>इस सप्ताह के सर्वाधिक लोकप्रिय आलेख ,लेखक के नाम और लिंक दिए गये हैं

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जनोक्ति .कॉम पर इस सप्ताह के सर्वाधिक लोकप्रिय आलेख ,लेखक के नाम और लिंक दिए गये हैं  . आप भी पढ़िये और विमर्श में भाग लीजिये . 

>साढ़े बारह बजे का किया इन्तेजार पर कसाब को फाँसी ना मिली

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आज सुबह से साढ़े बारह बजने का इन्तेजार कर रहा था . उत्सुकता और बेचैनी दिमाग पर काबिज थी . सुबह सात बजे उठ कर जामिया के लिए निकल गया . साढ़े नौ से साढ़े बारह तक परीक्षा थी और स्टार न्यूज़ के मुताबिक इसी समय तक भारत के सरकारी दामाद की सजा का ऐलान भी होना था . परीक्षा भवन में भी दिमाग का आधा हिस्सा इसी पर लगा हुआ था . जल्दी -जल्दी ऑटो से घर भागे . यहाँ आये तो पता चला कि साहब , कसाब को फाँसी देने में कई साल भी लग सकते हैं . अब हम जैसे कानून के अनपढ़ों को कौर्ट -कचहरी की भाषा भला कहाँ समझ आती है  ? लेकिन परेशानी यही नहीं है .  मामला तो तब बिगड़ता है जब कार्यपालिका , व्यवस्थापिका और न्यायपालिका को हमारी ये बात समझ में नहीं आती ! क्यों , सही कहा ना ! अगर उनको ये बात समझ में आती तो अफजल गुरु अभी तक तिहाड़ में हमारे पैसों की रोटी नहीं तोड़ रहा होता . कसाब के लिए करोड़ों नहीं उडाये जाते वो भी उस देश में जहाँ लोग भूख से जान देते हो . पता नहीं इस देश का सिस्टम (कार्यपालिका , व्यवस्थापिका और न्यायपालिका) आखिर कौन सी मिसाल कायम करना चाहता है  ? अरे , मिसाल तो अमेरिका ने कायम किया बिलकुल लोकतान्त्रिक तरीके से सद्दाम को कम से कम समय में फाँसी लगवा कर .  लेकिन नहीं यह तो भारतवर्ष है … जहाँ हत्या करने पर दस और हत्या का लाइसेंस देती है ये सरकार !

>तो पढ़िये और जानिए मजदूर कैसे हैं मानवों में सर्वोत्तम ?

>जनोक्ति .कॉम पर अनिकेत प्रियदर्शी का यह बेहतरीन आलेख पढना ना भूलिए . मजदूर दिवस पर मजदूरों को याद करता हुआ यह आलेख एक नये नजरिये को पेश करता है . तो पढ़िये और जानिए मजदूर कैसे हैं मानवों में सर्वोत्तम ? 


मानव में सर्वोत्तम……….मजदूर

>अरे , भूल गये पुन्यप्रसून जी कि …………………………….

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झारखण्ड की किस्मत किसने तय की है , वहां की जनता ने ही ना !  अरे , भूल गये पुन्यप्रसून जी कि ये वही प्रदेश है जहाँ की जनता ने घोटाले में लिप्त मुख्यमंत्री की बीबी को सर आँखों पर बिठाया था . यही वो प्रदेश है जो भावनाओं में बहकर शिबू सोरेन जैसों को अपनी बागडोर थमाता है . अब सांप को दूध पिलाओ तब भी जहर कम नहीं होता ! ये शिबू सोरेन की आदत है कभी यहाँ कभी वहां मुंह मारने की . लोग तो तब भी भाजपा के फैसले पर आश्चर्यचकित थे . तब विधायकों के   टूट जाने के भय से जिस स्संप को गले में डाला उसके जहर भरे दांत तोड़ने के उपाय भी करने चाहिए थे . वैसे मानते हैं कि आपकी रपट अलग होती है गरीब आदिवासियों से आपकी विशेष सहानुभूति है लेकिन भाई हम ऐसे लोगों से सहानुभूति नही रखते जो बार-बार एक ही गलती दुहराते हैं .झारखण्ड का मतदाता इतना सीधा-सादा भी नहीं है कि शिबू जैसों की असलियत ना पहचान सके , और फ़िर भी वोट देता है तो इसमें शिबू से ज्यादा इनकी गलती है ……………

>डाइपर से कुर्सी तक का सफ़र

>इंडियन पापा लीग में हर रोज किसी ना किसी पापा के बच्चों की भागीदारी सामने आ रही है . हमारे लिए गर्व की बात है ! क्यों ना हो , आख़िरकार क्रिकेट के क्षेत्र में ही सही भारत की बादशाहत कायम करने में रसूखदार पापाओं के बेटे-बेटियों , दामादों , भाई -बंधुओं , ने आई पी एल के जरिये अपना योगदान जो किया है ! क्या ये कम है कि आज पापावाद के कारण ही देश चल रहा है ! देश तो कब का फ़िर से गुलामी के गर्त में दब गया होता यदि देश चलाने वाले अच्छे और कुशल पापाओं की औलादें नहीं होते ! अरे , इन पापाओं की बात ही और है हाइब्रिड फसल उगाते हैं …. पैदा होने की बाद सीधे तब पता लगता है किसी महत्वपूर्ण पद पर उनकी ताजपोशी होती है ……..  डाइपर से कुर्सी तक का सफ़र इन पापाओं की असली करामात है ………………. 

>जामिया में होली खेलने पर छात्रों के परिचयपत्र छीने गये

>कल की सबसे आश्चर्यजनक और तानाशाही वाली एक खबर है जामिया मिल्लिया इस्लामिया से जहाँ हिंदी विभाग के छात्रों को परिसर में होली खेलने के कारण प्रोक्टर ने तलब किया है . छात्र -छात्राएं होली के पहले आखिरी क्लास के बाद आपस में रंग-गुलाल लगा रहे थे . इसी बात से नाराज सुरक्षाकर्मियों ने उनके परिचय-पत्र छीन लिए और प्रोक्टर ऑफिस आकर ले जाने की बात कही . छात्र  स्तब्ध रह गये कि आखिर उन्होंने क्या जुर्म किया है ? क्या होली खेलना गुनाह है ? एक छात्र ने दुखी मन से कहा , घर-परिवार ,दोस्तों से दूर सहपाठी हीं तो हमारे सबकुछ हैं . अब उनके साथ होली नहीं खेल सकते , तो परिसर में नहीं खेल सकते जबकि इसी परिसर में हमलोग बैठकर इफ्तार करते हैं . क्या यह भेद-भाव नहीं है हमारे साथ ?

बात सही है . यदि कोई बाहर का छात्र होता तो बात अलग थी हो सकता है जामिया का सांप्रदायिक सद्भाव नष्ट हो सकता था लेकिन जो छात्र सालों भर वहीँ पढ़ते हैं उनसे क्या खतरा था . उनके होली खेलने  से कौन सी आफत आने वाली थी ? और यदि ऐसा था तो क्यों नहीं पहले हर जगह नोटिस लगाई गयी ? यदि उन बच्चों ने रंग -गुलाल लगया तो बदले में उनके साथ ऐसा सलूक किया जायेगा ? क्या यह विश्वविद्यालय प्रशासन का भेदभाव और तानाशाही का रवैया  नहीं है ?

>अगर आप भी ब्लोगिंग में संगठन बनाने की बात से असहमत हैं तो अपने -अपने ब्लॉग पर एक विरोध का पोस्ट जरुर लिखें !

>अभी -अभी ” गप-शप का कोना ” पर प्रभात जी की पोस्ट देखी तो वाकई चिंता हुई . खबर चिंताजनक है कि ब्लॉगजगत को भी मठाधीशों की जरुरत संगठनात्मक रूप में होने लगी है !गौर करने लायक बात यह है कि यहाँ मठाधीश तो पहले से मौजूद रहे हैं लेकिन अब संगठन बना कर अपनी बातें दूसरों पर थोपा जायेगा . अब तक अभिव्यक्ति के इस स्वतंत्र समझे जाने वाले मंच को भी लोग अपनी लॉबिंग का केंद्र बनाने लगे हैं ऐसा अब तो जरुर महसूस होने लगा है . यहाँ भी उन्हीं लोगों की चलेगी जो अपनी गोटियाँ फिट कर पाएंगे और नये आने वालों को साहित्य की दुनिया की तरह हीं पुराने खिलाडियों की चमचागिरी करनी पड़ सकती है .आगे चल कर ऐसा भी हो सकता है कई एक संगठन बन जाए तब कुछ लिखने से पूर्व उनकी ओर लोगों को ताकना पड़ेगा कि किसकी क्या प्रतिक्रिया होगी . पोस्ट से ज्यादा चिंता उस पर आने वाली प्रतिक्रिया की होगी . प्रभात जी की पोस्ट पर एक सज्जन ने लिखा है क्या हम यहाँ राजपूत ब्लॉगर महासभा, ब्राहमण ब्लॉगर समिति, चिकित्सासेवी ब्लॉगर समूह देखना पसँद करेंगे ? कभी नहीं, क्योंकि हम अभिव्यक्ति और मत-विमर्श से इतर राजनीति या गुटनीति करने नहीं आये हैं ।”    जो मार्के की बात है . पूरे बहस में ब्लोगिंग के व्यक्तिगत और सामूहिक होने को लेकर कई प्रश्न उठते हैं . व्यक्तिगत ब्लॉग से हमने भी शुरुआत की थी जिसे बाद में सामूहिक कर दिया गया लेकिन कसी संगठन या खास विचार के नाम पर नहीं बल्कि यहाँ पर लगभग हर तरह के लोग मौजूद हैं और यदि विचारों पर अंकुश लगा कर एक ओर प्रवाहमान किया जाए तो हमारी समझ में इस विधा का दुरूपयोग हीं होगा .और किसी तरह के संगठन  बनने की स्थिति में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि वह किसी न किसी खास विचारधारा की ओर अपना झुकाव रखेगा  और  ना चाहते हुए भी जुड़ने वाले लोगों पर एक प्रकार का दबाव बनेगा . अब तक के तरह -तरह संगठनों को देख कर और उनमें काम करके इतना तो कह हीं सकता हूँ आरम्भ बहुत बढ़िया होता है बाद में सारी चीजें वैसी हीं हो जाती है . बेहतर है ब्लोगिंग को बांधने के बजाय स्वच्छंद रहने दिया  जाए साहब , नहीं  तो फ़िर  मीडिया हीं अच्छी है . यहाँ लोग इसीलिए आते हैं कि उन्हें उनकी बात रखने में कोई रोक नहीं सकता . अगर आप भी ब्लोगिंग में संगठन बनाने की बात से असहमत हैं तो अपने -अपने ब्लॉग पर एक विरोध का पोस्ट जरुर लिखें !

>बीबीसी संवाददाता सुहैल हलिम के ब्लॉग को पढ़कर एक चिट्ठी उनके और उस ब्लॉग पर टिप्पणी करने वालों के नाम

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सुहैल साहब ,नमस्कार !

शिवसेना के मुद्दे पर आपका ब्लॉग पढ़ा .आपने काफी साफगोई से सारी बात रखी पर, शायद कुछ भाइयों को इस व्यंग में शिवसेना की तरफदारी नज़र आई तो इस पर क्या कहा जाए . खैर एक अंतर्राष्ट्रीय मीडिया से जुड़े आदमी का ब्लॉग मैं कैसे बातें कही जानी चाहिए आपने इसका खूब ख्याल रखा है . पर मुझे इस ब्लॉग के शीर्षक और पोस्ट में कोई तारतम्य नज़र नहीं आया . माफ़ कीजियेगा . ….. वैसे जब शिवसेना की बात हो रही है तो मराठी मानुष के नाम पर हो रहे तमाम कारनामों से सभी परिचित है . शिवसेना को ऐतराज जताने का पूरा हक़ है और शाहरुख़ को भी लेकिन उन्हें यह अधिकार नहीं कि किसी की फिल्म चलने से रोकें ……. इतने कमेन्ट आये पर किसी ने सोनिया ब्रिगेड का नाम तक नहीं लिया जिनके युवराज बिहार में भारतीयता का दंभ भरते हैं और महाराष्ट्र में उन्हीं की सरकार है , क्या यह उनका दोहरापन नहीं है ? वैसे दरभंगा में राहुल का जो हश्र हुआ वह उनके युवा राजनीति को जान्ने के लिए काफी है ………. शिवसेना या मनसे को बढ़ावा देने वाले हम और और हीं हैं जिन्होंने आज तक कांग्रेस की विभाजक नीतियों का विरोध नहीं किया . उलटे हमेशा वोट बैंक की तरह खुद को उपभोग होने दिया . पौव्वा पीकर ,ठेकेदारी लेकर ,पैसे खाकर , सिफारिश करवाकर आदि -आदि अपने हितों में दूर का नुकसान भूल गये . क्यों भूल जाते हैं हम पंजाब से लेकर अयोध्या तक की घटना जिन्हें आज मीडिया और प्रधानमंत्री तक राष्ट्रीय शर्म कह रहे हैं वह बहुत इसी कांग्रेस के वोट बैंक की राजनीति का परिणाम है . वैसे आज जनसत्ता में छपा पुन्य प्रसून वाजपेई का लेख पढियेगा जिसमें राहुल गाँधी के युवा अभियान की धज्जियाँ उड़ा कर रख दी गयी है .राहुल गाँधी ब्यान दे रहे हैं कि मुंबई हमले में बिहारी सैनिकों ने अपना योगदान दिया . अरे ,शर्म आती है ऐसे युवा नेता पर जो भारतियों को बिहारी और मराठी के तराजू में तौल कर देश को बाँट रहे हैं . ऐसे छद्म लोगों को शिवसेना या मनसे का विरोध करने का कोई अधिकार नहीं है जिनकी सरकार खुद भाषा के आधार पर भेद-भाव वाला कानून पारित करती हो , जिनके शासनकाल में एक असहाय महिला को अधिकार इसलिए नहीं मिलता क्योंकि इससे वोट बैंक भड़क जाता है और उसी समय दूसरे समुदाय को खुश करने के लिए एक विवादित ढांचे का टला खोल दिया जाता है जो आज तक भारत की नाक का घाव बना हुआ है . क्या हम दोषी नहीं है जो उत्तर भारतीयों अथवा हिंदी भाषियों पर हो रहे अत्याचार और भेदभाव का रोना तो रोते हैं परन्तु राहुल गाँधी की पूंछ सहलाने से बाज नहीं आते ? जरा , सोचियेगा कभी आज सारी विघटनकारी शक्तियों के उभरने में किसकी अहम् भूमिका है ?


>क्या यह कांग्रेसियों का स्वांग नहीं है ?

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राजनीति में श्रेय का बड़ा महत्व है . किसी भी काम का श्रेय  छीनने की होड़ में कभी-कभी कुछ अच्छा काम भी हो जाया करता है . दो दशकों से भी अधिक समय तक मुंबई में ठाकरे की घिनौनी राजनीति ने कहर मचा रखी है . बड़े ठाकरे के बाद अब छोटे ठाकरे अपनी अलग पार्टी बना कर उछल-कूद कर रहे हैं . पहले लुंगी वालों की पुंगी बजाई अब भाइयों की बारी आई . गैर मराठियों को जम कर मारा पीटा गया . राज्य से लेकर केंद्र तक कांग्रेस और राष्ट्रवादी कोंग्रेस चुप रही . आज अचानक क्या हो गया जो गृहमंत्री देश की एकता -अखंडता को लेकर चिंतित हो गये . मीडिया में उनका ब्यान आने लगा कि भारतीय संविधान किसी भी भारतीय को कहीं भी बसने और काम करने की स्वतंत्रता देता है और केंद्र सरकार इसे सुनिश्चित करेगी . आखिर क्या वजह है ? साफा है कि संघ का इस मुद्दे पर आया ब्यान सरकार में खलबली मचा गया है . सोनिया ब्रिगेड घबरा गयी कि कहीं इसका श्रेय संघ के पास ना चला जाए …………. यहाँ तक तो ठीक है पर जनता कैसे पचा पाएगी गृहमंत्री के बयान को जब हाल हीं में अशोक चाहवान सरकार ने भाषावाद से ओत-प्रोत होकर मुंबई में टेक्सी परमिट का नया कानून लागू किया है . क्या गृह मंत्री और महारष्ट्र के मुख्यमंत्री का कृत्य आपस में विरोधाभाषी नहीं है ? क्या यह कांग्रेसियों का स्वांग नहीं है ? 

>कौन देगा इन सवालों के जवाब???

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‘कसाब बयान से पलटा’ इस खबर ने नींद ही उड़ा दी। मन में जो सवाल कसाब की गिरफ्तारी के समय से घुमड़ रहे थे वहीं आपके सामने—

‘‘क्या नौ आतंकवादियों को मार देने के बाद हमारे सैनिकों के पास एक गोली कसाब के लिए नहीं बची थी?’’
‘‘कसाब के द्वारा हम किन सबूतों को इकट्ठा करने की खोखली बातें कर रहे हैं?’’
‘‘यदि सबूत मिले भी और सभी सबूत पाक के खिलाफ हुए तब भी हमारी सरकार क्या करेगी?’’
‘‘किसी प्रकार वकीलों की जिरह और अदालत में प्रस्तुत किये सबूतों के आधार पर यदि कसाब छूट गया तो?’’
नींद इसी ‘तो’ ने उड़ा रखी है। सभी के सामने मय सबूतों के पकड़े गये अपराधी के साथ न्याय करने में हमारी व्यवस्थाओं की यह स्थिति है तो आम आदमी को मिलने वाले न्याय के बारे में सिर्फ सोचा जा सकता है।
नींद अभी भी उड़ी है कि कसाब बयान से पलटा और बच गया ‘तो’!!!!!
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चित्र साभार गूगल से लिया है