>सभी ब्लॉगर इस विवाह में आमंत्रित हैं… (अम्बुमणि रामदौस के साथ)

>No Smoking Act Ambumani Ramdaus
2 अक्टूबर से नशामुक्ति अभियान के तहत सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट पीने पर प्रतिबन्ध लग गया है। अतः इस अवसर पर सभी ब्लॉगरों से एक विवाह में शामिल होने का अनुरोध किया जाता है…

शुभ विवाह……… शुभ विवाह………… शुभ विवाह……
||अमंगलम् गुटखा खाद्यम धूम्रपानं, अमंगलं सर्वव्यसनम्||
||कराग्रे वसते बीड़ी, करमध्ये चुरुटम्, करमूले स्थितो गुटखायाः प्रभाते कर दर्शनम्||
दुर्भाग्यवती – बीड़ी कुमारी उर्फ़ सिगरेट देवी

कुपुत्री श्री तम्बाकूलाल एवं श्रीमती तेंदूपत्ता बाई
निवासी – 420, यमलोक हाऊस, दुःखनगर…

के संग

मृतात्मा – कैंसर कुमार उर्फ़ लाईलाज बाबू

कुपुत्र – श्री गुटखालाल जी एवं श्रीमती भांगदेवी
निवासी – गलत रास्ता, व्यसनपुर (नशाप्रदेश)

का अशुभ विवाह बड़े ही अमंगल समय पर तय हुआ है। अतः इस भयानक प्रसंग पर चाचा गांजासिंह, चाची अफ़ीम देवी, दादा हुक्काराम, दादी सुल्फ़ीदेवी, मामा चरसराम, मामी शराब देवी, देवर ड्रग कुमार, नाना चाय सिंह, नानी कॉफ़ीदेवी, ताऊ चूनाराम, फ़ूफ़ा जर्दाराम, जैसे खतरनाक बुजुर्गों की उपस्थिति में नवदम्पति को अभिशाप प्रदान करने हेतु सादर आमंत्रित हैं…

विवाह समय – अनिश्चित काल
विवाह स्थल – श्मशान घाट मैरिज गार्डन, चिन्ता भवन, कष्ट मोहल्ला, दुर्गति गली, दुःखनगर (जिला परलोकपुर)

दर्शनाभिलाषी
सेठ दमादास, श्रीमती टीबी बाई,
श्रीमती खांसीबाई एवं समस्त नशे की गोलियाँ
हेरोईन के सभी इंजेक्शन तथा कुख्यात पिच्च-थू परिवार

बाल मनुहार : “हमाली बदबूदाल बुआजी की छादी में जलूल-जलूल आना” – कटी-छिली सुपारी

बारातियों के लिये नोट –
1) बारात एम्बूलेंस से कैंसर अस्पताल होते हुए काल घड़ी में श्मशान घाट मैरिज गार्डन पहुँचेगी।
2) बारातियों का स्वागत चिलम के एक-एक सुट्टे से किया जायेगा व यमराज महाशय का आशीर्वाद मुफ़्त में मिलेगा।

आगंतुकों से अनुरोध है कि वे चाहें तो अपने ईष्ट मित्रों को भी साथ ला सकते हैं…

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>दारू चढ़ने के बाद बके जाने वाले विशिष्ट बोल…

>बात है सन् 1988 की, यानी बीस साल पहले की, जब हमारी इन्दौर में नई-नई नौकरी लगी थी। हम चार रूम पार्टनर थे, चारों टूरिंग जॉब में थे, और जो रूम हमने ले रखा था, मकान मालिक को यह बताकर लिया था कि दो ही लड़के रहेंगे, क्योंकि हमें मालूम था कि हममें से कोई दो तो हमेशा टूर पर रहेंगे, लेकिन संयोग से (या कहें कि दुर्योग से) कभी-कभार ऐसा मौका आ ही जाता था कि हम चारों साथ-साथ उसी शहर में पाये जाते थे, तब समस्या यह होती थी कि अब क्या करें? यदि रात को जल्दी घर पहुँचें तो मकान मालिक को कैफ़ियत देनी पड़ेगी, फ़िर क्या था हमारा एक ही ठिकाना होता था, छावनी चौक स्थित “जायसवाल बार”। खूब जमती थी महफ़िल जब मिल जाते थे चार यार…।

दो-चार दिन पहले एक ई-मेल प्राप्त हुआ जिसमें दारू पीने के बाद (बल्कि चढ़ने के बाद) होने वाले वार्तालाप (बल्कि एकालाप) पर विचार व्यक्त किये गये थे। वह ई-मेल पढ़कर काफ़ी पुरानी सी यादें ताज़ा हो आईं, उन दिनों की जब हम भी पीते थे। जी हाँ, बिलकुल पीते थे, सरेआम पीते थे, खुल्लमखुल्ला पीते थे, छुप-छुपकर नहीं, दबे-ढ़ंके तौर पर नहीं।

आज वह ई-मेल देखा और बरसों पुरानी याद आ गई, उन दिनों में जब हम चारों की ही शादी नहीं हुई थी और कम्पनी की मेहरबानी से जेब में पैसा भी दिखता रहता था। 1988 में तनख्वाह के तौर पर उस प्रायवेट कम्पनी में 940 रुपये बेसिक मिलता था, टूरिंग के लिये 120 रुपये रोज़ाना (होटल खर्च) अलग से। महीने में 20-22 दिन तो टूर ही रहता था, सो लगभग 1000 रुपये महीने की बचत हो ही जाती थी। लेकिन उन दिनों उस उमर में भला कोई “बचत” के बारे में सोचता भी है? (ठीक यही ट्रेण्ड आज भी है, वक्त भले बदल जाये नौजवानों की आदतें नहीं बदलतीं)। दारू-सिगरेटनुमा छोटी-मोटी ऐश के लिये उन दिनों 1000 रुपये प्रतिमाह ठीक-ठाक रकम थी। चारों यार मिलते, साथ बैठते, शाम को 8 बजे बार में घुसते और रात को दो बजे निकलते (जब वहाँ का चौकीदार भगाता)। वो भी क्या सुहाने दिन थे… याद न जाये बीते दिनों की… बार में खासतौर पर काँच वाली खिड़की के पास की टेबल चुनते थे, उन दिनों लड़कियों ने ताजी-ताजी ही जीन्स पहनना शुरु किया था, सो कभी-कभार ही कोई एकाध लड़की जीन्स पहने हुए दिखाई दे जाती थी, बस फ़िर क्या था, उस पर विस्तार से चर्चा की जाती थी (तब तक एक पैग समाप्त होता था)… “बैचलर लाइफ़” की कई-कई यादें हैं कुछ सुनहरी, कुछ धुँधली, कुछ उजली, कुछ महकती, कुछ चहकती हुई… बहरहाल उसकी बात कभी बाद में किसी पोस्ट में की जायेगी, फ़िलहाल आप मजे लीजिये उन चन्द वाक्यों का जो कि दारू चढ़ने के बाद खासमखास तौर पर कहे जाते हैं (कहे क्या जाते हैं, बके जाते हैं)…

मैं यहाँ आमतौर पर बके जाने वाले वाक्य जैसे “यार ये पाँच में से चार लाईटें बन्द कर दे…” (भले ही कमरे में एक ही लाईट जल रही हो), या फ़िर “वो देख बे, खिड़की में भूत खड़ा है…”, “अरे यार मेरे को कुछ हो जाये तो 100 डायल कर देना…”, “भाई मेरे को चढ़ी नहीं है तू टेंशन नहीं लेना…”… ये तो कॉमन लाईने हैं ही लेकिन और भी हैं जैसे –

1) तू मेरा भाई है भाई… (अक्सर ये भाई… टुन्न होने के बाद, “बाई” सुनाई देता है)
2) यू नो आय एम नॉट ड्रन्क!!! (पीने के बाद अंग्रेजी भी सूझने लगती है कभी-कभी)
3) हट बे गाड़ी मैं चलाऊँगा…
4) तू बुरा मत मानना भाई… (साथ में पीने के बाद सब आपस में भाई-भाई होते हैं)
5) मैं दिल से तेरी इज्जत करता हूँ…
6) अबे बोल डाल आज उसको दिल की बात, आर या पार… (चने के झाड़ पर चढ़ाकर जूते खिलवाने का प्रोग्राम)
7) आज साली चढ़ ही नहीं रही, पता नहीं क्या बात है? (चौथे पैग के बाद के बोल…)
8) तू क्या समझ रहा है, मुझे चढ़ गई है?
9) ये मत समझना कि पी के बोल रहा हूँ…
10) अबे यार कहीं कम तो नहीं पड़ेगी आज इतनी? (खामखा की फ़ूँक दिखाने के लिये…)
11) चल यार निकलने से पहले एक-एक छोटा सा और हो जाये…
12) अपने बाप को मत सिखाओ बेटा…
13) यार मगर तूने मेरा दिल तोड़ दिया… (पाँचवे पैग के बाद का बोल…)
14) कुछ भी है पर साला भाई है अपना, जा माफ़ किया बे…
15) तू बोल ना भाई क्या चाहिये, जान हाजिर है तेरे लिये तो… (ये भी पाँचवे पैग के बाद वाला ही है…)
16) अबे मेरे को आज तक नहीं चढ़ी, शर्त लगा ही ले साले आज तो तू…
17) चल आज तेरी बात करा ही देता हूँ उससे, मोबाइल नम्बर दे उसका… क्या अपने-आपको माधुरी दीक्षित समझती है साली…
18) अबे साले तेरी भाभी है वो, भाभी की नज़र से देखना उसको आज के बाद…
19) यार तू समझा कर, वो तेरे लायक नहीं है… (यानी कि मेरे लायक ही है…)
20) तुझे क्या लगता है मुझे चढ़ गई है, अबे एक फ़ुल और खतम कर सकता हूँ…
21) यार आज उसकी बहुत याद आ रही है…

और सबसे खास और सम्भवतः हर बार बोला जाने वाला वाक्य…
22) बस…बहुत हुआ, आज से साली दारू बन्द… (तगड़ी बहस और लगभग झगड़े की पोजीशन बन जाने पर)

और इस अन्तिम “घोषवाक्य” पर सच्चाई और निष्ठा से अमल करने वाले 5% ही होते हैं, जिनमें मैं भी शामिल हूँ…

ऐसा माना जाता है कि जीवन में सबसे गोल्डन समय होता है बचपन का जो कि सही भी है क्योंकि बचपन में हमें किसी बात की चिन्ता नहीं करना पड़ती, परन्तु मेरे हिसाब से जीवन का एक और दौर गोल्डन होता है – वह है नौकरी लगने और शादी होने के बीच का समय, जिसे हम “प्योर बैचलर लाइफ़” कह सकते हैं, जब जेब में पैसा भी होता है और पत्नी-बच्चों की जिम्मेदारी भी नहीं होती… इस गोल्डन दौर में ही असली और खुलकर मौजमस्ती की जाती है। हाँ, एक बात है कि… उम्र का यह गोल्डन दौर ज़्यादा लम्बा भी नहीं होना चाहिये… वरना…। हर काम करने का एक समय होता है, यदि व्यक्ति उसके बाद भी अपना शौक जारी रखे तो समझना चाहिये कि उसका शौक व्यसन बन चुका है, इसलिये शराब पीने की मनाही नहीं है, लेकिन आपको अपनी “लिमिट” पता होना चाहिये और आपमे इतना आत्मविश्वास होना चाहिये कि जब चाहें उसे छोड़ सकें, नहीं तो फ़िर वह आनन्द नहीं रह जायेगा, बल्कि लोगों और परिवार को दुःख पहुँचायेगा।

बहरहाल, जिसने कभी पी नहीं, वह इसको नहीं समझ सकता, लेकिन उसे आलोचना करने का भी हक नहीं है, क्योंकि उसे क्या मालूम कि “सुरा” क्या बला होती है, बड़े-बड़े लोगों ने इस “चमत्कारिक शै” के बारे में बहुत सारे कसीदे काढ़ रखे हैं… डॉक्टर भी कहते हैं कि यदि रोज़ाना एक पैग लिया जाये तो शरीर कई बीमारियों से बचा रह सकता है… तो हम और आप क्या चीज़ हैं…

अन्त में एक वाकया –
रोज-ब-रोज पीकर घर आने वाले पति से पत्नी ने कहा कि कल से मैं भी तुम्हारे साथ बार में चलूंगी और शराब पियूंगी, देखते हैं क्या होता है?
पति ने समझाया कि शराब तुम्हारे लायक नहीं है, तुम वहाँ मत चलो।
पत्नी ने जिद की और दोनों साथ में बार में पहुँचे, व्हिस्की का ऑर्डर दिया।
पहला सिप लेते ही पत्नी ने बुरा सा मुँह बनाया और लगभग उबकाई लेते हुए बोली, “कितना घटिया, कसैला और कड़वा स्वाद है”…
पति दार्शनिक अन्दाज़ में बोला – देखा!!! और तुम सोचती थीं कि हम लोग यहाँ ऐश करते हैं…

नोट : कभी-कभी ऐसी पोस्ट भी लिख लेना चाहिये…

>कुछ मजेदार विज्ञापन बोर्ड

>Advertising, hoarding, Airways, Kingfisher

विज्ञापन की दुनिया भी अनोखी है, मजेदार है, क्रियेटिव है… हालांकि अधिकतर बार विज्ञापन हमारी जेबों पर डाका ही डालते हैं, लेकिन कभी-कभी कुछ विज्ञापन बेहद चुटीले, व्यंग्यात्मक और बेहतरीन कलाकारी का नमूना होते हैं… प्रस्तुत होर्डिंगों के चित्र हालांकि पुराने हैं लेकिन उनमें एक के बाद जुड़ते जाने के कारण हो सकता है कि कुछ पाठकों ने इन्हें नहीं देखा होगा, उन्हें जरूर मजा आयेगा…

भारतीय आकाश की सीमायें खुल जाने से हवाई कम्पनियों में जबर्दस्त होड़ मची हुई है, विलय, अधिग्रहण, शेयर खरीदना-बेचना, जगहों-हवाई अड्डों पर कब्जे जैसी खबरें अब आम हो चली हैं… ऐसे माहौल में मुम्बई में लगे हुए यह विज्ञापन होर्डिंग अनायास ही ध्यान खींचते हैं और मुस्कराने पर मजबूर कर देते हैं…

सबसे पहले देखें “जेट एयरवेज” का बोर्ड, वे कहते हैं – “हम बदल गये हैं…”

फ़िर उसी के ऊपर कुछ दिन बाद “किंगफ़िशर एयरलाइंस” का बोर्ड लग गया – “हमने उन्हें बदलने पर मजबूर कर दिया…”

अब बारी थी “गो एयर” कम्पनी की – उन्होंने बोर्ड लगाया “हम तो नहीं बदले… हम अभी भी वैसे ही स्मार्ट हैं…”

लेकिन इसके बाद असली बोर्ड लगे हैं, जो विशुद्ध भारतीय हास्य-व्यंग्य का माद्दा रखते हैं… पहले बोर्ड में रेल्वे का विज्ञापन है, लालू “ब्रांड एम्बेसेडर” हैं और पंच लाईन है – “हम कभी नहीं बदलेंगे…”
फ़िर उसी के ऊपर अन्तिम बोर्ड लग गया मुम्बई बस सेवा “बेस्ट” का, वे कहते हैं- अब “बस” करो, वरना होर्डिंग हवाई जहाज से टकरा जायेंगे…

है न मजेदार…।
(एक ई-मेल द्वारा प्राप्त)

>मैं “असामाजिक” नहीं रहा- अथ मोबाइल गाथा

>Mobile Usage Social & Unsocial

जी हाँ बन्धुओं और भगिनियों, कल से मैं “असामाजिकता” से बाहर आ गया हूँ, और मेरे सामाजिक होने का एकमात्र और सबसे बड़ा सबूत है “मेरे हाथ में मोबाइल”। कल से पहले तक जब भी मैं किसी नये व्यक्ति से मिलता तो सबसे पहले तपाक से मेरा नम्बर पूछता (मन में कई बार सवाल उठा कि उससे पूछूँ कि तुझे कौन सा नम्बर चाहिये, जूते का, चश्मे का, बनियान का, बाइक का, लेकिन “सामाजिकता” के नाते पूछता नहीं था), और जब मैं उसे अपना लैंडलाइन (बीएसएनएल) का नम्बर देने की “कोशिश” करता, कोशिश इसलिये लिख रहा हूँ कि, मेरे यह बताते ही कि “मेरे पास मोबाइल नहीं है” कोई व्यक्ति मुझे ऐसे देखता था जैसे मैं मंगल ग्रह का प्राणी हूँ, कोई मुझे ऐसे देखता जैसे जिन्ना हाउस में रहने वाला झुग्गी वाले को देखता है और कोई-कोई तो खामख्वाह ही ऐसे तन जाता जैसे अभी-अभी उसे प्रेस कर दिया हो… गरज यह कि मैं मोबाइलधारी नहीं हूँ, यह “कुख्याति” धीरे-धीरे आसपास के चार गाँवों में भी फ़ैलने लगी थी।

अंततः हारकर मन में विचार आया कि अब मैं “समाज” से कट कर असामाजिक तत्व नहीं रह सकता और मुझे यह घंटी अपने गले में बाँधने के अलावा कोई चारा नहीं है। लेकिन मैं मोबाइल खरीदने को जितना आसान काम समझता था, उतना वह था नहीं। हम तो भई मोबाइल की दुनिया में कदम ही पहली बार रख रहे थे, जबकि मित्र के बच्चे चार कदम चलना सीखते ही मोबाइल पर माँ से दूध माँगना सीख चुके थे, ऐसे में आपके आसपास अचानक “रायचन्दों” की भीड़ लग जाती है। मेरे मुँह से “मोबाइल” सुनते ही भाई लोग मानो टूट पड़ते थे। जीपीआरएस, जीएसएम, नेटवर्क, सिम, रिंगटोन, एमपी३, कैमरा, वीजीए, मेगापिक्सेल नामक भयानक और बड़े-बड़े शब्दों की गोलीबारी आरम्भ हो जाती थी। सामने वाले को क्या मालूम था कि वह बीन बजा रहा है और सामने नाग नहीं, भैंस है। जब रायचन्द बोलना समाप्त करता था तब तक मेरे चेहरे पर उभरने वाले भाव देखकर ही वह सारा माजरा समझ जाता था। फ़िर खीझ और झेंप मिटाने के लिये “देखो भैया चीज लो तो बढ़िया लो, अपना काम था आपको सही सलाह देना… आगे आपकी मर्जी” कहकर ये जा और वो जा।

खैर, तीन-चार दिन की मगजमारी के बाद अपने बजट का एक मोबाइल ले लिया। मैंने सोचा था कि चलो जान छूटी, लेकिन अभी कहाँ जनाब, अगला कदम था कोई कनेक्शन लेना। फ़िर सारे रायचन्द एकत्रित। बीएसएनएल मत लेना यार, मेरा तो एयरटेल है, एकदम बढ़िया, बीएसएनएल का तो फ़ुल फ़ॉर्म ही है “भाई साहब नहीं लगता”….” दूसरा राय देता कि भाई प्रायवेट कम्पनियों के चक्करों में मत पड़ो, सरकारी कम्पनी चाहे कितनी भी निकम्मी हो, लेकिन बिलिंग के मामले में ईमानदार है, आईडिया ले लिया तो फ़ँस जाओगे (आईडिया तो मैं वैसे भी नहीं लेने वाला था, क्योंकि ऐश्वर्या राय से शादी के कारण मैं अभिषेक से वैसे ही चिढ़ा हुआ था), एक दुकानदार और एक एयरटेल के सेल्समैन ने मुझे दिन भर रीचार्ज, वाउचर, कूपन, टॉकटाइम, प्रीपेड-पोस्टपेड आदि के बारे में इतना पकाया कि मुझे अपने लैंडलाइन के निर्जीव फ़ोन पर बेहद प्यार आने लगा। पचास पैसे कॉल, पच्चीस पैसे में SMS आदि सुनकर मुझे लगा कि अभी मुद्रा का इतना भी अवमूल्यन नहीं हुआ है, जितना मैं सोचता था। एक तो वैसे ही मैं गणित और अकाउंट्स में कमजोर हूँ और उस पर दो-दो लोग भिन्न-भिन्न “पैसा बचाओ” स्कीम समझाने पर उतारू हो गये।

मेरी हालत उस खरबूजे की तरह थी कि उस पर छुरी गिरे या वह छुरी पर कटना तो उसी को था, लेकिन मरता क्या न करता, “असामाजिक” नाम के धब्बे को मिटाने के लिये यह संघर्ष तो करना ही था, और आखिर मैंने मोबाइल चालू करवा ही लिया। लेकिन भाईयों अभी भी “रायचन्द” पीछा नहीं छोड़ रहे हैं, “आपने कवर लगवाया कि नहीं, धूल बहुत है अपने यहाँ…” “पुराने गानों की रिंगटोन क्यों डलवाई…”, “कमर पर बाँधने वाला वालेट ले लो, अच्छा रहता है”, “च, च, च… अरे-अरे, एयरटेल का पोस्ट पेड ले लिया, क्या यार… हमें बताते बीएसएनएल में अपनी अच्छी चलती है…”, “नेट से वॉलपेपर डाऊनलोड मत करना वायरस आ जायेगा…”…. लगता है कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया है यह “राय”… ऊपर से तुर्रा यह कि यार-दोस्तों के फ़ोन आने से पहले ही, चड्डी-बनियान से लेकर हवाई जहाज के टिकट तक मुफ़्त में देने वाले विज्ञापन आने लगे हैं… अब बतायें मैं क्या करूँ… एक सामाजिक प्राणी घोषित होने की खुशी मनाऊँ या गले में पड़े इस मोबाइल नामक पट्टे को झेलता जाऊँ, झेलता जाऊँ….

आप लोग रायचन्द भले ही न हों, लेकिन चन्द “राय” अवश्य दें… 🙂

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>राम-सेतु पर राम-हनुमान का रोचक संवाद

>Ram Hanuman Dialogue on Ramsetu

भगवान महाप्रभु ने “राम-सेतु” का अवलोकन किया और भक्त हनुमान से कहा – हे पवनपुत्र, तुमने और तुम्हारी वानर सेना ने किस खूबसूरती और मजबूती से हजारों वर्ष पूर्व इस सेतु का निर्माण किया है, यह देखकर मैं बहुत खुश हूँ। मुझे तुम्हें शाबाशी देना चाहिये कि तमाम पर्यावरणीय और पारिस्थितिकीय दबावों के बावजूद यह पुल सुरक्षित रहा और इसने सुनामी को भी रोके रखा। हनुमान, वाकई यह तुम्हारा एक स्तुत्य कार्य है, खासकर तब जबकि हैदराबाद में “गैमन” जैसी विशालकाय कम्पनी का बनाया हुआ पुल उद्‌घाटन से पहले ही गिर गया है।

हनुमान ने कहा – प्रभु यह सब आपकी कृपा के कारण सम्भव हुआ था, हम तुच्छ वानर तो सिर्फ़ आपका नाम लिखे हुए पत्थर समुद्र में डालते गये, ना ही हमने टाटा का स्टील लिया था और न ही अम्बुजा और एसीसी का सीमेंट वापरा था, लेकिन प्रभु वह तो बहुत पुरानी बात है, इस वक्त यह मुद्दा क्यों?

बात ही कुछ ऐसी है भक्त, वहाँ नीचे पृथ्वी पर कुछ लोग तुम्हारा बनाया हुआ वह पुल तोड़ना चाहते हैं, ताकि उसके बीच में से एक नहर निकाली जा सके। उस ठेके में अरबों रुपये का धन लगा है, करोड़ों का फ़ायदा होने वाला है, यहाँ तक कि उस पुल को तोड़ने में ही “कुछ लोग” करोड़ों कमा जायेंगे, नहर तो बाद में बनेगी….

हनुमान ने भक्ति से सिर नवाकर पूछा – तो प्रभु क्यों ना हम पुनः धरा पर जायें और उन्हें समझाइश देने की कोशिश करें…
राम बोले – नहीं वत्स, अब समय बहुत बदल चुका है। यदि हम धरती पर चले भी गये तो सबसे पहले वे लोग तुमसे तुम्हारा आयु का प्रमाण माँगेंगे, या फ़िर स्कूल छोड़ने का प्रमाणपत्र, जबकि हमारे पास तो जन्म प्रमाणपत्र भी नहीं है। हे अंजनीपुत्र, हम तो सदियों से पैदल ही चलते रहे हैं, कभी-कभार बैलगाड़ी में भी सफ़र किया है, सो हमारे पास ड्रायविंग लायसेंस भी नहीं है। जहाँ तक निवास का प्रमाणपत्र देने की बात है तो पहले हमने सोचा था कि “अयोध्या” का निवास प्रमाणपत्र दे देंगे, लेकिन वह पवित्र भूमि तो पिछले पचास साल से न्यायालय में अटकी पड़ी है। यदि मैं “अरुण गोविल” की तरह पारम्परिक धनुष-बाण लिये राम बन कर जाऊँ तो वे मुझे पहचानना तो दूर, कहीं मुझे किसी आदिवासी इलाके का समझकर नृत्य ना करवाने लगें या “भारत-भवन” भेज दें। ये भी हो सकता है कि अर्जुन सिंह मुझे आईआईटी में एक सीट दे दें। भगवान स्वयं थ्री-पीस सूट में जनता के पास जायें तो जनता में भारी भ्रम पैदा हो जायेगा….

हनुमान ने कहा- प्रभुवर मैं आपकी तरफ़ से जाता हूँ और लोगों को बताता हूँ कि यह पुल मैंने बनाया था।

ओह मेरे प्रिय हनुमान, राम बोले- इसका कोई फ़ायदा नहीं है, वे लोग तुमसे इस “प्रोजेक्ट” का “ले-आऊट प्लान”, प्रोजेक्ट रिपोर्ट, फ़ायनेन्शियल रिपोर्ट माँगेंगे। वे तुमसे यह भी पूछेंगे कि इतने बड़े प्रोजेक्ट के लिये पैसा कहाँ से आया था और समूचा रामसेतु कुल कितने लाख डॉलर में बना था, और यदि तुमने यह सब बता भी दिया तो वे इसका पूर्णता प्रमाणपत्र (Completion Certificate) माँग लेंगे, तब तुम क्या करोगे पवनपुत्र। फ़िलहाल तो धरती पर जब तक डॉक्टर लिखकर ना दे दे व्यक्ति बीमार नहीं माना जाता, यहाँ तक कि पेंशनर को प्रत्येक महीने बैंक के अफ़सर के सामने गिड़गिड़ाते हुये अपने जीवित होने का प्रमाण देना पड़ता है। तुम्हारी राह आसान नहीं है, हनुमान!

हनुमान बोले- हे राम, मैं इन इतिहासकारों को समझ नहीं पाता। सदियों-वर्षों तक आपने कई महान भक्तों जैसे सूरदास, तुलसीदास, सन्त त्यागराज, जयदेव, भद्राचला रामदास और तुकाराम को दर्शन दिये हैं, लेकिन फ़िर भी वे आप पर अविश्वास दर्शा रहे हैं? आपके होने ना होने पर सवाल उठा रहे हैं? अब तो एक ही उपाय है प्रभु… कि धरती पर पुनः एक रामायण घटित की जाये और उसका एक पूरा “डॉक्यूमेंटेशन” तैयार किया जाये।

प्रभु मुस्कराये (ठीक वैसे ही जैसे रामानन्द सागर के रामायण में करते थे), बोले- हे पवनपुत्र, अब यह इतना आसान नहीं रहा, अब तो रावण भी करुणानिधि के सामने आने में शर्मा जायेगा। मैंने उसके मामा यानी “मारीच” से भी बात की थी लेकिन अब वह भी “सुनहरी मृग” बनने की “रिस्क” लेने को तैयार नहीं है, जब तक कि सलमान जमानत पर बाहर छुट्टा घूम रहा हो। यहाँ तक कि शूर्पणखा भी इतनी “ब्यूटी कांशस” हो गई है कि वह नाक कटवाने को राजी नहीं है, बालि और सुग्रीव भी एक बड़ी कम्पनी में पार्टनर हो गये हैं सो कम ही झगड़ते हैं, फ़िर कहीं मैंने शबरी से बेर खा लिये तो हो सकता है मायावती वोट बैंक खिसकता देखकर नाराज हो जायें… तात्पर्य यह कि, हे गदाधारी, वहाँ समस्याएं ही समस्याएं हैं… बेहतर है कि अगले “युग” का इन्तजार किया जाये…
(एक ई-मेल पर आधारित)

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>शादी की अंगूठी “अनामिका” में ही क्यों पहनी जाती है?

>Wedding Ring Finger

शायद वर्षों से यह परम्परा चली आ रही है कि सगाई या शादी की अंगूठी हमेशा “अनामिका” उंगली में ही पहनी जाती है। हालांकि इस परम्परा के बारे में अधिक जानकारी का अभाव है, लेकिन अब चूँकि परम्परा है तो लोग लगातार निभाये जाते हैं। हाल ही में एक ई-मेल में यह रोचक जानकारी मिली, जिसमें अनूठे “लॉजिक” के जरिये यह सिद्ध किया गया है कि अंगूठी उसी उंगली में क्यों पहनना चाहिये, आप भी मुलाहिजा फ़रमाईये –

सर्वप्रथम माना कि सबसे मजबूत होते हैं अंगूठे अर्थात उन्हें हम माता-पिता की संज्ञा दें –
फ़िर अगली उंगली “तर्जनी” को माना जाये हमारे भाई-बहन –
फ़िर आती है बीच की उंगली “मध्यमा” ये हैं हम स्वयं (परिवार का केन्द्रबिन्दु) –
उसके बाद रिंग फ़िंगर “अनामिका” जिसे हम मान लेते हैं, पत्नी –
सबसे अन्त में “कनिष्ठा” उंगली को हम मानते हैं, हमारे बच्चे –

अब चित्र में दिखाये अनुसार अपनी दोनों हथेलियाँ पूरी फ़ैलाकर उनके पोर आपस में मिला लीजिये और बीच की दोनो उंगलियाँ “मध्यमा” (ऊपर माना गया है कि जो आप स्वयं हैं) को अपनी तरफ़ मोड़ लीजिये, हथेलियों को जोड़े रखिये –

अब दोनो अंगूठों (जिन्हें हमने माता पिता माना है) को अलग-अलग कीजिये, क्योंकि अनचाहे ही सही माता-पिता जीवन भर हमारे साथ नहीं रह सकते। फ़िर अंगूठों को साथ मिला लीजिये।
अब दोनों तर्जनी (जिन्हें हमारे भाई-बहन, रिश्तेदार माना है) को अलग-अलग करके देखिये, क्योंकि भाई-बहन और रिश्तेदार भी उम्र भर साथ नहीं रहने वाले, उनके भी अपने परिवार हैं। फ़िर वापस तर्जनी अपनी पूर्व स्थिति में ले आईये।
अब सबसे छोटी कनिष्ठा (हमारे बच्चे) को भी अलग कर देखिये, वे भी जीवन भर हमारे साथ नहीं रहने वाले हैं, बड़े होकर कहीं दूर निकल जायेंगे। पुनः दोनो उंगलियों को वापस पूर्वस्थान पर रख लें।
अब सबसे अन्त में “अनामिका” को अलग-अलग करने की कोशिश कीजिये, नहीं होंगी, क्योंकि पति-पत्नी को आजीवन साथ रहना होता है, तमाम खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ, इसीलिये “अनामिका” में शादी की अंगूठी पहनाई जाती है। एक बार यह करके देखिये….

>नोकिया वालों लगे रहो….

>जब से नोकिया वालों ने “ईमानदारी” दिखाई है और फ़ोकट में बैटरी बदलने की बात कर दी है, मेरे कस्बे में मानो उफ़ान ही आ गया है। जमाने के साथ चलते हुए हमारे कस्बे में भी अब हजारों-हजार मोबाइल और मोबाइलधारी पैदा हो गये हैं, जाहिर है कि उसमें “नोकिया” वालों की संख्या ही सबसे ज्यादा है। अब भले ही नोकिया वाले गला फ़ाड़-फ़ाड़कर चिल्लाते रहे हों कि “सिर्फ़ नवम्बर 2005 से दिसम्बर 2006 के बीच बनी कुछ बैटरियाँ, और वो भी मात्सुशिता कम्पनी की, ही खराब हैं, लेकिन यहाँ पर भाई लोगों को हरेक फ़ोन में खराबी दिखाई देने लगी है, लेकिन अपने तो मजे ही मजे हैं, आप सोचेंगे कि क्या बात कर रहा है यार, यहाँ जान पर आ बनी है, पता नहीं कब मोबाइल कान के पास ही फ़ट जाये और दिमाग की पाव-भाजी बन जाये या पैंट की जेब में रखे-रखे फ़ूट जाये और जनसंख्या बढाने का साधन ही समाप्त हो जाये और ये साला मजे की बात कर रहा है, तो भाईयों मैं समझाता हूँ कि बात क्या है, दरअसल अपन भी एक छोटा सा इंटरनेट पार्लर चलाते हैं, तो पिछले दस दिनों में ही बैटरी का नम्बर चेक करने के बहाने अपन ने पाँच-सात सौ रुपये कूट लिये। हर ऐरा-गैरा चला आ रहा है, भाई साहब जरा चेक तो करना कहीं मेरा मोबाइल फ़टने वाला तो नहीं है….लाओ पाँच रुपये अभी चेक कर देता हूँ (अभी तक मैंने चेक की हुई डेढ सौ बैटरियों में से सिर्फ़ एक ने ही खराब वाला “स्टेटस” दिखाया है नेट पर)। सबसे ज्यादा मजे तो आ रहे हैं देसी लोगों के “कमेंट्स” सुनने में, जरा मुलाहिजा फ़रमाईये – “ये सब नोकिया वालों की चाल है, अपनी मार्केटिंग करने की” (मुझे पता ही नहीं था कि नोकिया की भारत में बिक्री कम हो गई), “जापान की बैटरियाँ खराब बता रहे हैं ये लोग चाइना की घटिया बैटरियाँ लगवाना चाहते होंगे” (जॉर्ज फ़र्नांडीस के मुरीद होंगे), एक पहलवान तो दो महीने पहले खरीदे हुए मोबाईल की बैटरी भी बदलवा लाये। तो नोकिया के ऑफ़िस में माराकूटी हो ही रही है, बहती गंगा में हमने भी हाथ धो लिये, ठीक वैसे ही जैसे “ताज” के समय धोये थे, हमारे पार्लर से ठेले वाले, पान वाले, पंचर वाले, चाय पहुँचाने वाले, सभी ने “ताज” को वोट किया था (मतलब हमारे द्वारा करवाया था), तो भैया नोकिया हो या ताज वाले हों, ऐसे ही लगे रहो, हर दो महीने में कुछ नया लेकर आओ, ताकि हम गरीबों की दाल-रोटी भी चलती रहे। जय नोकिया…
विशेष नोट : तमाम मित्रों की पहले “हिकारत” भरी और अब “रश्क और तारीफ़” भरी निगाहों के बावजूद मैंने अभी तक मोबाइल नाम की बीमारी को बुलावा नहीं दिया है

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>"बडा़" आदमी दिखना है ? तीन नुस्खे नोट करें…

>जब भी सामने वाले सिन्हा जी सुबह घूमने निकलते तो आने-जाने वाले लोग उन्हें “विश” करते थे, मैं भी उन्हीं के साथ घूमने निकलता था, मुझे कोई विश तो क्या “हुश” भी नहीं करता था। ये सिलसिला काफ़ी समय चला तो मैं अवसाद में घिर गया, मुझे लगने लगा कि मैं बेहद दीन-हीन हूँ। आखिर में मैंने हिम्मत बटोरी और सोचा कि आखिर क्या कारण है कि सिन्हा से बडे़ ओहदे पर होने के बावजूद शिक्षाकर्मी तो क्या सफ़ाईकर्मी भी मुझे सलाम नहीं करते और वो सिन्हा एक मामूली सा “बाबुडा़” है, फ़िर भी! इस मामले में “रिसर्च” करना ही होगा… चारों तरफ़ नजर दौडा़ई तब जाकर कहीं ज्ञानचक्षु खुले। बडा़ आदमी दिखने के तीन राज़ समझ में आये, जिस किसी को भी मोहल्ले और आसपास में बडा़ आदमी बनना हो नोट कर लें । सबसे पहला राज़ यह था कि सिन्हा “चड्डी” पहनने लगा था.. ना, ना, ऐसी बात नहीं थी कि पहले नहीं पहनता था, अवश्य पहनता होगा, लेकिन अब वह थोडी़ बडी़ “चड्डी” पहनने लगा था जिसे लोग “बरमूडा” कहा करते हैं। सुबह घूमते वक्त जब वह अपनी बालों भरी टाँगों का खुला प्रदर्शन करता शान से चलता था, तो लोगबाग खुद-ब-खुद रास्ता छोड़ देते थे। बरमूडा में उसे देखकर यह भ्रम दूर हो जाता था कि जंगली भालू बरमूडा में कैसा दिखता होगा? अमीरी और गरीबी दोनो ही कपड़े उतारती है और फ़ाड़ती है, यह सत्य भी उजागर हो गया (भई, हमारी काम वाली बाई भी चिथडे़ पहनती है और मल्लिका भी)। ऑफ़िस का चपरासी भी रात-दिन चड्डी में ही घूमता था, क्योंकि उसके पास एक ही पैंट थी। पहला सबक हमने याद कर लिया कि “बडे़” आदमी बनना है, कुछ इज्जत कमाना है, तो घुटने तक आने वाला रंग-बिरंगा चड्डा पहनो (रंग-बिरंगा इसलिये, कि “खाकी” चड्डे के नाम से कुछ लोग वैसे ही बिदकते हैं, जैसे लाल रंग को देखकर सांड), उसमें नाडा़-वाडा़ लटकता हो या दो-चार पट्टियाँ इधर-उधर झूलती हुई हों तो सोने पर सुहागा। दूसरा राज़ था एक अदद कुत्ता, जी हाँ… जैसे ही आपने कुत्ता पाला, तड़ से आपकी इज्जत बढी़ ही समझो! शर्त सिर्फ़ इतनी सी है कि कुत्त्ता या तो एकदम छोटा सा, मरियल और चर्बी से ज्यादा बालों के वजन वाला हो, या फ़िर एकदम नंगा (पूँछ कटा हुआ)… बीच वाली कोई “रेंज” नहीं चलेगी। क्योंकि यदि आपने “बुलडॉग” पाल लिया तो रोज उसे मटन और दूध देने की औकात भी तो बनानी पडे़गी। कल ही बाजार से एक-दो “बरमूडा” और एक कुत्ता लाना ही पडे़गा, फ़िर उस कुत्ते की चेन पकड़ कर जब मैं सुबह उसे हगाता हुआ चलूँगा तो क्या नजारा होगा, आगे-आगे कुत्ता और पीछे-पीछे मैं…। ना तो युधिष्ठिर ना वह कुत्ता सशरीर स्वर्ग में जाते वक्त इतने खुश हुए होंगे… यह सोच-सोचकर ही मन पुलकित हो रहा है। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण गुर यह सीखा कि आपके घर पर जो भी आये उसे दरवाजे पर टँगा हुआ छोड़कर आप आराम से नहाने-धोने को चले जायें (या कम से कम “साहब बाथरूम में हैं” यह तो बाहर कहलवा ही दें)। भारत के जितने बडे़ आदमी होते हैं वे कम से कम दिन में चार बार तो बाथरूम में होते ही हैं और वह भी कम-से-कम एक घंटे के लिये। कई बार विचार आया कि सचिवालयों में एक सार्वजनिक बाथरूम बना दिया जाये जिससे वहीं पर साहब लोग अपना काम निपटा लेंगे, सरकार की काम की गति बढेगी। बहरहाल… जब आपके घर के बाहर के मच्छर उसके खून का पूरा नमूना ले लें, आपका नया-नवेला टॉमी भी उसका परिचय प्राप्त कर ले, सामने वाला व्यक्ति लगभग जाने को उद्यत हो, तभी दरवाजे पर आप प्रकट हों… ये नहीं कि दरवाजे की घंटी बजी और पजामे का लटकता नाडा़ लिये आप ही दरवाजा खोलने चल पडे़। नौकर, बाई, चौकीदार.. कोई नहीं हो तो बच्चे से ही कहलवा दें कि “साहब आ रहे हैं”, वरना लोग आपको फ़ालतू समझेंगे। ये तीन दाँव तो आज से ही आजमाता हूँ, फ़िर देखता हूँ लोग कैसे मुझे सलाम नहीं करते?

>"सैंडी" का फ़्रेण्डशिप बैंड

>उस दिन शाम को “सैंडी” बहुत दुःखी दिख रहा था, ना.. ना.. “सैंडी” कोई अमेरिकन नहीं है बल्कि कल तक नाक पोंछने वाला हमारा सन्दीप ही है । मेरे पूछते ही मानो उसका दुःख फ़ूट पडा़, बोला – भाई साहब, सारे शहर में ढूँढ कर आ रहा हूँ, “फ़्रेंडशिप बैंड” कहीं नहीं मिल रहा है । यदि मैं पूछता कि यह फ़्रेंडशिप बैंड क्या है, तो निश्चित ही वह मुझे ऐसे देखता जैसे वह अपने पिता को देखता है जब वह सुबह उसे जल्दी उठाने की कोशिश करते हैं, प्रत्यक्ष में मैने सहानुभूति जताते हुए कहा – हाँ भाई ये छोटे नगर में रहने का एक घाटा तो यही है, यहाँ के दुकानदारों को जब मालूम है कि आजकल कोई ना कोई “डे” गाहे-बगाहे होने लगा है तो उन्हें इस प्रकार के आईटम थोक में रखना चाहिये ताकि मासूम बच्चों (?) को इधर-उधर ज्यादा भटकना नहीं पडे़गा । संदीप बोला – हाँ भाई साहब, देखिये ना दो दिन बीत गये फ़्रेंडशिप डे को, लेकिन मैंने अभी तक अपने फ़्रेंड को फ़्रेंडशिप बैंड नहीं बाँधा, उसे कितना बुरा लग रहा होगा…। मैने कहा – लेकिन वह तो वर्षों से तुम्हारा दोस्त है, फ़िर उसे यह बैंड-वैंड बाँधने की क्या जरूरत है ? यदि तुमने उसे फ़्रेंडशिप बैंड नहीं बाँधा तो क्या वह दोस्ती तोड़ देगा ? या मित्रता कोई आवारा गाय-ढोर है, जो कि बैंड से ही बँधती है और नहीं बाँधा तो उसके इधर-उधर चरने चले जाने की संभावना होती है । अब देखो ना मायावती ने भी तो भाजपा के लालजी भय्या को फ़्रेंडशिप बैंड बाँधा था, एक बार जयललिता और ममता दीदी भी बाँध चुकी हैं, देखा नहीं क्या हुआ… फ़्रेंडशिप तो रही नहीं, “बैंड” अलग से बज गया, इसलिये कहाँ इन चक्करों में पडे़ हो… (मन में कहा – वैसे भी पिछले दो दिनों में अपने बाप का सौ-दो सौ रुपया एसएमएस में बरबाद कर ही चुके हो) । सैंडी बोला – अरे आप समझते नहीं है, अब वह जमाना नहीं रहा, वक्त के साथ बदलना सीखिये भाई साहब… पता है मेरे बाकी दोस्त कितना मजाक उडा़ रहे होंगे कि मैं एक फ़्रेंडशिप बैंड तक नहीं ला सका (फ़िर से मेरा नालायक मन सैंडी से बोला – जा पेप्सी में डूब मर) । फ़िर मैने सोचा कि अब इसका दुःख बढाना ठीक नहीं, उसे एक आईडिया दिया…ऐसा करो सैंडी… तुमने बचपन में स्कूल में बहुत सारा “क्राफ़्ट” किया है, एक राखी खरीदो, उसके ऊपर लगा हुआ फ़ुन्दा-वुन्दा जो भी हो उसे नोच फ़ेंको, उस पट्टी को बीच में से काटकर कोकाकोला के एक ढक्कन को चपटा करके उसमें पिरो दो, उस पर एक तरफ़ माइकल जैक्सन और मैडोना का और दूसरी तरफ़ संजू बाबा और मल्लिका के स्टीकर लगा दो, हो गया तुम्हारा आधुनिक फ़्रेंडशिप बैंड तैयार ! आइडिया सुनकर सैंडी वैसा ही खुश हुआ जैसे एक सांसद वाली पार्टी मन्त्री पद पाकर होती है… मेरा मन भी प्रफ़ुल्लित (?) था कि चलो मैने एक नौजवान को शर्मिन्दा (!) होने से बचा लिया ।

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>टेलीमार्केटिंग से बचने के तरीके

>आजकल टेलीमार्केटिंग कम्पनियों का जमाना है, रोज-ब-रोज कोई ना कोई बैंक, इंश्योरेंस, फ़ाईनेंस एजेन्सी आदि-आदि फ़ोन कर-कर के आपकी नींद खराब करते रहते हैं, ब्लडप्रेशर बढाते रहते हैं, और आप हैं कि मन-ही-मन कुढते रहते हैं, कभी-कभी फ़ोन करने वाले को गालियाँ भी निकालते हैं, लेकिन अब पेश है कुछ नये आईडिया इन टेलीमार्केटिंग कम्पनियों से प्रभावी बचाव का – इनको आजमा कर देखिये कम से कम चार तो आपको पसन्द आयेंगे ही –

(१) जैसे ही टेलीमार्केटर बोलना बन्द करे, उसे तत्काल शादी का प्रस्ताव दे दीजिये, यदि वह लड़की है तो दोबारा फ़ोन नहीं आयेगा, और यदि वह लड़का है तो शर्तिया नहीं आयेगा ।
(२) टेलीमार्केटर से कहें कि आप फ़िलहाल व्यस्त हैं, तुम्हारा फ़ोन नम्बर, पता, घर-ऑफ़िस का नम्बर दो, मैं अभी वापस कॉल करता हूँ..
(३) उसे, उसी की कही तमाम बातों को दोहराने को कहें, कम से कम चार बार..
(४) उसे कहें कि आप लंच कर रहे हैं, कृपया होल्ड करें, फ़िर फ़ोन को प्लेट के पास रखकर ही चपर-चपर खाते जायें, जब तक कि उधर से फ़ोन ना कट जाये..
(५) उससे कहिये कि मेरी सारे हिसाब-किताब मेरा अकाऊंटेंट देखता है, लीजिये उससे बात कीजिये और अपने सबसे छोटे बच्चे को फ़ोन पकडा़ दीजिये…
(६) उससे कहिये आप ऊँचा सुनते हैं, जरा जोर से बोलिये (ऐसा कम से कम चार बार करें)..
(७) उसका पहला वाक्य सुनते ही जोर से चिल्लाईये – “अरे पोपटलाल, तुम… ! माय गॉड, कितन दिनों बाद फ़ोन किया,,,, और,,,,, और,,,,,, बहुत कुछ लगातार बोलिये… फ़िर वह कहेगा कि मैं पोपटलाल नहीं हूँ, फ़िर भी मत मानिये, कहिये “अरे मजाक छोड़ यार….” । अगली बार फ़ोन आ जाये तो गारंटी…
(८) उससे कहिये कि एकदम धीरे-धीरे बोले, क्योंकि आप सब कुछ हू-ब-हू लिखना चाहते हैं, फ़िर भी यदि वह पीछा ना छोडे, तो एक बार और उसी गति से रिपीट करने को कहें….
(९) यदि ICICI से फ़ोन है तो उसे कहिये कि मेरे ऑफ़िस के नम्बर पर बात करें और उसे HSBC का नम्बर दे दें…

आजमा कर देखिये और मुझे रिपोर्ट करें (फ़ोन पर) 🙂

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