>संसद में शोर

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लेखक : रमेश भट्ट , लोकसभा टीवी 



संसद, लोकतन्त्र का खंभा , 
देश की सर्वोच्च नीति निर्धारक संस्था, 
देश के विकास की नींव यही रखी जाती है। देश के कोने कोने से चुने हुए प्रतिनिधि देश भर की समस्याओं को लेकर यहां अपनी आवाज बुलन्द करते है। जनता से जुड़े मुददों पर सार्थक बहस इसी जगह होती है। कानून बनाने की ताकत भी इसी संसद के पास है। मगर आज यहां हालात बदले बदले नज़र आ रहे है। सदन में आए दिन होने वाले हो हंगामें से अब जनता त्रस्त हो गई है। आखिर किसके लिए है संसद। क्या है इसका उद्देश्य। क्या संसद आम आदमी के प्रति नही है। इसमें कोई दो राय नही की संसदीय बहस का स्तर लगातार गिर रहा है। सांसद रचनात्मक बहस से ज्यादा आपसी टोकाटोकी में ज्यादा मशगूल नज़र आते है। संसद में आए दिन हंगामा होना कोई नही बात नही है। सच्चाई यह है कि राजनीतिक दलों ने इसे एक सियासी हथियार के तौर पर अपना लिया है। वैसे तो सदन में सांसदों के लिए कई नियम बनाये गए है। मगर इसका अनुसरण कोई नही करता। मसलन कोई सदस्य अगर भाषण दे रहा हो, तो उसमें बांधा पहुचाना नियम के खिलाफ है। सांसद ऐसी कोई पुस्तक, समाचार पत्र या पत्र नही पडे़गा जिसका सभा की कार्यवाही से सम्बन्ध न हो । सभा में नारे लगाना सर्वथा नियम विरूद है। सदन में प्रवेश और निकलते वक्त अध्यक्ष की पीठ की तरफ नमन करना नियम के तहत है। अगर कोई सभा में नही बोल रहा हो तो उसे शान्ति से दूसरे की बात सुननी चाहिए।  भाषण देने वाले सदस्यों के बीच से नही गुजरना चाहिए। यहां तक कि कोई भी सांसद अपने भाषण देने के तुरन्त बाद बाहर नही जा सकता। हमेशा अध्यक्ष को ही सम्बोधित करना चाहिए। नियम के मुताबिक सदन की कार्यवाही में रूकावट नही डालनी चाहिए। सदन की कार्यवाही में रूकावट नही डालेगा। इन सारे नियमों के लब्बोलुआब को कुछ अगर एक पंक्ति में समझना हो तो सदन में अध्यक्ष के आदेश के बिना पत्ता भी नही हिल सकता। दु:ख की बात तो यह है कि ऐसे कई नियम मौजूद है लेकिन इन नियमों केा मानने वाला कोई नही। राजनीतिक चर्चाऐं कई बार अखाड़ों में तब्दील हो जाती है। आज इन सारे नियमेंा की अनदेखी एक बड़े संसदीय संकट की ओर इशारा कर रही है। क्या इसका उपाय है हमारे पासर्षोर्षो आज 100 दिन संसद का चलना किसी सपने की तरह है। कई जरूरी विधेयक बिना बहस के पास हो रहे है। सभा की कार्यवाही से कई सांसद अकसर नदारद रहते है। कभी कभी तेा कोरम पूरा करने के लिए सांसद खोज के लाने पड़ते है। क्या दुनिया के सबसे बडे लोकतन्त्र की तस्वीर ऐसी होनी चाहिए। आज सासन्द असंसदीय भाषा का इस्तेमाल करने से भी नही चूक रहे है। अब समय आ गया है कि जनता `काम नही तो भत्ता नही` और `जनप्रतिनिधी को वापस बुलाने के अधिकार` को कानूनी रूप प्रदान करने के लिए राजनीतिक दलों पर दबाव बनाये। 


>साढ़े बारह बजे का किया इन्तेजार पर कसाब को फाँसी ना मिली

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आज सुबह से साढ़े बारह बजने का इन्तेजार कर रहा था . उत्सुकता और बेचैनी दिमाग पर काबिज थी . सुबह सात बजे उठ कर जामिया के लिए निकल गया . साढ़े नौ से साढ़े बारह तक परीक्षा थी और स्टार न्यूज़ के मुताबिक इसी समय तक भारत के सरकारी दामाद की सजा का ऐलान भी होना था . परीक्षा भवन में भी दिमाग का आधा हिस्सा इसी पर लगा हुआ था . जल्दी -जल्दी ऑटो से घर भागे . यहाँ आये तो पता चला कि साहब , कसाब को फाँसी देने में कई साल भी लग सकते हैं . अब हम जैसे कानून के अनपढ़ों को कौर्ट -कचहरी की भाषा भला कहाँ समझ आती है  ? लेकिन परेशानी यही नहीं है .  मामला तो तब बिगड़ता है जब कार्यपालिका , व्यवस्थापिका और न्यायपालिका को हमारी ये बात समझ में नहीं आती ! क्यों , सही कहा ना ! अगर उनको ये बात समझ में आती तो अफजल गुरु अभी तक तिहाड़ में हमारे पैसों की रोटी नहीं तोड़ रहा होता . कसाब के लिए करोड़ों नहीं उडाये जाते वो भी उस देश में जहाँ लोग भूख से जान देते हो . पता नहीं इस देश का सिस्टम (कार्यपालिका , व्यवस्थापिका और न्यायपालिका) आखिर कौन सी मिसाल कायम करना चाहता है  ? अरे , मिसाल तो अमेरिका ने कायम किया बिलकुल लोकतान्त्रिक तरीके से सद्दाम को कम से कम समय में फाँसी लगवा कर .  लेकिन नहीं यह तो भारतवर्ष है … जहाँ हत्या करने पर दस और हत्या का लाइसेंस देती है ये सरकार !

>अरे , भूल गये पुन्यप्रसून जी कि …………………………….

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झारखण्ड की किस्मत किसने तय की है , वहां की जनता ने ही ना !  अरे , भूल गये पुन्यप्रसून जी कि ये वही प्रदेश है जहाँ की जनता ने घोटाले में लिप्त मुख्यमंत्री की बीबी को सर आँखों पर बिठाया था . यही वो प्रदेश है जो भावनाओं में बहकर शिबू सोरेन जैसों को अपनी बागडोर थमाता है . अब सांप को दूध पिलाओ तब भी जहर कम नहीं होता ! ये शिबू सोरेन की आदत है कभी यहाँ कभी वहां मुंह मारने की . लोग तो तब भी भाजपा के फैसले पर आश्चर्यचकित थे . तब विधायकों के   टूट जाने के भय से जिस स्संप को गले में डाला उसके जहर भरे दांत तोड़ने के उपाय भी करने चाहिए थे . वैसे मानते हैं कि आपकी रपट अलग होती है गरीब आदिवासियों से आपकी विशेष सहानुभूति है लेकिन भाई हम ऐसे लोगों से सहानुभूति नही रखते जो बार-बार एक ही गलती दुहराते हैं .झारखण्ड का मतदाता इतना सीधा-सादा भी नहीं है कि शिबू जैसों की असलियत ना पहचान सके , और फ़िर भी वोट देता है तो इसमें शिबू से ज्यादा इनकी गलती है ……………

>क्या यह कांग्रेसियों का स्वांग नहीं है ?

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राजनीति में श्रेय का बड़ा महत्व है . किसी भी काम का श्रेय  छीनने की होड़ में कभी-कभी कुछ अच्छा काम भी हो जाया करता है . दो दशकों से भी अधिक समय तक मुंबई में ठाकरे की घिनौनी राजनीति ने कहर मचा रखी है . बड़े ठाकरे के बाद अब छोटे ठाकरे अपनी अलग पार्टी बना कर उछल-कूद कर रहे हैं . पहले लुंगी वालों की पुंगी बजाई अब भाइयों की बारी आई . गैर मराठियों को जम कर मारा पीटा गया . राज्य से लेकर केंद्र तक कांग्रेस और राष्ट्रवादी कोंग्रेस चुप रही . आज अचानक क्या हो गया जो गृहमंत्री देश की एकता -अखंडता को लेकर चिंतित हो गये . मीडिया में उनका ब्यान आने लगा कि भारतीय संविधान किसी भी भारतीय को कहीं भी बसने और काम करने की स्वतंत्रता देता है और केंद्र सरकार इसे सुनिश्चित करेगी . आखिर क्या वजह है ? साफा है कि संघ का इस मुद्दे पर आया ब्यान सरकार में खलबली मचा गया है . सोनिया ब्रिगेड घबरा गयी कि कहीं इसका श्रेय संघ के पास ना चला जाए …………. यहाँ तक तो ठीक है पर जनता कैसे पचा पाएगी गृहमंत्री के बयान को जब हाल हीं में अशोक चाहवान सरकार ने भाषावाद से ओत-प्रोत होकर मुंबई में टेक्सी परमिट का नया कानून लागू किया है . क्या गृह मंत्री और महारष्ट्र के मुख्यमंत्री का कृत्य आपस में विरोधाभाषी नहीं है ? क्या यह कांग्रेसियों का स्वांग नहीं है ? 

>मैं कहता, यहाँ लोकतंत्र नहीं

>हाँ बहुत दुःख होता है,
जब कोई भूखा सोता है.
ये दिल मेरा कलपता है,
जब एक नेता चार हजार करोड़ लूट कर
उन भूखो का निवाला छीन लेता है.
दर्द फिर तब होता हैं
जब ऐसे राजनेताओं को सजा मिलना
मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन होता है.
आत्मा धिक्कारते है,
ऐसे लोगो को, जो विकास की झूठी ख़बरें फैलाते हैं.
तरस होता है ये देखकर
जब लोग कसाब के लिए फांसी नहीं मांगते
बस मुंबई के बेगुनाहों को याद करते मोमबत्तियां जलाकर
सुनकर हंसी आती है
देश का चौथा स्तम्भ भी हिल गया है.
जो नोट लेकर सरकारी नेताओ से मिल गया है.
डर लगता है ऐसे मानवाधिकार से
जिसका पूरा चरित्र ही बदल गया है.
अफज़ल को हर कीमत पर छोड़ दो
क्या ये भी पाकिस्तान से मिल गया है.
गुस्सा आता है… कुछ कामचोर पार्टियो से
जो आम जनता का काम नहीं करते
बस देते रहते भाषण
हैं राम के ये भक्त
पर अल्लाह-अल्लाह कहकर
बात-बात पर कहते, दे दो उन्हें आरक्षण
घिन्न आती है ऐसे समाज से
जो आधुनिकता का लिवास ओढ़कर
खुले अंग की नुमाईस करते
और मुह फेर लेते भारतीय शर्म, हया और लाज से
अफसोस होता है ये देखकर
बेतुकी कहानियों वाली अधनंगी फिल्म
बॉक्स ऑफिस पर हिट जाती है
और “ये मेरा इंडिया, १९७१, स्वदेश” जैसी फिल्मे
बॉक्स ऑफिस पर पिट जाती है.
निराशा घेर लेती है चारो ओर
जब भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, क्षेत्रवाद, जातिवाद, फैला हो हर ओर
क्या मिलता है उन्हें
जो सैनिक, सीमा में शहीद हो जाते है.
मिलता है तो बस, उन खिलाडिओं को
जो जीते या हारे
बस जाकर आइपीएल में शामिल हो जाते है.
मैं कहता, यहाँ लोकतंत्र नहीं है.
बिलकुल राजतन्त्र सी कहानी है
जहाँ प्रधान कोई मंत्री नहीं
न कोई मंत्री प्रधान है.
यहाँ प्रधान तो है एक युवराज
जिसकी इतालियन मम्मी यहाँ की रानी है.
लगता है छोड़ दू सब कुछ सोचना
उस ऊपर वाले के हाल पर
शायद वो कुछ नया कर दिखाए
आने वाले अगले साल पर.

>पैसों की पेड़ राजनीति

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“कुछ था तो खुदा था कुछ होता तो खुदा होता, मुझको डुबोया मेरे होने ने मैं hota तो क्या होता ! “अभी झारखण्ड की राजनीति गरमा गई है .चुनाव कुछ हो चुके कुछ होने हैं पर जैसे जैसे यह दिन नजदीक रहा था . वैसे लोग एक दुसरे का छेछा लेदर करने मैं जुट गए थे .और कई बातो का खुलासा भी हुआ इसी बीच पता चला की झारखण्ड के पूर्व मुखमंत्री मधु कोड़ा साहब ने चार हजार करोड रुपीयों का घोटाला किया है .यह पहले नहीं जो कृतिमान गढ़ा है फेरहिस्त तो लम्बी है पर इसका उदभेदन चुनाव के करण हुआ .पर इसकी आज क्या जरुरत थी कुएँ सरकार नीद से जग गए .नींद मैं खलल किसने डाला ?पर यह बात तो कुछ और ही है .वह अपने आप को चुनाव मैं पाक साख दिखाना चाहते हैं.पर उन नेताओं पर असर ही नहीं पड़ता लगता है ये अपने लाज शर्म बाजार मे बेच मूंगफली खा गये हैं ,सब कुछ पता चलने के बावजूद ये जनता से मुखातिब होने पर कहते हैं की कुछ लोग उनकी लोकप्रियता से घबरा गए हैं और उन्हें बदनाम करने की कोशिस कर रहें हैं और उन्हें दलित होने के करण निसाना बनाया जा रहा है .पर इस भारतवर्ष मैं एक चौथाई जनता दलित और गरीब है पर निशाने पर आपही क्यूँ ?”बिना आग के धुऐं नहीं उठतेपर सोचने से माथे पर बल पड़ जाता है की कितनीं जल्दी ये अपना वक्तित्व बदल लेते हैं साप को भी कुछ समय लगता है अपना केचुल उतारने मे, ये उससे भी आगे है . पर बात जो भी हो लेकिन ये आएने की तरह साफ़ हैं की अगर रातों रात आमिर बनना है अगर आप धन कमाने पर आमादा हैं तो राजनीति के कुरुक्षेत्र मैं कूद पड़ो .इस कुरुक्षेत्र में जितने लोग हैं वो अपने आप को गणेश समझतें हैं उशे कोई बाधा छु नहीं सकती ,वह ख़ुद को विघ्न विनासक मानता है .और यह सस्वत सच भी है .जिसका प्रत्यक्ष हैं घोटालों की फाईलें जो कही कोने में पड़ी धुल खा रही हैं .यही वजह है की दिहाड़ी पर कम करने वाला आदमी इतनी हिम्मत करता है उसे सहस यही से मिलता है .खैर गलती इनकी नहीं झारखण्ड की बदकिस्मती है की पिछले नव दस सालों में कोई कुसल साशक नहीं मिला ,जो इन खनिजों से भरे राज्य का बोझ उठा कर कुछ कदम भी चल सके .जिसने देखा उसी के मुह में पानी गया .सबों का ईमान डोल गया .सब नें भर पेट लुटा आम आदमी के भरोसे और विश्वास का दिनों रात बलात्कार किया गया .इन सब को देख नेताओं से नफरत होने लगती है .वह माँ भी अपने कोख को कितना कोस रही होगी की मैंने ऐसी बेटे को जन्म दिया .यूं तो एक स्त्री के लिए बाँझ होना एक गली है ,पर ऐसे बच्चे होने से अच्छा है की कलंक की कालिख पोते गर्व से वो घूमे .जब इन सब का भंडाफोड़ होता है तो अंगुलियाँ कांग्रेस की तरफ़ भी उठती है .क्यूंकि उनकी सरकार इनकी सह पे ही चल रही थी ,तो क्या समझा जाए जो हुआ वो मिलीभगत थी या ये है .चुनाव के समय यह सब करना और अब लिब्रहान रिपोर्टे का लिक होना यह बताता है की उन्होंने पहले से ही सारे चल सोच रक्खी थी विपक्ष की मात के लिए ,यह सभी जानते है कि झारखण्ड भाजपा का अच्छा गढ़ रहा हैं तो शायद इसी किले में सेंध के लिए यह सब किया जा रहा है .इन को सोचना तो चाहिएअगर पतीला का ढक्कन खुला हो तो कमसे कम कुत्ते को तो शर्म आनी चाहिए

>खिसयाई बिल्ली खम्भा नोचे

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” हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम , वो क़त्ल भी करते है तो चर्चा नहीं होती. जो कुछ मुंबई मे हुआ वह पहली दफा नहीं हुआ जब मीडिया को प्रताड़ित किया गया . जब कभी मीडिया सच बोलता है तो उसे उसकी कीमत चुकानी पड़ती है. आज बाला साहब हुंकार करके मीडिया की भर्त्सना कर रहे है लेकिन , जब राज उत्पात मचा रहे थे तब उन्होंने कुछ नहीं कहा .जब राज वहां क्षेत्रवाद का नंगा नाच कर रहे थे बल्कि यूं कहें अपना जनाधार तैयार कर रहे थे तब कोई गुस्सा कोई हमला नही !लेकिन अब ऐसा क्या हो गया जो उनके रगों मे बहता खून उबाल मारने लगा यह समझने के लिए महाराष्ट्र चुनाव की तरफ़ रुख करना होगा जहाँ शिव सेना औंधा मुह गिरा. उस चुनाव परिणाम में साफ़ देखा जा सकता था की बाला साहब की ढलती उम्र शिव सेना को अपनी चपेट में ले रही थी .इसी बनती छवि और मनसे की कामयाबी से वो तिलमिला उठे ,जरा सा बात यह है की उन्हें अब मनसे से खतरा लगता है .उन्हें लगता है की उनके पैरों के निचे से सियासत की जमीं खिसक रही है .वह अपना खोया जनाधार हासिल करना चाहते है .यह महज पोलिटिकल स्टंट है .और रही बात सचिन को भगवन मानने की तो यह भारतीय इतिहास की विडम्बना ही है की जिसके पास शास्त्र नहीं तो वह भगवन नहीं .तो किसके हाथ तीर तरकस से लैस और कौन निहत्था है यह बताने की जरुरत नहीं .

>बस्तर से आई आवाज

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राजीव रंजन प्रसाद (rajeevnhpc102@gmail.com) बस्तर

नक्सलवाद को एक ऑर्गेनाईज्ड क्राईम की तरह से ही देखा जाना चाहिये। आंतरिक आवाजे ऐसी नहीं होती जिसका दावा नक्सलवाद के समर्थक पत्रकार और प्रचारक बुद्दिजीवी करते हैं। बुनियाद में देखें तो आप बस्तर में “आन्दोलन” के नाम पर “मनमानी” करते सुकारू और बुदरू को नहीं पायेंगे “राव” और “सेन” को पायेंगे। यह एक एंक्रोचमेंट है “सेफ प्लेस” पर। बस्तर के आदिवासियों को माओवाद का पाठ पढाते ये लोग घातक हैं वहाँ कि संस्कृति और उनकी अपनी स्वाभाविक व्यवस्था के लिये। हालात नक्सलियों द्वारा आतंक फैला कर पैदा किये गये हैं जिन्हे आदिमं के हर घर से लडने के लिये एक आदिम जवान चाहिये होता है…उसकी मर्जी हो तब भी और नहीं हो तब भी।

नक्सली आतंकवादियों के मानवाधिकार पर केवल इतना ही कहूँगा कि उनके तो मानवाधिकार हैं लेकिन रोज बारूदी सुरंगों के विस्फोट में मारे जा रहे जवान और हजारों निरीह आदिम हैं उनके अधिकारों की बात करते समय हमारे माननीय पत्रकारों को क्या साँप सूंघता है? जो बस्तर का इतिहास जानते हैं उन्हे पता है कि यहाँ का आदिम दस से अधिक बार (भूमकाल) स्वत: अपने अधिकारों के लिये खडा हुआ और उसने न केवल अपने “राजतंत्र” बल्कि “अंग्रेजों” की भी ईंट से ईंट बजा कर अपने अधिकार हासिल किये। (हो सकता है यह सलवा जुडुम भी एसा ही एक आन्दोलन हो जो उनका “स्वत: स्फूर्त” हो क्योंकि इसके पैरोकार आन्ध्र या बंगाल के भगोडे अपराधी नहीं हैं कमसकम वहीं के आदिम और आदिवासी नेता हैं) उसे अपनी लडाई के लिये किसी माओवादी संगठन की बैसाखी नहीं चाहिये।

असल में चश्मा बदल कर देखने की आवश्यकता है। बैसाखी आदिमो को नहीं दी गयी है बस्तर तो बिल है जिसमे छुपे माओवादी अपनी कायरता को लफ्फाजी से छुपाते रहे हैं….यह जान लीजिये कि वीरप्पन भी जंगलों में हुआ, फूलन भी बीहडों में हुई और नक्सल भी जंगलों में मिलेंगे क्योंकि ये उनके सहज पनाहगाह हैं। माओवादियों को जनसमर्थन होता तो ये मैदानों में भी पाये जाते – सहज स्वीकार्य? वहाँ क्या तथाकथित शोषण नहीं समाजवाद है?

यह सच है कि माओवादी विचारों के जरिये ही चीन की सत्ता बची है और वह दुनिया का ताकतवर देश है लेकिन एसा देश जिसके भीतर मानवाधिकारों की क्या स्थिति है यह भी दुनिया जानती है (माफ कीजियेगा कुछ पत्रकार और कुछ बुद्धिजीवी नहीं जानते)। उसी चीन नें तिब्बत का जो लाल सलाम किया है उस पर तो किसी माओवाद समर्थक पत्रकार और बुद्धिजीवी को अब आपत्ति नहीं होगी? और नेपाल पर इतराने जैसी भी कोई बात नजर नहीं आती…

>तो फिर अब नपुंसक जनता तैयार रहे

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देश की नीति-नियती निर्धारित करने वाली राष्ट्रीय राजधानी की गलियों में मंहगाई के खिलाफ गूंजते नारे नक्कारखाने में तूती की बोलती से अधिक कुछ और नहीं है। सशक्त विपक्ष के रूप में खुद को साबित करने के लिए भाजपा ने जनता की दुखती रग पर हाथ रखा है .आलू-प्याज ,आटा-दाल, तेल-पानी, बिजली-बस- मेट्रो की बढ़ती महंगाई के मुद्दे पर दिल्ली बंद , भाजपा कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे, अनेक जगहों पर दुकाने और परिवहन सेवा ठप रही परन्तु क्या इसे बंद कहा जाना चाहिए? नहीं यह एक राजनैतिक दल का सफल अभियान जरूर है, पर बंद नहीं।
बंद से जनता नदारद रही। जीने के लिए आवश्यक हर वस्तु की कीमत सुरसा मुख की तरह बढ़ती जा रही है। महंगाई का रोना हर कोई रो रहा है। जब कुछ करने की बारी आती है तो मुंह छुपा कर घर में दुबक जाते हैं। क्या ऐसे अकर्मण्य नागरिकों को महंगाई के लिए सरकार को कोसने का हक है जो अपने हक की लड़ाई नहीं लड़ सकते?
अकर्मण्यता या कर्म भीरूता का यह विषाणु तो सदियो से हमारे भीतर रहा है। जो मानव इतिहास में सबसे अधिक 1500 सालों तक पराधीन रहने का कारण है। अंग्रेजो से आजादी की लड़ाई के वक्त ९५% भारतीय सामान्य गुलामी की जिंदगी बसर कर रहे थे। 5 % लोग लड़ते और शहीद होते रहे तभी गांधी नाम एक उद्घारक आया जिसने उन कायरों को कलंक धोने लायक बना डाला। गांधी ने जब समझाया कि बगैर कुछ खोए सभा में बैठकर सड़को पर नारे लगाकर हमें आजादी पा सकते है तब ये चूहो की तरह बिलों से निकल-निकल कर गांधी सभाओं में,अहिंसक आंदोलनों में भागीदारी करने लगे। अपनी कायरता/नपुंसकता को सहिष्णुता / अहिंसकता/ दयालुता के चादर में लपेट कर आने वाली पीढी को अपने देशप्रेम का सबूत दिया गया।
आज परिस्थितियां और भी बदतर है। अपने ही चंद लोगों ने गुलाम बना रखा है हमें। हमारी जरूरतों की एक-एक चीज, हमारी शिक्षा, हमारी जीवनशैली, चंद उद्योगपतियों, जन प्रतिनिधियों और कुछ विदेशी दलालों (जिनमें मीडियाकर्मियों से लेकर नव एनजीओ चालक तक शामिल है) के अनुसार तय होती है। इनकी पकड़ सामाजिक राजनीति और आर्थिक व्यवस्था पर इतनी सूक्ष्म है कि नंगी आंखों से एक बारगी देखने पर भी समझ पाना बेहद कठिन है।
लेकिन कुछ चीजें प्रत्यक्ष दिखती हैं जैसे महंगाई। महंगाई जैसी कुव्यवस्था से लड़ने का लोकतांत्रिक हथियार है बंद, चक्का जाम, धरना प्रदर्शन। आज जनता में इतना साहस भी नहीं बचा कि अपनी ही चुनी हुई सरकार से अपने प्रतिनिधि से महंगाई का हिसाब मांग सके। सरकार निकम्मी थी तो काम चल जाता था। भ्रष्टाचार से लेकर महंगाई और सुरक्षा आदि मुद्दों पर विपक्ष जनता के साथ मिलकर सरकार का घेराव करती थी और सरकार को जनहित को प्राथमिकता देनी पड़ती। अब सरकार के साथ-साथ जनता निकम्मी हो चली है।
अपने हक की लड़ाई को राजनीति का हिस्सा समझ कर खुद को उससे अलग मानने लगी है। सरकार और विपक्ष के बीच बैटिंग-बॉलिंग हो रही है और फील्डिंग करने वाली जनता नदारद है। ऐसे हालात में लोकतंत्र का यह खेल ज्यादा समय तक सुचारू रूप से खेला जाना संभव नहीं है।
“ठेके’’ के इस युग में सरकार जिस तरह से सार्वजनिक उपक्रमो को निजी कंपनियों के हवाले कर रही है वैसे ही जनता ने अपने अधिकार और कर्तव्य दोनों नेताओ को ठेके पर दे रखा है तो फिर अब नपुंसक जनता तैयार रहे…………….. किस चीज के लिए………….. यह तो वक़्त बताएगा।

>महाराष्ट्र की जनता -जनार्दन का सार्थक कदम

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उम्मीदवारों के भाग्य का विधाता तो मतदाता ही होता है। कई दिग्गजों और मंत्रियों को घर का रास्ता दिखाने के साथ ही तमाम राजनेताओं के लाडलों को विधायक बना दिया। मगर उन प्रत्याशियों को मतदाताओं ने धोखा दे दिया, जो आपराधिक पृष्ठभूमि के थे। महाराष्ट्र की विभिन्न अदालतों में जिन प्रत्याशियों के खिलाफ मामला दर्ज हैं, उनमें मंत्री, विधायक और पहली बार किस्मत आजमा रहे नेताओं का समावेश था। सभी को मतदाताओंने विधानसभा जाने से रोक दिया। अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि के लिए मशहूर निवर्तमान राज्यमंत्री सिद्धराम म्हात्रे, विधायक पप्पू कालानी, अरूण गवली, हितेंद्र ठाकुर को जहां झटका लगा है, वहीं शिवसेना प्रत्याशी विजय चौगुले और मनसे के सुधाकर चव्हाण की उम्मीदों पर पानी फिरा है। सोलापुर की अक्कलकोट सीट से पूर्व में कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुने गए सिद्धराम म्हात्रे को आघाड़ी सरकार में गृहराज्य मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद से नवाजा गया था। अपने आपराधिक इतिहास के चलते इस चुनाव में म्हात्रे को मतदताओं को बेरूखी की शिकार होना पड़ गया और वे विधायक बनते-बनते रह गए। माफिया डॉन से राजनेता बने अखिल भारतीय सेना प्रमुख अरूण गवली पिछली बार तो विधायक बन लिए थे, लेकिन इस चुनव में उसको पराजय का मुंह देखना पड़ा। इसी तरह उल्हासनगर के बाहुबली विधायक पप्पू कालानी को भी इस चुनाव में भाजपा के कुमार आयलानी के सामने पराजय का मुंह देखना पड़ा। अपने आपराधिक सम्राज्य के बूते लंबे समय से उल्हासनगर की सत्ता पर काबिज कालानी की पत्नी ज्योति वहां की महापौर भी रह चुकी हैं। फिलहाल ज्योति कालानी इस समय राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में हैं और पप्पू कालानी रिपब्लिकन पार्टी से विधायक चुने गए थे। इस बार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उतरे कालानी को मतदाताओं ने खारिज कर दिया। वसई के निर्वतमान विधायक हितेंद्र ठाकुर का नाम भी बाहुबली विधायकों की सूची में दर्ज है। गत लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपनी पार्टी बहुजन विकास आगाड़ी का सांसद भी पालघर क्षेत्र में जिताया। सांसद बलीराम जाधव ने केंद्र में कांग्रेस का समर्थन दिया, तो विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने तीन सीटें ठाकुर के लिए छोड़ दी। ठाकुर की पार्टी से बोईसर में चुनाव लड़ रहे विलास तरे के साथ ही जूनियर ठाकुर क्षितिज नालासोपारा से तो जीतने में कामयाब रहे, लेकिन पैनल से वसई सीट पर उतरे नारायण माणकर को निर्दलीय विवेक पंडित ने ढेर कर दिया। ज्ञात हो कि नायगांव से लेकर विरार तक ठाकुर कंपनी का एकछत्र साम्राज्य हुआ करता था, लेकिन हाल ही में ठाकुर समेतउसके समर्थकों पर जिस तरह से ग्रामीणों ने हमला किया। उससे हितेंद्र को जमीन खिसकती हुई नजर आई और उन्होंने रणछोड़ दास बनने में ही भलाई समझी। हितेंद्र का अंदाज सही निकला वो समझ गए थे कि अगर इस सीट से लड़े तो इज्जत का कचरा हो जाएगा। इसलिए मैदान से हट गए और आखिरकार उनके उम्मीदवार को शिवसेना समर्थित विवेक पंडित ने पराजित कर दिया। आपराधिक इतिहास वाले उम्मीदवारों में ऐरोली से शिवसेना प्रत्याशी विजय चौगुले का भी नाम आता है, जो सिर्फ राकांपा प्रत्याशी संदीप नाईक से हार गए, क्योंकि क्रिमिनल रिकार्ड की वजह से वहां के मतदाताओं ने चौगुले को नापसंद कर दिया। लोकसभा चुनाव में संदीप के बड़े भाई संजीव के सामने भी चौगुले अपनी आपराधिक छवि के कारण हार गए थे। इसी क्रम में ओवला माजीवड़ा सीट से मनसे प्रत्याशी सुधाकर चव्हाण की पराजय का कारण भी उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि ही रही। उनके सामने उतरे शिवसेना प्रत्याशी प्रताप सरनाईक अपनी स्वच्छ छवि के चलते मैदान मारने में कामयाब रहे। कुल मिलाकर इस चुनाव के परिणामों से साफ जाहिर हो गया कि विधानसभा में आपराधियों की बजाय उन्हें भेजा जाए, जिनका दामन साफ हो।

साभार : हम प्रवासी ब्लॉग से {http://humhaipravasi.blogspot.com/2009/11/blog-post.html}

महाराष्ट्र की जनताजनार्दन ने सालों से लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में व्याप्त अपराधीकरण के पुजारियों को वोटों की मार से बाहर का रास्ता दिखा दिया है जो बेहद सराहनीय पहल हैइस चुनाव से भारतवर्ष के सभी मतदाताओं को सबक लेने की जरुरत हैमहाराष्ट्र की जनता ने अपराधियों से अपने प्रतिनिधित्व को मुक्त कर यह साबित किया है कि आज भी लोकतंत्र में जनता हीं जनार्दन हैकम से कम बिहार और यूपी की जनता को आज ऐसे हीं सुधारात्मक कदम उठाने की जरुरत हैआख़िर कब तक बेवकूफ बनेगी बिहार और यूपी की जनता ? सत्ता परिवर्तन तो जरुर हुआ है पर क्या फायदा , राज तो वही चंद बाहुबलियों का है ! आज बसपा में है कल सपा में , आज राजद तो कल जदयू ,इन गुंडों से छुटकारा कहाँ है ? चुनाव आयोग भी सिस्टम के हाथों मजबूर होकर हाथ पर हाथ धरे बैठी है लेकिन जनता इतना तो कर हीं सकती है कि जिनके ऊपर किसी प्रकार की आपराध का आरोप हो उनको चुनाव की दौड़ से बाहर का रास्ता दिखाए

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