>संसद में शोर

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लेखक : रमेश भट्ट , लोकसभा टीवी 



संसद, लोकतन्त्र का खंभा , 
देश की सर्वोच्च नीति निर्धारक संस्था, 
देश के विकास की नींव यही रखी जाती है। देश के कोने कोने से चुने हुए प्रतिनिधि देश भर की समस्याओं को लेकर यहां अपनी आवाज बुलन्द करते है। जनता से जुड़े मुददों पर सार्थक बहस इसी जगह होती है। कानून बनाने की ताकत भी इसी संसद के पास है। मगर आज यहां हालात बदले बदले नज़र आ रहे है। सदन में आए दिन होने वाले हो हंगामें से अब जनता त्रस्त हो गई है। आखिर किसके लिए है संसद। क्या है इसका उद्देश्य। क्या संसद आम आदमी के प्रति नही है। इसमें कोई दो राय नही की संसदीय बहस का स्तर लगातार गिर रहा है। सांसद रचनात्मक बहस से ज्यादा आपसी टोकाटोकी में ज्यादा मशगूल नज़र आते है। संसद में आए दिन हंगामा होना कोई नही बात नही है। सच्चाई यह है कि राजनीतिक दलों ने इसे एक सियासी हथियार के तौर पर अपना लिया है। वैसे तो सदन में सांसदों के लिए कई नियम बनाये गए है। मगर इसका अनुसरण कोई नही करता। मसलन कोई सदस्य अगर भाषण दे रहा हो, तो उसमें बांधा पहुचाना नियम के खिलाफ है। सांसद ऐसी कोई पुस्तक, समाचार पत्र या पत्र नही पडे़गा जिसका सभा की कार्यवाही से सम्बन्ध न हो । सभा में नारे लगाना सर्वथा नियम विरूद है। सदन में प्रवेश और निकलते वक्त अध्यक्ष की पीठ की तरफ नमन करना नियम के तहत है। अगर कोई सभा में नही बोल रहा हो तो उसे शान्ति से दूसरे की बात सुननी चाहिए।  भाषण देने वाले सदस्यों के बीच से नही गुजरना चाहिए। यहां तक कि कोई भी सांसद अपने भाषण देने के तुरन्त बाद बाहर नही जा सकता। हमेशा अध्यक्ष को ही सम्बोधित करना चाहिए। नियम के मुताबिक सदन की कार्यवाही में रूकावट नही डालनी चाहिए। सदन की कार्यवाही में रूकावट नही डालेगा। इन सारे नियमों के लब्बोलुआब को कुछ अगर एक पंक्ति में समझना हो तो सदन में अध्यक्ष के आदेश के बिना पत्ता भी नही हिल सकता। दु:ख की बात तो यह है कि ऐसे कई नियम मौजूद है लेकिन इन नियमों केा मानने वाला कोई नही। राजनीतिक चर्चाऐं कई बार अखाड़ों में तब्दील हो जाती है। आज इन सारे नियमेंा की अनदेखी एक बड़े संसदीय संकट की ओर इशारा कर रही है। क्या इसका उपाय है हमारे पासर्षोर्षो आज 100 दिन संसद का चलना किसी सपने की तरह है। कई जरूरी विधेयक बिना बहस के पास हो रहे है। सभा की कार्यवाही से कई सांसद अकसर नदारद रहते है। कभी कभी तेा कोरम पूरा करने के लिए सांसद खोज के लाने पड़ते है। क्या दुनिया के सबसे बडे लोकतन्त्र की तस्वीर ऐसी होनी चाहिए। आज सासन्द असंसदीय भाषा का इस्तेमाल करने से भी नही चूक रहे है। अब समय आ गया है कि जनता `काम नही तो भत्ता नही` और `जनप्रतिनिधी को वापस बुलाने के अधिकार` को कानूनी रूप प्रदान करने के लिए राजनीतिक दलों पर दबाव बनाये। 


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>अरे , भूल गये पुन्यप्रसून जी कि …………………………….

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झारखण्ड की किस्मत किसने तय की है , वहां की जनता ने ही ना !  अरे , भूल गये पुन्यप्रसून जी कि ये वही प्रदेश है जहाँ की जनता ने घोटाले में लिप्त मुख्यमंत्री की बीबी को सर आँखों पर बिठाया था . यही वो प्रदेश है जो भावनाओं में बहकर शिबू सोरेन जैसों को अपनी बागडोर थमाता है . अब सांप को दूध पिलाओ तब भी जहर कम नहीं होता ! ये शिबू सोरेन की आदत है कभी यहाँ कभी वहां मुंह मारने की . लोग तो तब भी भाजपा के फैसले पर आश्चर्यचकित थे . तब विधायकों के   टूट जाने के भय से जिस स्संप को गले में डाला उसके जहर भरे दांत तोड़ने के उपाय भी करने चाहिए थे . वैसे मानते हैं कि आपकी रपट अलग होती है गरीब आदिवासियों से आपकी विशेष सहानुभूति है लेकिन भाई हम ऐसे लोगों से सहानुभूति नही रखते जो बार-बार एक ही गलती दुहराते हैं .झारखण्ड का मतदाता इतना सीधा-सादा भी नहीं है कि शिबू जैसों की असलियत ना पहचान सके , और फ़िर भी वोट देता है तो इसमें शिबू से ज्यादा इनकी गलती है ……………

>राजनीति में सिद्धांत — दिवास्वप्न सरीखा है अब

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राजनीति में सिद्धान्तों की राजनीति तो समाप्त हो गई और सिद्धान्त विहीन राजनीति की शुरुआत होने लगी। किसी भी स्थिति के सिद्धान्त क्या होगे और कब तक वे लागू रहेंगे यह एक प्रश्न हो सकता है किन्तु हमारा मानना है कि सिद्धान्त वही होते हैं जो कभी बदलते नहीं या फिर उनमें परिवर्तन नहीं होता। यदि ऐसा है तो इसका तात्पर्य यह हुआ कि राजनीति में कोई सिद्धान्त था ही नहीं? यदि कोई सिद्धान्त होते तो हम कैसे उनके बदलने की चर्चा करते, हाँ नियमों का बदला जाना तो समझ में आता है।

(चित्र गूगल छवियों से साभार)

राजनीति में जिन सिद्धान्तों की हम बात करते हैं वे हमारे जीवन के सिद्धान्त हैं। इनके सहारे ही हम अपनी जीवन-शैली को सुचारू रूप से आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं। जीवन से इतर जब हम राजनीति की बात करते हैं तो हम इसके द्वारा कल्पना करते हैं एक ऐसी व्यवस्था की जो हमें शासन-प्रशासन की उपलब्धता करवाती है। एक ऐसी व्यवस्था की जो हमें संसाधनों की, अवसरों की सुविधा-उपलब्धता उपलब्ध करवाती है।

वर्तमान में हमने राजनीति में सक्रिय व्यक्तियों के आधार पर, उनके कार्यों के आधार पर सिद्धान्तों का प्रतिपादन कर लिया है। अब हमें दिखाई देता है कि किसी भी दल के लिए अपने किसी भी सिद्धान्त का कोई अर्थ नहीं। उसके लिए उसके ही द्वारा बनाये गये सिद्धान्तों की कोई अहमियत नहीं। किसी दल के लिए कल कोई दुश्मन से ज्यादा खतरनाक होता है तो अगले ही दिन वही उसका सर्वप्रिय बन जाता है। वर्षों पहले के नारों में से सबसे विवादित नारा ‘तिलक, तराजू और तलवार……..’ किसी ने भी नहीं भुलाया होगा किन्तु आज यही सबसे आगे की पंक्ति में साथ देते दिख रहे हैं।

विवादों और आरोपों का राजनीति के साथ चोली-दामन का साथ है किन्तु अब इसमें स्वार्थपरकता भी शामिल हो चुकी है। स्वार्थ की स्थिति यह है कि प्रत्येक दल को दलित और मुस्लिम एक प्रकार का वोट-बैंक लगता है। हरेक दल किसी न किसी रूप में इन दोनों को अपने-अपने पाले में खींचने की कोशिश में लगे रहते हैं। इसके लिए उन्हें किसी भी हद तक गिरना पड़े, वे स्वीकार कर लेते हैं। मुस्लिमों को राजनीति में आरक्षण की बात हो अथवा दलितों के आरक्षण में से उनको भी आरक्षण देने की रंगनाथ मिश्र की रिपोर्ट, सब कहीं न कहीं स्वार्थपूर्ति का साधन बनती दिख रही हैं।

ऐसा कब तक होगा यह कहना तो बहुत ही मुश्किल है किन्तु इतना तो कहा जा सकता है कि जब तक होगा तब तक किसी भी वर्ग का, किसी भी जाति का, किसी भी धर्म का भला होने वाला नहीं, सिवाय उन राजनैतिक महानुभावों के जो इस सिद्धान्तविहीन राजनीति को जन्म दे रहे हैं। इसके उदाहरण हम उत्तर प्रदेश में हो रही राजनीति से देख सकते हैं जहाँ सब एक दूसरे के लिए सिर्फ और सिर्फ बदले की भावना से राजनीति में लगे हैं।

>महिलाओं कभी तो पुरुषों के सहयोग को स्वीकार लिया करो…

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100वाँ साल है अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस का और ऐसे में आशा व्यक्त की जा रही है कि देश की संसद में महिला आरक्षण बिल पेश हो जायेगा और स्वीकार भी होगा। इस बिल के विरोध में तमाम सारे लोग हैं जो इसके अच्छे और बुरे पक्षों पर अपनी राय दे रहे हैं।

हमारा यहाँ महिला आरक्षण बिल को लेकर किसी तरह के पक्ष या विपक्ष वाली बात नहीं है। हमारा तो मानना है कि विगत 14 वर्षों से चला आ रहा इंतजार समाप्त हो और इस बिल को पास होने का सौभाग्य प्राप्त हो।

हमारी खुशी तो इस बात पर है कि बात-बात पर पुरुष समाज को कोसने का कार्य करने वाली महिलाओं के लिए बिल का रास्ता पुरुषों के समर्थन से ही तय होगा। इसे हमारा किसी प्रकार का दम्भ न माना जाये, हम उस आइने को दिखाने का प्रयास कर रहे हैं जिसे महिलाएँ देखना नहीं चाहतीं हैं।

महिलाओं से सम्बन्धित किसी भी कमी अथवा समस्या का जिम्मेवार वे पुरुष समाज को ठहरातीं हैं और सफलता अपने हिस्से में रखतीं हैं। जो महिलाएँ बात-बात पर पुरुष समाज को दोष देने लगतीं हैं वे बतायें कि उनकी शिक्षा-दीक्षा किस व्यक्ति की सहायता से सम्पन्न हुई है?

आज संसद में जो भी महिलाएँ सांसद बनी बैठीं हैं, विधान मण्डलों में जो भी महिलाएँ आसीन हैं वे बतायें कि क्या उनको जिताने में पुरुष वर्ग का सहयोग नहीं मिला है?

देश की राष्ट्रपति महिला, लोकसभा अध्यक्ष महिला, सत्ता पक्ष दल की नेता भी महिला, उ0प्र0 की मुख्यमंत्री भी महिला हैं क्या ये सभी मात्र महिलाओं के समर्थन से यहाँ तक पहुँचीं हैं?

शिक्षा ग्रहण करने वाली महिलाओं के आज के आँकड़े और देश के स्वतन्त्र होने के समय के आँकड़ों को देखा जाये और बताया जाये कि क्या महिलाओं की संख्या में वृद्धि सिर्फ और सिर्फ महिलाओं अकेले की देन है?

नौकरी करने वाली महिलाएँ स्वयं बतायें कि क्या उनको उनके परिवार के किसी भी पुरुष का साथ नहीं मिला?

हमारा कहना यह कदापि नहीं हैं कि देश में महिलाओं के प्रति हिंसा का माहौल अथवा भेदभाव का माहौल थम गया है। यह माहौल थमा भले ही न हो किन्तु इसमें कमी तो आई ही है। शहरों में और ग्रामीण इलाकों में भी परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं।

रही बात अत्याचार की तो पुरुष ने पुरुष के ऊपर अत्याचार जारी रखे हैं तो नारी ने नारी का भी शोषण किया है। शोषण का मनोविज्ञान सत्ता और वर्चस्व का मनोविज्ञान है, इसमें पुरुष और महिला होना महत्वपूर्ण नहीं है।

बहरहाल…………बिल पास हो और महिलाओं का एक तिहाई हिस्सा संसद के अन्दर पहुँचे। अब देखना ये है कि बिल पास हो जाने के बाद महिलाएँ पुरुषों के सहयोग को कितना स्वीकारतीं हैं? महिला होने के बाद स्वयं महिलाओं के उत्थान के लिए वे किन-किन परिवारों की महिलाओं को संसद में देखना पसंद करतीं हैं? बिल पास न हो पाने की दशा में तो पुरुषों की छीछालेदर तो होनी ही है, बिल पास होने के बाद भी पुरुषों की पीठ ठोंकने कोई महिला नहीं आने वाली।

जय हो……..जय हो………जय हो।

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चित्र गूगल छवियों से साभार

>मैं कहता, यहाँ लोकतंत्र नहीं

>हाँ बहुत दुःख होता है,
जब कोई भूखा सोता है.
ये दिल मेरा कलपता है,
जब एक नेता चार हजार करोड़ लूट कर
उन भूखो का निवाला छीन लेता है.
दर्द फिर तब होता हैं
जब ऐसे राजनेताओं को सजा मिलना
मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन होता है.
आत्मा धिक्कारते है,
ऐसे लोगो को, जो विकास की झूठी ख़बरें फैलाते हैं.
तरस होता है ये देखकर
जब लोग कसाब के लिए फांसी नहीं मांगते
बस मुंबई के बेगुनाहों को याद करते मोमबत्तियां जलाकर
सुनकर हंसी आती है
देश का चौथा स्तम्भ भी हिल गया है.
जो नोट लेकर सरकारी नेताओ से मिल गया है.
डर लगता है ऐसे मानवाधिकार से
जिसका पूरा चरित्र ही बदल गया है.
अफज़ल को हर कीमत पर छोड़ दो
क्या ये भी पाकिस्तान से मिल गया है.
गुस्सा आता है… कुछ कामचोर पार्टियो से
जो आम जनता का काम नहीं करते
बस देते रहते भाषण
हैं राम के ये भक्त
पर अल्लाह-अल्लाह कहकर
बात-बात पर कहते, दे दो उन्हें आरक्षण
घिन्न आती है ऐसे समाज से
जो आधुनिकता का लिवास ओढ़कर
खुले अंग की नुमाईस करते
और मुह फेर लेते भारतीय शर्म, हया और लाज से
अफसोस होता है ये देखकर
बेतुकी कहानियों वाली अधनंगी फिल्म
बॉक्स ऑफिस पर हिट जाती है
और “ये मेरा इंडिया, १९७१, स्वदेश” जैसी फिल्मे
बॉक्स ऑफिस पर पिट जाती है.
निराशा घेर लेती है चारो ओर
जब भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, क्षेत्रवाद, जातिवाद, फैला हो हर ओर
क्या मिलता है उन्हें
जो सैनिक, सीमा में शहीद हो जाते है.
मिलता है तो बस, उन खिलाडिओं को
जो जीते या हारे
बस जाकर आइपीएल में शामिल हो जाते है.
मैं कहता, यहाँ लोकतंत्र नहीं है.
बिलकुल राजतन्त्र सी कहानी है
जहाँ प्रधान कोई मंत्री नहीं
न कोई मंत्री प्रधान है.
यहाँ प्रधान तो है एक युवराज
जिसकी इतालियन मम्मी यहाँ की रानी है.
लगता है छोड़ दू सब कुछ सोचना
उस ऊपर वाले के हाल पर
शायद वो कुछ नया कर दिखाए
आने वाले अगले साल पर.

>पैसों की पेड़ राजनीति

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“कुछ था तो खुदा था कुछ होता तो खुदा होता, मुझको डुबोया मेरे होने ने मैं hota तो क्या होता ! “अभी झारखण्ड की राजनीति गरमा गई है .चुनाव कुछ हो चुके कुछ होने हैं पर जैसे जैसे यह दिन नजदीक रहा था . वैसे लोग एक दुसरे का छेछा लेदर करने मैं जुट गए थे .और कई बातो का खुलासा भी हुआ इसी बीच पता चला की झारखण्ड के पूर्व मुखमंत्री मधु कोड़ा साहब ने चार हजार करोड रुपीयों का घोटाला किया है .यह पहले नहीं जो कृतिमान गढ़ा है फेरहिस्त तो लम्बी है पर इसका उदभेदन चुनाव के करण हुआ .पर इसकी आज क्या जरुरत थी कुएँ सरकार नीद से जग गए .नींद मैं खलल किसने डाला ?पर यह बात तो कुछ और ही है .वह अपने आप को चुनाव मैं पाक साख दिखाना चाहते हैं.पर उन नेताओं पर असर ही नहीं पड़ता लगता है ये अपने लाज शर्म बाजार मे बेच मूंगफली खा गये हैं ,सब कुछ पता चलने के बावजूद ये जनता से मुखातिब होने पर कहते हैं की कुछ लोग उनकी लोकप्रियता से घबरा गए हैं और उन्हें बदनाम करने की कोशिस कर रहें हैं और उन्हें दलित होने के करण निसाना बनाया जा रहा है .पर इस भारतवर्ष मैं एक चौथाई जनता दलित और गरीब है पर निशाने पर आपही क्यूँ ?”बिना आग के धुऐं नहीं उठतेपर सोचने से माथे पर बल पड़ जाता है की कितनीं जल्दी ये अपना वक्तित्व बदल लेते हैं साप को भी कुछ समय लगता है अपना केचुल उतारने मे, ये उससे भी आगे है . पर बात जो भी हो लेकिन ये आएने की तरह साफ़ हैं की अगर रातों रात आमिर बनना है अगर आप धन कमाने पर आमादा हैं तो राजनीति के कुरुक्षेत्र मैं कूद पड़ो .इस कुरुक्षेत्र में जितने लोग हैं वो अपने आप को गणेश समझतें हैं उशे कोई बाधा छु नहीं सकती ,वह ख़ुद को विघ्न विनासक मानता है .और यह सस्वत सच भी है .जिसका प्रत्यक्ष हैं घोटालों की फाईलें जो कही कोने में पड़ी धुल खा रही हैं .यही वजह है की दिहाड़ी पर कम करने वाला आदमी इतनी हिम्मत करता है उसे सहस यही से मिलता है .खैर गलती इनकी नहीं झारखण्ड की बदकिस्मती है की पिछले नव दस सालों में कोई कुसल साशक नहीं मिला ,जो इन खनिजों से भरे राज्य का बोझ उठा कर कुछ कदम भी चल सके .जिसने देखा उसी के मुह में पानी गया .सबों का ईमान डोल गया .सब नें भर पेट लुटा आम आदमी के भरोसे और विश्वास का दिनों रात बलात्कार किया गया .इन सब को देख नेताओं से नफरत होने लगती है .वह माँ भी अपने कोख को कितना कोस रही होगी की मैंने ऐसी बेटे को जन्म दिया .यूं तो एक स्त्री के लिए बाँझ होना एक गली है ,पर ऐसे बच्चे होने से अच्छा है की कलंक की कालिख पोते गर्व से वो घूमे .जब इन सब का भंडाफोड़ होता है तो अंगुलियाँ कांग्रेस की तरफ़ भी उठती है .क्यूंकि उनकी सरकार इनकी सह पे ही चल रही थी ,तो क्या समझा जाए जो हुआ वो मिलीभगत थी या ये है .चुनाव के समय यह सब करना और अब लिब्रहान रिपोर्टे का लिक होना यह बताता है की उन्होंने पहले से ही सारे चल सोच रक्खी थी विपक्ष की मात के लिए ,यह सभी जानते है कि झारखण्ड भाजपा का अच्छा गढ़ रहा हैं तो शायद इसी किले में सेंध के लिए यह सब किया जा रहा है .इन को सोचना तो चाहिएअगर पतीला का ढक्कन खुला हो तो कमसे कम कुत्ते को तो शर्म आनी चाहिए

>खिसयाई बिल्ली खम्भा नोचे

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” हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम , वो क़त्ल भी करते है तो चर्चा नहीं होती. जो कुछ मुंबई मे हुआ वह पहली दफा नहीं हुआ जब मीडिया को प्रताड़ित किया गया . जब कभी मीडिया सच बोलता है तो उसे उसकी कीमत चुकानी पड़ती है. आज बाला साहब हुंकार करके मीडिया की भर्त्सना कर रहे है लेकिन , जब राज उत्पात मचा रहे थे तब उन्होंने कुछ नहीं कहा .जब राज वहां क्षेत्रवाद का नंगा नाच कर रहे थे बल्कि यूं कहें अपना जनाधार तैयार कर रहे थे तब कोई गुस्सा कोई हमला नही !लेकिन अब ऐसा क्या हो गया जो उनके रगों मे बहता खून उबाल मारने लगा यह समझने के लिए महाराष्ट्र चुनाव की तरफ़ रुख करना होगा जहाँ शिव सेना औंधा मुह गिरा. उस चुनाव परिणाम में साफ़ देखा जा सकता था की बाला साहब की ढलती उम्र शिव सेना को अपनी चपेट में ले रही थी .इसी बनती छवि और मनसे की कामयाबी से वो तिलमिला उठे ,जरा सा बात यह है की उन्हें अब मनसे से खतरा लगता है .उन्हें लगता है की उनके पैरों के निचे से सियासत की जमीं खिसक रही है .वह अपना खोया जनाधार हासिल करना चाहते है .यह महज पोलिटिकल स्टंट है .और रही बात सचिन को भगवन मानने की तो यह भारतीय इतिहास की विडम्बना ही है की जिसके पास शास्त्र नहीं तो वह भगवन नहीं .तो किसके हाथ तीर तरकस से लैस और कौन निहत्था है यह बताने की जरुरत नहीं .

>महाराष्ट्र की जनता -जनार्दन का सार्थक कदम

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उम्मीदवारों के भाग्य का विधाता तो मतदाता ही होता है। कई दिग्गजों और मंत्रियों को घर का रास्ता दिखाने के साथ ही तमाम राजनेताओं के लाडलों को विधायक बना दिया। मगर उन प्रत्याशियों को मतदाताओं ने धोखा दे दिया, जो आपराधिक पृष्ठभूमि के थे। महाराष्ट्र की विभिन्न अदालतों में जिन प्रत्याशियों के खिलाफ मामला दर्ज हैं, उनमें मंत्री, विधायक और पहली बार किस्मत आजमा रहे नेताओं का समावेश था। सभी को मतदाताओंने विधानसभा जाने से रोक दिया। अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि के लिए मशहूर निवर्तमान राज्यमंत्री सिद्धराम म्हात्रे, विधायक पप्पू कालानी, अरूण गवली, हितेंद्र ठाकुर को जहां झटका लगा है, वहीं शिवसेना प्रत्याशी विजय चौगुले और मनसे के सुधाकर चव्हाण की उम्मीदों पर पानी फिरा है। सोलापुर की अक्कलकोट सीट से पूर्व में कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुने गए सिद्धराम म्हात्रे को आघाड़ी सरकार में गृहराज्य मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद से नवाजा गया था। अपने आपराधिक इतिहास के चलते इस चुनाव में म्हात्रे को मतदताओं को बेरूखी की शिकार होना पड़ गया और वे विधायक बनते-बनते रह गए। माफिया डॉन से राजनेता बने अखिल भारतीय सेना प्रमुख अरूण गवली पिछली बार तो विधायक बन लिए थे, लेकिन इस चुनव में उसको पराजय का मुंह देखना पड़ा। इसी तरह उल्हासनगर के बाहुबली विधायक पप्पू कालानी को भी इस चुनाव में भाजपा के कुमार आयलानी के सामने पराजय का मुंह देखना पड़ा। अपने आपराधिक सम्राज्य के बूते लंबे समय से उल्हासनगर की सत्ता पर काबिज कालानी की पत्नी ज्योति वहां की महापौर भी रह चुकी हैं। फिलहाल ज्योति कालानी इस समय राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में हैं और पप्पू कालानी रिपब्लिकन पार्टी से विधायक चुने गए थे। इस बार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उतरे कालानी को मतदाताओं ने खारिज कर दिया। वसई के निर्वतमान विधायक हितेंद्र ठाकुर का नाम भी बाहुबली विधायकों की सूची में दर्ज है। गत लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपनी पार्टी बहुजन विकास आगाड़ी का सांसद भी पालघर क्षेत्र में जिताया। सांसद बलीराम जाधव ने केंद्र में कांग्रेस का समर्थन दिया, तो विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने तीन सीटें ठाकुर के लिए छोड़ दी। ठाकुर की पार्टी से बोईसर में चुनाव लड़ रहे विलास तरे के साथ ही जूनियर ठाकुर क्षितिज नालासोपारा से तो जीतने में कामयाब रहे, लेकिन पैनल से वसई सीट पर उतरे नारायण माणकर को निर्दलीय विवेक पंडित ने ढेर कर दिया। ज्ञात हो कि नायगांव से लेकर विरार तक ठाकुर कंपनी का एकछत्र साम्राज्य हुआ करता था, लेकिन हाल ही में ठाकुर समेतउसके समर्थकों पर जिस तरह से ग्रामीणों ने हमला किया। उससे हितेंद्र को जमीन खिसकती हुई नजर आई और उन्होंने रणछोड़ दास बनने में ही भलाई समझी। हितेंद्र का अंदाज सही निकला वो समझ गए थे कि अगर इस सीट से लड़े तो इज्जत का कचरा हो जाएगा। इसलिए मैदान से हट गए और आखिरकार उनके उम्मीदवार को शिवसेना समर्थित विवेक पंडित ने पराजित कर दिया। आपराधिक इतिहास वाले उम्मीदवारों में ऐरोली से शिवसेना प्रत्याशी विजय चौगुले का भी नाम आता है, जो सिर्फ राकांपा प्रत्याशी संदीप नाईक से हार गए, क्योंकि क्रिमिनल रिकार्ड की वजह से वहां के मतदाताओं ने चौगुले को नापसंद कर दिया। लोकसभा चुनाव में संदीप के बड़े भाई संजीव के सामने भी चौगुले अपनी आपराधिक छवि के कारण हार गए थे। इसी क्रम में ओवला माजीवड़ा सीट से मनसे प्रत्याशी सुधाकर चव्हाण की पराजय का कारण भी उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि ही रही। उनके सामने उतरे शिवसेना प्रत्याशी प्रताप सरनाईक अपनी स्वच्छ छवि के चलते मैदान मारने में कामयाब रहे। कुल मिलाकर इस चुनाव के परिणामों से साफ जाहिर हो गया कि विधानसभा में आपराधियों की बजाय उन्हें भेजा जाए, जिनका दामन साफ हो।

साभार : हम प्रवासी ब्लॉग से {http://humhaipravasi.blogspot.com/2009/11/blog-post.html}

महाराष्ट्र की जनताजनार्दन ने सालों से लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में व्याप्त अपराधीकरण के पुजारियों को वोटों की मार से बाहर का रास्ता दिखा दिया है जो बेहद सराहनीय पहल हैइस चुनाव से भारतवर्ष के सभी मतदाताओं को सबक लेने की जरुरत हैमहाराष्ट्र की जनता ने अपराधियों से अपने प्रतिनिधित्व को मुक्त कर यह साबित किया है कि आज भी लोकतंत्र में जनता हीं जनार्दन हैकम से कम बिहार और यूपी की जनता को आज ऐसे हीं सुधारात्मक कदम उठाने की जरुरत हैआख़िर कब तक बेवकूफ बनेगी बिहार और यूपी की जनता ? सत्ता परिवर्तन तो जरुर हुआ है पर क्या फायदा , राज तो वही चंद बाहुबलियों का है ! आज बसपा में है कल सपा में , आज राजद तो कल जदयू ,इन गुंडों से छुटकारा कहाँ है ? चुनाव आयोग भी सिस्टम के हाथों मजबूर होकर हाथ पर हाथ धरे बैठी है लेकिन जनता इतना तो कर हीं सकती है कि जिनके ऊपर किसी प्रकार की आपराध का आरोप हो उनको चुनाव की दौड़ से बाहर का रास्ता दिखाए

>राजशेखर रेड्डी के गम में मरने लिए 5000-5000 रूपये बांटे कांग्रेस ने

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अभी पिछले दिनों आँध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी की मौत विमान दुर्घटना में हो गई.सभी समाचार चैनल में कहा गया  कि  उनकी मौत के दुख में 462 लोगो ने आत्महत्या कर ली. आश्चर्य होता है न आज के समय में किसी नेता के लिए इतना प्यार देखकर!!! लेकिन बाद में मालूम पड़ा की ये प्यार नेता के लिए नहीं बल्कि पैसे के लिए था मतलब की कांग्रेस सरकार ने देश को जितने भी लोगो को खुदख़ुशी करने वालों में गिनाया था वो सभी खुदखुशी के कारण नहीं बल्कि अपनी स्वाभाविक मौत मरे थे.
जी हां एक सनसनीखेज़ खुलासे में ये बात सामने आई है की मरने वाले लोगो के घर वालो को सरकार ने 5000-5000 Rs. दिए थे और बदले में उनलोगों को ये बोलना था की “मरने वाला आदमी अपनी स्वाभाविक मौत नहीं मरा बल्कि उसने मुख्यमंत्री के गम में आत्महत्या की है.”
शर्म आती है ये बाते सुन-सुन कर की आज की कांग्रेस इतनी गिर चुकी है की लोगो की मौत पर भी राजनीति करने लगी
काश ये पैसा उन लोगो को मरने से पहले दिया जाता तो शायद वो दुनिया में होते .
 { ऑरकुट पर भाव्यांश के स्क्रेप का अंश  } 

>लालू की बात लग गई , कलावती बनेगी विधायक

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लोकतंत्र के चाहने वालों के लिए एक और खुशखबरी है .आगामी महाराष्ट्र विधान सभा चुनाव में कलावती चुनाव लड़ रही है .पिछले साल सुर्खियों में रहने वाली विदर्भ के किसान की विधवा और ७ बच्चों की माँ कलावती यवतमाल के वणी विधानसभा सीट से चुनावी समर में कूद पड़ी हैं . कलावती ने तमाम राजनितिक दलों के टिकट को ठुकराकरविदर्भ जनांदोलन समिति और शेतकरी संघर्ष समिति के बैनर तले चुनाव लड़ना स्वीकार किया है .

कलावती को आप कैसे भूल सकते हैं , राहुल गाँधी की राजनीति में विदर्भ की कलावती का नाम सांसद तक में गूंजा था .पूरा देश कलावतीमय हो गया था . राहुल के दलित,गरीब और किसान प्रेम से भारतवासी चकित थे . दलित नेताओं की कुर्सी उसी तरह हिलने लगी थी जैसा किसी तपस्वी के तप से इन्द्र का सिंघासन !

ऐसा नहीं है कि कलावती अचानक से राजनीति में आ गयी है .विगत एक वर्ष में कलावती ने विदर्भ के आंदोलनकारी किसान नेता किशोर तिवारी के साथ मिलकर किसानों को फसल ऋण और कर्जमाफी के लिए दर्जनों आन्दोलन और धरनों का प्रतिनिधित्व किया है . अपनी भूख और गरीबी से लड़ने के लिए कलावती ने खुद को किसी बड़े नेता के सहयोग की मोहताज समझा . आखिर पूरी दुनिया में उनका नाम जो हो गया है . इसीलिए किसी बड़े नेता की बाट जोहने के बजाय खुद को ही संघर्ष के लिए तैयार कर लिया.

महिला आरक्षण पर चर्चा के दौरान भी लालू प्रसाद यादव ने कलावती, भगवती की चर्चा कर डाली थी . लालू ने इस बिल पर बोलते हुए कहा कि इसमें ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे कलावती जैसी करीब महिलाएं भी संसद में आ सकें. आज कलावती विधानसभा में आने को कमर कस चुकी है . आगे -आगे देखिये होता है क्या ?

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