>देश का भला

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जिस देश के अधिकांश बुद्धिजीवी (आदर्श[सेलेब्रिटी] समझे जाने वाले व्यक्ति), लगभग मानसिक रोगी होने की सीमा तक भारतीयता को भुला बैठे हों।
जिस देश के अधिकांश राजनेता और अधिकारी, “बेशर्म, बेईमान, बेदर्द और मूर्खता की सीमा को आगे बढ़ाये जा रहे हों।
जिस देश के उद्योगपति, अपनी अय्याशियों के लिए किसी भी सीमा तक “अनैतिक तरीके” से धन अर्जित करने के लिए सरकारों तक को खरीद लें।
जिस देश का आम आदमी अपना और अपने परिवार के जीवन को चलाने में इतनाव्यस्त रहने को मजबूर हो कि उसे देश और समाज में क्या हो रहा है इसका पता ही न चले।

तो इस देश का भला कैसे होगा ?

पर ! होगा; भला होना निश्चित है। न जाने कितनी बार इससे पहले इससे भी बुरी स्थिति हुई है। फिर भी भला हुआ है। असुरता मिटी है देवत्व पुनर्प्रतिष्ठित हुआ है। ये प्रकृति का,श्रष्टि का नियम है। यहाँ सब कुछ एक चक्र में बंधा हुआ चल रहा है उससे कोई नहीं बच सकता।

स्थिति चाहे कितनी ही बुरी क्यों न हो इस देश में, पर “देवत्व का बीज” बचा रहता है इसीलिए जब-जब धर्म की हानि होती है तब-तब भगवान स्वयं जगत का कल्याण करने की इच्छा करने लगते हैं। और तब सब कुछ उनके अनुकूल होने लगता है।

जैसा इस समय हो रहा है;अगर बुराईयाँ चरम पर हैं तो अच्छाईयाँ भी बढ़ रही हैं। एक ओर ऐसे उद्योगपति हैं जो अपने तीन-चार जनों के परिवार के लिए सत्ताईस मंजिला भवन बनवा रहे हैं या जनता को लूटने के लिए सरकारों से साठगांठ करते है, तो दूसरी ओर ऐसे भी हैं जो अपना “सर्वस्व”समाज के लिए दान कर रहे है।

अपराध-भ्रष्टाचार में इतना अधिक बढ़ावा हो गया है कि कभी सही भी होगा ये विश्वास नहीं होता, पर दूसरी ओर इसके विरोध में उठने वाले स्वरों और हाथों को देख कर लगता है कि ये अधिक दिन का मेहमान नहीं है। एक ओर हमरे नवयुवा नशेड़ी और संस्कार हीन होकर इन राजनैतिक पार्टियों के सदस्य बनने को लालायित हैं; (क्योंकि इन्हें हराम की खाने का लालच है), और अभारतीयता के साथ-साथ पाश्चात्य संस्कृति की ओर दौड़ लगा रहे हैं; तो दूसरी ओर ऐसे युवा भी हैं जो सुबह-सुबह तीन बजे से “स्वामी रामदेव जी ” के योग शिविर में हजारों की संख्या में पहुँच कर भारत की सभ्यता-संस्कृति नशे-वासनाओं से दूर रहना और स्वच्छ राजनीति का पाठ पढ़ रहे हैं।

और अब तो अति हो भी गयी है जब से “विकिलीक्स” के द्वारा ये पता लगा है कि दुनिया के नेता हमारे देश और नेतओं के बारे में कैसे विचार रखते हैं। इसी लिए मैंने इन नेताओं को बेशर्म कहा है; क्योंकि इनके हास्यास्पद क्रियाकलापों से हमारे देश की, संसार के देशों में क्या स्थिति है; इसे देख-सुन कर देश के लोगों का खून खौल जाता है। जब समाचार पत्रों में पढने को मिलता है कि अमेरिका में हमारे राजनयिकों या नेताओं तक को जाँच के नाम पर अपने कपडे भी उतारने पड़ते हैं, तो खून खौल जाता है; सर शर्म से झुक जाता है।धिक्कार है उन नेताओं और अधिकारियों को और उन लोगों को जो फिर भी अपनी और देश की बेइज्जती नहीं समझते।

और धिक्कार है उन लोगों को, जो देश के इतना बुरा हाल बना देने वाली राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्त्ता बनने को आतुर दीखते हों । जो पढ़े लिखे होने के बाद भी गुलाम की तरह इनके खानदानी नेताओं के झंडे ढोने को और इनसे हाथ छू जाने को अपना सौभाग्य समझते हों, जो ये सोचने का प्रयास नहीं करते हैं;कि आखिर इस देश का ये हाल ऐसा ही रहा तो आने वाले समय में कोई भी सुखी नहीं रह पायेगा चाहे कितना ही बड़ा करोडपति क्यों न हो।

जो पढ़े लिखे होने के बावजूद भी ये सोचने का प्रयास नहीं करते कि ये इतना बुरा हाल ! हुआ क्यों । इसलिए धिक्कार है उनकी शिक्षा-दीक्षा को, धिक्कार है उनके उन शिक्षण संस्थानों को और उन शिक्षकों को, और धिक्कार है उन माताओं-पिताओं को, जिनके द्वारा “वो निर्लज्ज” “मूढ़ मति” इस संसार में आये।

उन्हें जो पढाया गया उसे ही आँख बंद कर सच मानने वाली जो शिक्षा इस देश में नहीं चलती थी, ये उसे ही लागू रखने का परिणाम है ।
आज भारत कि स्थिति ऐसी है जैसे “चौबे जी चले छब्बे जी बनने रह गए दूबे जी” ।

वास्तव में आजादी के नाम पर हुआ समझौता देश के लोगों के साथ धोखाधड़ी है। जिन लोगों ने ये किया वो पापी थे, और जिन्होंने उनका साथ दिया या उन्हें वोट दिया उन्होंने भी जाने-अनजाने पाप किया।
अब इन “पाप सने हाथों” को धोने का समय आ गया है और अवसर भी मिल रहा है जिनके पूर्वजों ने ये पाप किया था वो भी उनके पाप से अपने को उरिण कर सकते हैं।

नई आजादी नई व्यवस्था के लिए नया आन्दोलन चल रहा है “भारत स्वाभिमान” जिसके आगामी चुनावों में सफल होने के अब तो दो सौ प्रतिशत सम्भावनाये हैं जैसा कि बिहार में दिख गया है, और राष्ट्रीयता जो उफान पर है उसे देख कर तो लगता है कि इस बार न विदेशी तौर-तरीका(सिस्टम) बचेगा न विदेशी सोच और सोचने वाले बचेंगे।

>संसद में शोर

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लेखक : रमेश भट्ट , लोकसभा टीवी 



संसद, लोकतन्त्र का खंभा , 
देश की सर्वोच्च नीति निर्धारक संस्था, 
देश के विकास की नींव यही रखी जाती है। देश के कोने कोने से चुने हुए प्रतिनिधि देश भर की समस्याओं को लेकर यहां अपनी आवाज बुलन्द करते है। जनता से जुड़े मुददों पर सार्थक बहस इसी जगह होती है। कानून बनाने की ताकत भी इसी संसद के पास है। मगर आज यहां हालात बदले बदले नज़र आ रहे है। सदन में आए दिन होने वाले हो हंगामें से अब जनता त्रस्त हो गई है। आखिर किसके लिए है संसद। क्या है इसका उद्देश्य। क्या संसद आम आदमी के प्रति नही है। इसमें कोई दो राय नही की संसदीय बहस का स्तर लगातार गिर रहा है। सांसद रचनात्मक बहस से ज्यादा आपसी टोकाटोकी में ज्यादा मशगूल नज़र आते है। संसद में आए दिन हंगामा होना कोई नही बात नही है। सच्चाई यह है कि राजनीतिक दलों ने इसे एक सियासी हथियार के तौर पर अपना लिया है। वैसे तो सदन में सांसदों के लिए कई नियम बनाये गए है। मगर इसका अनुसरण कोई नही करता। मसलन कोई सदस्य अगर भाषण दे रहा हो, तो उसमें बांधा पहुचाना नियम के खिलाफ है। सांसद ऐसी कोई पुस्तक, समाचार पत्र या पत्र नही पडे़गा जिसका सभा की कार्यवाही से सम्बन्ध न हो । सभा में नारे लगाना सर्वथा नियम विरूद है। सदन में प्रवेश और निकलते वक्त अध्यक्ष की पीठ की तरफ नमन करना नियम के तहत है। अगर कोई सभा में नही बोल रहा हो तो उसे शान्ति से दूसरे की बात सुननी चाहिए।  भाषण देने वाले सदस्यों के बीच से नही गुजरना चाहिए। यहां तक कि कोई भी सांसद अपने भाषण देने के तुरन्त बाद बाहर नही जा सकता। हमेशा अध्यक्ष को ही सम्बोधित करना चाहिए। नियम के मुताबिक सदन की कार्यवाही में रूकावट नही डालनी चाहिए। सदन की कार्यवाही में रूकावट नही डालेगा। इन सारे नियमों के लब्बोलुआब को कुछ अगर एक पंक्ति में समझना हो तो सदन में अध्यक्ष के आदेश के बिना पत्ता भी नही हिल सकता। दु:ख की बात तो यह है कि ऐसे कई नियम मौजूद है लेकिन इन नियमों केा मानने वाला कोई नही। राजनीतिक चर्चाऐं कई बार अखाड़ों में तब्दील हो जाती है। आज इन सारे नियमेंा की अनदेखी एक बड़े संसदीय संकट की ओर इशारा कर रही है। क्या इसका उपाय है हमारे पासर्षोर्षो आज 100 दिन संसद का चलना किसी सपने की तरह है। कई जरूरी विधेयक बिना बहस के पास हो रहे है। सभा की कार्यवाही से कई सांसद अकसर नदारद रहते है। कभी कभी तेा कोरम पूरा करने के लिए सांसद खोज के लाने पड़ते है। क्या दुनिया के सबसे बडे लोकतन्त्र की तस्वीर ऐसी होनी चाहिए। आज सासन्द असंसदीय भाषा का इस्तेमाल करने से भी नही चूक रहे है। अब समय आ गया है कि जनता `काम नही तो भत्ता नही` और `जनप्रतिनिधी को वापस बुलाने के अधिकार` को कानूनी रूप प्रदान करने के लिए राजनीतिक दलों पर दबाव बनाये। 


>साढ़े बारह बजे का किया इन्तेजार पर कसाब को फाँसी ना मिली

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आज सुबह से साढ़े बारह बजने का इन्तेजार कर रहा था . उत्सुकता और बेचैनी दिमाग पर काबिज थी . सुबह सात बजे उठ कर जामिया के लिए निकल गया . साढ़े नौ से साढ़े बारह तक परीक्षा थी और स्टार न्यूज़ के मुताबिक इसी समय तक भारत के सरकारी दामाद की सजा का ऐलान भी होना था . परीक्षा भवन में भी दिमाग का आधा हिस्सा इसी पर लगा हुआ था . जल्दी -जल्दी ऑटो से घर भागे . यहाँ आये तो पता चला कि साहब , कसाब को फाँसी देने में कई साल भी लग सकते हैं . अब हम जैसे कानून के अनपढ़ों को कौर्ट -कचहरी की भाषा भला कहाँ समझ आती है  ? लेकिन परेशानी यही नहीं है .  मामला तो तब बिगड़ता है जब कार्यपालिका , व्यवस्थापिका और न्यायपालिका को हमारी ये बात समझ में नहीं आती ! क्यों , सही कहा ना ! अगर उनको ये बात समझ में आती तो अफजल गुरु अभी तक तिहाड़ में हमारे पैसों की रोटी नहीं तोड़ रहा होता . कसाब के लिए करोड़ों नहीं उडाये जाते वो भी उस देश में जहाँ लोग भूख से जान देते हो . पता नहीं इस देश का सिस्टम (कार्यपालिका , व्यवस्थापिका और न्यायपालिका) आखिर कौन सी मिसाल कायम करना चाहता है  ? अरे , मिसाल तो अमेरिका ने कायम किया बिलकुल लोकतान्त्रिक तरीके से सद्दाम को कम से कम समय में फाँसी लगवा कर .  लेकिन नहीं यह तो भारतवर्ष है … जहाँ हत्या करने पर दस और हत्या का लाइसेंस देती है ये सरकार !

>अरे , भूल गये पुन्यप्रसून जी कि …………………………….

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झारखण्ड की किस्मत किसने तय की है , वहां की जनता ने ही ना !  अरे , भूल गये पुन्यप्रसून जी कि ये वही प्रदेश है जहाँ की जनता ने घोटाले में लिप्त मुख्यमंत्री की बीबी को सर आँखों पर बिठाया था . यही वो प्रदेश है जो भावनाओं में बहकर शिबू सोरेन जैसों को अपनी बागडोर थमाता है . अब सांप को दूध पिलाओ तब भी जहर कम नहीं होता ! ये शिबू सोरेन की आदत है कभी यहाँ कभी वहां मुंह मारने की . लोग तो तब भी भाजपा के फैसले पर आश्चर्यचकित थे . तब विधायकों के   टूट जाने के भय से जिस स्संप को गले में डाला उसके जहर भरे दांत तोड़ने के उपाय भी करने चाहिए थे . वैसे मानते हैं कि आपकी रपट अलग होती है गरीब आदिवासियों से आपकी विशेष सहानुभूति है लेकिन भाई हम ऐसे लोगों से सहानुभूति नही रखते जो बार-बार एक ही गलती दुहराते हैं .झारखण्ड का मतदाता इतना सीधा-सादा भी नहीं है कि शिबू जैसों की असलियत ना पहचान सके , और फ़िर भी वोट देता है तो इसमें शिबू से ज्यादा इनकी गलती है ……………

>क्या यह कांग्रेसियों का स्वांग नहीं है ?

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राजनीति में श्रेय का बड़ा महत्व है . किसी भी काम का श्रेय  छीनने की होड़ में कभी-कभी कुछ अच्छा काम भी हो जाया करता है . दो दशकों से भी अधिक समय तक मुंबई में ठाकरे की घिनौनी राजनीति ने कहर मचा रखी है . बड़े ठाकरे के बाद अब छोटे ठाकरे अपनी अलग पार्टी बना कर उछल-कूद कर रहे हैं . पहले लुंगी वालों की पुंगी बजाई अब भाइयों की बारी आई . गैर मराठियों को जम कर मारा पीटा गया . राज्य से लेकर केंद्र तक कांग्रेस और राष्ट्रवादी कोंग्रेस चुप रही . आज अचानक क्या हो गया जो गृहमंत्री देश की एकता -अखंडता को लेकर चिंतित हो गये . मीडिया में उनका ब्यान आने लगा कि भारतीय संविधान किसी भी भारतीय को कहीं भी बसने और काम करने की स्वतंत्रता देता है और केंद्र सरकार इसे सुनिश्चित करेगी . आखिर क्या वजह है ? साफा है कि संघ का इस मुद्दे पर आया ब्यान सरकार में खलबली मचा गया है . सोनिया ब्रिगेड घबरा गयी कि कहीं इसका श्रेय संघ के पास ना चला जाए …………. यहाँ तक तो ठीक है पर जनता कैसे पचा पाएगी गृहमंत्री के बयान को जब हाल हीं में अशोक चाहवान सरकार ने भाषावाद से ओत-प्रोत होकर मुंबई में टेक्सी परमिट का नया कानून लागू किया है . क्या गृह मंत्री और महारष्ट्र के मुख्यमंत्री का कृत्य आपस में विरोधाभाषी नहीं है ? क्या यह कांग्रेसियों का स्वांग नहीं है ? 

>मैं कहता, यहाँ लोकतंत्र नहीं

>हाँ बहुत दुःख होता है,
जब कोई भूखा सोता है.
ये दिल मेरा कलपता है,
जब एक नेता चार हजार करोड़ लूट कर
उन भूखो का निवाला छीन लेता है.
दर्द फिर तब होता हैं
जब ऐसे राजनेताओं को सजा मिलना
मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन होता है.
आत्मा धिक्कारते है,
ऐसे लोगो को, जो विकास की झूठी ख़बरें फैलाते हैं.
तरस होता है ये देखकर
जब लोग कसाब के लिए फांसी नहीं मांगते
बस मुंबई के बेगुनाहों को याद करते मोमबत्तियां जलाकर
सुनकर हंसी आती है
देश का चौथा स्तम्भ भी हिल गया है.
जो नोट लेकर सरकारी नेताओ से मिल गया है.
डर लगता है ऐसे मानवाधिकार से
जिसका पूरा चरित्र ही बदल गया है.
अफज़ल को हर कीमत पर छोड़ दो
क्या ये भी पाकिस्तान से मिल गया है.
गुस्सा आता है… कुछ कामचोर पार्टियो से
जो आम जनता का काम नहीं करते
बस देते रहते भाषण
हैं राम के ये भक्त
पर अल्लाह-अल्लाह कहकर
बात-बात पर कहते, दे दो उन्हें आरक्षण
घिन्न आती है ऐसे समाज से
जो आधुनिकता का लिवास ओढ़कर
खुले अंग की नुमाईस करते
और मुह फेर लेते भारतीय शर्म, हया और लाज से
अफसोस होता है ये देखकर
बेतुकी कहानियों वाली अधनंगी फिल्म
बॉक्स ऑफिस पर हिट जाती है
और “ये मेरा इंडिया, १९७१, स्वदेश” जैसी फिल्मे
बॉक्स ऑफिस पर पिट जाती है.
निराशा घेर लेती है चारो ओर
जब भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, क्षेत्रवाद, जातिवाद, फैला हो हर ओर
क्या मिलता है उन्हें
जो सैनिक, सीमा में शहीद हो जाते है.
मिलता है तो बस, उन खिलाडिओं को
जो जीते या हारे
बस जाकर आइपीएल में शामिल हो जाते है.
मैं कहता, यहाँ लोकतंत्र नहीं है.
बिलकुल राजतन्त्र सी कहानी है
जहाँ प्रधान कोई मंत्री नहीं
न कोई मंत्री प्रधान है.
यहाँ प्रधान तो है एक युवराज
जिसकी इतालियन मम्मी यहाँ की रानी है.
लगता है छोड़ दू सब कुछ सोचना
उस ऊपर वाले के हाल पर
शायद वो कुछ नया कर दिखाए
आने वाले अगले साल पर.

>भारतीय सीमा पर चीन की घुसपैठ : एक विमर्श..!

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देशों के पारस्परिक  सम्बन्धव्यक्तियों के पारस्परिक सम्बन्धों से बहुत भिन्न नही होते. जवाबदेही का अंतर होता है. प्राथमिक उद्देश्य अवसर की निरंतरता व सुरक्षा ही होती है. मिले अवसरों का युक्तिसंगत प्रयोग देश की घरेलू मशीनरी की जिम्मेदारी होती है और सुरक्षा की जिम्मेदारी पारस्परिक व सामूहिक होती है. अभी चीन से लगे सीमाओं पर जो उपद्रव व शोर हो रहा हैएक विचारणीय मसला है. कुछ जरूरी  सवाल हैचीन ऐसा क्यों कर रहा है..क्या सीमाओं पर ऐसी घटनाएँ स्वाभाविक  है या इनका कोई निहितार्थ भी है..क्या ऐसी घटनाएँ पहली बार हैं…भारत सरकार ने ऐसी घटनाओ से निपटने के लिए क्या कोई कारगर रणनीति बनाई है..क्या चीन आधिकारिक रूप से इन घटनाओं की पुष्टि करता है..भारत सरकार के पास कितने संभव विकल्प है इन स्थितियों में…आदि-आदि..
इधर कुछ महीनों से माउन्ट गया के पास चुमार सेक्टर लद्दाख के पास चीनी आवा-जाही बढ़ी है. यह इलाका बर्फ की खूबसूरत राजकुमारी‘ के नाम से आम जनमानस में प्रसिद्द है. करीब १.५ किलोमीटर तक घुसपैठ की जानकारी देश के प्रमुख अखबार बता रहे हैं. चीनी मिलिटरी के जवानपत्थरों पर लाल रंग से चीन लिख रहे है और यह यहाँ आसानी से देखा जा सकता है. स्थानीय लोगों से चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि जल्द ही यह हिस्सा हमारे कब्जे में होगा. सीमा की आबादी बहुत ही संवेदनशील होती है. जितने ही यह देश की मुख्य-धारा से कटे होते है,सीमा सुरक्षा की स्थिति उतनी ही अविश्वश्नीय हो जाती है. 
३१ जुलाई २००९ को पहली बार भारतीय गश्ती दल ने इस आवा-जाही को देखा. हलाकि सेना के प्रमुख जनरल दीपक कपूर ने इसे महज तब दिशा-भ्रम‘ बताया. इससे पहले इसी साल में २१ जून को भी ऐसी ही आपत्तिजनक गतिविधि देखी गयी थी  जब हवाई जहाजों से कुछ खाद्यसामग्री के थैले गिराए गए थे. एक खास बात यह है कि इससे पहले ऐसे उपद्रव अरुणांचल प्रदेश की सीमाओं पर तो आम रहे हैं पर लद्दाखसिक्किम जैसे क्षेत्र LAC के शांतिपूर्ण क्षेत्र माने जाते रहे है.
भारत के कूटनीतिक हलकों में एक अजीब सी चुप्पी मची रही फिर विदेश मंत्री एस.एम्. कृष्णा ने बयान दिया के भारत-चीन सीमा तो देश की अन्य सीमाओं की तुलना में शांतिपूर्ण है और इसतरह की घटनाओं को ‘ इनबिल्ट-मैकेनिस्म‘ से सुलझा लिया जायेगा. यह इनबिल्ट-मैकेनिज्म‘ दरअसल दोनों देशों के जवानों के बीच होने वाली मुलाकातों को कहते है जो एक निश्चित समयांतराल पर होती है और जिसमे बात-चीत के द्वारा चीजें सुलझाने की कवायद होती है. इसे फ्लैग-मीटिंग्स‘ भी कहते हैं. यह मैकेनिज्म १९९३ से एक समझौते के बाद से अपनाई जाती है.
स्थानीय लोगो की माने तो यह घटनाएँ बिलकुल ही नयी नहीं हैंवर्षों से छिट-पुट चली आ रही हैं. चीन ने इस तरह की किसी भी घटना से इंकार किया है. उनकी सुने तो वो भी नहीं समझ पा रहे है कि भारत में ऐसी चर्चा क्यों चल रही है.अभी हाल ही में चीन की  एक सामरिक पत्रिका में एक रिपोर्ट छपी थी जिसमे भारत को खंड-खंड तोड़ देने का सबसे सही समय आ गया है-ऐसा लिखा गया था. इस रिपोर्ट पर चीनी सरकार ने कोई सफाई नहीं दी वरन भारतीय विदेश मंत्रालय को ही एक बयान जारी करना पड़ा कि उक्त रिपोर्ट में कहे गए विचारलेखक की निजी राय थी और चीन के किसी अधिकारिक बयान से इसकी पुष्टि नहीं होती है. 
इसमे कहीं दो राय नहीं है कि ऐसी घटनाएँ हुई हैहोती रहीं हैं और यह भी कि ऐसे उपद्रव स्वाभाविक नहीं कहे जा सकते. चीन की मंशा समझना कठिन नहीं हैजबकि उसने अन्य देशों से अपनी सीमा-विवाद, साठ के दशक से विश्व को यह दिखाने के लिए कि  चीन एक जिम्मेदार राष्ट्र हैसुलझाना शुरू कर दिया था. पाकिस्तान.म्यांमार और अफगानिस्तान से उसने सारे सीमा-विवाद सुलझा लिए हैं. द. एशिया में बस भारत और भूटान ही है जिनसे यह गांठ उलझी हुई है. और यह उलझाव जानबूझकर है और दबाव की रणनीति का एक हिस्सा है. 
आज की वैश्विक राजनीति में शक्ति‘ की अपेक्षा प्रभाव‘ की रणनीति प्रचलन में है. इस नीति मेंअंतिम विकल्पशक्ति-संघर्ष‘ को छोड़कर शेष समस्त विकल्प खुले रखे जाते हैं. हर युग में राष्ट्र-हित‘ की परिभाषा में थोड़ा फेर-बदल होता रहता है. कभी राष्ट्र के लिए धर्म-विस्तार‘ की नीति थीकभी कॉलोनियां बनाने पर जोर थातो  कभीराष्ट्र-विस्तार‘ की नीति. ज्यादातर समयों में व्यापार-विस्तार की प्राथमिकता थी. इस भूमंडलीकरण के दौर में वास्तव में शक्ति का सूत्र – आर्थिक संपन्नता का होना हैजो विश्व-व्यापार में अपनी भागेदारी के प्रतिशत से परिलक्षित होती है. बिना किसी संदेह के चीनविश्व की एक प्रमुख अर्थ-शक्ति है. इस अर्थ-शक्ति को सर्वकालिक बनाने के लिए जरूरी है कि इसकी सतत सुरक्षा हो और इसमे सतत बढोत्तरी भी. अर्थ-क्षेत्र में किसी नए प्रतिद्वंदी का प्रभावी होना निश्चित ही चीन के लिए वांछित नहीं है. वैसे भारत कहीं से भी अर्थ-क्षेत्र में चीन को टक्कर देने की अभी सोच भी नहीं सकता पर अगले दशक तक स्थितियां बदल भी सकती हैं. चीन कोई भी जोखिम नहीं ले सकता यदि उसे दुनिया की निर्विवाद हस्ती बने रहना है…वो भी आस-पड़ोस से. भारत की बढ़ती साख से खतरा है चीन को. भारत के पास एक प्रकार की विश्वशनीयता है जिसमे  चीन गंभीर रूप से संघर्ष करता प्रतीत होता है. यह साखभविष्य के लिए मजबूत संभावनाएं जगाता है. और फिर भारत अभी भी अमेरिका के बाद दूसरे नम्बर की मृदुल शक्ति(soft power) है. मृदुल शक्ति से तात्पर्य यह है कि भारत अपने सांस्कृतिक श्रेष्ठता का लोहा मनवा चुका है. भारत की फिल्मेंखाद्य-सामग्रियां व विविध विधियांसाहित्य की उपलब्धियांयोगा वेश-भूषा आदि-आदि. तो चीन चाहता है की इस  साख  पे बट्टा लगे.
एक और बात बेहद महत्वपूर्ण है कि शीत युद्ध के बाद दुनिया ने कुछ निर्णायक बदलाव देखे हैंइनकी अनदेखी नहीं की जा सकती. दुनिया अब केवल तीन वर्गोंपूंजीवादीसाम्यवादी और गुटनिरपेक्ष  में नहीं बटी है. अपितु अब कुछ क्षेत्रों(regions) यथा- द. एशियामध्य-पूर्व एशियाअमेरिकायूरोपियन यूनियन आदि में विभाजित हो गयी है. यदि महाशक्ति बने रहना है तो अपनी सशक्त भागेदारी व उपस्थिति हर क्षेत्र-विशेष में रखनी है. द.एशिया इसका अपवाद बिलकुल नहीं है. जैसा मैंने कहा यह प्रभाव-राजनीति‘ का समय है, ‘शक्ति-संघर्ष‘ का नहीं तो आज विश्व में समस्त कार्य वाया मोल-तोल (negotiaions) होते हैं. और मोल-तोल के मेज पर एक पक्ष के अधिकतम लाभ के लिए दूसरे पक्ष का असुरक्षित‘ होना आवश्यक है.
तो यकीनन चीनभारत को असुरक्षित‘ रखना चाहता है मोल-तोल वार्ताओं के विश्व-मंच पर. वहभारत की गहरी आवाज को विश्व-मंचों पर हलकी करना चाहता है. ऐसा चीन ने पहले भी किया है१९६२ में जब भारतविश्व के सबसे बड़े समूह-आन्दोलन गुट-निरपेक्ष आन्दोलन‘ का  अगुआ था.
हर क्षेत्र-विशेष की अपनी राजनीति होती है. द.एशिया का ताना-बाना कुछ यूँ बन पड़ा है कि भारत एकदम से बड़ा – और बाकि देश छोटे-छोटे. तो एक तरह की शाश्वत असुरक्षा है इन देशों में. भारत की यह एक लगातार चुनौती है कि वह अपने पड़ोसियों से कम से कम न्यूनतमआवश्यक मधुर सम्बन्ध बनाये रखे जो जहाँ तक संभव हो विश्वशनीय हो. भारत की इस अनिवार्य आवश्यकता के बीचो बीच चीन के पास मौका बना हुआ है इस क्षेत्र-विशेष में अपनी उपस्थिति के लिए…जो कभी आर्थिककभी कूटनीतिक तो कभी सामरिक अतिक्रमण व अन्यान्य उपस्थिति के रूप में दिखलाई पड़ती है.
चित्र साभार: गूगल 

अम्‍बूमंणि रामदौस और उनकी विषय वस्‍तु

आज खबर पढ़ रहा था तो पढ़ने में आया कि कोई हालीवुड स्टार ह्यूं जैकमैन 2008 के सबसे कामोत्‍तेजक अर्थात Sexy पुरुष चुने गए है। भारतीय के लिये शर्म की बात यह की भारत का को नंग धडग आदमी इस दौड़ में शामिल नही हो पाया। जॉन अब्राहम, सलमान, हासमी पता नही कितने कपड़ा उतारू एक्‍टरों की मेहनत पर बट्टा लग गया। ये भारतीय एक्‍टर कितनी मेहनत करते है कमोत्तेजक कहलाने में किन्‍तु हो गया ढ़ाक के तीन पात, देश की बात होने पर सिर्फ इन्‍ही के चर्चे होते है किन्‍तु जहॉं विदेश की बात आती है, दुनिया में इनका नामो निशान नही होता है, बिल्‍कुल क्रिकेट खिलाडियों की तरह भारत में जो खेलने आता है उसे पटक के हरा देते है, किन्‍तु जब विदेश दौरे में हार जाते है तो कहते है कि बेईमानी कर के जीत लिये, खिसियानी बिल्‍ली खम्‍भा नोचे, ऐसे है भारतीय एक्‍टर और भारतीय क्रिकेट टीम।

आज कल तो सेक्‍स और सेक्‍सी दोनो ने समाज में बहुत गंदा वातावरण फैला दिया है। इसी में रामदौस भी अड़ गये है कि अब मर्द की शादी मर्द से करा के ही दम लेगे, चाहे मनमोहन साहब कितने खफ़ा क्‍यो न हो ? मनमोहन साहब भी करे तो करे क्‍या चार दिन के मेहमान जो ठहरे पता नही अगली बार कुर्सी मिले भी कि न मिले, गे मामले में उनकी रूचि देख कर लगता है कि शायद कही साहब अपने लिये नये पार्टनर तो नही खोज रहे है, अब पता चला कि Sexy Man ऐसे लोगो के लिये चुना जाता है अब तो उन्‍हे सबसे कमोत्तजक पुरूष ह्यूं जैकमैन पंसद आ ही जायेगे सूत्रों से पता चला है कि उन्‍हे पीएम इन वेटिंग से जितना खतरा नही है उससे ज्‍यादा राहुल बाबा से है। चुनाव का समय है सुनाई दे रहा था कि राहुल बाबा को 84 के सिक्ख दंगो का खेद है, मुस्लिम इन्दिरा दादी ने सिक्‍खो पर दंड़ा करने में कसर नही छोड़ी थी अब ईसाई पुत्र राहुल हिन्‍दुओं पर दंड़ा किये पड़े है। चुनाव आ रहा है तो राजनीति खेली ही जायेगी, वो चाहे अच्‍छी हो या गंदी राजनीति तो राजनीति होती है, आज कल केन्‍द्रीय खाजने में कमी की खबर आ रही है, जॉच करने में पता चला कि कुछ मनमोहन साहब मैडम के आदेश पर अमेरिका के गरीब में बॉट आये और जो कुछ बचा वो मुस्लिम अनुदान आयोग में चला गया, मुस्लिम छात्रों को वजीफा।

खैर बहुत बेबात की बात हो गई, पर रामदौस वाली बात शतप्रतिशत सही है, तभी वे समलैंगिक (gay) सम्बनधों के पीछे पड़ा है, पहले से ही यह आदमी बद्दिमाग लग रहा था किन्‍तु आज कल चुनाव में हार के डर पता नही क्‍या क्‍या कर रहे है। कुछ लोगो का कहना है कि इसमें गलत क्‍या है तो मेरा कहना है कि हर प्रश्न का उत्‍तर नही होता है। अब भाई आका वही है तो जो करे सर आखो में, अब वो मर्द को दर्द देना चाहते है तो हम क्‍या कर सकते है, हमारी Constituency से भी नही है कि हम उन्हे उनके कृत्‍य से रोकने के लिये वोट न देने की घमकी दे सकते है। अगर वे हमारी Constituency से होते भी तो कोई फर्क नही पड़ता, वे इतना सब पड़ने के बाद स्‍यवं जान जाते कि बंदा हमको तो वोट नही ही देगा।

खैर शेष फिर ……………..

वह दिन जब हिन्दू नही होगा साम्प्रायिक

आज देश में दहशत का माहौल बनाया जा रहा है, कहीं आंतकवाद के नाम पर तो कहीं महाराष्ट्रवाद के नाम पर। आखिर देश की नब्ज़ को हो क्या गया है। एक तरफ अफजल गुरू के फांसी के सम्बन्ध में केन्द्र सरकार ने मुँह में लेई भर रखा है तो वहीं दूसरी ओर महाराष्ट्र की ज्वलंत राजनीति से वहॉं की प्रदेश सरकार देश का ध्यान हटाने के लिये लगातार साध्वी प्रज्ञा सिंह पर हमले तेज किये जा रही है और इसे हिन्दू आंतकवाद के नाम पर पोषित किया जा रहा है। य‍ह सिर्फ इस लिये किया जा रहा है कि उत्तर भार‍तीयों पर हो रहे हमलो से बड़ी एक न्यूज तैयार हो जो मीडिया के पटल पर लगातार बनी रहे। 

आज भारत ही  नही सम्पूर्ण विश्व इस्लामिक आंतकवाद से जूझ रहा है, विश्व की पॉंचो महाशक्तियॉं भी आज इस्लामिक आंतकवाद से अछूती नही रह गई है। आज रूस तथा चीन के कई प्रांत आज इस्लामिक आलगाववादी आंतकवाद ये जूझ रहे है। इन देशों में आज आंतकवाद  इसलिये सिर नही उठा पा रहे है क्‍योकि इन देशों में  भारत की तरह सत्तासीन आंतकवादियों के  रहनुमा राज नही कर रहे है।
भारत में आज दोहरी नीतियों के हिसाब से काम हो रहा है, मुस्लिमों की बात करना आज इस देश में धर्मर्निपेक्षता है और हिन्दुत्व की बात करना इस देश में सम्प्रादयिकता की श्रेणी में गिना जाता है। आज हिन्दुओं को इस देश में दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया गया है। इस कारण है कि मुस्लिम वोट मुस्लिम वोट के नाम से जाने जाते है जबकि हिन्दुओं के वोट को ब्राह्मण, ठाकुर, यादव, लाला और एसटी-एससी के नाम से जाने जाते है। जिन ये वोट हिन्‍दू मतदाओं के नाम पर निकलेगा उस दिन हिन्दुत्व और हिन्दू की बात करना सम्प्रादायिकता श्रेणी से हट कर धर्मनिर्पेक्षता की श्रेणी में आ जायेगा, और इसे लाने वाली भी यही सेक्यूलर पार्टियॉं ही होगी। 

देश तोड़ते दो नेता

आज देश किस मोड़ पर जा रहा है, आज के नेतागण देश और धर्म को चूस रहे है। महाराष्ट्र में राज ठाकरे देश को तो समाजवादी पार्टी के कुछ नेता देश और धर्म को बॉंट रहे है। आज इन नेताओं की मानसिकता बन गई है कि बन गई है कि इस देश में उसी का राज है। आज इन अर्धमियों के आगे अपना देश और सविंधान नतमस्तक  हो गया है। आखिर ये देश और देश की राजनीति को किस दिशा में ले जाना चाहते है ? 
आज जिस प्रकार महाराष्ट्र में राज ठाकरे द्वारा कुराज किया जा रहा है, वह देश बॉंटने वाला है। आज ये क्षेत्रवाद के नाम पर देश को बॉट रहे है। वह देश की संस्‍कृतिक विरासत के लिये खतरा है। अगर इसी प्रकार क्षेत्रवाद के नाम पर राष्‍ट्र को बॉंटा जायेगा तो देश का बंटाधार तो तय है। भारत को उसकी विविधा के कारण जाना जाता है। पर इस विवि‍धा वाले देश को मराठा और तमिल के नाम पर कुछ क्षेत्रिय नेता आपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे है। ये नेता क्यो भूल जाते है कि जो क्षेत्रवाद की राजनीति करते है। वे भूल जाते है कि वे जिस मराठा मनुष की बात करते है वही के मराठा मानुष भारत के अन्य राज्यों में भी रहते है। अगर उनके हितो को नुकसान पहुँचाया जायेगा तो कैसा लगेगा ? 
आज कल सपा नेताओं को भी चुनाव आते ही मुस्लित हितो का तेजी से ध्‍यान आने लगा है। जिनते आंतकवादी मिल रहे है सपा उन्हे अपना घरजमाई और दमाद बना ले रही है। अमर सिंह की तो हर आंतकवादी से रिस्‍ते दारी निकल रही है। तभी देश की रक्षा करते हुये शहीदो से ज्‍यादा सपा और उसके नेताओं को अपने घर जामईयों की ज्‍यादा याद आ रही है।
यह देश आज आत्‍मघातियों से जूझ रहा है, जो क्षण क्षण देश को तोड़ रहे है। भगवान राजठाकरे को, और अल्लाह मियॉं अमर सिंह को सद्बुद्धि दे की ये देश के बारे कुछ अच्छा सोचे और देश के विकास में सहयोग करें। इसी में सबका भला है।