>सानिया की शादी व मन्त्रीजी का गाउन उतारना—-डा श्याम गुप्त

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सानिया की शादी व मन्त्री जी का गाउन उतारना……

—-आज दो ज्वलंत समाचार हैं—–एक, सानिया की शादी ; दो-मन्त्री जी का गाउन उतारना।
—--(१) कोई शशि शेखर हैं जो जब से हिन्दुस्तान के मुख्य संपादक बने हैं अपने बडे से कालम में कुछ न कुछ लिखते रहते हैं; वे सानिया की शादी ( जो एक व्यक्तिगत मामला है समष्टिगत व देश का नहीं-उन्हें क्यों लिखने की आवश्यकता हुई ) पर वे जोधाबाई का उदाहरण पेश कर के कहते हैं कि मान सिंह ने बहन देकर अपने क्षेत्र में युद्ध बचा लिये।—-क्या उनकी निगाह में औरतें–बहन, बेटियां, मां आदि वस्तुयें हैं जिन्हें देकर अपने को, अपने राज्य को, प्रज़ा को बचाया जा सकता है—नारी की कोई अपनी गरिमा, इच्छा नहीं है। बेचारे राणा प्रताप यूंही-मूर्खता में- दर-दर भागते फ़िरे , वे भी कोई बहन -बेटी अकबर को देकर अपने को बचा लेते। धन्य हैं आज के पत्रकार, संपादक।
–(२)-मन्त्रीजी के गाउन उतारने पर तमाम लोग-विद्यार्थी,सामान्य लोग,अन्ग्रेज़ी दां इन्फ़ोटेकी, व्यापारी -नाराज़ हें–कोई गाउन पहनने को गरिमा बता रहा है, कोई संस्क्रिति की पहचान, कोई पढे लिखे समाज़ की शोभा पहनना परम्परा की खिल्लीउडाना कहरहा है,—–क्या गाउन हमारी भारतीय परम्परा है जो हम उसे शोभा या सम्मान मानें। यह अन्ग्रेज़ों की दी हुई परम्परा है, इसे समाप्त करना ही चाहिये।
कुछ लोगों का कथन है कि उन्हें समारोह में भाग ही नही लेना चाहिये, पहनना ही नही चाहिये पर गाउन का अपमान ( गोया अन्ग्रेज़ों/काले अन्ग्रेज़ों का अपमान होगया) । वर्षों पहले मैने स्वयम अपने कालेज के दीक्षान्त समारोह का बहिष्कार इसीलिये किया था कि मुझे अन्ग्रेज़ी परम्परा /गाउन का से विरोध था, इसका मैने प्रचार भी किया था परन्तु क्या हुआ यह आज तक चलरहा है। मैं शक्ति सम्पन्न नहीं था अतह चुपचाप विरोध था।
तुलसी दास ने कहा है कि –“हरिहर निन्दा सुनहि जो काना, होइपाप गौघात समाना।
काटिय जीभ जो बूत बसाई, आंखि मूंदि नतु चलिय पराई॥”
—– मैने चोपाई के अन्तिम पद का अनुसरण किया था, मन्त्री जी ने तीसरे पद का ; मन्त्री जी समर्थ हैं उन्हें इस प्रकार का व्यवहार करना ही चाहिए । जबतक समर्थ लोग सशक्त व स्पष्ट विरोध नहीं करेंगे स्थितियां नहीं बदलेंगी