वह दिन जब हिन्दू नही होगा साम्प्रायिक

आज देश में दहशत का माहौल बनाया जा रहा है, कहीं आंतकवाद के नाम पर तो कहीं महाराष्ट्रवाद के नाम पर। आखिर देश की नब्ज़ को हो क्या गया है। एक तरफ अफजल गुरू के फांसी के सम्बन्ध में केन्द्र सरकार ने मुँह में लेई भर रखा है तो वहीं दूसरी ओर महाराष्ट्र की ज्वलंत राजनीति से वहॉं की प्रदेश सरकार देश का ध्यान हटाने के लिये लगातार साध्वी प्रज्ञा सिंह पर हमले तेज किये जा रही है और इसे हिन्दू आंतकवाद के नाम पर पोषित किया जा रहा है। य‍ह सिर्फ इस लिये किया जा रहा है कि उत्तर भार‍तीयों पर हो रहे हमलो से बड़ी एक न्यूज तैयार हो जो मीडिया के पटल पर लगातार बनी रहे। 

आज भारत ही  नही सम्पूर्ण विश्व इस्लामिक आंतकवाद से जूझ रहा है, विश्व की पॉंचो महाशक्तियॉं भी आज इस्लामिक आंतकवाद से अछूती नही रह गई है। आज रूस तथा चीन के कई प्रांत आज इस्लामिक आलगाववादी आंतकवाद ये जूझ रहे है। इन देशों में आज आंतकवाद  इसलिये सिर नही उठा पा रहे है क्‍योकि इन देशों में  भारत की तरह सत्तासीन आंतकवादियों के  रहनुमा राज नही कर रहे है।
भारत में आज दोहरी नीतियों के हिसाब से काम हो रहा है, मुस्लिमों की बात करना आज इस देश में धर्मर्निपेक्षता है और हिन्दुत्व की बात करना इस देश में सम्प्रादयिकता की श्रेणी में गिना जाता है। आज हिन्दुओं को इस देश में दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया गया है। इस कारण है कि मुस्लिम वोट मुस्लिम वोट के नाम से जाने जाते है जबकि हिन्दुओं के वोट को ब्राह्मण, ठाकुर, यादव, लाला और एसटी-एससी के नाम से जाने जाते है। जिन ये वोट हिन्‍दू मतदाओं के नाम पर निकलेगा उस दिन हिन्दुत्व और हिन्दू की बात करना सम्प्रादायिकता श्रेणी से हट कर धर्मनिर्पेक्षता की श्रेणी में आ जायेगा, और इसे लाने वाली भी यही सेक्यूलर पार्टियॉं ही होगी। 
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कल का बहता लहूँ और आज का उठता धुआँ

भारत की वर्तमान परिदृश्‍य को देख कर लगता है कि देश को आजादी की कोई जरूरत नही थी। आज देश जिस प्रकार पश्चात सभ्‍यता के सिकंजे से जकड़ी हुई है। देश उस समय अंग्रेजो का प्रत्‍यक्ष शारीरिक गुलाम था किन्‍तु आज स्थिति यह है कि हमारे देश की पीढ़ी शारीरिक के साथ साथ मानसिक रूप से गुलाम हो गई है। आज कुछ भी नही बदला है किन्‍तु वातावरण बदल गया था तब आजादी के लिये लड़ रहे थे आज गुलामी के शिकजे में खुद गिरफ्त होते जा रहे है। 
तब का दौर था के भगत सिंह के दिल में देश के लिये कुछ करने का जज्‍बा था किन्‍तु आज के दौर मे इसी उम्र का युवा भगत सिंह पर बनी फिल्‍म रंग दे बंसती को की तारीफ करता है किन्‍तु भगत सिंह जैसा जज्‍बा दिखाने में झिझकता है, और कुछ करने से पहले अपने अगर बगल देखता है कि कोई देख तो नही रहा है। आज हमारे लिये शहीद के मायने 15 अगस्‍त और 26 जनवरी को पुष्‍पाजंली अर्पित करने तक ही रह गई है। एक दिन हम इन्‍हे याद कर अपने कर्तव्‍यों से मुक्‍त हो जाते है। 
एक बहुत बड़ा प्रश्‍न यह उठता है कि आज देश के लिये जो शहीद हुये है उनके लिये ऑंसू बहाने का समय है ? कि उन शहीदों के सफनों के सपनो को साकार करने के लिये ऑंखों में देश के प्रति कर्तव्य पालन के लिये आँखों में अंगार सुलगाये रखने का समय है?  आज देश को अपनी सोच में परिवर्तन करने का समय है। हमारे शहीदों की सही श्रृंद्धाजली आँखो में पानी भरने से न होगी, सच्‍ची श्रृद्धाजंली तो तब होगी जब देश की तरफ शत्रु आँख उठा कर न देख पाये, जो आँख कभी उठे भी उसे दोबारा उठने लायक न छोड़ा जाये। 
आज के दौर हो सकता है कि गांधीवाद के रास्‍ते से शान्ति स्‍थापित की जा सकती है, किन्‍तु हमारी सरकार गांधीवाद की गांरटी लेने को तैयार नही है? जिस गांधीवाद के जरिये शान्ति का ढिड़ोरा पीटा जा रहा है। गांधीवाद प्रसंगगत ही ठीक लगता है इसकी वास्‍तविकता से कल्‍पना करना राई के पहाड़ बनाने के तुल्‍य होगा। राई का पहाड़ तभी सम्‍भव होगा जब कि बलिदान रूपी मूसर से उस बार कर उसकी गोलाई को नष्‍ट न किया जाये। 
जब किसी बात की शुरूवात होती है तो उसका अंत करना काफी कठिन होता है, देश की आजादी में सिर्फ गांधीवाद के ढकोले को श्रेय दिया जाता है। जबकि गाँधी जी की गांधी जी जिद्दी और तानाशाही प्रवृति के के कारण भगतसिंह, नेताजी और लौहपुरूष पटेल को किनारे रखा गया। गांधी जी की आपने आपको मसीहा साबित करने की नी‍ति का कारण था कि वे पाकिस्तान को बटवाने के समय ५५ करोड़ दिलाने के लिए उन्होंने अनशन किया, जबकि सब इसे देने के खिलाफ थे। १९४२ का सफल चल रहा आन्दोलन उन्होंने एक छोटी सी घटना के कारण वापस ले लिया, जबकि सभी ने ऐसा न करने की सलाह दी। और भी कई उदाहरण हैं, गाँधी जी सब जगह अपनी ही मर्जी चलाते थे। नही तो क्‍या जिस आजादी के लिये लाखो लोगों ने अपनी प्राण देने में नही हिचके, उन गांधी जी ने देश की आखंड़ता को ताक पर रखकर देश का बटवारा कर दिया। भले ही गांधीवाद को अपने प्राण प्‍यारे थे किन्‍तु देश में वीर सावरकर और देशभक्‍त नाथूराम जैसे अनेको देशभक्‍त देश की अखंड़ता के लिये संषर्घ करने को तैयार थे किन्‍तु गांधी जी की नेहरू को प्रधानमंत्री रूप में देखने की लालसा ही भारत विभाजन का कारण बनी। गांधी जी को तत्‍कालीन हिंसा तो दिखी, किन्‍तु उन्‍होने नेहरूवाद की पट्टी से उनकी आँखे बाद थी जिसका कारण यह था कि आज तक भारत ने इनते प्राणों का आंतकवाद की आग में प्राण गवा दिये जितनी की कल्‍पना गांधी जी को न रही होगी। 
हमने वीरों के बलिदानों से आजादी तो प्राप्‍त की किन्‍तु तत्‍कालीन नेताओं ने अपनी माहत्‍वकांक्षाओं की पूर्ति का साधन आजादी को मान लिया था, आजादी मिलते ही देश का नेतृत्‍व ऐसे हाथों में चला गया जिसने जीवन भर विलासिता का जीवन ही जिया, उसे आजादी और अखंडता से क्‍या मतलब था ? आज भारत देश की सबसे बड़ी कमजोरी उसका कमजोर नेतृत्‍व था। हम उस प्रधानमंत्री से क्‍या आस लगा सकते है जो पर स्‍त्री एडविना के प्रेम का दीवना था। एक तरफ भगत सिंह जैसे देशभक्त ने आजादी को अपनी दुल्‍हन माना था वही नेहरू को दूसरे की मेहरिया का रखैला बनने में आंनद था। हम किसी विलासित व्‍यक्ति से और अपेक्षा क्‍या कर सकते है? अगर भारत अंग्रेजों का गुलाम था तो नेहरू एक अंग्रेज स्त्री का। और एक विदेशी स्त्री के गुलाम व्यक्ति से हम अपेक्षा ही क्‍या कर सकते है ? सभी को पता है कि भारत विभाजन में सबसे महत्‍वपूर्ण कड़ी माउंटबेटन थे और ये उसी एडबिना के पति थे। भारत विभाजन की के परिपेक्ष में नेहरू-एडविना-माउंटबेटन की केमेस्‍ट्री का खुलासा होना चाहिये था किन्‍तु हमारा तंत्र उन्‍ही के हाथो में रहा जो अपराधी थे। जिस भारत की अंखड़ता को 2000 साल के आक्रमणकारी नही नष्‍ट कर पाये, कुछ चाटुकारों ने मिलकर नष्‍ट कर दिया। 
सही है कि कलयुग आ गया है, कहावत है जिसकी लाठी उसी की भैंस होती है। हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था को अंग्रेजी शासन में इतना तहस नहस नही किया गया जितना की स्‍वतंत्र भारत की प्राथमिक सरकार ने किया। हमारे इतिहास में तिलक, सुभाष को बंद दरवाजे में डाल दिया गया, बचे तो सिर्फ गांधी और गांधी। गांधी जी के सम्‍मान में 2 अक्‍टूबर की राष्‍ट्रीय अवकाश के मायने को स्‍पष्‍ट किया जाना चाहिये। गांधी व्‍यक्ति का आगमन 1915 में हुआ, क्‍या इससे पहले का आन्‍दोलन नही हुआ? गाधी नेहरू की आड़ में बहुत सम्‍माननीय राष्‍ट्रभक्‍तों को किनारे का रास्‍ता दिखा दिया गया। नेहरू-गांधी परिवार का इतिहास रहा है कि वह वह अपने हितों को साधने के लिये किसी भी नेता को हासिये पर डालते रहे है। अतीत से वर्तमान तक की गांधी परिवार को देखे तो पायेगे कि जो काम आजादी के पहले सुभाष बाबू और सरदार पटेल के साथ गाधी और नेहरू के उद्भव के लिये किया गया वही काम इदिरा के लिये लालबहादुर शास्त्री के साथ तथा वर्तमान में सोनिया-राहुल के लिये नरसिह्मा राव और सीता राम केसरी के साथ किया और अभी भी कितनों के साथ किया जा रहा है। यह देश की आड़ में व्‍यक्तिगत हित साधना नही तो और क्या है? 
आज भारत की तकदीर बदलनी है तो हमें व्‍यक्तिवाद को समाप्‍त करना होगा, भारत के महापुरूषों का अपमान करके कभी भी भारत की उन्‍नति के मार्ग को नही बनाया जा सकता है। बड़े शर्म की बात है कि हमारे देश की सर्वोच्‍च प्रशासनिक परीक्षा में भगत सिंह का आतंकवादी बताया जाता है। जिस देश की शिक्षा प्रणाली से बच्‍चों को भगत सिंह से दूर रखने का प्रयास किया जा रहा है। वहॉं पर गांधीवाद नाम का अनर्गल प्रलाप ही किया जा सकता है। गांधीवाद की प्रशासंगिकता का समझना होगा कि कहाँ इसका उपयोग किया जायेगा। किसी दुश्‍मन देश के साथ गांधीवाद के जरिये कोई मसला नही हल किया जा सकता है, कम से कम पाकिस्‍तान और चीन के साथ तो कभी भी नही। 
बातों को कहना जिनता आसान होता है करना उतना ही कठिन, हृदय में स्‍वतंत्र भारत को शवशैया पर देखकर दुख होता है कि आजादी के 70 सालों में ही वह दम तोड़ने लगा है। आज हमें अपनी आजादी के मायनों के बारें में सोचना होगा। हम विश्व गुरू कहालाते थे कि आज हम अच्‍छे शिष्‍य भी नही बन पा रहे है। नेताजी, भगतसिंह ने ऐसी आजादी की कल्‍पना नही की होगी जिसमें जिसमें भ्रष्‍टाचार, वैमस्‍य और रिश्वतखोरी हो। आज देश की आजादी के लिये लाखों सेनानियों की रक्‍त कुर्बानियों को आज की युवा पीढ़ी सिगरेट के धुयें में उड़ाती चले जा रही है। 

खतरे में माता हिंगलाज

पाकिस्‍तान के बलूचिस्‍तान प्रान्‍त में हिन्‍दू के 52 शक्ति पीठों में से एक हिंगलात माता के मन्दिर का अस्तित्‍व खतरे में नज़र आ रहा है। पाकिस्‍तान की संघीय सरकार ने मंदिर पास बांध बनाने का प्रस्‍ताव रखा है जिसे बूलचिस्‍तान प्रदेश सरकार ने संघीय सरकार से अपनी परियो‍जना को बदलने का अनुरोध किया है।

इस मंदिर के महत्‍व में कहा जाता है कि यह हिंगलाज हिंदुओं के बावन शक्तिपीठों में से एक है। मंदिर काफ़ी दुर्गम स्थान पर स्थित है, पौराणिक कथाओं केअनुसार भगवान शिव की पत्नि सती के पिता दक्ष ने जब शिवजी की आलोचना की तो सती सहन नहीं कर सकीं और उन्होंने आदाह कर लिया। माता सती के शरीर के 52 टुकड़े गिरे जिसमें से सिर गिरा हिंगलाज में। हिंगोल यानी सिंदूर, उसी से नाम पड़ा हिंगलाज। हिंगलाज सेवा मंडली के वेरसीमल के देवानी ने बीबीसी को बताया कि चूंकि माता सती का सिर हिंगलाज में गिरा था इसीलिए हिंगलाज के मंदिर का महत्व बहुत अधिक है।

जब किसी पवित्र खजू़र के पेड़ को बचाये जाने के लिये सड़क को मोड़ा जा सकता था तो 52 शक्ति पीठों में से एक हिंगलात माता के मन्दिर को क्‍यो नही बचाया जा सकता है। प्रान्‍तीय सरकार के सभी सदस्‍य इस मंदिर को बचाये जाने के पक्ष में है किन्‍तु हर जगह लालू-मुलायम जैसे सेक्‍यूलर नेता पाये जाते है। ऐसा ही उस प्रान्‍त भी है हिंदू समुदाय से संबंध रखने वाले एक विधायक ने मंदिर के पास बाँध के निर्माण की हिमायत की। बलूचिस्तान प्रांतीय असेंबली के सदस्य बसंत लाल गुलशन ने ज़ोर दे कर कहा है कि `धर्म को सामाजिक-आर्थिक विकास की राह में अवरोध बनाए बगैर’ सरकार को इस परियोजना पर काम जारी रखना चाहिए। 

हे भगवान इस धरा से इन जयचन्‍द्रों का अंत कब होगा ?

मीडिया की चाटुक‍ारिता रूप

आज रवीश जी के कस्‍बे पर एक  एक लेख पढ़ा किन्‍तु दु:ख हुआ कि मीडिया आज चटुकारिता में ही विश्‍वास करती है। आज देश में सेवा बस्तियों में संघ के विभिन्‍न संगठनों के द्वारा इतने सेवा कार्य चल रहे है कि यह विश्‍व का सबसे बड़ा सामुद‍ायिक कार्यो  में एक होगा।  कि आज कल के कुछ पत्रकारों को मलाईदार आदमी की मलाई खाने और उनकी कवरेज करने के आ‍दी हो रहे है। यही कारण है कि आज मीडिया गर्त में जा रहा है।

इन सब का कारण स्‍पष्‍ट है कि इनकी कवरेज करने पर फाईफ स्‍टार होटल में फ्री में नश्‍ता पानी की व्‍यवस्‍था होती है और संघी कार्यक्रमों के कवरेज में जमीन पर बैठ कर दलितों के मध्‍य भोजन। तो इन पत्रकारों को काहे न विदेशी  करतब दिखेगा।

जहॉं तक ठाकुरो वाली बात है तो भाड़े की मीडिया के भाड़े के टट्टूओं को अराजक न्‍यूज ही प्रकाशित करनी आती है। अगर मीडिया आपना दायित्‍व समझे और सही अर्थो में समाज में जो अच्‍छे काम हो रहे है उसे उजागर करें तो शायद ही मथुरा जैसी घटना घटे।

प्रतिभा और बाज़ार

[01] प्रतिभा और बाज़ार उसकी सफलता की कहानी में केवल उसका टेलेंट ही था…?ये अर्ध सत्य इस कारण भी क्योंकि बाज़ारवाद में ये सब कुछ होता है तरक्की और विकास के शब्द सिर्फ़ व्यवसायिकता के पन्नों पे दिखाई देतें हैं । रोशनी को सलाम करता ये समय तिमिर को नहीं पूछ रहा होता है।मेरी, आपकी, यानी हम सबकी नज़र के इर्द गिर्द हजारों हज़ार प्रतिभाएं बेदम दिखाईं देतीं है ,किंतु केवल वो ही सफल होती है जो ग्लैमरस हो.यानी व्यवसायिकता के लिए मिसफिट न हो ।माँ-बाप की तस्वीरें घर के बैठक खानों से लापता है,तो पूजा घर में होगी…? नहीं घर के नक्शे में पूजा घर के लायक जगह थी ही नहीं….सो बन नहीं पाया पूजा घर ।जैसे ही मेरी नज़र गयी दीवार पर इक मँहगी पेंटिंग जो न तो भाई साहब के पिताजी की थी और न ही माँ की तस्वीर थी वो,इसका अर्थ ये नहीं की उनके मन में माँ – बाप के लिए ज़गह नहीं है बात दरअसल ये है कि हमारी इन महाशय पर व्यावसायिकता इस कदर हावी हुई है कि वो सब कुछ भूल गए बच्चो से भी तो कम ही मिल पातें हैं वे तो दिवंगतों को याद रखना कैसे सम्भव होगा ।विष्यान्तर होने के लिए माफी चाहता हूँ ,वास्तव में जिन श्रीमान की मैं चर्चा कर रहा हूँ वे बेहतरीन चित्रकार थे, तूलिकाएं,रंग,केनवस् उनके इशारे पे चलते थे,अब ….. वो प्रतिभा गुमसुम सी है, केनवस् कलम रंग को छुए बरसों बीत गए। केवल व्यापारिक-दक्षता ही उपयोगी साबित हुई उनके जीवन के लिए ।पेंसिल से चित्रकारी करते लोगों की तारीफ करनी होगी,जो व्यावसायिकता के दौर में आज भी प्रतिभा को ज़िंदा रखतें हैं । ब्लॉगर के रूप सही,कला को ज़िंदा रखना ही होगा अस भी बस भी….!अखबार,पत्रिकाएँ,विज्ञापनजीवी संचार माध्यमों के माथे दोष मढ़्ना ग़लत होगा समय ही ऐसा है कि कला साहित्य के पन्ने कम होते जा रहे हैं।

भारत के वीर जवानों की सत्य कथाये

भारत के वीर जवानों की सत्य कथाये
जोकि भारत और चीन,पाकिस्तान के बीच सं १९६२ और सं १९६५ के युद्ध के समय की है ऐसे वीर भारत माता के बेटो की कहानी जिनने हंसते हंसते देश की रक्षा के लिए अपने प्राण निछावर कर दिए . भारत के वीर जवान पुस्तक से चार कहानी हिन्दी ब्लॉग सफलप्रहरी मे प्रकाशित की जा चुकी है . कृपया अवलोकन कर अभिव्यक्ति प्रदान करने का कष्ट करे और नेट पर यह जो पुस्तक प्रकाशित की जा रही है इसके बारे मे आपके क्या विचार है .

भारत और चीन युद्ध पुस्तक की कड़ी : मेजर सौदागर सिह
भारत के वीर जवान पुस्तक की कड़ी : लेफ्टिनेंट कर्नल दयाल
भारत के वीर जवान पुस्तक की कड़ी : बहादुर जसवीर सिह…
भारत के वीर जवान पुस्तक की कड़ी : सूबेदार जोगिन्दर…
कृपया देखे =
http://safalprahri.blogspot.com

सरकार को भूटिया ने जमाई “किक” और किरण बेदी ने जड़ा “तमाचा”…

ओलम्पिक मशाल भारत आने वाली है, ऐसी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की जा रही है, मानो हजारों आतंकवादी देश में घुस आये हों और नेताओं को बस मारने ही वाले हों। प्रणव मुखर्जी साहब दलाई लामा को सरेआम धमका रहे हैं कि “वे राजनीति नहीं करें” (हुर्रियत नेता चाहे जो बकवास करें, दलाई लामा कुछ नहीं बोल सकते, है ना मजेदार!! )। गरज कि चारों तरफ़ अफ़रा-तफ़री का माहौल बना हुआ है। इस माहौल में देश की पहली महिला आईपीएस अफ़सर किरण बेदी ने ओलम्पिक मशाल थामने से इंकार कर दिया है। उन्होंने कहा है कि “पिंजरे में बन्द कैदी की तरह मशाल लेकर दौड़ने का कोई मतलब नहीं है…”। असल में सरकार तिब्बती प्रदर्शनकारियों से इतना डर गई है कि उसने दौड़ मार्ग को जालियों से ढाँक दिया है, चप्पे-चप्पे पर पुलिस और सेना के जवान तैनात हैं। बेदी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि इस “घुटन” भरे माहौल में वे ओलम्पिक मशाल लेकर नहीं दौड़ सकतीं। इसके पहले फ़ुटबॉल खिलाड़ी बाइचुंग भूटिया पहले “मर्द” रहे जिन्होंने खुलेआम चीन की आलोचना करते हुए तिब्बत के समर्थन में मशाल लेने से इनकार किया। हालांकि किरण बेदी का तर्क भूटिया से कुछ अलग है, लेकिन मकसद वही है कि “तिब्बत में मानवाधिकारों की रक्षा होनी चाहिये, चीन तिब्बत के नेताओं से बात करे और भारत सरकार चीन से न दबे।

जो बात एक आम आदमी की समझ में आ रही है वह सरकार को समझ नहीं आ रही। सारी दुनिया में चीन का विरोध शुरु हो गया है, हर जगह ओलम्पिक मशाल को विरोध का सामना करना पड़ रहा है। बुश, पुतिन और फ़्रांस-जर्मनी आदि के नेता चीन के नेताओं को फ़ोन करके दलाई लामा से बात करने को कह रहे हैं। लेकिन हम क्या कर रहे हैं? कुछ नहीं सिवाय प्रदर्शनकारियों को धमकाने के। मानो चीन-तिब्बत मसले से हमें कुछ लेना-देना न हो। सदा-सर्वदा मानवाधिकार और गाँधीवाद की दुहाई देने और गीत गाने वाले लोग चीन सरकार के सुर में सुर मिला रहे हैं, बर्मा के फ़ौजी शासकों से चर्चायें कर रहे हैं (पाकिस्तान के फ़ौजी शासकों से बात करना तो मजबूरी है)। .चीन सरेआम अपना घटिया माल भारत में चेप रहा है, बाजार का सन्तुलन बिगाड़ रहा है, अरुणाचल में दिनदहाड़े हमें आँखें दिखा रहा है, हमारी सीमा पर अतिक्रमण कर रहा है, पाकिस्तान से उसका प्रेम जगजाहिर है, वह आधी रात को हमारे राजदूत को बुलाकर डाँट रहा है… लेकिन हमारे वामपंथी नेताओं की “बन्दर घुड़की” के आगे सरकार बेबस नजर आ रही है। चीन ने भारत सरकार को झुकने को कहा तो सरकार लेट ही गई। सबसे अफ़सोसनाक रवैया तथाकथित मानवाधिकारवादियों का रहा, जिन्हें “गाजा पट्टी” की ज्यादा चिंता है, पड़ोसी तिब्बत की नहीं (जाहिर है कि तिब्बती वोट नहीं डालते)
असल में सरकार ने चीन की आँख में उंगली करने का एक शानदार और सुनहरा मौका गँवा दिया। जब चीन हमें सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट दिलवाने में हमारी कोई मदद नहीं करने वाला, व्यापार सन्तुलन भी आने वाले वर्षों में उसके ही पक्ष में ही रहने वाला है, गाहे-बगाहे पाकिस्तान को हथियार और परमाणु सामग्री बेचता रहेगा, तो फ़िर हम क्यों और कब तक उसके लिये कालीन बिछाते रहें? लेकिन सरकार कुछ खास पूंजीपतियों (जिनके चीन के साथ व्यापारिक हित जुड़े हुए हैं और जिन्हें आने वाले समय में चीन में कमाई के अवसर दिख रहे हैं) तथा वामपंथियों के आगे पूरी तरह नतमस्तक हो गई है। बाजारवाद की आँधी में सरकार ने विदेश में अपनी ही खिल्ली उड़वा ली है। इस पूरे विवाद में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का बहुत बड़ा रोल है। ओलम्पिक का मतलब है अरबों डॉलर की कमाई, कोकाकोला और रीबॉक जैसी कम्पनियों ने आमिर खान और सचिन तेंडुलकर पर व्यावसायिक दबाव बनाकर मशाल दौड़ के लिये उन्हें राजी कर लिया। यह खेल सिर्फ़ खेल नहीं हैं, बल्कि इन कम्पनियों के लिये भविष्य के बाजार की रणनीति का प्रचार भी होते हैं। सारे विश्व में इन कम्पनियों ने मोटी रकम दे-देकर नामचीन खिलाड़ियों को खरीदा है और “खेल भावना” के नाम पर उन्हें दौड़ाया है, अब आने वाले छः महीनों तक विज्ञापनों में ये लोग मशाल लिये कम्पनियों का माल बेचते नजर आयेंगे। लेकिन भूटिया और किरण बेदी की अंतरात्मा को वे नहीं खरीद सकीं। इन लोगों ने अपनी अन्तरात्मा की आवाज पर विरोध का दामन थाम लिया है।

हम क्षेत्रीय महाशक्ति होने का दम भरते हैं, किस बिना पर? क्षेत्रीय महाशक्ति ऐसी पिलपिलाये हुए मेमने की तरह नहीं बोला करतीं, और एक बात तो तय है कि यदि भारत सरकार गाँधीवाद और मानवाधिकार की बातें करती है तो भी, और यदि महाशक्ति बनने का ढोंग करती हो तब भी…दोनों परिस्थितियों में उसे तिब्बत के लिये बोलना जरूरी है, लेकिन वह ऐसा नहीं कर रही। पिछले लगभग बीस वर्षों के आर्थिक उदारीकरण के बाद भी हम मतिभ्रम में फ़ँसे हुए हैं कि हमें क्या होना चाहिये, पूर्ण बाजारवादी, गाँधीवादी या सैनिक/आर्थिक महाशक्ति, और इस चक्कर में हम कुछ भी नहीं बन पाये हैं…

सुरेश चिपलूनकर
http://sureshchiplunkar.blogspot.com

भारतीय मुस्लिम नेतृत्‍व

यह मुस्लिम नेता रोषपूर्वक अपने को सौ प्रतिशत भारतीय होने का दावा करते है। साथ ही साथ काश्‍मीर पर पाकिस्‍तान के दावे के पक्ष में तर्क देते सुने जाते है। आसाम में पाकिस्‍तानी काश्‍मीर घुसपैठियों को भारतीय मुसलमान मुस्लिम सिद्ध करते दिखाई देते है। कहने को उनका हिन्‍दुओं से कोई मनोमालिन्‍य नही किन्‍तु साथ ही साथ यह फतवा भी जारी करते है कि नेहरू के मृत्‍योंपरानत उनके शव के पास कुरान का पाठ इस्‍लाम के विरूद्ध है क्‍योकि काफिर के शव पर कुरान नही पढ़ी जा सकती। वह जाकिर हुसैन को भारत का राष्‍ट्रपति तो देखना चाहते है किन्‍तु अच्‍छा मुसलमान होने के नाते उनके हिन्‍दु में शपथ और शंकराचार्य से आशीर्वाद लेने प आपत्ति करते है।

प्रस्‍तुत वाक्‍य हामिद दलवई के है जो मुस्लिम पालिटिक्‍स इन सेक्‍युलन इंडिया, पृ. 47  से उद्धत है। इस वाक्‍य से मु‍सलिम नेतृत्‍व की का सही रूप सामने दिखता है। जो नेहरू की मृत्‍यु से लेकर आज तक की सत्‍ता सर्घष में हावी है। यह कांग्रेस उसी म‍ुसलिम कौम को उठाने का असफल प्रयास कर रही है जो अपनी रूढि़ विचारों से कभी नही उठ सकती है। सोनिया को लगता है कि वह 18 प्रतिशत मुसलमानों के बल पर वह चुनाव जीत लेगी तो यह उनकी सबसे बड़ी राजनैतिक अ‍परपिक्‍वता की निशानी है, वह दिन दूर नही जब राष्‍ट्रवाद का स्‍वाभिमान जागृत होगा और देश में राष्‍ट्रवाद के नेतृत्‍व की सरकार आयेगी। और तब देश में न सिर्फ मुसलमान उन्‍नति करेगा अपितु पूरा देश उन्‍नति करेगा। जरूरत है उग्रता को सोंटा दिखने और सही मार्ग पर ले चलने की। क्‍योकि कहा गया है – भय बिन प्रीत न होत गुंसाई।

पुत्र लालसा का मिथक तोड़ते 105 परिवार

बेटियों के लिए नकारात्मक नज़रिया रखने वालों के लिए जबलपुर जिले के १०५ परिवारों से सीख लेना चाहिए जिनने केवल २ बेटियों के बाद परिवार कल्याण को अपना लिया ये जानते हुए
कि इसके बाद उनको पुत्र प्राप्ति न हों सकेगी ,


[“बाल विवाह मत करना माँ”अपनी माँ को रक्षा सूत्र बांधती एक बेटी ]
ये खुलासा तब हुआ जब मैं अपने सहयोगी स्टाफ के साथ म० प्र० सरकार की लाडली लक्ष्मी योजना की उपलब्धि के बाद आंकडों का विश्लेषण कर रहा था । 500 लाडली लक्ष्मीयों में से 89 वो हैं जिनकी बड़ी बहन ही है और भाई अब नहीं आ सकेगा , 6 बालिकाओं के तो न तो बहन होगी न ही भाई , यानी 21 प्रतिशत परिवारों ने पुत्र की लालसा के मिथक तोड़ दिए, क्यों न सकारात्मक सोच को उभार के हम कुरीतियों से निज़ात पाएं ….!!
अब शायद म० प्र० सरकार के इस प्रयास की सराहना सभी को करनी ही होगी ।

हिन्‍दू विवाह

 

 

हिन्‍दू विवाह एक संस्‍कार हुआ करता था किन्‍तु भारत सरकार के द्वारा हिन्‍दू‍ विवाह अधिनियम, 1955 के अनुसार अब न यह संस्‍कार है और न ही संविदा। अपितु यह दोनो का समन्‍वय हो गया है। भारत सरकार के इस अधिनियम से निश्चित रूप से हिन्‍दू भावाओं को आधात पहुँचा है क्‍योकि यह हिन्‍दू धर्म की मूल भावानाओं का अतिक्रमण करता है तथा संविधान की मूल भावनाओं का उल्‍लंघन करता है।

हिन्‍दू विवाह जहॉ जन्‍मजन्‍मान्‍तर का संबध माना जाता था इसे एक खेल का रूप दे दिया गया है तथा हिन्‍दुओं की प्रचीन पद्धति को न्‍यायालय को मुहाने पर खड़ा कर दिया गया, जिसे परमात्‍मा भी भेद नही सकते थे। महाभारत में स्‍त्री पुरूष का अर्ध भाग है तथा पुरूष बिना स्‍त्री के पूर्णत: प्राप्‍त नही कर सकता है। धर्म के लिये पुरूष तथा उपयोगी होता है जबकि उसके साथ उसकी धर्म प‍त्‍नी साथ हो, अन्‍यथा पुरूष कितना भी शक्तिशाली क्‍यो न हो वह धर्मिक आयोजनों का पात्र नही हो सकता है।

रामायण में भगवान राम भी सीता आभाव में धर्मिक आयोजन के योग्‍य नही हु‍ऐ थे। रामायण कहती है कि पत्नी को पति की आत्‍मा का स्‍वरूप माना गया है। पति अपनी पत्नि भरणपोषण कर्ता तथा रक्षक है।

हिन्दू विवाह एक ऐसा बंधन है जिसमें जो शरीर एकनिष्‍ठ हो जाते है, किन्‍तु वर्तमान कानून हिन्‍दू विवाह की ऐसी तैसी कर दिया है। हिन्‍दू विवाह को संस्‍कार से ज्‍यादा संविदात्‍मक रूप प्रदान कर दिया है जो हिन्‍दू विवाह के स्‍वरूप को नष्‍ट करता है। हिन्‍दू विवाह में कन्‍यादान पिता के रूप में दिया गया सर्वोच्‍च दान होता है इसके जैसा कोई अन्‍य दान नही है।

विवाह के पुश्‍चात एक युवक और एक युवती अपना वर्तमान अस्तित्‍व को छोड़कर नर और नारी को ग्रहण करते है। हिन्‍दू विवाह एक बंधन है न की अनुबंध, विवाह वह पारलौकिक गांठ है जो जीवन ही नही मृत्‍यु पर्यन्‍त ईश्‍वर भी नही मिटा सकता है किन्‍तु भारत के कुछ बुद्धि जीवियों ने  हिन्‍दू विवाह की रेड़ मार कर रख दी है इसको जितना पतित कर सकते थे करने की कोशिश की है। भगवान मनु कहते है कि पति और पत्नि का मिलन जीवन का नही अपितु मृत्‍यु के पश्चात अन्‍य जन्‍मों में भी य सम्‍बन्‍ध बरकरार रहता है। हिन्‍दू विवाह पद्धिति में तलाक और Divorce शब्‍द का उल्‍लेख नही मिलता है जहॉं तक विवाह विच्‍छेन का सम्‍बन्‍ध है तो उसे शब्‍द संधि द्वारा बनाया गया। अत: हिन्‍दु विवाह अपने आप में कभी खत्‍म होने वाला सम्‍बन्‍ध नही है।

वयस्‍कता प्राप्‍त करने पर,संतानों को मनमानी करने का फैसला निश्चित रूप से हिन्‍दू ही नही अपितु पूर भरतीय समाज के लिये गलत था। क्‍या मात्र 18 वर्ष की सीमा पार करने पर ही पिछले 18 वर्षो के संबध की तिलाजंली देने के लिये पर्याप्‍त है? है

1914 के गोपाल कृष्‍ण बनाम वैंकटसर में मद्रान उच्‍च न्‍यायाल ने हिन्‍दु विवाह को स्‍पष्‍ट करते हुये कहा कि हिन्‍दू विधि में विवाह को उन दस संस्‍कारों में एक प्रधान संस्‍कार माना गया है जो शरीर को उसके वंशानुगत दोषों से मुक्‍त करता है।

इस प्रकार हम देखेगें तो पायेगें कि हिन्‍दू विवाह का उद्देश्‍य न तो शारीरिक काम वासना को तृप्‍त करना है वरन धार्मिक उद्देश्‍यों की पूर्ति करना है। आज हिन्‍दू विवाह को कुछ अधिनियमों ने संविदात्मक रूप प्रदान कर दिया है तो हिन्‍दू विवाह के उद्देश्‍यों को छति पहुँचाता है।

अभी बातें खत्‍म नही हुई और बहुत कुछ लिखना और कहना बाकी है। समय मिलने पर इस संदर्भ में बाते रखूँगा।

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