>एक अफगानी मित्र के प्रति संवेदना सहित: प्रशांत प्रेम

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 हजारों टन बमों और
सैकड़ो क्रुज़ मिस्साइले गिरने का मतलब तुम्हे नहीं पता,
तुम्हे नहीं पता- भूख और बेवशी की पीड़ा,
तुम्हे मालुम भी नहीं
सर्दियों में सिर्फ तन ढकने के कपड़ो के बिना
ठिठुर कर मर जाना |
तुम्हे नहीं पता
गरीबी और गरीबों की बीमारियाँ,
तुम्हे नहीं पता
दवाओं के बिना बुखार में तप कर मरना |
तुम तो एन्थ्रेक्स से सिर्फ एक मौत पर
दुनिया भर की प्रयोगशालाओं में तैयार करवाने लगे हो एन्टीडोट्स |

तुम्हारी मीनारों के जमीन छूने की एवज में
तुमने मिटा डाला है जमीन का ए़क टुकडा ही
जहां लाखों लोग तबाह है |

तुम स्वर्ग के बाशिंदों
तुम्हे क्या पता — भूख और ठंढ से मरने से बेहतर है
हमारे लिए
तुम्हारे बमों की आंच में मरना
जब मरना ही हो आख़िरी विकल्प |

चलो अच्छा है !
इस “इनफाएनाईट जस्टिस” की आड़ में
आजमा लो तुम भी अपने सारे नए ईजाद,
साफ़ कर लो अपने जंग लगते सारे हथियार |
ताकि फिर कोई दुसरा अफगानिस्तान न उजडे
और ना ही कोई मुनिया रोये
अपने काबुलीवाला को याद कर-कर |


Note :- कविता 5 साल पुरानी है…. पर कहानी नहीं| आप अफगानिस्तान की जगह ईराक रख ले नाईजिरिया या येरुशलम…..


>In INDIA we are not INDIANS

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बेगानेपन का अहसास दबाये दिल वालों की दिल्ली में पूर्वोत्तर भारतीय समय काट रहे हैं .मुनिरका ,मुखर्जीनगर ,कटवारिया ,लाडोसराय आदि  इलाकों के दरबे जैसे घरों में रहने वाले इन बेगाने भारतीयों को कदम-कदम पर अपमान का घूंट पी कर जीना पड़ता है . राह चलते चिंकी ,सेक्सी , माल ,नेपाली ,चाइनीज जैसे फिकरे सुनना तो इनकी नियति बन गयी है . हद तो तब हो जाती है मनचले हाथ लगाने पर उतर आते हैं . ऐसा नहीं है कि ये हरकतें कम-पढ़े लिखे आवारा किस्म के लड़के करते हैं बल्कि डीयु ,जामिया,आई आई टी सरीखे नामी गिरामी शिक्षण संसथानों के तथाकथित सभी छात्र भी इनसे मज़े लेने में कोई कसर नहीं छोड़ते .राजधानी में पूर्वोत्तर की लड़की की आई आई टी के छात्र द्वारा हत्या और ग्यारहवीं के छात्रों द्वारा जामिया के मॉस कॉम में पढ़ रही अरुणाचल की लड़की के कपडे फाड़ने की घटना इन बातों को साबित करने के लिए काफी है . इनकी हालत उन बिहारी रिक्शा चालकों जैसी है जिन्हें दायें -बाएं से आने गुजर रहे हर दुपहिया -चरपहिया वालों की लताड़ खानी पड़ती है . इतना हीं नहीं जब तब सरकार की  भेदभावपूर्ण नीतियों  का शिकार भी इन्हें होना पड़ता है . भारोत्तोलक मोनिका देवी मामले में भारतीय खेल प्राधिकरण का रवैया इसका ताजा उदाहरण है .अकसर हम इनको राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल करने की बात करते हैं लेकिन क्या इन सबके बावजूद  पूर्वोत्तर राज्यों से पढ़ाई या नौकरी के लिए देश की राजधानी आए लोगों  के मन में भारतीय होने का अहसास बच पायेगा ?  
ईटानगर में आयोजित एक सेमीनार में का किस्सा याद आ रहा है . हम संयोगवश वहां पहुंचे थे . हमने सेमिनार का विषय “in india we are not indians ” देखा तो आश्चर्यचकित हो गये . अब  अहसास  हो रहा है, वो गलत नहीं थे . पूर्वोत्तर में हमेशा गृहयुद्ध की हालत को भोग रहे ये लोग जब दिल्ली -मुंबई का रुख करते हैं तब हमसे तिरस्कार ,घृणा के सिवा इन्हें क्या मिलता है ?  विश्वबंधुत्व का ढिंढोरा पीटने वाले हम भारतवासी क्या भारतीय कहलाने के काबिल रह गये हैं ?  हम समय के साथ अपने भारतीय होने की अपनी पहचान को खोते जा रहे हैं . यह एक गिरते हुए समाज की तस्वीर है .जो शक्ति खुद के लिए , समाज के लिए और देश के लिए प्रयोग करनी चाहिए थी वह खुद को हीं बदनाम करने में प्रयोग हो रहा है .इस मामले को महज पुलिस कार्यक्षेत्र का मसला समझ कर भूल जाना हमें महंगा पड़ेगा .पुलिस की नाकामी से पहले यह समाज की और समाज से पहले व्यक्ति की नाकामी और पतन का  सूचक है . आखिर ऐसी मानसिकता समाज से हीं तो पैदा हो रही है जो युवाओं को एक खास वर्ग या समुदाय के प्रति नीचता करने को प्रेरित करती है ? समाज को चलाने का दंभ करने वाले बुद्धिजीवी लोग भी इस मसले पर मूकदर्शक बने नज़र आते हैं .मुंबई में राज ठाकरे की गुंडई पर गला फाड़ने वाले पत्रकार बंधू भी गला साफ़ करने में लगे रहते हैं .क्या जो उत्तर भारतीयों के साथ मुंबई में होता है वही पूर्वोत्तर वालों के साथ दिल्ली में नहीं हो रहा है ? फ़िर ,विरोध में भेदभाव क्यों ? क्या देश के चौथे स्तम्भ की उदासीनता { बाकि तो पहले से कन्नी कटे हुए हैं } से मान लिया जाए चीन की बात सही है कि अरुणाचल उनका हिस्सा है ? क्या इसी तरह सांस्कृतिक के आधार पर थोड़े अलग इन भारतीयों को गैरभारतीय मान लिया जाए जिन्हें दिल्ली -मुंबई में शरण दे कर हमने उन पर अहसान किया है ? जरा इन सवालों पर सोचते हुए पूर्वोत्तर में जन्मे बिहार -झारखण्ड में पढ़े -लिखे और दिल्ली में पत्रकारिता कर रहे एक भारतीय की इन पंक्तियों को ध्यान से पढ़िये :-
                                                   
                                               अजनबी शहर में हम जहां हैं वह देश जैसा दिखाई देता है. 
                                                                                पर है परदेश. 
                                                        सरकारी विज्ञप्तियां बताती हैं यह हमारा देश है. 
                                  लेकिन आवाजों का संजाल कहीं न कहीं से कचोट कर हकीकत को सामने रख देता है. 
                                                                         दुष्यंत होते तो कहते:-
                            “हमको पता नहीं था हमे अब पता चला, इस मुल्क में हमारी हूकूमत नहीं रही.”
                                           इसी परदेश और देश की संधि रेखा पर खडे होकर हम बात करेंगे. 
                                         सीमाओं की जो हमने नहीं खींची. धरती पर आने के साथ हमें मिली हैं.
 

>राष्ट्रपति के बेटे राजेंद्र शेखावत को टिकट देने का विरोध दर्ज कराएँ यहाँ

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राजशेखर रेड्डी का अंतिम संस्कार होने के पहले ही दिवंगत मुख्यमंत्री के बेटे जगनमोहन रेड्डी को सत्ता की कुर्सी पर बैठाने के लिए कांग्रेस की आकुलता को बीते अभी कुछ दिन हीं बीता कि आगामी विधानसभा चुनावों में  राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के बेटे राजेंद्र शेखावत को टिकट मिलने की खबर मिली है . कांग्रेस में परिवारवाद / वंशवाद का यह वाइरस नया नहीं हैं . हाँ , जब भी कुछ नज़रों से होकर गुजरता है तो हमें इसकी याद आ जाती है और खीज में भर कर कीबोर्ड पर उंगलियाँ दौड़ाने लगते हैं  . मालूम है , अब यह रोग लगभग लाइलाज होने के कगार पर खड़ा है .लोकतंत्र की प्रतिरोधक क्षमता धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है . भारत में वंशवाद के विषबेलों की संख्या दिनों – दिन चौगुनी रफ़्तार में बढ़ रही है .
आइये एक नज़र डालें उन जहरीली झाड़ियों पर जिनका सम्बन्ध लोकतांत्रिक भारत के चुनिंदा ‘राजघरानों’ से हैं .  सोनिया गाँधी , राहुल गाँधी ,डॉ फारुक अब्दुल्ला ,उमर अब्दुल्ला ,दयानिधि मारन { तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि के भांजे और कई बार मंत्री रह चुके स्वर्गीय मुरासोली मारन के बेटे हैं },एम के अड़ागिरी {करुणानिधि के सबसे बड़े बेटे },कनीमोड़ी {करुणानिधि की बेटी},जी के वासन {कांग्रेस के  नेता स्वर्गीय जी के मूपनार के बेटे},कुमारी शैलजा [ इंदिरा गांधी की सरकार में मंत्री चौधरी दलबीर सिंह की बेटी },मुकुल वासनिक {कांग्रेस के पूर्व सांसद बालकृष्ण वासनिक के बेटे},लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार{ स्वर्गीय जगजीवन राम की बेटी } ,सलमान खुर्शीद { कांग्रेसी नेता खुर्शीद आलम खां के बेटे और पूर्व राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन के नाती },पृथ्वीराज चव्हाण { माँ बाप दोनों कांग्रेसी सांसद रह चुके हैं },सिंधिया राजघराने के चिराग ज्योतिरादित्य सिंधिया, कांग्रेस के दिग्गज नेता जितेंद्र प्रसाद के बेटे जितिन प्रसाद,  राजेश पायलट के बेटे और फारुख अब्दुल्ला के दामाद सचिन पायलट,  पीए संगमा की बेटी अगाथा संगमा, कांग्रेस नेता ललित माकन के भतीजे अजय माकन, गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री माधवसिंह सोलंकी के बेटे भरतसिंह सोलंकी, गुजरात के एक और पूर्व मुख्यमंत्री अमरसिंह चौधरी के बेटे तुषार चौधरी, मध्य प्रदेश के कांग्रेसी नेता पूर्व उपमुख्यमंत्री सुभाष यादव के बेटे अरुण यादव, पूर्व मंत्री सीपीएन सिंह के बेटे आरपीएन सिंह, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री वसंतदादा पाटिल के पोते और पूर्व सांसद प्रकाश पाटिल के बेटे प्रतीक पाटिल, मेनका गाँधी के पुत्र वरुण गाँधी  ,जसवंतसिंह के पुत्र मानवेन्द्रसिंह ,पटियाला की महारानी और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की पत्नी प्रनीत कौर  आदि -आदि . अब ज्यादा नाम लिया तो आप चक्कर में आ सकते हैं . पोस्ट उबाऊ न हो इसका भी तो ख्याल रखना होता हैं न साहब !
                                                  लोकतान्त्रिक भारत के राजवंशी नेताओं के इतने सारे नाम एक साथ पढ़ कर कैसा लग रहा है आपको ? कोई बेचैनी हो रही है ? क्या वर्तमान राष्ट्रपति जी के बेटे को विधानसभा के टिकट मिलने पर आपको गुस्सा / जलन / कुंठा / घुटन  सा महसूस नहीं होता ? क्या भारत की गणतंत्रता के ६० साल पूरे होने से पहले हीं फ़िर से राजतंत्र की ओर बढ़ते कदम से खौफ नहीं होता ? अगर लगता है कि वंशवाद के इन बेलों की जड़ों को जमीन में ज्यादा गहरे तक जाने से पहले रोका जाना चाहिए तो क्यों न ब्लॉगजगत के सजग प्रहरी आप और हम आगामी किसी भी चुनाव में ऐसे किसी भी नेता की उम्मीदवारी का विरोध करें . और फिलहाल हमारे निशाने पर प्रतिभा ताई के सुपुत्र ” राजेन्द्र शेखावत “ ,पूनम महाजन , और जिनको भी अनुकम्पा के सहारे टिकट मिलता है  ब्लॉगजगत  को अब अपने ताकत का अहसास अपने जोरदार विरोध से करना होगा . लोकसभा चुनाव बीत गया तो क्या जब जगे तभी सवेरा ………………….. 

>"लव जिहाद" सांप्रदायिक भड़ास निकलने का जरिया ….. जरुर पढिये

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अपने जीवन के 17 बसन्त देख चुकी श्रुति (काल्पनिक नाम) को यह नहीं मालूम था कि जो युवक विद्यालय जाते समय रास्ते में मिलता रहा और वे एक दूसरे के काफी नजदीक आ गये थे वह उससे प्रेम नहीं करता है बल्कि पूर्वांचल में चल रहे लव जिहाद का एक जेहादी है और वह उसे दलालों के जरियें खाडी देश के किसी शेख के हाथों बेच देगा। वह खुशकिश्मत थी कि बच गयी अन्यथा उसका भी वहीं हाल हुआ होता जो इस जेहाद की जद में फंस चुकी लड़कियों का हो रहा है।

आजमगढ़ जनपद के अहरौला कस्बे की रहने वाली श्रुति अग्रहरि पिछले एक माह से विद्यालय में पढ़ने जाती तो उसके पीछे एक युवक जो दिखने में स्मार्ट था वह लग जाता था। श्रुति और उसकी आंखे चार हो गयी। और वह उस युवक से प्रेम कर बैठी। वह युवक स्वंय को फूलपुर कस्बे के एक वैश्य परिवार का बताता था। बात शारीरिक सम्बन्धों तक नहीं पहुंची थी।इसी बीच 8 सितम्बर 2009 को श्रुति अचानक लापता हो गयी। परिजनों ने खोजबीन की इसी दौरान उन्हें सूचना मिली कि उनकी लड़की जौनपुर जनपद खुटहन के शाहगंज थानान्तगर्त अरन्द गांव के निवासी राशिद पुत्र जकरिया व अब्दुल पुत्र सन्तार जो शाहगंज के पक्का पोखरा के पास रहता है उन दोनों के साथ 8 सितम्बर को देखी गयी। इस बात की जानकारी जब परिजनों ने 9 सितम्बर को अहरौला थाने को दी तो थानाध्यक्ष ने कोई कार्यवाही नहीं की। इसके बाद परिजनों और अहरौला के कुछ लोग खुद अब्दुल के घर पहुंच गये और वहां से उसे पकड़कर लाये तथा अहरौला पुलिस को साँप दिया। 9 सितम्बर को जब ग्रामीणों ने आरोपी को खुद ही पुलिस को सौप दिया फिर भी पुलिस 24 घण्टे तक मूकदर्शक बनी रही। इसके बाद जब ग्रामीणों ने 10 सितम्बर को अहरौला थाने में तोड़ फोड़ शुरू कर दी तो पुलिस सक्रिय हुई और आरोपी पर थर्ड डिग्री का इस्तेमाल किया तो उसने जो रहस्योदघाटन किया उसके बाद तो पुलिस के पैरों तले से जमीन ही खिसक गयी पुलिस बैकफुट पर नजर आने लगी। उसने बताया कि युवती को उसने आजमगढ़ के फूलपुर कस्बे में रहने वाले बसपा नेता और पिछला विधानसभा चुनाव लड़ चुके इमरान खान उर्फ हिटलर के घर में रखा है। पुलिस इमरान खां उर्फ हिटलर के घर पर छापेमारी को लेकर मौन बनी रही। इसके बाद तों अहरौला के निवासियों और युवती के परिजनों ने ही सम्प्रदाय विशेष के प्रबल विरोध के बावजूद हिटलर के घर में घुसकर युवती को बरामद कर लिया और फूलपुर कोतवाली पर लाये। पुलिस सिर्फ तमाशबीन की भूमिका में रही। इसके बाद जब युवती ने बताया कि उसके साथ 10-12 की संख्या में अन्य युवतियां भी उस मकान में थी तो पुलिस को मानों सांप ही सूंघ गया। थाने से मात्र 200 मीटर की दूरी पर स्थित बसपा नेता के उस मकान पर छापेमारी करने में उसने 4 घंटे का समय लगा दिया। इसके बाद जब पुलिस छापेमारी करने पहुंुची तो उस मकान में आदमी तो क्या कोई परिन्दा भी नहीं मिला। इस घटना में राशिद भी पुलिस की गिरफ्त में आया लेकिन पुलिसिया पूछताछ में उसने क्या बताया यह बताने से पुलिस कतराती रही। 17 वर्षीय श्रुति को पुलिस फूलपुर कोतवाली ले गयी। और पहले तो वह उसके चरित्र हनन का प्रयास करती रही लेकिन जब वह अपनी बात पर अड़ी रही तो पुलिस ने मुकदमा दर्ज लिया और आगे की कार्यवाही कर रही है लेकिन वह भी घटना की तह में जाने से कतरा रही है। कारण यह है मामला काफी हाइप्रोफाइल नजर आ रहा है।

श्रुति बताती है कि 8 सितम्बर को जब वह स्कूल से आ रही थी तो उसी समय तीन की संख्या में लोगों ने उसके मुंह पर रूमाल रखकर उसे दबोच लिया। इसके बाद वह बेहोश हो गयी। जब वह होश में आयी तो देखा कि वह एक कमरे में है। उसके शरीर पर बुर्के जैसा वस्त्र है। उसके नाखून काट दिये गये है तथा गले की माला और हाथ का रक्षासूत्र भी काट लिया गया था। कुल मिलाकर उसकी पहचान समाप्त करने की कोशिश की गयी थी। उसके बाद 9 सितम्बर की दोपहर में फिर उसे बेहोश कर दिया गया। इसके बाद वह दूसरे स्थान पर थी। उसके पास खान नामक एक आदमी था जो मोबाइल पर बात कर रहा था कि लड़की को कहा पहुंचायें सर किस रास्ते व कैसे ले जाय इसके बाद पुन:उसे बेहोश कर दिया गया। जब उसे होश आया तो उसने अपने आपकों दूसरे कमरे में पाया जहां 10-12 की संख्या में और भी लड़कियां थी। होश आने के बाद उसे दुसरे कमरे में बन्द कर दिया गया जिसमें एक और महिला थी जिसे खान की बीबी कहा जा रहा था। 10 सितम्बर की सुबह फिर खान ने बात की। सर लड़की को क्या करें बात समाप्त होने के बाद खान की बीबी ने कहा कि मुंह धुल लों। इसके बाद उसने उसे जबरिया नकब पहनाना शुरू कर दिया। इसी बीच हंगामा हुआ और किसी ने दरवाजा खटखटाया फिर शोर हुआ तो मैने खान की बीबी का प्रतिरोध करके दरवाजा खोल दिया। इसके बाद मेरे परिजन मुझे वहां से निकालकर ले गये। इस बात की जानकारी होने के बाद पुलिस ने दुबारा वहां पर छापेमारी करने में 4घण्टे लगा दिये। तब तक वहां कोई नहीं था। प्यार की आड़ में चल रहे इस धंधे को ही लब जिहाद का नाम दिया गया है जिसमें सम्प्रदाय विशेष के युवक येन-केन-प्रकारेण हिन्दु युवतियों को अपने माया जाल में फंसाते है। और अपने बॉस को सौप देते है। बॉस उन युवतियों का क्या करता है यह तो मुख्य सरगना की गिरफ्तारी के बाद ही पता चलेगा। अभी तक पुलिस न तो मुख्य सरगना को गिरफ्तार कर सकी है और न ही इस प्रयास में ही दिखाई दे रहीं है ताकि लब जिहाद के मुख्य सरगना को दबोचा जा सके।

-डॉ। ईश्वरचंद्र त्रिपाठी (साभार :प्रवक्ता डौट कॉम )

लेखक ने अप्रत्यक्ष तौर पर किस ओर इशारा किया है यह कहने की जरुरत नहीं है । क्या एक संप्रदाय विशेष सचमुच ऐसा कर रहा है ? क्या कोई ऐसा कर रहा है तो इसके पीछे कौन सी सामाजिक परिस्थिति है ? क्या ऐसा नहीं कि दो बड़े समुदायों के मध्य फैली तरह-तरह की भ्रांतियां इसे बढावा दे रही है ? अक्सर मुसलमान युवकों के बीच इस बात की चर्चा होती है कि हिंदू लड़की के साथ सेक्स करने पर जन्नत हासिल होगी और हिंदू युवक कहते हैं एक मुस्लिम लड़की के साथ सेक्स करने पर सौ यज्ञों का पुन्य मिलेगा । क्या इन दुष्प्रचारों से तो ऐसा नहीं हो रहा ? समाज को अपनी सोच बदलनी होगी नही तो ये लव के नाम पर हो रहा जिहाद हमें ले डूबेगा ।



>आख़िर कॉमरेड को जन्नत की हकीकत मालूम हो गई

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कल मंडीहॉउस में कॉमरेड संतोष से मिला । मुलाकात कब वाद-प्रतिवाद के ऊपर बहस में बदल गई तनिक भी पता न चला । वामपंथ की प्रासंगिकता से शुरू हुए इस बहस के अंत तक पहुँचते -पहुँचते इसकी असलियत पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा हो गया ।संतोष जैसे हजारों युवा कच्ची उम्र में एक्टिविज्म का शौक पाले विभिन्न पंथों की दूकान चलाने वाले राजनीतिक दलों , छात्र संगठनों और दबाव समूहों से जुड़कर अपना खून -पसीना बहाते हैं । इनमें से अधिकाँश को जब जन्नत की हकीकत मालूम होती है तब समाज और देश की जगह केवल व्यक्तिवादी सोच बचती है । और यही सोच यह कहने पर मजबूर करती है कि अरे यार हमने भी कॉलेज के दिनों में ये सब खूब किया था , कुछ नही बदलने वाला , साला सिस्टम ही भ्रष्ट है।ख़ुद को कॉमरेड कहने वाला संतोष भी बिहार के सीमांचल इलाके से व्यवस्था परिवर्तन , समानता , पूंजीवाद से लडाई और भी न जाने कितने सपने संजोये दिल्ली आया था । यहाँ अपने लक्ष्य को पाने के लिए ‘एस ऍफ़ आई’ का कैडर बनकर पढ़ाई और पैसे बरबाद करता रहा । हर रोज १०-२० लोगों से मिलना संगठन की बातें बताने में ही सारा दिन निकल जाता । थोडी बहुत कोर्स की पढ़ाई के अलावा विचारधारा का चिंतन और पार्टी सिधान्तों से जुड़े साहित्य का अध्ययन करते हुए कब नींद आ जाती पता ही न चलता । ४ सालों तक संगठन के नेताओं के दिशा -निर्देश का पालन बगैर सोचे -समझे करता रहा । इतने महत्वपूर्ण समय को संगठन के लिए खपाने वाला ‘कॉमरेड’ आज बेगारी से जूझ रहा है । आज उसे संगठन के नाम से भी चिढ है । क्यों उसे लगता है किउसने अपना समय बेकार में नष्ट किया ? इस सवाल का उत्तर भी संतोष के पास ही है । जबाव कई हैं ।

* समाज में आर्थिक समानता लाने , भेदभाव मिटाने , साम्प्रदायिकता से लड़ने जैसे बड़े लक्ष्य रखने का दावा करने वाले इन वाम संगठनों की कथनी और करनी में फर्क है । जिन सिधान्तों की घुट्टी कार्यकर्ताओं को पिलाई जाती है उन्हीं से शीर्ष पर बैठे लोगों का कोई सरोकार नही होता है ।
वाम
*पूंजीवाद के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने का दावा करने वाले संगठनों के उच्चासीन नेताओं का रहन -सहन उन्हीं के सिधान्तों की पोल खोलता है । इसी सन्दर्भ में मुझे एक घटना याद आ रही है । जनवरी ०९ में हम कुछ साथियों के संग वी ० पी० हॉउस घूम रहा थे । इस दौरान तथाकथित पूंजीवाद विरोधी माकपा नेत्री वृंदा करात के कमरे के बाहर हमें दर्जन भर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के न्यू इयर कार्ड मिले । कार्ड में स्पष्ट शब्दों में वृंदा जी को बधाई का संदेशा लिखा हुआ था ।

* नंदीग्राम के नरसंहार की वीभत्स घटना में पश्चिम बंगाल के वाम सरकार का पूंजीवाद समर्थित चेहरा दुनिया के सामने आ चुका है ।

*धर्म को अफीम कहने वाले वाम दलों की धर्मनिरपेक्षता कलंकित हो गई थी जब केरल में उग्रवादी नेता मौलाना मदनी के साथ चुनावी गटबंधन किया गया था । एक पक्ष की साम्प्रदायिकता से लड़ने के लिए दुसरे पक्ष की सांप्रदायिक दलों से हाथ मिलाने से सब साफ़ है । इनके लिए तो एक ख़ास धर्म हीं अफीम है !

ऐसे सैकडों कारनामें हैं जो इनकी कथनी और करनी में फर्क को साबित करते हैं । वृंदा और ममता बनर्जी के साड़ी के फर्क ने बंगाल का वाम किला ढाह दिया । जनता को वास्तविकता का अहसास हो गया है परन्तु अफ़सोस है कि अब भी संतोष जैसे युवा एक बंजर और अप्रासंगिक हो चुकी विचारधारा को हरा-भरा करने में अपनी ऊर्जा बरबाद कर रहे हैं । कॉमरेड संतोष ने एक बेहद महत्वपूर्ण तथ्य की ओर इशारा किया है । वाम संगठनों में कार्यकर्ताओं से आत्मीयता और व्यक्तिगत संबंधों को न के बराबर महत्व दिया जाता है । पार्टी के जो कार्यकर्त्ता कभी महीनों संतोष के खर्चे पर पलते थे आज आँख उठा कर देखना भी पसंद नही करते हैं । भारत में सिमटते जा रहे तथाकथित वामपंथ से इनका कोई लेना-देना नहीं रह गया है । संतोष सरीखे हजारों की हालत को देखकर ‘फनीश्वरनाथ रेणुकी कहानी ‘आत्मसाक्षी’ के पात्र कॉमरेड “गणपत” के जैसी है । रेणु ने जो बात सालों पहले समझ ली थी उस हकीकत को समझने -बुझने में हमें इतने दिन लग गए । चलिए देर ही सही पर दुरुस्त आए !

>एक कॉमरेड व्यथा गाथा ………..

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कल मंडीहॉउस में कॉमरेड संतोष से मिला । मुलाकात कब वाद-प्रतिवाद के ऊपर बहस में बदल गई तनिक भी पता न चला । वामपंथ की प्रासंगिकता से शुरू हुए इस बहस के अंत तक पहुँचते -पहुँचते इसकी असलियत पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा हो गया ।संतोष जैसे हजारों युवा कच्ची उम्र में एक्टिविज्म का शौक पाले विभिन्न पंथों की दूकान चलाने वाले राजनीतिक दलों , छात्र संगठनों और दबाव समूहों से जुड़कर अपना खून -पसीना बहाते हैं । इनमें से अधिकाँश को जब जन्नत की हकीकत मालूम होती है तब समाज और देश की जगह केवल व्यक्तिवादी सोच बचती है । और यही सोच यह कहने पर मजबूर करती है कि अरे यार हमने भी कॉलेज के दिनों में ये सब खूब किया था , कुछ नही बदलने वाला , साला सिस्टम ही भ्रष्ट है।ख़ुद को कॉमरेड कहने वाला संतोष भी बिहार के सीमांचल इलाके से व्यवस्था परिवर्तन , समानता , पूंजीवाद से लडाई और भी न जाने कितने सपने संजोये दिल्ली आया था । यहाँ अपने लक्ष्य को पाने के लिए ‘एस ऍफ़ आई’ का कैडर बनकर पढ़ाई और पैसे बरबाद करता रहा । हर रोज १०-२० लोगों से मिलना संगठन की बातें बताने में ही सारा दिन निकल जाता । थोडी बहुत कोर्स की पढ़ाई के अलावा विचारधारा का चिंतन और पार्टी सिधान्तों से जुड़े साहित्य का अध्ययन करते हुए कब नींद आ जाती पता ही न चलता । ४ सालों तक संगठन के नेताओं के दिशा -निर्देश का पालन बगैर सोचे -समझे करता रहा । इतने महत्वपूर्ण समय को संगठन के लिए खपाने वाला ‘कॉमरेड’ आज बेगारी से जूझ रहा है । आज उसे संगठन के नाम से भी चिढ है । क्यों उसे लगता है किउसने अपना समय बेकार में नष्ट किया ? इस सवाल का उत्तर भी संतोष के पास ही है । जबाव कई हैं ।

* समाज में आर्थिक समानता लाने , भेदभाव मिटाने , साम्प्रदायिकता से लड़ने जैसे बड़े लक्ष्य रखने का दावा करने वाले इन वाम संगठनों की कथनी और करनी में फर्क है । जिन सिधान्तों की घुट्टी कार्यकर्ताओं को पिलाई जाती है उन्हीं से शीर्ष पर बैठे लोगों का कोई सरोकार नही होता है ।

वाम

*पूंजीवाद के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने का दावा करने वाले संगठनों के उच्चासीन नेताओं का रहन -सहन उन्हीं के सिधान्तों की पोल खोलता है । इसी सन्दर्भ में मुझे एक घटना याद आ रही है । जनवरी ०९ में हम कुछ साथियों के संग वी ० पी० हॉउस घूम रहा थे । इस दौरान तथाकथित पूंजीवाद विरोधी माकपा नेत्री वृंदा करात के कमरे के बाहर हमें दर्जन भर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के न्यू इयर कार्ड मिले । कार्ड में स्पष्ट शब्दों में वृंदा जी को बधाई का संदेशा लिखा हुआ था ।

* नंदीग्राम के नरसंहार की वीभत्स घटना में पश्चिम बंगाल के वाम सरकार का पूंजीवाद समर्थित चेहरा दुनिया के सामने आ चुका है ।

*धर्म को अफीम कहने वाले वाम दलों की धर्मनिरपेक्षता कलंकित हो गई थी जब केरल में उग्रवादी नेता मौलाना मदनी के साथ चुनावी गटबंधन किया गया था । एक पक्ष की साम्प्रदायिकता से लड़ने के लिए दुसरे पक्ष की सांप्रदायिक दलों से हाथ मिलाने से सब साफ़ है । इनके लिए तो एक ख़ास धर्म हीं अफीम है !

ऐसे सैकडों कारनामें हैं जो इनकी कथनी और करनी में फर्क को साबित करते हैं । वृंदा और ममता बनर्जी के साड़ी के फर्क ने बंगाल का वाम किला ढाह दिया । जनता को वास्तविकता का अहसास हो गया है परन्तु अफ़सोस है कि अब भी संतोष जैसे युवा एक बंजर और अप्रासंगिक हो चुकी विचारधारा को हरा-भरा करने में अपनी ऊर्जा बरबाद कर रहे हैं । कॉमरेड संतोष ने एक बेहद महत्वपूर्ण तथ्य की ओर इशारा किया है । वाम संगठनों में कार्यकर्ताओं से आत्मीयता और व्यक्तिगत संबंधों को न के बराबर महत्व दिया जाता है । पार्टी के जो कार्यकर्त्ता कभी महीनों संतोष के खर्चे पर पलते थे आज आँख उठा कर देखना भी पसंद नही करते हैं । भारत में सिमटते जा रहे तथाकथित वामपंथ से इनका कोई लेना-देना नहीं रह गया है । संतोष सरीखे हजारों की हालत को देखकर ‘फनीश्वरनाथ रेणुकी कहानी ‘आत्मसाक्षी’ के पात्र कॉमरेड “गणपत” के जैसी है । रेणु ने जो बात सालों पहले समझ ली थी उस हकीकत को समझने -बुझने में हमें इतने दिन लग गए । चलिए देर ही सही पर दुरुस्त आए !

>भारत एक मिशन है,एक गौरवपूर्ण भविष्य है : "नेता जी "

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मनुष्य -जीवन में जिस प्रकार शैशव ,यौवन,प्रौढावस्थाऔर वार्धक्य आते हैं , राष्ट्रीयजीवन में भी ऐसी अवस्थाएं उसी क्रम में आती है । मनुष्य मरता है , एक शरीर को त्याग कर नया कलेवर धारण करता है । राष्ट्र भी मरता है और मरण के भीतर से ही नवजीवन प्राप्त करता है । फ़िर भी व्यक्ति और राष्ट्र का अन्तर यह है कि सब राष्ट्र मृत्योपरांत जीवन नहीं पाते । भारतवर्ष एक से अधिक बार मरा है , किंतु हमेशा पुनर्जीवन मिलता रहा है । उसका कारण यह है कि भारत के अस्तित्व की सार्थकता रही है और आज भी विद्यमान है । भारत का एक संदेश संसार के कोने-कोने तक पहुँचाना है; भारत की संस्कृति में ऐसे कुछ तत्व हैं जिसे प्राप्त किए बगैर विश्व सभ्यता वास्तविक उन्मेष नही पा सकती है । केवल यही नहीं , विज्ञान , कला , संगीत , साहित्य , व्ययसाय , वाणिज्य आदि तमाम क्षेत्रों में हमारा राष्ट्र कुछ देगा और सिखायेगा । इसीलिए भारतीय मनीषियों ने अंधकारपूर्ण युगों में भी अपलक भारतीय ज्ञान का दीपक प्रज्वलित रखा । हम उन्ही की संतान हैं । अपना राष्ट्रीय लक्ष्य प्राप्त किए बिना हम मर सकते हैं क्या ?

जंग -ऐ- आजादी के सच्चे सेनानायक सुभाष चन्द्र बोस “नेता जी ” ने कहा था -” बाहर के जेलखानों में रहने के दौरान अक्सर मेरे मन में यह प्रश्न उठता -किसके लिए , किसकी प्रेरणा से हम इतनी यातनाएं सहकर भी टूटे नहीं बल्कि और अधिक शक्तिशाली हो उठे हैं ? भीतर से जबाव आता – भारत एक मिशन है , एक गौरवपूर्ण भविष्य है ; भारत के उस भविष्य के उत्तराधिकारी हम हैं । नए भारत के मुक्ति के इतिहास की रचना हम ही कर रहे हैं और हम ही करेंगे । यह आस्था है तभी सब दुःख कष्ट सह सकता हूँ , भविष्य के अंधेरे को स्वीकार कर सकता हूँ , यथार्थ के निठुर सत्यों को आदर्श के कठोर आघात से धुल में मिला सकता हूँ । ”

>जनता का अविश्वास बढ़ा है : युवा सांसदों का बयान

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सरकार और जनता के बीच अविश्वास की खाई का बड़ा कारण देश का विकास धीमी गति से होना है । यह विश्वास देश के विकास की गति को बढ़ा कर ही वापस लाया जा सकता है और विकास के लिए जरुरी है कि सभी के पास रोजगार उपलब्ध हों ।१५ वीं लोकसभा में भले ही १०० से ज्यादा आपराधिक पृष्ठभूमि के सांसद जीत कर आए हो लेकिन युवा ब्रिगेड के जलवे से अपराधीकरण और वंशवाद जैसे मुद्दे गौण होते जा रहे हैं ।
वर्तमान लोकसभा की युवा ब्रिगेड के कुछ सदस्यों ने एसोचेम की एक परिचर्चा में अपनी प्राथमिकतायें सामने रखी । विभिन्न दलों से जीत कर आए इन युवा प्रतिनिधियों का मानना है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर , कृषि , सैन्य क्षमता से लेकर जनसँख्या नियंत्रण और शिक्षा – स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों पर ध्यान देकर ५-१० सालों में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की बदहाल सूरत को खुशहाली में बदला जा सकता है । भाजपा नेता कीर्ति आजाद ने कहा , ” युवा सांसदों के लिए शिक्षा और जनसँख्या नियंत्रण अहम् मुद्दे हैं । जैसे चीन ने इस दिशा में काफ़ी कार्य किया है वैसे ही भारत में कुछ कदम उठाने होंगे । “
भाजपा सांसद दुष्यंत सिंह ने भी कहा, ” सरकार को लोगों की शिक्षा और जनसँख्या नियंत्रण पर उचित ध्यान देने की जरुरत है । आने वाले समय में बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर मुहैया करना सरकार की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होगी । “
एक अन्य युवा सांसद विजय इंदर सिंघल बोले , ” चुनाव में जनता ने युवाओ को पसंद किया । यदि देश को विकास के रास्ते पर जाना चाहते हैं तो हमें सही जगह सही लोगों को रखना होगा ।”
भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने कहा , ” मंदी के समय उद्योग जगत को कामगारों के हितों को ध्यान में रखते हुए उनके नौकरियों की रक्षा करनी चाहिए क्योंकि इंडस्ट्री के अच्छे समय में इन्होंने ही साथ दिया था । मुनाफे की आढ़ में मानवीय मूल्यों का गला नहीं घोटा जाना चाहिए । “
कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल ने मौके पर कहा , “देश में मतदान के तरीके सुधारने की जरुरत है ताकि चुनाव के समय बाहर गए हुए लोग और प्रवासी भारतीय भी वोट कर सकें । और सरकार को देश के इन्फ्रास्ट्रक्चर पर काम करना होगा क्योंकि विकास की नीव यही है । “
कांग्रेस के मनीष तिवारी ने कहा ” हमारे पास चुनौती और मौके दोनों हैं हर दिन चीन सबसे ज्यादा खर्च सैन्य ताकत को बढ़ाने में कर रहा है । दक्षिण एशिया के हालत ठीक नही हैं । इसलिए देश को इन सब चुनौतियों से आगे बढ़ना होगा । सरकार को कृषि पर ध्यान देना होगा क्योंकि ६५% जनता अभी भी खेती से जुडी है ।
एसोचेम द्वारा आयोजित इस परिचर्चा में कई और जनप्रतिनिधियों ने भाग लिया और अपने सुझाव दिए । चर्चा का सार यही रहा कि इन्फ्रास्ट्रक्चर , कृषि , सैन्य क्षमता , जनसंख्या नियंत्रण , शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे को प्राथमिकता दी जानी चाहिए । युवा सांसदों बयानबाजी एक ने लड़ते अहसास दिलाने वाला है लेकिन तब जब ये बातें उनके व्यवहार में भी सामने आए । क्योंकि मनसा , वाचा फ़िर कर्मणा के सिधान्तों से विकास का मार्ग प्रशस्त हो सकता है । थोथी बयानबाजी से जनता को भरमाया नहीं जा सकता है और इन्हें भी समय रहते समझ जाना चाहिए कि कागज़ के फूलों से अधिक दिनों तक खुशबू नहीं आ सकती है ।

>चीर देंगे वक्त के जिस्म पर लगा हर एक घाव

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जय हिंद , साथिओं !
अभी -अभी हमारे गणतंत्र या लोकतंत्र अथवा प्रजातंत्र जो भी कहें , क्योंकि वो बस कहने भर को हमारा है बाद बाकि इसकी आत्मा अर्थात संविधान तो आयातित ही है ना , का कुम्भ समाप्त हुआ है । वैसे तो यह कुम्भ मेला कम अखाडा ज्यादा लगता है पर अखाड़े की धुल मिटटी की जगह यहाँ भ्रष्टाचार के कीचड़ उछाले जाते हैं । आशंकाओं के विपरीत कांग्रेस का २०० सीटों पर जीत कर आना और यूपीए द्वारा बहुमत से सरकार बनाने को लेकर लोग बड़े खुश दिखाते हैं। बहुत सालों बाद अच्छी बहुमत वाली सरकार देखकर शायद उन्हें भ्रम हो रहा है किअगले ५ वर्ष शांतिपूर्वक मनमोहन सरकार की सुविधाभोगी नीतियों के सहारे गुजर जायेंगे । युवा साथिओं ! अगर आप भी कुछ ऐसा सोचते हैं तो आप ग़लत हो सकते हैं । अरे, आप तो सोचिये , विचारिये , आस-पास उठ रहे झंझावातों की आहट को पहचानिये ! कभी जयप्रकाश तो कभी मंडल -कमंडल के जरिये प्रतिउत्तर देने वाला स्वतंत्र भारत का वो वर्ग एक बार फ़िर क्रांति की जमीन तलाश रहा है । ऐसे युग- परिवर्तकों की संख्या आज भी सैकडों में है जिन्हें सरकार के बनने , नही बनने से मतलब सत्ता से कोई खास फर्क नही पड़ता । संघर्ष को ही जीवन का अन्तिम सत्य मन लेना संभवतः इनके स्वभाव में ही रचा -बसा है । प्रश्न उठता है संघर्ष क्यों और किस हेतु ? उत्तर में हमारे एक बुजुर्ग आंदोलनकारी ने मुझसे कहा ” झूठी बात नही कहूँगा , देश और समाज से ज्यादा यह ख़ुद के लिए है माने स्वान्तः सुखाय। और चित्त ही ऐसा हो गया है कि बगैर इन बातों के हम तो मृतप्राय ही हो जायेंगे । “
लोग अक्सर कहते हुए सुने जाते हैं कि आज के युवाओं के लिए आन्दोलन , क्रांति जैसे शब्द बेमानी हैं । कुछ युवा ऐसे मिलते भी हैं । अक्सर चर्चा के दौरान अधिकांश लोग ‘राम मन्दिर आन्दोलन ‘ की बात करके न केवल संघ को लपेटते हैं बल्कि आन्दोलन की प्रासंगिकता को भी चुनौती दे जाते हैं । समझ -समझ की बात है और हमारे अन्दर ऐसी समझ भौतिकतावादी / यथास्थितिवादी / भाग्यवादी मतों ने पैदा की हैं । तब ऐसे – वैसे समय में यही संघर्षशील लोग परिस्थिति में संतुलन बनाये रखते हैं ।( यहाँ संघर्षशील लोगों का तात्पर्य सड़क पर उतरने वालों की ही नही अपितु उनसे भी है जो इन आंदोलनों की पृष्ठभूमि तैयार करते हैं , इनके मुद्दे तैयार करते हैं ) तभी तो लोकतंत्र में ऐसे दबाव समूहों की भूमिका को अनिवार्य माना जाता है ।कुछ मानवता के नाम पर अतिउत्साहित युवा अक्सर इन समूहों अथवा संगठनों को समाप्त करने की बात करते हैं । कई लोग इनके ख़ुद ख़त्म होने की भविश्यवाणी भी करते हुए मिल ही जाते हैं । अपने अव्यावहारिक ज्ञान के कारण हम में से कई लोग प्रकृति के संतुलन का सिद्धांत भूल जाते हैं । मुझे ‘मकबूल’ फ़िल्म का संवाद याद आ रहा है जिसमे नसीरुद्दीन शाह कहता है ‘ ” आग के लिए पानी का डर बना रहना चाहिए ” । लगता है , आंदोलनों की काफी गहरे में चले जा रहे हैं । पुनः वापस लौटते हैं चुनाव परिणाम की संतुष्टि में खोये , स्थिर सरकार की निश्चिंतता में सोये राष्ट्र के प्रहरियों को बताने की परिवर्तन ऊंट फ़िर से करवट ले रहा है। भारतीय संविधान के ६० साल पुरे होने वाले हैं । देश भर के अनेकों विचारकों द्वारा वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था की विफलता को लेकर वर्ष भर राष्ट्रीयबहस का माहौल पैदा किया जाने का अनुमान हैं । बाबा रामदेव और पंडित रविशंकर सरीखे आध्यात्मिक गुरुओं ने सक्रीय राजनीति में प्रवेश लगभग कर लिया है। आने वाले एक साल के भीतर ‘राम जन्म भूमि बनाम बाबरी मस्जिद’ के विवाद का फ़ैसला आने वाला है । निर्णय चाहे जो भी हो एक बड़ा तूफ़ान तो खड़ा होगा ही । और विश्व हिंदू परिषद् द्वारा ‘राम शिलाओं’ को विवादित भूमि के नजदीक ले जाने की घोषणा से सब कुछ साफ़ हो जाता है । जरा सा गौर से आस -पास की हलचलों पर जोर देन तो आने वाले भविष्य की जो तस्वीर स्पष्ट हो जाती है उसके अनुसार देश एक लंबे अन्तराल के बाद आस्था , राष्ट्रवाद , बढती आर्थिक असमानता आदि मुद्दों के कारण आन्दोलनों की चपेट में होगा । वक्त संक्रमण का शिकार हो चुका है । बदलाव के ऐसे स्वर्णिम अवसर में हमें अपनी -अपनी भूमिका भी तय कर लेनी चाहिए । हमारा” युवा ” भी इस बार कमर कस कर खड़ा है । हर साथी उत्साहित है उधम सिंह और नेता जी की तरह अपने उद्देश्यों को संपन्न करने हेतु । आने वाले समय की तकदीर हम लिखेंगे अपने हाथों से । चीर देंगे वक्त के जिस्म पर लगा हर घाव !
आईये सपथ लें उस मातृभूमि की जिसका दूध हमारी रगों का लहू है । सपथ लें उस समाज का जिसको बदलने का सपना हम देखा करते हैं । जय हिंद !

>एक जीवन ऐसा भी

>उगता चाँद डूबता सूरज संदीप (बदला हुआ नाम) नोएडा के एक अन्तर- राष्ट्रीय काल सेन्टर में कामकरता है ! संदीप ने बी।एस. सी की डिग्री दिल्ली यूनिवर्सिटी से ली है और सोफ्टवेयर टेक्नोलॉजी में डिप्लोमा किया है ! काफी कम्पनियों के चक्करकाटने के बाद जब कही बात ना बनी तब किसी दोस्त के कहने पर संदीप ने इसकॉल सेन्टर में अप्लाई किया और अंग्रेज़ी का अच्छा ज्ञान होने के कारण उसे नौकरी भी मिल गई ! आज संदीप पिछले २ सालो से इस काल सेन्टर में काम कररहा है पैसे तो अच्छे मिलते है लेकिन संदीप कहता है ” मैं जब यहाँ आया था तब कॉलेज से निकला एक नौजवान था जिसके सपने कुछ करने के कुछ बनने के थे , लेकिन अब मैं एक अधेड़ व्यक्ति हूँ । मेरा वज़न मेरे कद से कही ज्यादा होचुका है, अब छुट्टी के दिन भी मैं रात में सो नही पाता, आँखों के पासकाले धब्बे पड़ चुके है, बाल झड़ चुके है , चेहरा बीमार सा दीखता है, औरकाम में ज़रूरत से ज्यादा प्रेशर होने के कारण झुंझलाया सा रहता हु ! बिनाबात के लोगो से लड़ ज्ञाता हूँ ! सारी- सारी रात अँगरेज़ कस्टमरों सेफ़ोन पे बात करना कभी उनसे पैसे की वसूली करना तो कभी उनकी समस्याओ कोसुलझाना, कभी उनकी अंग्रेज़ गालीयाँ सुनना तो कभी अपनी कंपनी की पॉलिसीका हवाला देते हुए उनसे पचास झूठ बोलना ” ! क्या एक आम इंसान जो रात भरयह काम करेगा और पुरा दिन सोयेगा वह नार्मल जीवन जी पायेगा ! या फिर पैसाहमारे जीवन को खोखला बनाता जा रहा है, हम पाश्चात्य संस्कृति के ओर इस कदर बढ़ रहे है कि हम अपने जीवन को भी ताक पर रख देते है !इसका परिणाम क्या होगा ? क्या हम भारत को एक नया, युवा भारत बना पाएंगे ? यासिर्फ़ अमेरिका का एक मुखौटा बन कर रह जायेंगे ! संदीप के शब्दों में “मैंने जब कॉल सेन्टर जोइन किया था तब लगा था मेरी सारी पारिवारिक औरव्यक्तिगत समस्याओ का समाधान हो जाएगा, लेकिन बजाए समाधान के मेरा सिर्फ़नुक्सान ही हुआ, ना तो मैं सेविंग ही कर पाया और नाही अपने परिवार को हीकुछ दे सका, मेरी सोशल लाइफ बिल्कुल ख़तम हो चुकी है , मैं अपने शरीर कोबरबाद कर चुका हु, मैं चाह कर भी अपने घर वालों से ठीक से बात नही करपाता, अब लगता है के मैंने दस पन्द्रह हज़ार रुपये के लिए अपने भावी औरभविष्य दोनों का ही गला घोंट दिया है “सवाल यह भी उठता है के बेरोजगार नौजवान जाए कहा, दिन की प्राइवेट हो या सरकारी नौकरियां बिना सिफारिश मिलती नही और जो मिल भी जाए तो पैसे इतने कममिलते है के परिवार तो क्या अपना ख़ुद का भी खर्चा नही चले, घूम फिर कर नई पीढी को इन कॉल संतरों में ग्लैमर, पैसा, फ्री यातायात, खाना, औरदिन की नौकरी से ज्यादा पैसे मिल जाते है और ऐसे चीजों का एक युवा को रिझा लेना लाज़मी है! फिर वो अपने जीवन, स्वास्थ, और भविष्य से हीक्यो ना खेल बैठे ! सरकार हमेशा की तरह बेबस और वही पुराने जवाबो से लैस के कुछ तो है फिर इतनी नौकरिया आए कहाँ से, जनसँख्या भी तो नियंत्रद केबाहर है ! और आख़िर में रह जाता है इस सरकारी और प्राइवेट ज़ंग में दशकों पिसता युवा जो वक्त से पहले बूढा हो जाता है, और लाचारी और बेबसीको ही अपनी किस्मत मान बैठता है !

: – कनिष्क कश्यप