लादेन के नाम एक खत

ओसामा बिन लादेन जी
नमस्कार, हाल में आपने फ़रमाया कि अमेरिका, ब्रिटेन और इसराईल के साथ-साथ भारत भी हमारा दुश्मन है, ये बात कुछ समझ नहीं आई… सबसे ज्यादा आपत्ति इसी बात को लेकर है और आपको पत्र लिखने का खयाल भी इसी बात को लेकर आया कि आपने अमेरिका, ब्रिटेन और भारत को एक समान मान लिया । मैंने सुना है कि आप बहुत अमीर आदमी हैं, करोडों-अरबों की दौलत आपके पास है, आपके पास हवाई जहाज, तेल के कुँए, महंगे हथियार और डॉलर हैं, मैने तो इनमें से एक भी चीज आज तक नहीं देखी । सुना है कि आप अमेरिका से लड़ रहे हो, हो सकता है आप सही भी हों । आपके बारे में तो ज्यादा पता नहीं है, लेकिन अमेरिका के बारे में जरूर बहुत पता है कि वह एक व्यवसायी देश है जो गरीबों का खून चूस-चूस कर अमीर बना हुआ है । बचपन में दादाजी कहा करते थे कि जब अचानक कहीं कोई टीला या ढेर उठा हुआ देखो तो समझ जाओ कि कहीं ना कहीं गढ्ढा हो गया होगा । बचपन में तो समझ नहीं पाते थे, लेकिन अब समझ में आने लगी हैं । अमेरिका के वैभव और चकाचौंध के टीले और भारत-पाकिस्तान में दरिद्रता के गढ्ढे अब मुझे साफ़ दिखाई देने लगे हैं । हमें और ईरान-इराक को आपस में लड़वाकर, हमें ही हथियार बेचकर कमाया, फ़िर इराक पर दादागिरी करके तेल पर कब्जा करना, विश्व बैंक को आगे करके गरीब देशों की गरदन पर सवार होना, खुली अर्थव्यवस्था के नाम पर उसकी कम्पनियों द्वारा खुल्लमखुल्ला नोट चरना, अनेक बातें हम देख चुके हैं, देख रहे हैं, तो उसकी मंशा तो पहले से ही साफ़ है, लूटना और मतलब निकल जाने के बाद लात मार देना । हम ही बेवकूफ़ हैं जो उसकी चरण-वन्दना में लगे हुए हैं । और भारत ने आपका क्या बिगाडा़ है पता नहीं ? आपको तो ये भी पता नहीं होगा कि भारत में जितने मुसलमान रहते हैं, उतनी तो कई मुस्लिम देशों की कुल जनसंख्या भी नहीं है । शिरडी वाले सांई बाबा और अजमेर के ख्वाजा का तो आपने नाम भी नहीं सुना होगा, रहीम, कबीर और खानखाना से आपका कोई वास्ता कभी नहीं पडा़ होगा, तो भला आप भारत को कैसे जानेंगे ? भारत का एक और पहलू अमेरिका और ब्रिटेन से अलग है… यहाँ की कुल आबादी का लगभग आधा हिस्सा निरक्षर है, तीस फ़ीसदी से ज्यादा लोग रात को आधे पेट सोते हैं, और हम जैसे निम्न-मध्यमवर्गीय लोग जब बारह-चौदह घंटे काम करते हैं तब कहीं जाकर इज्जत की रोटी मिलती है । आपने हिम्मत कैसे की अमेरिका के साथ भारत की तुलना करने की बन्दापरवर…भारत पर आतंकवादी हमला करके आपको कुछ नहीं मिलने वाला… ना ! कोई फ़ायदा नहीं होने वाला.. हमारे यहाँ की जनता बहुत सहनशील है, बहुत ! मतलब बहुत ज्यादा सहनशील है… इतनी.. कि पिछले पचपन -साठ साल से एक जैसे निकम्मे नेताओं को झेलती जा रही है, कष्ट उठाये जाती है, पर विद्रोह नहीं करती । हमारे यहाँ खामख्वाह लोग मारे जाते हैं, अकाल से, बाढ से, ठंड से, गरीबी से, भूख से, मलेरिया से, भूकम्प से, फ़ुटपाथ पर कुचलकर… गोया कि हजारों तरह से मौत रोज दस्तक देती है । जम्मू-कश्मीर में हजारों जवान मारे जा चुके हैं, श्रीलंका में जबरन ही सैकडों शहीद हो गये थे, देश धर्मशाला बना हुआ है, पाकिस्तानियों आओ, तिब्बतियों यहाँ बसो, बांग्लादेशियों डाके डालो, नेपालियों अपना घर समझो, जिसकी जब मर्जी हो आओ-जाओ… इस सबका यहाँ की जनता पर कोई असर नहीं होता और नेताओं के कानों पर ढक्कन लगा होता है । तो भाई भारत को दुश्मन समझने की गलती मत करो… हमारा जीवन भी उतना ही कठिन है, जितना पाक, या बांग्लादेश में रहने वाले का.. और एक बात ध्यान रखना गरीब आदमी मरने से नहीं डरता, क्योंकि वो तो रोज ही मरता है । डरता है अमीर, उसे डर होता है कि जो उल्टे-सीधे धंधे करके कमाया है, कहीं हाथ से निकल ना जाये, मर गये तो इतने पैसे का क्या होगा । अमेरिका भी इसीलिये डरा हुआ है और इतना डरा हुआ है कि अफ़गानिस्तान में रस्सी को साँप समझ कर मिसाइल चला देता है । हमें कोई डर नहीं है, क्योंकि हमें मालूम है कि हमारा कुछ नहीं बिगडेगा, दो-चार हजार आदमी मारे जायेंगे, एकाध नेता मारा जायेगा, थोडा़ बहुत हो-हल्ला मचेगा, राजनीति होगी, एकाध सरकार उलटेगी, एक डाकू जायेगा दूसरा आ जायेगा, फ़िर वही कुछ होगा जो आज भी हो रहा है । भ्रष्टाचार, साँठगाँठ, अनैतिकता, गंदी राजनीति इन सबने मिलकर हमारा जीवन तो पहले से नर्क बना रखा है तुम हमें क्या मारोगे ? हमारी दुश्मन है अशिक्षा, बेरोजगारी, जनसंख्या और गरीबी.. इनके सामने आप तो कहीं नहीं लगते भाई । हाँ.. यह जरूर होगा कि आपको मारने के लिये अमेरिका ने हजारों मिसाइलें और बम गिराये हैं, उनकी कीमत वह हमसे वसूलेगा, वो नये-नये तरीके लायेगा हमें चूसने के लिये, क्या फ़र्क पडेगा, जिन्दगी जो पहले से ही कठिन है और कठिन हो जायेगी । सुना है कि एक मिसाइल की कीमत बीस लाख डॉलर होती है, रुपये में कितना होगा यह तो पता नहीं, लेकिन ये पता है कि इतने पैसों में कई अस्पताल बन सकते हैं, सैकडों स्कूल खोले जा सकते हैं, हजारों भूखों को भोजन करवाया जा सकता है..। इस लडाई से न तो आपको कोई नुकसान होगा, ना अमेरिका का । असली नुकसान होगा हम जैसे और हमसे भी अधिक गरीबों का होगा, चाहे वह झाबुआ-कालाहांडी का आदिवासी हो जो दिन भर गढ्ढे खोदकर शाम को पचास रुपये पाता है, या फ़िर कराची की गंदी गलियों में घूमने वाला महमूद हो जो कडी मेहनत के बावजूद परिवार नहीं पाल पाता, या फ़िर ढाका के किसी सीलनभरे कमरे में कालीन सीकर उँगलियाँ तुडवाने वाला इम्तियाज हो…। रही बात कि मैं कौन हूँ या मेरा क्या परिचय है, यह कतई महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि मैं एक आम मध्यमवर्गीय हूँ, जो रोजमर्रा के रोजीरोटी के संघर्ष में इतना घिस-पिट चुका हूँ कि मेरी पहचान खो चुकी है और ये मध्यमवर्गीय आदमी भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश या श्रीलंका कहीं का भी हो सकता है । मुख्य बात ये नहीं है उसकी राष्ट्रीयता क्या है बल्कि यह है कि उसके सरोकार क्या हैं ? उसकी जिन्दगी का संघर्ष क्या है ? उसके जीवन का लक्ष्य क्या है ? मोटे तौर पर देखा जाये तो सबके समान हैं, चाहे वह कोई भी देश हो । आपने लुटेरे जमींदार की लड़की को छेड़ दिया है, अब वह पूरे गाँव को सजा देगा । माहौल ये है कि दो साँडों की लडा़ई में रोटी खरीदने आये मजदूर की टाँग टूटने का खतरा है, और ये आदमी पहले भी जापान में, वियतनाम में, इराक और अफ़गानिस्तान में बहुत चोट खा चुका है.. थोडे़ लिखे को बहुत समझना और आगे से कभी भी इजराईल, अमेरिका के साथ हमें मत रखना… कहाँ वो और कहाँ हम ?

Advertisements

>लादेन के नाम एक खत

>ओसामा बिन लादेन जी
नमस्कार, हाल में आपने फ़रमाया कि अमेरिका, ब्रिटेन और इसराईल के साथ-साथ भारत भी हमारा दुश्मन है, ये बात कुछ समझ नहीं आई… सबसे ज्यादा आपत्ति इसी बात को लेकर है और आपको पत्र लिखने का खयाल भी इसी बात को लेकर आया कि आपने अमेरिका, ब्रिटेन और भारत को एक समान मान लिया । मैंने सुना है कि आप बहुत अमीर आदमी हैं, करोडों-अरबों की दौलत आपके पास है, आपके पास हवाई जहाज, तेल के कुँए, महंगे हथियार और डॉलर हैं, मैने तो इनमें से एक भी चीज आज तक नहीं देखी । सुना है कि आप अमेरिका से लड़ रहे हो, हो सकता है आप सही भी हों । आपके बारे में तो ज्यादा पता नहीं है, लेकिन अमेरिका के बारे में जरूर बहुत पता है कि वह एक व्यवसायी देश है जो गरीबों का खून चूस-चूस कर अमीर बना हुआ है । बचपन में दादाजी कहा करते थे कि जब अचानक कहीं कोई टीला या ढेर उठा हुआ देखो तो समझ जाओ कि कहीं ना कहीं गढ्ढा हो गया होगा । बचपन में तो समझ नहीं पाते थे, लेकिन अब समझ में आने लगी हैं । अमेरिका के वैभव और चकाचौंध के टीले और भारत-पाकिस्तान में दरिद्रता के गढ्ढे अब मुझे साफ़ दिखाई देने लगे हैं । हमें और ईरान-इराक को आपस में लड़वाकर, हमें ही हथियार बेचकर कमाया, फ़िर इराक पर दादागिरी करके तेल पर कब्जा करना, विश्व बैंक को आगे करके गरीब देशों की गरदन पर सवार होना, खुली अर्थव्यवस्था के नाम पर उसकी कम्पनियों द्वारा खुल्लमखुल्ला नोट चरना, अनेक बातें हम देख चुके हैं, देख रहे हैं, तो उसकी मंशा तो पहले से ही साफ़ है, लूटना और मतलब निकल जाने के बाद लात मार देना । हम ही बेवकूफ़ हैं जो उसकी चरण-वन्दना में लगे हुए हैं । और भारत ने आपका क्या बिगाडा़ है पता नहीं ? आपको तो ये भी पता नहीं होगा कि भारत में जितने मुसलमान रहते हैं, उतनी तो कई मुस्लिम देशों की कुल जनसंख्या भी नहीं है । शिरडी वाले सांई बाबा और अजमेर के ख्वाजा का तो आपने नाम भी नहीं सुना होगा, रहीम, कबीर और खानखाना से आपका कोई वास्ता कभी नहीं पडा़ होगा, तो भला आप भारत को कैसे जानेंगे ? भारत का एक और पहलू अमेरिका और ब्रिटेन से अलग है… यहाँ की कुल आबादी का लगभग आधा हिस्सा निरक्षर है, तीस फ़ीसदी से ज्यादा लोग रात को आधे पेट सोते हैं, और हम जैसे निम्न-मध्यमवर्गीय लोग जब बारह-चौदह घंटे काम करते हैं तब कहीं जाकर इज्जत की रोटी मिलती है । आपने हिम्मत कैसे की अमेरिका के साथ भारत की तुलना करने की बन्दापरवर…भारत पर आतंकवादी हमला करके आपको कुछ नहीं मिलने वाला… ना ! कोई फ़ायदा नहीं होने वाला.. हमारे यहाँ की जनता बहुत सहनशील है, बहुत ! मतलब बहुत ज्यादा सहनशील है… इतनी.. कि पिछले पचपन -साठ साल से एक जैसे निकम्मे नेताओं को झेलती जा रही है, कष्ट उठाये जाती है, पर विद्रोह नहीं करती । हमारे यहाँ खामख्वाह लोग मारे जाते हैं, अकाल से, बाढ से, ठंड से, गरीबी से, भूख से, मलेरिया से, भूकम्प से, फ़ुटपाथ पर कुचलकर… गोया कि हजारों तरह से मौत रोज दस्तक देती है । जम्मू-कश्मीर में हजारों जवान मारे जा चुके हैं, श्रीलंका में जबरन ही सैकडों शहीद हो गये थे, देश धर्मशाला बना हुआ है, पाकिस्तानियों आओ, तिब्बतियों यहाँ बसो, बांग्लादेशियों डाके डालो, नेपालियों अपना घर समझो, जिसकी जब मर्जी हो आओ-जाओ… इस सबका यहाँ की जनता पर कोई असर नहीं होता और नेताओं के कानों पर ढक्कन लगा होता है । तो भाई भारत को दुश्मन समझने की गलती मत करो… हमारा जीवन भी उतना ही कठिन है, जितना पाक, या बांग्लादेश में रहने वाले का.. और एक बात ध्यान रखना गरीब आदमी मरने से नहीं डरता, क्योंकि वो तो रोज ही मरता है । डरता है अमीर, उसे डर होता है कि जो उल्टे-सीधे धंधे करके कमाया है, कहीं हाथ से निकल ना जाये, मर गये तो इतने पैसे का क्या होगा । अमेरिका भी इसीलिये डरा हुआ है और इतना डरा हुआ है कि अफ़गानिस्तान में रस्सी को साँप समझ कर मिसाइल चला देता है । हमें कोई डर नहीं है, क्योंकि हमें मालूम है कि हमारा कुछ नहीं बिगडेगा, दो-चार हजार आदमी मारे जायेंगे, एकाध नेता मारा जायेगा, थोडा़ बहुत हो-हल्ला मचेगा, राजनीति होगी, एकाध सरकार उलटेगी, एक डाकू जायेगा दूसरा आ जायेगा, फ़िर वही कुछ होगा जो आज भी हो रहा है । भ्रष्टाचार, साँठगाँठ, अनैतिकता, गंदी राजनीति इन सबने मिलकर हमारा जीवन तो पहले से नर्क बना रखा है तुम हमें क्या मारोगे ? हमारी दुश्मन है अशिक्षा, बेरोजगारी, जनसंख्या और गरीबी.. इनके सामने आप तो कहीं नहीं लगते भाई । हाँ.. यह जरूर होगा कि आपको मारने के लिये अमेरिका ने हजारों मिसाइलें और बम गिराये हैं, उनकी कीमत वह हमसे वसूलेगा, वो नये-नये तरीके लायेगा हमें चूसने के लिये, क्या फ़र्क पडेगा, जिन्दगी जो पहले से ही कठिन है और कठिन हो जायेगी । सुना है कि एक मिसाइल की कीमत बीस लाख डॉलर होती है, रुपये में कितना होगा यह तो पता नहीं, लेकिन ये पता है कि इतने पैसों में कई अस्पताल बन सकते हैं, सैकडों स्कूल खोले जा सकते हैं, हजारों भूखों को भोजन करवाया जा सकता है..। इस लडाई से न तो आपको कोई नुकसान होगा, ना अमेरिका का । असली नुकसान होगा हम जैसे और हमसे भी अधिक गरीबों का होगा, चाहे वह झाबुआ-कालाहांडी का आदिवासी हो जो दिन भर गढ्ढे खोदकर शाम को पचास रुपये पाता है, या फ़िर कराची की गंदी गलियों में घूमने वाला महमूद हो जो कडी मेहनत के बावजूद परिवार नहीं पाल पाता, या फ़िर ढाका के किसी सीलनभरे कमरे में कालीन सीकर उँगलियाँ तुडवाने वाला इम्तियाज हो…। रही बात कि मैं कौन हूँ या मेरा क्या परिचय है, यह कतई महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि मैं एक आम मध्यमवर्गीय हूँ, जो रोजमर्रा के रोजीरोटी के संघर्ष में इतना घिस-पिट चुका हूँ कि मेरी पहचान खो चुकी है और ये मध्यमवर्गीय आदमी भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश या श्रीलंका कहीं का भी हो सकता है । मुख्य बात ये नहीं है उसकी राष्ट्रीयता क्या है बल्कि यह है कि उसके सरोकार क्या हैं ? उसकी जिन्दगी का संघर्ष क्या है ? उसके जीवन का लक्ष्य क्या है ? मोटे तौर पर देखा जाये तो सबके समान हैं, चाहे वह कोई भी देश हो । आपने लुटेरे जमींदार की लड़की को छेड़ दिया है, अब वह पूरे गाँव को सजा देगा । माहौल ये है कि दो साँडों की लडा़ई में रोटी खरीदने आये मजदूर की टाँग टूटने का खतरा है, और ये आदमी पहले भी जापान में, वियतनाम में, इराक और अफ़गानिस्तान में बहुत चोट खा चुका है.. थोडे़ लिखे को बहुत समझना और आगे से कभी भी इजराईल, अमेरिका के साथ हमें मत रखना… कहाँ वो और कहाँ हम ?