>प्रभाष जोशी का सेकुलरवाद से गद्दारी क्यों ? वामपंथियों का सवाल

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भागो, भागो, भागो ….. अब तो पूरी जमात भेड़ियों की तरह टूट पड़ी है। अंतरजाल पर वामपंथी ताने-बाने का हरेक झंडाबरदार प्रभाष जोशी के पीछे लपक पड़े हैं । रविवार में एक आलेख क्या छपा इनकी नींद उड़ गई ! ब्लॉग से लेकर वेबसाइट तक जोशी के ब्राह्मण हो जाने की सनसनी फ़ैल गयी है । पता नहीं अब तक किसी टीवी वाले ने प्रभाष जी को चाय पर बुलाया है या नहीं ? चाय पर माने इन्टरव्यू के लिए । अरे , आख़िर माजरा क्या है ? आजीवन ब्राह्मणवाद ,मनुवाद ,हिन्दुवाद से दूर वामपंथ अथवा वामपंथ के इर्द-गिर्द अपनी लेखनी चलाने वाले लेखक -पत्रकार लोग बुढापे में अपने पंथ से गद्दारी क्यों कर बैठते हैं ? पाठकों , यह सवाल मेरा नहीं बल्कि वामपंथ के युवा लेखकों के दिल की टीस है ! उनके अनुसार तो प्रभाष जी सठिया गये हैं (एक महान पत्रकार के वेबसाइट का लिंक दिए हैं ) वाकई , सवाल तो लाखों का नहीं अरबों -खरबों का है ! मौका और फुर्सत हो तो किसी सेकुलर (छद्म वामपंथी) खोजी पत्रकार को मामले की तह में जाना चाहिए । कोई न मिल रहा हो तो तरुण तेजपाल को हीं लगा दिया जाए । कुछ न कुछ तो ढूंढ़ निकालेंगे ! साहब , मैं फालतू की बात नहीं कर रहा हूँ । यह आज तक यक्ष प्रश्न बना हुआ है । निर्मल वर्मा , कमलेश्वर , राजेंद्र यादव, उदयप्रकाश ,प्रभाष जोशी सरीखे महान लेखकों की एक लम्बी सूची है जिनको दक्षिणपंथी , हिंदूवादी ,संघप्रेमी, आदि अलंकरणों से विभूषित किया जा चुका है इनमें से प्रत्येक लेखक को लेकर उठे बबाल का ज्ञान आपक सभी को होगा हीं । अभी ताजातरीन विवाद में उदयप्रकाश को योगी आदित्यनाथ के साथ एक मंच पर खड़े होने के लिए लताड़ा गया था और अब प्रभाष जी के साक्षात्कार को लेकर चिल्लमचिल्ली मची हुई है । अभी महीने भर पहले पत्रकारीय मूल्यों में गिरावट और पैकेज वाले ख़बरों के विरुद्ध जोशी जी की मुहीम से सभी खुश थे । जगह-जगह सेमिनार / गोष्ठी / कार्यशाला लगाई जा रही थी । इन तमाम कार्यक्रमों में हिन्दी पत्रकारिता के भीष्म आदर्श पत्रकार होने के गुर सिखा रहे थे ।देश भर में इन्हीं की धूम मची थी । आज अचानक एक साक्षात्कार ने इन्हें क्या से क्या बना दिया ? लोग तुम-ताम पर उतर आए हैं । आज कल ग्रहदशा कुछ ठीक नहीं चल रही है । कई बड़े लोगों की गाड़ी पटरी पर से उतरती हुई दिख रही है ।
बहरहाल ,प्रभाष जोशी के पिछले लेखन कर्म में कहीं भी पारदर्शिता का अभाव नहीं रहा है और मेरे अनुसार तो वो यहाँ भी पारदर्शी हैं । परन्तु कुछ लोगों को आभासी प्रतिबिम्बों को देख-देख कर जीने की आदत होती है । ऐसे लोगों को जोशी कुछ और नज़र आते हैं । वैसे वामपंथियों के लिए दुखी होकर चिल्लाने के अलावा एक खुश खबरी भी है । जसवंत सिंह भी अचानक पाला बदल कर सेकुलर होने की राह पर चल पड़े और आखिरकार उन्हें शहादत देते हुए भाजपा की सदस्यता गंवानी पड़ गयी । तो भाई लोग खम्भा नोचना छोड़ कर थोडा खुश हो लें क्योंकि अपने सुख से ज्यादा इंसान को दूसरों के दुःख से प्रसन्नता होती है !

>इति श्री कुर्सी कथा समाप्त !!!!!!

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मैं अपनी महिमा गीत ख़ुद गाकर अपने मुंह मियां मिट्ठू नही बनना चाहता । मैं एक कुर्सी हूँ । मैं एक आम घरों से लेकर आम सभा और लोकसभा तक मौजूद हूँ। मैं , मैं हूँ । मेरी इस दुनिया में कोई सानी नही है । मेरी वजह से लोग सारे रिश्ते नाते भूल जाते हैं । मैं जब चाहू ,जहाँ चाहूँ जो चाहूँ कर सकता हूँ , करवा सकता हूँ । इतिहास गवाह है मैंने हमेशा से हुकूमत किया है ।
और मेरी हुकूमत के किस्से सुनाने को आज का वर्तमान गवाही देगा । लोग मेरी एक अदा पर अपना सर्वस्व लुटा देते हैं । किसी का भी गर्दन काट सकता हूँ कटवा सकता हूँ । वैसे तो मेरे चार पैर दो हाथ हैं पर मेरे पास अपना दिमाग नही होता है यही हमारी परम्परा रही है ,मैं कई रंगों और डिजायनों में पाया जाता हूँ । मैं उस व्यक्ति के अनुसार चलता हूँ , जो मुझपर काबिज होता है ।मेरी वजह से दुनिया में झूठ , फरेब , मक्कारी , भ्रष्टाचार , रिश्वत का बोलबाला है । मैं किसी का बना बनाया काम बिगाड़ सकता हूँ और असंभव सा दिखने वाला काम भी चुटकियों में करवा सकता हूँ । मैंने हमेशा इन तुच्छ मानवों पर अपना अधिकार सिद्ध किया है ,और समय समय पर अपनी महत्ता से अवगत कराया है । मानवों की छोड़ो मैंने देवराज इन्द्र को भी नही बख्शा है । मेरी खासियत यह है कि जिसे एक बार मेरी आदत लग गई वो कभी चैन से नहीं रह सकता है , हमेशा उसे मेरी चिंता रहेगी और मुझे बचाने का प्रयास यथा संभव करेगा । वैसे तो मेरा कोई जात धर्म , चरित्र नही है । जब जिसने मुझे अपनाया मैं उसकी प्राण प्यारी हो गई । मैं उस बाजारू औरत की तरह हूँ जिसे जो चाहे जिस तरह चाहे कीमत अदा कर इस्तेमाल कर सकता है , मेरी भी कीमत है और ये कीमत इस बात से तय होती है कि मैं किस जगह पर हूँ । तो भइया इसके बाद आपको भी ये समझ आ ही गया होगा कि यह दुनिया मेरे बगै़र नही चल सकती है। तो छोड़ो सबको और मेरी शरण में आ जाओ ……… और एकमत होकर मेरी महिमा का बखान करो और जोर जोर से गाओ ……….
इति श्री कुर्सी कथा समाप्त !!!!!!!!!!!!!!!

>चुंबन की आवाज़ और चांटा !

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मुशर्रफ, मनमोहन, ऐश्वर्या राय और सोनिया एक ट्रेन में यात्रा कर रहे हैं।
ट्रेन एक सुरंग से निकलती है ट्रेन में अंधेरा हो जाता है। अचानक वहां एक चुंबन ध्वनि और फिर एक थप्पड़ की आवाज आती है।
ट्रेन सुरंग से बाहर आती है।
सभी चुपचाप बैठे रहते हैं कोई कुछ नहीं बोलता बस कूटनीति से सब मुशर्रफ का चेहरा देखते हैं क्योंकि उसका गाल लाल है।
सोनिया सोच रही है: ये सभी पाकिस्तानी ऐश्वर्य के पीछे पागल हो रहे हैं। सुरंग में उसे चूमने की कोशिश की गई होगी, उसने अच्छा किया जो थप्पड़ मार दिया।
ऐश्वर्या सोच रही है: मुझे चूमने की कोशिश की होगी, लेकिन सोनिया को चूमा और बदले में सोनिया ने थप्पड़ मारा होगा।
मुशर्रफ सोचते है: धिक्कार है, मनमोहन ने ऐश्वर्या चूमने की कोशिश की होगी और उसने मुझे थप्पड़ मार दिया।
मनमोहन सोचते हैं: अगर ट्रेन एक और बार सुरंग से गुजरती है तो मैं फिर से चुंबन की ध्वनी निकाल कर मुशर्रफ को एक और चांटा मार .दूंगा………………….

( अभी -अभी फेसबुक पर रजनीश कुमार झा का यह सुंदर व्यंग हाथ लगा तो सोचे क्यूँ न आप तक पहुँचाया जाए )

>" टेढी बात " कटाक्ष का नया अंदाज ..छा गए गुरु

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राजनीति और अभिनय का अभिन्न सम्बन्ध रहा है । राजनीति करनी हो या अभिनय करना हो दोनों ही टेढी खीर है । एक अच्छा अभिनेता भले ही अच्छा नेता न हो पर यह सौ फीसदी सच है कि हरेक नेता एक बेहतरीन अभिनेता होता है। बात चाहे उसके निजी जिन्दगी की हो या फिर सामाजिक ,राजनितिक जिन्दगी की। एक अभिनेता फिल्मों में अपनी बेहतर अदाकारी से दर्शकों के दिल पर हुकूमत करता है , दीगर बात ये है की वहीँ नेता अपनी अदाकारी से जनता पर अपनी हुकूमत चलाता है। इन दिनों सब पर एक धारावाहिक आ रहा है “टेढी बात ” शेखर , के साथ । क्या बेहतरीन सोच है , देश में फैले भ्रष्टाचार की किस बखूबी से बखिया उधेडी जा रही है! बेशक यह टेलीविजन इतिहास में एक बेहतरीन कदम है । और वो सारे लोग जो इससे जुड़े हैं बधाई के पात्र हैं । लोकसभा चुनाव में हार गए शेखर सुमन अपने प्रतिद्वंदी अभिनेता सह नेता शत्रुघ्न सिन्हा को निश्चय ही लोकप्रियता में मात देने को कमर कस कर खड़े हैं । आगे -आगे देखिये होता है क्या? को हिन्दी साहित्य जगत के प्रतिष्ठित व्यंगकार हरिशंकर परसाईं ने समाज में व्याप्त बुराइयों पर अपनी कलम से करारा प्रहार किया । ठीक उसी शैली में करने का बिदा -बाण से प्रश्न कुरीतियों को बेध कर छिन्न-भिन्न करने का बीड़ा उठाये हुए हैं । प्रश्न जितने सीधे शब्दों में पूछे जायें , जवाब तो टेढा ही मिलेगा ! मैं तो बस इतना कहूँगा – जनता की आवाज ‘शेखू’ जय हो …….. , अभिनेता रूपी नेता को जनता का भय हो ….

>एक व्यंग : एक इन्टरव्यू मेरा भी….

>एक व्यंग : एक इन्टरव्यू मेरा भी….

जब से प्रसारण क्रान्ति आई ,टी०वी० चैनलों की बाढ़ आ गई। जिसको देखो वही एक चैनेल खोल रहा है।कोई न्यूज चैनेल,कोई व्यूज चैनेल।समाचार के लिए ८-१० चैनेल। दिन भर समाचार सुनिए ,एक ही समाचार दिन भर सुनिए। हिन्दी में सुनिए ,अंग्रेजी में सुनिए,कन्नड़ में सुनिए ,मलायलम में सुनिए. यदि आप धार्मिक प्रवृत्ति के हैं तो धार्मिक चैनेल देखिए-आस्था चैनेल देखिए ,संस्कार चैनेल देखिए। यदि आप युवा वर्ग के हैं तो एम०टी०वी० देखिए, रॉक टी०वी० देखिये । यदि आप हमारी प्रवृत्ति के हैं तो दिन के उजाले में भजन-कीर्तन देखिए ,रात के अन्धेरे में फ़ैशन टी०वी० देखिए- अकेले में।मेरी बात अलग है ,मैं अपने अध्ययन कक्ष में रहता हूँ तो फ़ैशन टी०वी० देखता रहता हूँ परन्तु जब श्रीमती जी चाय-पानी लेकर आ जाती हैं तो तुरन्त ’साधना’ चैनेल बदल भजन-कीर्तन पर सिर चालन करता हूँ । इससे श्रीमती जी पर अभीष्ट प्रभाव पड़ता है ।
उन दिनों, जब मैं जवान हुआ करता था तो यह चैनेल नहीं हुआ करते थे और जब मैं जवान नहीं तो १००-२०० चैनेल खुल गये। पॉप डान्स, रॉक डान्स,हिप डान्स,हॉप डान्स। उन दिनों ले-देकर एक ही चैनेल हुआ करता था-दूरदर्शन। शाम को २ घन्टे का प्रोग्राम आता था .आधा घंटा तो चैनेल का ’लोगो’ खुलने में लगता था -सत्यं शिवं सुन्दरम। फिर टमाटर की खेती कैसे करें ,समझाते थे ,धान की फ़सल पर कीट-नाशक दवाईयाँ कैसे छिड़के बताते थे । फिर समाचार वगैरह सुना कर सो जाते थे। सम्भवत: आज की जवान होती हुई पीढी को इस त्रासदी का अनुभव भी नहीं होगा।
इन चैनलों से देश के युवा वर्ग कितने लाभान्वित हुए ,कह नही सकता परन्तु मेरे जैसे टँट्पुजिए लेखक का बड़ा फ़ायदा हुआ।चैनेल के शुरुआत में कोई विशेष प्रोग्राम या प्रायोजक तो मिलता नहीं तो दिन भर फ़िल्म दिखाते रहते हैं,गाना सुनाते रह्ते हैं या किसी पुराने धारावाहिक को धो-पोछ कर पुन: प्रसारण करते रहते हैं।’रियल्टी शो” के लिए कैमेरा लेकर निकल पड़ते हैं गली-कूचे में शूटिंग करने गाय-बकरी-कुत्ते-सूअर-साँड़-भैस।फ़िर चार दिन का विशेष कार्यक्रम बनाएगे दिखाने हेतु। नगर में गाय और यातायात की समस्या, बकरे कि माँ कब तक खैर मनायेगी देखिये इस चैनेल पर…सिर्फ़ इस चैनेल पर ..पहली बार ..ए़क्स्क्लूसिव रिपोर्ट..गलियों में सूअरों का आतंक….सचिवालय परिसर में स्वच्छ्न्द घूमते कुत्ते ,एक-एक घन्टे का कार्यक्रम तैयार…दिन में ३ बार दिखाना है सुबह-दोपहर-शाम …दवाईओं की तरह ..समाज को स्वस्थ रखने हेतु।
एक शाम इसी चैनेल की एक टीम गली के नुक्कड़ पर ’ चिरौंजी” लाल से टकरा गई । संवाददाता संभवत: चिरौंजी लाल का परिचित निकला -’ अरे यार ! चिरौंजी ! तू इधर ? यार तू किधर?
इस इधर-उधर के उपरान्त दोनों अपने पुराने दिनों की यादों में खो गये परन्तु ’मिस तलवार” को याद करना दोनों मित्र नहीं भूले .”मिस तलवार…अरे वही जो…। चेतनावस्था में लौटते ही उक्त संवाददाता महोदय ने अपनी वास्तविक व्यथा बताई।
’यार चिरौंजी ! हिन्दी के किसी साहित्यकार का एक इन्टरव्यू करना है ,मुझे तो कोई मिला नहीं, जितने महान साहित्यकार हैं वो आज-कल विश्व हिंदी सम्मेलन में ’न्यूयार्क’ गये हुए हैं हिंदी की दशा-दिशा पर ,हिंदी को भारत की राष्ट्र -भाषा बनाने के लिये.हिंदी लेखन पर महादशा चल रही है न आज-कल । तू इस गली में किसी लब्ध प्रतिष्ठित हिंदी लेखक को जानता है?
’अरे है न ! पिछली गली में मेरे मकान के पीछे’
’अच्छा! क्या करता है?’
’अरे यही कुछ अल्लम-गल्लम लिखता रहता है ।मैं तो जब भी उसके पास गया हूँ तो निठ्ठ्ल्ला बैठ कुछ सोचता रहता है या लिखता रहता है। डाक्टर ने बताया कि यह एक प्रकार की बीमारी है . भाभी जी कहती हैं घर में काम न करने का एक बहाना है
’ अरे यार ! किस उठाईगीर का नाम बता रहा है ,किसी महान साहित्यकार का नाम बता न।’
अरे तू एक बार उसका इन्टरव्यू चैनेल पर दिखा न ,वह भी महान बन जायेगा. राखी सावंत को नही देखा ?
चिरौंजी लाल के प्रस्ताव पर सहमति बनी. इन्टरव्यू का दिन तय हो गया. तय हुआ कि इन्टरव्यू मेरे इसी मकान पर मेरे अध्ययन कक्ष में होगी.मैने तैयारी शुरु कर दी ,अपने अन्य साथी लेखकों से तथा कुछ कबाड़ी बाज़ार से पुरानी पुस्तकें खरीद कर अपने ’बुक-शेल्फ़” में करीने से सजा कर लगा दी. कैमरे के फ़ोकस में आना चाहिए।कमरे का रंग-रोगन करा दिया। श्रीमती जी ने अपनी एक-दो साड़ी ड्राई क्लीनर को धुलने को दे आईं..इन्टरव्यू में साथ जो बैठना होगा.मैने भी अपना खद्दर का कुरता ,पायजामा,टोपी, अंगरखा, जवाहिर जैकेट ,शाल वगैरह धुल-धुला कर रख लिया .राष्ट्रीय प्रसारण होगा ,दूसरी भाषा के लेखक क्या धारणा बनायेगे हिंदी के एक लेखक के प्रति.। अत: हिंदी की अस्मिता के रक्षार्थ तैयारी में लग गया। कुछ स्वनामधन्य लेखकों के इन्टरव्यू पढे़ ,अखबार की कतरने पढी़
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नियति तिथि पर चैनेल वाले आ गये।कैमरा नियति कोण पर लगाया जाने लगा. फ़ोकस में रहे.माईक टेस्टिंग हो रही थी । आवाज़ बरोबर पकडे़गी तो सही. इन्टरव्यू प्रारम्भ हो गया.
टी०वी०- आनन्द जी ! आप का स्वागत है. आप व्यंग लिखते है? आप को यह शौक कब से है?
श्रीमती जी बीच ही में बात काटते हुए और साडी़ का पल्लू ठीक करते हुए बोल पडी़- ” आप शौक कहते है इसे? अरे रोग कहिए
रोग,मेरी तो किस्मत ही फ़ूट गई थी कि….
“आप चुप रहेंगी ,व्यर्थ में ….’ मैने डांट पिलाते हुए अपना पति-धर्म निभाया
’ हां हां मै तो चुप ही रहूगी ,३० साल से चुप ही तो हूँ कि आप को यह रोग लग गया. भगवान न करे कि किसी कलम घिसुए से…’
’ना माकूल औरत .’- मैने दूसरी बार पति-धर्म क निर्वाह किया
वह तो अच्छा हुआ कि कैमरा मैन ने कैमरा चालू नही किया था ,शायद वह भी कोई विवाहित व्यक्ति था\
मैं – ” हाँ ज़नाब ! पूछिए”
टी०वी०–’आप व्यंग लिखते हैं? आप को यह शौक कब से है??
मैं –” ऎ वेरी गुड क्योश्चन ,यू सी ,एक्चुअली …आई लाइक दिस क्यूश्चन …आई मीन..यू नो..इन हिंदी…’ मैं कुछ कन्धे उचका कर कहने ही जा रहा था कि उस चैनेल वाले ने एक सख्त आदेश दिया -पिन्टू कैमेरा बन्द कर.फ़िर मेरी तरफ़ मुखातिब हुआ
टी०वी०-” सर जी ! आप हिंदी के लेखक हो ,हिंदी में लिखते हो तो इन्टरव्यू अंग्रेजी में क्यों दे रहे हो?
मैं– क्यों? इन्टरव्यू तो अंग्रेजी में तो देते हैं न! देखते नहीं हो हमारे हीरो-हीरोइन सारी फ़िल्में तो हिंदी में करते हैं ,गाना हिंदी मे गाते हैं .संवाद हिंदी में बोलते हैं परन्तु इन्टरव्यू अंग्रेजी में देते हैं.जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती वो भी ..यू सी..आई मीन..बट.आल दो..दैट्स आल….कह कर इन्टरव्यू देते हैं उन्हे तो कोई नहीं टोकता .वो लोग तो हिंदी से ऐसे बचते हैं कि हालीवुड वाला उन्हे कहीं गँवई-गँवार न समझ ले .फ़िर यह भेद-भाव हिंदी लेखक के साथ ही क्यों….?
टी०वी० — वे फ़िल्मों में हिंदी की खाते है आप हिंदी को जीते है.सर आप अपनी तुलना उनसे क्यों करते हैं?
कुछ देर तक तो मुझे यही समझ में नहीं आया कि यह चैनेल वाला मुझे सम्मान दे रहा है या मुझ पर व्यंग कर रहा है
खैर ,इन्टरव्यू आगे बढ़ा
टी०वी०– श्रीमान जी ! आप को व्यंग में अभिरुचि कब जगी?
मैं—- बचपने से.. वस्तुत: मैं पैदा होते ही व्यंग करने लग गया था .सच पूछिए तो मैं पैदाईशी व्यंगकार हूँ जैसे हर बड़ा एक्टर कहता है.बचपन में व्यंग करता था तो मां-बाप की डांट खाता था अब व्यवस्था को आईना दिखाता हूँ तो मार खाता हूँ
टी०वी० — तो आप व्यंग लिखते ही क्यों हो?
मैं – क्या करुँ ,दिल है कि मानता नहीं
फ़लक को ज़िद है जहाँ बिज़लियाँ गिराने की
हमें भी ज़िद है वहीं आशियाँ बनाने की
टी० वी० — आप सबसे ज्यादा व्यंग किस पर करते है?
मैं – – महोदय प्रथमत: आप अपना प्रश्न स्प्ष्ट करें .व्यंग करना और व्यंग लिखना दोनो दो बातें हैं
टी०वी० — मेरा अभिप्राय यह है कि आप सबसे ज्यादा व्यंग किस पर कसते हैं
मैं– श्रीमती जी पर । ज्यादा निरापद वही हैं। पिट जाने की स्थिति में पता नही चलता कि व्यंग के कारण पिटा हूँ या अपने
निट्ठल्लेपन के कारण पिटा हूँ .वैसे मुहल्ले वाले समझते हैं कि मैं अपनी बेवकूफ़ी के कारण पिटा हूँगा
ज़ाहिद व्यंग लिखने दे घर में ही बैठ कर
या वह जगह बता दे जहाँ न कोई पिटता होए
टी०वी० – बहुत से लोग व्यंग को साहित्य की विधा नहीं मानते ,आप को क्या कहना है
मैं — भगवान उन्हे सदबुद्धि दे
टी०वी०– सशक्त व्यंग से आप क्या समझते हैं?
मैं – सशक्त व्यंग कभी भी सशक्त व्यक्ति ,विशेषकर पहलवानों के सामने नहीं करना चाहिए.अंग-भंग की संभावना बनी रहती है.
टी०वी०- हिंदी व्यंग की दशा व दिशा पर आप की क्या राय है?
मैं- व्यंग की दशा पर महादशा का योग चल रहा है और दिशा हास्य की ओर।हास्य-व्यंग के बीच एक बहुत ही पतली रेखा है. आप
के लेखन से यदि आप के पेट में बल पड़ जाये तो समझिए की हास्य है और यदि माथे पर बल पड़ जाए तो समझिए कि
व्यंग है
टी०वी० आप क श्रेष्ठ व्यंग कौन -सा है?
मैं (कुछ शरमाते व सकुचाते हुए) यह प्रश्न तो बड़ा कठिन है .यह तो ऐसे ही हुआ जैसे लालू प्रसाद जी से कोई पूछे आप की इतनी
सन्तानों में सबसे प्रिय़ सन्तान…
टी०वी० फ़िर भी…
मैं अभी लिखा नही
टी०वी० तो भी..
मैं जो टी०वी० पर दिखाई जाए.जिस रचना पे सबसे ज्यादा एस०एम०एस० मिल जाय तो घटिया से घटिया रचना भी श्रेष्ट हो जाती है
टी०वी० सुना है आप ग़ज़ल भी लिख लेते हैं
मैं (कुछ झेंपते हुए) कुछ नहीं बस यूँ ही /वैसे गज़ल लिखी नहीं, कही जाती है.(मैने अपने इल्मे-ग़ज़ल का इज़हार किया।

फ़िर चैनेल वाला श्रीमती जी की तरफ मुखातिब हुआ ।तब तक श्रीमती जी ने अपना पल्लू वगैरह ठीक कर लिया था ताकि
प्रसारण में कोई दिक्कत न हो
टी०वी० भाभी जी ! आप की शादी हो गई है?
श्रीमती जी (शरमाते हुए) आप भी क्या सवाल पूछ रहे हैं ?
टी०वी० हम चैनेल वालों को पूछने पड़ते हैं ऎसे सवाल” इसी बात का प्रशिक्षण दिया जाता है हमें।यदि कोई व्यक्ति पानी में डूब रहा
होता है तो भी हम ऎसे सवाल पूछते हैं हम चैनेलवाले…..भाई साहब ,आप को डूबने में कैसा लग रहा है…
खैर छोड़िए यह व्यक्तिगत प्रश्न .आप बतायें कि आप ने इन में क्या देखा कि आप इन पर फ़िदा हो गई?
श्रीमती जी इनकी अक्ल
मैं हाँ जब आदमी की अक्ल मारी जाती है तभी वह शादी करता है
श्रीमती जी नहीं ,इनका अक्ल के पीछे लट्ठ (व्यंग) लिये फिरना ।पापा की पेन की एजेन्सी थी ,चिरौंजी भाई साहब ने बताया था कि
लड़का कलम क धनी है । पापा ने सोचा कि कलम के धन्धे में इज़ाफ़ा होगा …मुझे क्या मालूम था कि कलम का धनी कलम
घिसुआ होता है …वह तो मेरे करम फ़ूटे थे कि…..
मैं हाँ हाँ मैं ही गया था तुम्हारे पापा के पास…..

सम्भवत: आगामी दॄश्य -श्रव्य की कल्पना कर कैमरामैन ने कैमेरा बन्द कर दिया था । अनुभवी विवाहित व्यक्ति जो था.। शूटिंग
खत्म …इन्टरव्यू खत्म।
जाते -जाते मैने पूछ लिया ,” भाई साहेब ,इस इन्टरव्यू क प्रसारण कब होगा??
टी०वी० सर जी ! अगले सोमवार को प्राइम टाइम नौ बजे…

पाँच साल हो गये वह ’अगला सोमवार नहीं आया। संभवत: वह चैनेल भी बन्द हो गया होगा अब तक तो।
अस्तु

-आनन्द

>एक व्यंग: सुदामा फिर आइहौ….

>सुदामा की पत्नी ने अपनी व्यथा कही ….
‘ हे प्राण नाथ ! या घर ते कबहूँ न बाहर गयो,यह पुरातन फ्रीज़ और श्वेत-श्याम टी०वी० अजहूँ ना बदली जा सकी.पड़ोस की गोपिकाएं कहती हैं ‘हे सखी! आज-कल आप के बाल-सखा श्रीकृष्ण का राज दरबार दिल्ली में है.आप दिल्ली में द्वारिका की यात्रा क्यों नहीं करते? क्यों नहीं मिल आते एक बार ? कम से यह कष्ट तो कट जाते प्राणनाथ!
‘हे प्राणेश्वरी !कितने वर्ष बीत गए. अब कौन पहचानेगा मुझे? बचपन की बात और थी जब हम साथ-साथ गौएँ चराया करते थे और वह चैन की वंशी बजाया करते थे .उनकी बात और है .वह भाग्य के प्रबल हैं.पूर्व में गोपिकाओं से घिरे रहते थे अब सेविकाओं से. हे स्वामिनी! मुझे आवश्यकता नहीं है ‘दिल्ली’ यात्रा की. हम संतुष्ट हैं अपने पुरातन फ्रिज व श्वेत-श्याम टी ०वी० से .क्या हुआ? फ्रिज में पानी ठंडा होता तो है.टीवी में ‘चित्रहार’ रंगोली आती तो है .चित्र हिलता है तो क्या?गाता तो है. अरे बावरी !औरों को गाडी बँगला टेंडर चाहिए ,हम निर्धन ब्राह्मण लिपिकों को लिफाफा बंद दान-दक्षिणा ही पर्याप्त है “-सुदामा ने कहा
कहते हैं सुन्दर स्त्रियों के अमोघ अस्त्र होते है उनके आंसू. एक बार निकले तो उसकी उषणता से पुरुष पिघल जाता है और यदा-कदा चुल्लू भर आंसू में डूब भी जाता है .सब अस्त्र चूक सकते है ,पर यह नहीं.पति नामक निरीह प्राणी फिर समर्पण कर देता है .यही इसका रहस्य है.अंततोगत्वा सुदामा जी को एक आदर्श पति की भांति,पत्नी की बात माननी पड़ी. इच्छा न होते हुए भी ‘दिल्ली’ में द्वारिका की यात्रा करनी पडी सुदामा की पत्नी एक सुयोग्य व विदुषी महिला थी /यात्रा -पथ के लिए उन्होंने पूडी-सब्जी , मिस्थान के अतिरिक्त एक पोटली और तैयार की विशेष रूप से श्री कृष्ण के द्वारपाल को भेंट देने के लिए चल पड़े सुदामा
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‘ऐ ठहरो ! कौन हो तुम? किससे काम है?-द्वारपाल ने बन्दूक की बट टोंकते हुए कड़कती आवाज़ में कहा
”भइए मैं ,मैं हूँ सुदामा.,श्री कृष्ण ले बाल-सखा मित्र से मिलना है ”
” मिलना है? हूँ !”- द्वारपाल ने एक व्यंगात्मक व परिहासजन्य कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए कहा -‘ मिलाना है? अरे ! अपना रूप देखा है?
साहब के बाल-सखा है ! चला आया मिलने ! हूँ ,अप्वांतमेंट लिया है?”-द्वारपाल ने जिज्ञासा प्रगट की.
“ई अपैंत्मेंट का होत है भैया ? हम ठहरे बाल-सखा बाल-सखा सुदामा गोकुल में साथ-साथ गौएँ चराया करते थे ”
” तो जाकर चराओ न , इधर काहे वास्ते माथा खाता है तुम्हारे जैसा दर्ज़नों सुदामा आता है इधर साहब का मिलने वास्ते . साहब तुम जैसे चरवाहों से मिलना शुरू कर देगा कल वह भी उधर गौएँ चराता नज़र आएगा. चलो हटो ! अपना काम करो शीश पगा न झगा तन पे “-द्वारपाल ने सुदामा को परे धकेलते हुए कहा
दीन दुखी सुदामा धकियाये जाने के बाद ,बाहर सीढियों पे बैठ गए.सुदामा जो ठहरे ब्राहमण आदमी ,स्वभावगत भीरू व निश्छल आज तक लाठी-पैना के अतिरिक्त कोई अस्त्र-शस्त्र तो देखा नहीं था ,बन्दूक मशीनगन देख वैसे ही पसीना छूटने लगा मन ही मन कभी स्वयं को ,कभी पत्नी को कोसने लगे.अच्छा-भला ,शान्ति पूर्वक जीवन यापन कर रहा था ,व्यर्थ में फंसा दिया इस माया जाल में .श्वेत-श्याम टी 0 वी० ?अरे नहीं बदलता तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ता ? और एक यह द्वारपाल का बच्चा कि खडा है द्वार पर पहाड़ की तरह .प्रवेश की अनुमति ही नहीं दे रहा है .इसीलिए कहते हैं की स्त्रियों की बात कदापि नहीं माननी चाहिए.साथ ही यदि वह स्त्री चतुर हो तो भूलवश भी नहीं .कहती थी यह पोटली दे दीजियेगा द्वारपाल को.हूँ ! यहाँ गाडी-मोटर वाले को तो कोई पूछता नहीं तो यह पोटली कौन सा तीर मार लेगी.? सुदामा जी ने कुछ साहस बटोर कर एक बार पुन: प्रयास किया .
” भइए ! अपैंतमेंट तो नहीं लाया है ,यह पोटली लाया हूँ तुम्हारे लिए,तुम्हारी भाभी ने दी है.”
द्वारपाल ने ,कक्ष के कोने में जाकर पोटली का थोडा मुख खोला पूर्ण मुख खोलने से आचार-संहिता के उल्लंघन की संभावना थी कर्तव्यनिष्ठा पर आंच आ सकती थी पोटली के भीतर कागज़ के कुछ हरे-हरे व कड़े-कड़े दुकडे नज़र आये. द्वारपाल की आँखों में एक विशेष चमक व चहरे पर एक संतोष भाव उभर आया.
जब वह अपने आस-पास देख ,पूर्ण रूप से आश्वस्त हो गया की यह सुखद क्रिया किसी अन्य आगंतुक ने नहीं देखी तो झट पोटली बंद कर अपने पास रख ली.फिर मुड़ कर वाणी में मिठास घोलते हुए कहा -” तो भईए सुदामा ! दिल्ली नगरी कब पहुँचे? रास्ता में कोई कष्ट तो नहीं हुआ?
सुदामा जी स्तब्ध व अचम्भित हो गए. अभी अभी यह करेला नीम चढा था ‘रसगुल्ला कैसे बन गया? बिनौला था रसीला कैसे हो गया ?
सुदामा जी ब्राह्मण ठहरे ,द्रवीभूत हो गए.’भईया’ कितना प्यारा सम्बोधन दिया है.अपनापन उभर आया होगा . काश! धर्मपत्नी की बात मान पहले ही यह पोटली भेंट कर दी होती. परन्तु क्या था उस पोटली में की वाणी में मिठास आ गयी ? अवश्य ही नए गुड की डली रही होगी.पत्नी ने हमी से छुपाई थी यह बात . हो सकता है द्वारपाल महोदय पिघल गए होंगे . हमने भी तो भाभी का रिश्ता देकर सौंपी थी. पोटली आहा ! क्या द्वापर युग है .भेंट-दक्षिणा ‘द्वार पर ‘से ही शुरू.
सुदामा जी को मालूम नहीं ,कौन सी ‘विलक्षण’ वास्तु उस पोटली में हमें ज्ञात नहीं.यह रहस्य मात्र दो व्यक्ति जानते थे -एक द्वारपाल और दूसरे सुदामा की पत्नी.
उक्त पोटली के प्रभाव से सुदामा जी अन्दर पहुँच गए.
अन्दर ,श्रीकृष्ण जी ,मसनद के सहारे ,केहुँनी टिकाए लेते हुए हैं.अब मोर -मुकुट पीताम्बर की जगह खद्दर का कुरता,पायजामा ,जवाहर जैकेट , गांधी-टोपी है.अब छछिया भरी छाछ पे नहीं नाचते हैं ,अपितु कोटा-लाइसेंस के लिए अपने भक्तों को नचाते हैं .माखन की गगरी में नहीं ,वोट की नगरी में सेंध लगाते है.फल-फूल रखा है,अधिकारी ,व्यापारी,दरबारी घेरे खड़े हैं.कई सुदामा अपनी-अपनी झोली फैलाए खड़े है.किसी को तबादला करवाना है,किसी को तबादला रुकवाना है.किसी को परमिट चाहिए ,किसी को कोटा,बड़े लडके को मेडिकल में एड्मिसन दिलाना है.साहब एक संस्तुति -पत्र लिख दें तो कार्य सिद्ध हो जाएगा.भीतर चकाचौंध है.कुछ झोलाधारी,कुछ चश्माधारी .कुछ दाढ़ी बढाए ,कुछ मुंह लटकाए.कुछ स्वस्तिवाचन करते .कुछ स्तुतिगान करते.खड़े है
” सर ! आप तो जानते हैं कि कितने वर्ष से इस पार्टी कि निस्वार्थ सेवा कर रहा हूँ सर! एक गैस एजेन्सी मिल जाती तो ….. टेलीफोन कि घंटियाँ बज रही है टेलीफोन आ रहा है….टेलीफोन जा रहा है…….’हेलो हेलो …मैं मंत्री निवास से बोल रहा हूँ …हेलो हेलो आप सुन रहे हैं ना ….साहब की इच्छा है ……साहब चाहतें हैं …..आप सुन रहे हैं ना….साहब ने पूछा है….साहब कह रहें हैं…..साहब माँगते है……अच्छा ऐसा कर दीजिएगा ….नहीं नहीं ….लगता है…आप सुन नहीं रहे हैं…..टिकना मुश्किल हो जाएगा आप का ……आप दिल्ली आकर मिलिए …
दरबार चल रहा है.चर्चा चल रही है देश की..विदेश की . ‘गोकुल’ की नहीं “अयोध्या’ की .’मथुरा ‘ की नहीं ‘राम-जन्म भूमि’ की. ‘राधा’ की नहीं ‘छमिया ‘ की.ग्वाल-बाल की नहीं ‘मंडल ‘की वैसे साहब का अपना ‘बरसाना ‘ भी है
एक कोने में ‘सुदामा जी’ निरीह व निस्वार्थ भाव से औचक खड़े है. आज के कृष्ण सुदामा को नहीं पहचानते.अब दौड़ कर नहीं आते.बहुत सुदामा पैदा हो गए हैं.तब से अबतक .दिल्ली में सुदामा का पहचानना आवश्यक भी नहीं .पांच साल में मात्र एक बार तो पहचानना है ,जा कर पहचान लेंगे निर्वाचन क्षेत्र में पखार लेंगे पाँव एक बार
सुदामा जी के मुख पर संकोच का भाव है .यहाँ लोग कितने मिस्थान के पैकेट लाएं है और एक मैं कि कुछ नहीं लाया एक पोटली लाया भी था तो उस द्वारपाल के बच्चे ने रख लिया .विगत पचास-साठ साल से दिल्ली के किसी कोने में भारत का सुदामा आज भी खडा है ,अपने श्रीकृष्ण से मिलने के लिए .आज भी सुदामा दीन-हीन निरुपाय है आज भी ” शीश पगा न झगा तनte पे ‘है
साहब उठ गए.दरबार ख़त्म हो गया अन्य लोग भी उठ कर जाने लगे.साहब को किसी जन सभा में जाना है .भाषण देना है भारत कि दीन-हीन गरीबी पर.उनकी झोपडी पर जहाँ विकाश का रथ अभी तक नहीं पहुंचा है.उन गरीब भाइयों पर जहाँ अँधेरा है.भीड़ चल रही है .एक युवा तुर्क व्यक्ति आगे-आगे रास्ता बनाते चल रहा है …’हटिये हटिये …जरा बाएँ हो जाएँ…भाई साहब …भीड़ मत लगाइए ..अभी साहब को जाना है..’- भीड़ छंट कर अगल-बगल हो जाती है कि अचानक साहब कि दृष्टि सुदामा पर पड़ती है
‘अरे सुदामा! ? कब आए?’
‘दर्शन करने आ गया सखे !’- वाणी में विह्वलता व ह्रदय में प्रेम भर कर सुदामा ने कहा
‘ ओ० के० ओ० के० फिर मिलना ‘
भीड़ सुदामा को पीछे धकेलते आगे बढ़ जाती है
०० ००० ००००
सुदामा का भ्रम टूट गया.सखापन वाष्प बन कर उड़ गया .मन भारी हो गया.अंतर्मन आर्तनाद से भर उठा.गला रुंध गया आँखों में प्रेम के आंसू छलछला गए.
धीरे -धीरे बोझिल कदमों से बाहर आ गए
‘ भैये भेंट हो गयी अपने बाल-सखा से ?–द्वारपाल ने जिज्ञासा प्रगट की
सुदामा बंगले की सीढियां उतरते सड़क पर आ गए
” फिर आईहौ लला ! पोटली लाना न भूलिअहौ”- द्वारपाल ने आवाज़ लगाईं
अस्तु!

—-आनंद

>एक व्यंग : कुत्ता बड़े साहब का …..

>एक व्यंग : कुत्ता बड़े साहब का …..
वह बड़े साहब हैं.बड़ी -सी कोठी,बड़ी-सी गाडी, बड़ा-सा मकान ,बड़ा -सा गेट और गेट पर लटका बड़ा-सा पट्टा-‘बी अवेयर आफ डाग” कुत्ते से सावधान सम्भवत: बड़ा होने का यही माप-दण्ड हो. चौकीदार चपरासी अनेक ,पर साहब एक मेंम साहिबा एक .परन्तु मेंम साहिबा को एक ही दर्द सालता था हिंदी के प्रति हिंदी के व्याकरण के प्रतिहिंदी में “कोठी” का बड़ा रूप “कोठा” क्यों नहीं होता ?हम मेंम साहिबा का दर्द महसूस करते हैं परन्तु उनकी मर्यादा का भी ख्याल रखते हैं.
परन्तु मोहल्ले के मनचले कब ख्याल रखते हैं.कल साहब के साला बाबू व जमाई बाबू गर्मियों की छुट्टियां व्यतीत करने आये थे बाहर-भीतर चहल-पहल थी लोग स्वागत-सत्कार में व्यस्त हो गए.मगर मनचले! मनचलों ने ‘कुत्ते से सावधान’ में ‘कुत्ते’ के आगे एक ‘ओ’ की मात्रा वृद्धि कर दी -‘कुत्तों से सावधान’ नहीं नहीं यह तो ज्यादती है ‘साला’ और ‘जमाई’ ही तो आये हैं और यह बहु-वचन.!
प्राय: जैसा होता हैं. एक बार पट्ट टंग गया तो टंग गया .कौन पढ़े रोज़ रोज़ !ऐसा ही चलता रहता अगर उस दिन कमिश्नर साहब ने टोका न होता
” अरे सक्सेना ! कितने कुत्ते पाल रखे हो ?”
” नो सर ,यस सर,यस सर ,हाँ सर!एक मैं और एक मेरा कुत्ता सारी सर मेरा मतलब है कि मैं और कुत्ता
बड़े साहब ने अपनी अति विनम्रता व दयनीयता प्रगट की.
नतीजा? भूल सुधार हुआ और एक चपरासी की छुट्टी .
मनचले तो मनचले .एक दिन रात के अँधेरे में ‘कुत्ते से सावधान ‘ के नीचे एक पंक्ति और जोड़ दी …” और मालिक से भी”. लगता है इन निठ्ल्लुओं को अन्य कोई रचनात्मक कार्य नहीं .व्यर्थ में मिट्टी पलीद करते रहते हैं. खैर सायंकाल साहब की दृष्टि पडी ,भूल सुधार हुआ परन्तु बोर्ड नहीं हटा. संभवत: बोर्ड हटने से साहब श्रीहीन हो जाते ,कौडी के तीन हो जाते,जल बिनु मीन हो जाते .
साहब ने नीचे की पंक्ति क्यों मिटवाई? आज कल तो ‘शेषन’ को बुल डाग एल्सेशियन क्या क्या नहीं बोलते हैं !जितना बड़ा पद,उतना बड़ा विशेषण, उतनी बड़ी नस्ल . और एक हम कि हमें कोई सड़क का कुत्ता देशी कुत्ता ,खौराहा कुत्ता भी नहीं कहता .इस जनम में तो ‘शेषन’ बनने से रहा .लगता है यह दर्द लिए ही इस दुनिया से ‘जय-हिंद’ कर जाऊँगा .हाँ यदा-कदा श्रीमती जी झिड़कती रहती हैं -क्या कुत्ते कि तरह घूमते रहते हो मेरे आगे -पीछे …” मगर यह एक गोपनीय उपाधि है
साहब लोगों के कुत्ते होते ही हैं विचित्र विकसित मेधा-शक्ति के. आदमी पहचानते हैं,’सूटकेस’ पहचानते हैं ‘ब्रीफ केस’ पहचानते हैं .यदा-कदा साहब की कोठी पर आगंतुक सेठ साहूकारों की ‘अंटी’ व अंटी का वज़न भी जानते हैं.कहते हैं इनकी घ्राण-शक्ति अति तीव्र होती है .बड़े साहब से भी तेज़ .आप अन्दर दाखिल हुए नहीं कि वह तुंरत दौड़ कर आप के समीप आएगा ,आप को सूंघेगा,अंटी सूंघेगा सूटकेस सूंघेगा.माल ठीक हुआ तो तुंरत आप के श्री चरणों में लोट-पोट हो जाएगा .कूँ-कूँ करने लगेगा पूँछ हिलाने लगेगा कभी दौड़ कर साहब के पास जाएगा ,कभी आप के पास आएगा बरामदे में बैठा साहब संकेत समझ जाएगा.खग जाने खग की भाषा ” “आइए आइए ! इतना भारी ‘सूटकेस ‘उठाने का कष्ट क्यों किया ,कह दिया होता तो ……”
और साहब बड़े सम्मान व प्रेम से आप को सीधे शयन कक्ष तक ले जाएंगे
उस दिन ,हम भी साहब की कोठी पर गए थे .व्यक्तिगत समस्या थी.स्थानांतरण रुकवाने हेतु प्रार्थना पत्र देना था.प्रार्थना-पत्र हाथ में था .सोचा प्रार्थना करेंगे ,साहब दयालु है ,संभवत: कृपा कर दें
सहमते-सहमते कोठी के अन्दर दाखिल हुआ ‘बुलडाग’ साहब दौड़ कर आए आगे-पीछे घूमे,कुछ अवलोकन किया ,कुछ सूँघा कि अचानक जोर-जोर से भौकना शुरू कर दिया .संभवत: संकेत मिल गया ,मैं विस्मित हो गया .
“बड़े बाबू! कितनी बार कहा हैं कि आफिस का काम आफिस में डिस्कस किया करो /सारी आई ऍम बिजी “- कह साहब अन्दर चले गए
” सर! सर! ….” मैं लगभग गूंगियाता ,धक्के खा कर फिंके जाने की स्थिति में आ गया
काश ,मेरे पास भी ब्रीफकेस होता
० ०० ०००
मन आहात हो गया .कुत्ते ने क्या संकेत दिया ? वह बड़े साहब हैं तो क्या हुआ ? हम भी बड़े बाबू हैं .दो-चार लोग हमारे भी अधीनस्थ हैं.अत: मैंने भी एक कुत्ता पाल लिया बिलकुल शुध्द ,भारतीय नस्ल का स्वदेशी ,देश की माटी से जुड़ा,अपनी ज़मीन का
अपने हे परिवेश अपनी ही संस्कृति का कम से कम उचित संकेत तो देगा
उस दिन एक पार्टी (क्लाइंट?) आई थी.कुछ सरकारी कार्य करवाना था फाइल रुकी थी बढ़वाना था .मेरा ‘शेरू ‘दौड़ कर आया ,आगे -पीछे घूमा सम्यक निरीक्षण किया ,कुछ सूँघा .जब आश्वस्त हो गया तो ‘क्लाइंट’ के श्री चरणों में लोट-पोट हो कूँ -कूँ करने लगा मन प्रफ्फुलित हो गया ‘शेरू’ ने सही पहचाना मैं अविलम्ब उसे अपने बैठक कक्ष में ले गया स्वागत-भाव,आतिथ्य -सत्कार किया
चाय-पानी ,नाश्ता-नमकीन ,मिठाई प्रस्तुत किया उनका कार्य समझा ,आश्वासन दिया बदले में वह जाते-जाते एक लिफाफा थमा गए–“
पत्रं-पुष्पं हैं बच्चों के लिए “
‘हे! हे! इसकी क्या ज़रुरत थी ? -मैंने विनम्रता पूर्वक .ससंकोच लिफाफा ग्रहण कर लिया
जल्दी-जल्दी विदा कर लिफाफा खोला देखा पांच-पांच के पांच नोट स्साला ,काइयां तीस रुपये की तो मिठाई -नमकीन खा गया और यह स्साला ‘शेरू’? कुत्ते की औलाद /देशी नस्ल स्साला गंवई का गंवई रह गया पार्टी भी ठीक से नहीं पहचानता लात मार कर भगा दिया उसी दिन उसे

० ०० ०००

अगले दिन साहब ने अपने कार्यालय -कक्ष में बुलाया–” बड़े बाबू ! सुना है तुम ने भी एक कुत्ता पाल रखा है “—बड़े साहब ने चश्में के ऊपर से देख एक कुटिल व व्यंगात्मक मुस्कान उड़ेलते हुए कहा
” नो सर! यस सर! हाँ सर! “- मैंने लगभग घिघियाते हुए कहा -” सर कल शाम ही उसे लात मार भगा दिया गंवई नस्ल का था स्साला क्लाइंट भी ठीक से नहीं पहचानता था “
” करने को क्लर्की और शौक अफसराना” –बड़े साहब ने कहा
खैर ज़नाब ! कुत्ता पालने का अधिकार तो बड़े साहब लोगो को है जब तक पद है ,कुर्सी है तब तक कुत्ते की आवश्यकता है ,जानवर की शकल में हो या आदमी ,चमचे(दलाल) की शकल में क्लाइंट पहचानना है इसीलिए आज भी बोर्ड टंगा है —
“कुत्ते से सावधान ‘

–आनंद

>व्यंग : एक ग़ज़ल की मौत …

>विवाहित कवियों को जो एक सुविधा सर्वदा उपलब्ध रहती है और अविवाहित कवियों को नहीं – वह है एक अदद श्रोता और वह श्रोता होती है उनकी श्रीमती जी -अभागिन अभागिन इसलिए कि वह हमारे जैसे चिरकुट कवि की धर्मपत्नी होती है अगर वह किसी हवलदार की पत्नी होती तो वह हमसे ज्यादा ही कमा कर लाता इसीलिए वह आजीवन अपने भाग्य को कोसती रहती हैं एक वह दिन कि आज का दिन वह तो विधि का विधान था कि इस कलम घिसुए कवि से शादी हुई कौन मिटा सकता है इसे.!हर कवि की आदि श्रोता वही होती है और अंतिम श्रोता भी वही -बेचारी उधर किसी गीत का मुखडा बना नहीं कि कवि महोदय के पेट में प्रसव-पीडा शुरू हो जाती है- कब सुनाए ,किसे सुनाए उस समय तो कोई मिलता है नहीं अत: पत्नी को ही आवाज़ लगाते हैं -‘अरे ! भाग्यवान ! इधर तो आना एक गीत सुनाता हूँ –

‘रोटी कपडा और मकान
कवियों का इस से काम
रोटी कपडा और मकान “

‘बोलो कैसी लगी ?’- कवि महोदय ने समर्थन माँगा
पत्नी इस कविता का अर्थ नहीं ,मर्म समझती है -अपना निठ्ठ्ल्लापन ढांप रहा है यह आदमी.जल्दी रसोई घर में भागती है .तवे पर रोटी छोड़ कर आई थी. रोटी पलटनी थी . देखा रोटी जल गई . सोचती है -क्या जला? रोटी ,दिल या अपना भाग्य? इनकी कविता सुनते-सुनते काश ! कि हम बहरे होते
ऐसी ही एक प्रसव-पीडा एक कवि जी को रात २ बजे हुई कि सोती हुई पत्नी को जगा कर एक अंतरा सुनाने की चेष्टा की थी.पत्नी ने उनके मुख पर तकिया रख कर दबा दिया फिर सारे अंतरा-मुखडा सुप्त हो गए कहते हैं कि वह एक विदुषी महिला थीं
परन्तु अविवाहित कवियों को एक जो सुविधा सर्वदा उपलब्ध होती है वह विवाहित कवियों को आजीवन उपलब्ध नहीं होती . चाहें तो वाजपेई जी से पूछ सकते हैं और वह सुविधा है रात्रि शयन में खाट से उतरना अविवाहित कवि स्वेच्छा से जिस तरफ से चाहें उतर सकता है वह स्वतंत्र है स्वतंत्र लेखन करता है यह स्वतंत्रता विवाहित कवियों को नहीं है यही कारण है की विवाहित कवि या तो ‘वाम-पंथी’ विचारधारा के होते हैं या फिर ‘दक्षिण-पंथी’ विचारधारा के होते है जो खाट से उतरते ही नहीं वह ‘निठ्ठल्ले” कवि होते हैं -नाम बताऊँ?
मगर शायरों की बात अलग है. एक बार ऐसा ही जच्चा वाला दर्द मुझे भी हुआ था . शे’र बाहर आने के लिए कुलांचे मार रहा था’ ‘मतला’ हो गया (मिचली नहीं) .सोचा नई ग़ज़ल है .बेगम को सुनाते है –
तुमको न हो यकीं मगर मुझको यकीन है
रहता है दिल में कोई तुझ-सा मकीन है
‘यह यकीन कौन है?कोई कमीन तो नहीं ? -बेगम ने शक की निगाह से पूछा
दिलखुश हो गया. चलो एक लफ्ज़ तो ऐसा लिखा जिसका मायने इन्हें नहीं मालूम. वज़नदार शे’र वही जिसका न तासीर समझ में आये न अल्फाज़ .लगता है शे”र अच्छा बना है मैंने बड़े प्यार से समझाया- ‘मकीन माने जो घर में रहता है मकान वाला -उर्दू में मकीन बोलते हैं . उन्हें मेरे उर्दू की जानकारी पर फक्र हुआ हो या न हुआ हो मगर शुबहा ज़रूर हो गया की हो न हो मेरे दिल में उनके अलावा और भी कोई रहता है .मेरा कहीं लफडा ज़रूर है
यकायक चिल्ला उठी – मुझे तो पहले से ही यकीन था की ज़रूर तुम्हारा कहीं लफडा है आपा ठीक ही कहती थी कि ये शायर बड़े रोमानी आशिकाना मिजाज़ के होते हैं .इश्किया शायरी की आड़ में क्या क्या गुल खिलाते है ज़रा इन पर कड़ी नज़र रखना लगता है आपा ने ठीक ही कहा था
‘ बेगम तुम औरतों के दिमाग में बस एक ही बात घूमती रहती है अरे! इस शे’र का मतलब समझो ,शे’र का वज़न देखो -शायर कहना चाहता है की या अल्लाह ,परवरदिगार मेरे ,आप को यकीन हो न हो परन्तु हमें पूरा यकीन है की मेरे दिल में आप की मानिंद एक साया इधर भी रहता है
अभी मैं समझा ही रहा था की बेगम साहिबा बीच में ही चीख उठी -” चुप रहिए! हमें चराने की कोशिश न कीजिए .हम वो बकरियां नहीं कि आप चराएं और हम चर जाएँ. आप क्या समझते हैं की हमे आप की नियत नहीं मालूम !,नज़र किधर है नहीं मालूम !हमे सब मालूम्हें .अरे! यह शायर लिखते तो है अपने उस ‘छमक-छल्लो’ के लिए और नाम लेते है ‘खुदा’ का . अल्लाह का > अरे कमज़र्फ़ आदमी !शर्म नहीं आती परवरदिगार को बीच में लाने पर.
” कौन है वह?’-उन्होंने गुस्से में आँख तरेरते हुए पूछा
‘कौन? -मैंने सकपकाते हुए पूछा
‘ अरे! वही कलमुंही ,मकीन,कमीन यकीन जो भी नाम हो उसका जो तुम्हारे दिलमें दिल-ओ-जान से रहती है ?’
‘लाहौल विला कूवत. लानत है तुम्हारी समझदारी पर ‘
‘हाँ हाँ !अब तो लानत भेजोगे ही मुझ पर जब शादी कर के लाए थे तब लानत नहीं भेजी थी ‘
‘बेगम साहिबा ! तुम तो समझती ही नहीं ‘
‘हाँ हाँ अब मैं क्यों समझने लगूं. तुम क्या समझते हो कि हमें शे’र समझने की तमीज नहीं !अरे! हमने भी कमेस्ट्री से एम० ए० किया है हम ने भी हाई स्कूल तक हिंदी पढ़ी है .खूब समझती हूँ तुम्हारी ग़ज़ल और ग़ज़ल की असल ….
फिर क्या होना था .वही हुआ जो ऐसे मौके पर हर पत्नी करती है -रोना-धोना सर पीटना (अपना) अचूक अस्त्र अचूक निशाना
अब ग़ज़ल का अगला शे’र क्या सुनाना
०० ०० ००००००
शायरों की यही तो कमज़ोरी है .इस तरह की दाद पर मायूस हो जाएं तो हो चुकी शायरी अरे! शायरी तो दीवानापन है ,बेखुदी है.सड़े अंडे-टमाटर की परवाह कौन करे मजनू ने की थी क्या? महीने गुज़र गए अब तक तो बेगम का गुस्सा भी ठंडा हो गया होगा चलते हैं दूसरा शे’र सुनाते हैं –
ताउम्र इसी बात की जद्द-ओ-ज़हद रही
अपनी ज़मीन है या उनकी ज़मीन है
अभी शे’र का काफिया ख़त्म भी न हुआ था की बेगम साहिबा एक बार फिर भड़क उठी -“हाय अलाह !अब ज़मीन जायदाद भी उसके नाम कर दिया क्या! “
“अरे! चुप ,किस की बात कर रही हो तुम?”
“अरे! तुम्हारे कमीन – मकीन की “
“या अल्लाह इस नाशुक्री बीवी को थोडा-सा अक्ल अता कर वरना तुम्हारा यह शायर इस कमज़र्फ़ बीवी के हाथों ख्वामख्वाह मारा जाएगा मैंने तो यह शे”र तुम्हारी शान में पढा था यह जिस्म यह जान किस की है ..अपनी या तुम्हारी ….”
“पहले ज़मीन-जायदाद का कागज़ दिखाओ ..ज़रूर उस सौतन को लिखने का इरादा होगा ….” बेगम साहिबा ने मेरा हाथ ही पकड़ लिया
अब इस शे’र के मानी क्या समझाते अगला शे’र क्या सुनाते चुप ही रहना बेहतर समझा
०० ०००००००००
अब मैंने यह तय कर लिया की अब इस औरत को न कोई शे’र सुनाना, न कोई ग़ज़ल इस से अच्छा तो किसी चाय की दुकान पे सुनाते तो कम से कम चाय तो मिलती.घर की मुर्गी साग बराबर .इस औरत के लिए तो घर का जोगी जोगडा …इसे मेरी औकात का क्या पता आज शाम नखास पर मुशायरा है बड़े अदब से बुलाया है उन लोगो ने अपनी शेरवानी निकाली.चूडीदार पायजामा पहना,फर की टोपी पहनी ,आँखों में सुरमा लगाया ,कानो के पास इतर लगाया ,करीने से रुमाल रखा.फिल्मवालों ने यही ड्रेस कोड तय कर रखा है हम जैसे शायरों के लिए .शायरी में दम हो न हो मगर ड्रेस में तो दम हो .
कवि की बात अलग है ,शायरी की बात अलग वीर रस के कवि हैं तो मंच पर आये ,हाथ-पैर पटक गए,श्रृंगार रस के कवि हैं तो आए और लिपट गए, रस के कवि हैं तो रो-धो कर निपट गए मगर शायरी ! शायर को एक एक शे’र तीन-तीन बार पढ़ना पड़ता है फिर देखना पड़ता है किधर से गालियाँ आ रही है ,किधर से तालियाँ .हम गुमनाम शायरों के लिए सड़े अंडे-टमाटर तो छोड़ दीजिए यहाँ भी ‘ब्रांड-वैल्यू’ बिकता है नामचीन शायर है तो मंच पर आने से पहले ‘तालियाँ बजती हैं ,हम जैसों के लिए जाने के बाद ‘तालियाँ’ बजती है -गया मुआ ! पता नहीं कहाँ -कहाँ से पकड़ लाते हैं यह प्रोग्राम वाले.
अब तो ड्रेस पर ही भरोसा था .शीशे के सामने खड़े हो कर शे’र अदायगी का रिहर्सल कर रहा था –
दीदार तो नहीं है चर्चे मगर सुने –
वह भी किसी हसीं से ज्यादा हसीन हैं

पीछे से किसी ने ताली बजाई ,सामने से मैंने शुक्रिया अदा किया .मुड़ कर देखा बेगम साहिबा हैं.-‘वाह ! वाह ! सुभान अल्लाह !सुभान अल्लाह !क्या शे’र मारा है .अब जाओ दीदार भी कर लो ,बेकरार होगी .कब्र में पाँव लटकाए बैठे है ज़नाब की न जाने कब फाख्ता उड़ जाय …वह भी हसरत पूरी कर लो ….’-बेगम साहिबा ने भडास निकाली .
‘बेगम ! किसकी बात कर रही हो?’
‘अरे! उसी कलमुंही कमीन मकीन की.हसीन हैं न ! हम से भी ज्यादा हसीन है न ‘
‘लाहौल विला कूवत ! कमज़र्फ़ औरत! शे’र समझने की तमीज नहीं तमीज होगी भी कैसे -सास बहू सीरियल देखने से.टेसूए बहाने से .किट्टी पार्टी करने से फुरसत होगी तब न ,शायरी समझने की तमीज आयेगी ‘
‘हाँ हाँ ,हमें क्यों तमीज आयेगी ! सारी तमीज या तो उस छमकछल्लो के पास है या आप के पास है ‘
‘बेगम ! इस शे’र का मतलब तुम नहीं समझती हो ,इस का मतलब है या मेरे मौला ,परवरदिगार जिन्दगी गुजर गयी मगर आज तक दीदार नहीं हो सका ,मगर खुदा के बन्दे बताते है की आप इस ज़हान के सब से खूबसूरत हसीन …..’
देखिए जी .कहे देती हूँ !हमें इतनी भोली मत समझिए ,हमारे अब्बा ने मुझे भी तालीम दी है ,हमें भी अदीब की जानकारी है हम उड़ती चिडिया के पर गिन सकते हैं ,खुली आँखों से सुरमा चुरा सकते हैं आप हम से नज़रें नहीं चुरा सकते हैं …..वो तो मेरे करम ही फूटे थे की……’-कहते -कहते रो पडी

फिर उसके बाद क्या हुआ ,विवाहित पाठकों की कल्पना पर छोड़ देता हूँ वहां से जो भागा तो मुशायरे में जा कर ही दम लिया .पूरी ग़ज़ल वहीँ पढ़ी -गालियाँ मिली या तालियाँ आप स्वयं ही समझ लें
अस्तु

-आनंद —

>बेचारा पप्पू …….. शायद कभी पास नहीं होगा !

>

बचपन से ही शर्मीला किस्म का इंसान। लड़कियां तो दूर लड़कियों के शब्द से भी सिरहन सी होने लगती। दोस्त कई सारे हुए मगर सभी समान लिंग वाले। इसका कदापि मतलब नहीं की उसमें ‘दोस्ताना’ वाले लक्षण शामिल थे, बल्कि वह अभी नाबालिग था। दसवीं तक यहीं दौर चला। पढ़ाई में भी कुछ खास न था। अव्वल आता परन्तु पीछे की तालिका से घरवाले भी काफ़ी परेशान रहते। खेल खेलना भी पसंद नहीं करता। अगर मन में कभी खेल भावना हिचकोले भी मारती तो घर वाले ताना देते। हर वक्त खेल, इसलिए तो पढ़ाई में अव्वल आते हो वह भी पीछे की दिशा से। तुम्हारा तो अब भगवान ही मालिक है। ताने सुनता रहा तुलना औरों से होती रही। देखो उस समीर को फर्स्ट लाया है अपने बाप का नाम रौशन किया है। दर्द असहनीय होता गया। मन में क्षोभ जन्म लेने लगे। बेचारा था… पप्पू ही रहा। दसवीं के परिणाम ने एक बार फ़िर से निराशा के अंधेरे में ढकेल दिया। लेकिन घर में एक मां थी जिसने हर वक्त पुचकारा, गलतियों पर पर्दा डालती रही। जानती थी, वह भी उसकी कोख से जन्मा उसके कलेजे का टुकड़ा रहा। उस बेचारे की तरपफदारी में कभी-कभार आक्षेप के दंश को भी हंसकर सहन करने से न कतराती। मां जो ठहरी, विशाल हृदय होना तो लाजमी ही था। बाप की तरह पत्थर दिल की संस्कृति हमारे भारतीय सभ्यता में नहीं देखी गई है। और अपनी ही छवि धूमिल होता देख कहाँ चुप रह पाती।
दसवीं के बाद किसी प्रकार उसे मॉडर्न स्कूल में डाल दिया गया। ताकि संकुचित मस्तिष्क में पड़ी धुल छट सके। इस दौरान उसे प्रेम का मतलब पता चला। आकर्षण किसे कहते है, बोध् होने लगा। एक लड़की से मन ही मन प्यार करने लगा। बेचारा शर्मीला जो ठहरा। कहने की हिम्मत कहा थी। लेकिन एक बात तो उसमें थी कि वह अपने सभी बातों को बेधड़क दोस्तों से कह देता। उसे शहर की हवा भी नहीं लग पाई थी। क्योंकि जहां वह रहता था उसे गांव कहा जाता। गांव की संस्कृति में पला-बढा जहां हर पड़ोसी में रिश्ते-नाते तलाश लेता। किसी को चाचा-चाची, मामा-मामी, दीदी-भैया और बहन बना लेता। और एक बार जो मन में बिठा लेता, दूर-दूर तक उस पर कुदृष्टि नहीं डालता। लेकिन जहां वो पढ़ने के लिए मॉडर्न स्कूल जाता था। आस-पास का वातावरण शहर के माहौल में पूरी तरह ढल चुका था। सामने खुलने वाले दरवाजों के बीच रिश्ते तो दूर की बात, एक-दूसरे को जानते तक नहीं। मुसाफिर को घर तलाशने में भी काफी मसक्कत करनी पड़ती थी।
घर से निकलता स्कूल बस पर और संध्या को सीधे उसी गांव के वातावरण में। उसने प्यार तो सीख लिया पर प्यार के अलावा कुछ नहीं सीखा, जो आज के महानगरों के बच्चे कक्षा सांतवी से ही जान चुके होते है। न तो लड़कियां रिझाने के तौर-तरीके से ही वाकिपफ था, उसके बाद की परिकल्पना की तो बात ही छोड़ दें।
इसी क्रम में बेचारे के दो साल भी बीत गया। और होना क्या था, बारहवीं का परिणाम सामने। परिवार वालों का शोर कानों में लाउडस्पीकर की तरह एक बार पिफर बजने लगा। इसका कदापि तात्पर्य नहीं कि वह फेल हो गया था। बल्कि प्रथम से दो अंक पीछे रहकर द्वितीय श्रेणी का खिताब तो अवश्य ही पा लिया था। सब ने कहां अब क्या करोगे? उसने कहां तैयारी मेडिकल की करूंगा, शायद डॉक्टर बन जाउंफ। कॉनपिफडेंस लूज जो ठहरा। मेडिकल की तैयारी के लिए कोचिंग में दाखिला लिया पर उसकी अजीबो-गरीब सी पढ़ाई ने उसे और असमंजस में डाल दिया। यह भी एक साल यूँ ही जाता रहा। एक बात अवश्य रही इस बार उसे प्रेम का मोह मन में नहीं पनप पाया।
निराश लौट आया द्घर को खुद को कोसते हुए। परिवार वालों ने कोसा, वो अलग। पढ़ाई से मानो अब मन ही उचट गया था। बिजनस में जाने का मन बना लिया। द्घर वालों ने भी प्रोत्साहन देने के बजाय एक बार पिफर से पढ़ाई की दल-दल में झोक दिया। कहां अभी पढ़ो बिजनस करने की उम्र अभी बहुत बची है। पास के कॉलेज में दाखिला लिया ताकि स्नातक की खानापूर्ति हो सके। इसी बीच बेचारे को दिल्ली द्घूमने का मौका मिला। वहां की दौड़ती भागती जिंदगी से कापफी प्रभावित हुआ। रोज नए-नए हुस्न के दर्शन और उससे पनपते आकर्षण ने दिल्ली में रहने की ललक जगा दी। दिल्ली में रहना कोई आसान नहीं था। मंहगा शहर था। वो दक्षता भी नहीं थी जिससे की वह खुशहाल जिंदगी अपनी बना सके। अचानक उसके जेहन में कई सारे रंगीन सपनो ने जगह बनाना शुरू कर दिया। मन से एक आगाज उठने लगा, कहने लगाः-
”देश के लिए कुछ करूं या तो नाम कमाउं
राजनीति मे नहीं तो टीवी पर तो आउं
वो भी न कर सका तो मैं मिट्टी में मिल जाउं”
जिंदगी में आगे चलकर उसे क्या करना है। कुछ नहीं जानता बस इतना जानता ‘जो मन में ठानी है, उसे हर कीमत पर पाना है’। ऐसे में रोजगार परक कोर्स को लेकर विचार मंथन चलने लगा। साथ ही मन की आवाज को भी पूरा करना था। पत्राकारिता एक मात्र रास्ता दिखा जिसके माध्यम से इन तमाम रास्तो से गुजरा जा सकता है। लेकिन कुछ कमियां उसमें जिससे इस रास्ते पर आना आसान नहीं दिख रहा था। लेकिन कहते है न जो किस्मत में लिखा है वहीं होता है। अचानक उसके हाथों में लिखने की क्षमता जागृत होने लगी। शुरुआत बेचारे ने कविताओं से की। इसी बीच एक लड़की के पुलकित चेहरे ने उसकी आखों में दस्तक दी । बस क्या था प्रेरणा उबाल मारने लगी । कलम की, धार पैनी होती चली गई। रफ्रतार भी तेज होती गई लिखने की। शब्दों और वाक्यों से खेलने की कला में भी निखार आने लगा। हां एक कमी थी उसमें साहित्यिक शब्दों का इस्तेमाल नहीं कर पाता। वजह एक मात्रा थी, वो गांव, जहां हिन्दी भी शुद्ध नहीं बोली जाती क्योंकि प्रादेशिक भाषा का बोल-बाला था।
उसने तय कर लिया पत्राकार ही बनेगा। चाहे कितनी भी परेशानियों का सामना करना पड़े। लड़ेगा वो थकेगा नहीं। स्नातक पास कर लिया वह भी पप्पू की तरह लटक-झटक कर। लेकिन पत्राकारिता के स्नातकोत्तर में दाखिला लेने में ज्यादा मसक्कत नहीं करनी पड़ी। दाखिला लेने के बाद उसने तय किया कि वह अब अपने शर्म को अपने दिल के कोने में बने संदूक में डाल देगा। दोस्तों की कतार बढ़ने लगी। इस बार लड़कियां भी उस कतार में शामिल होने लगीं।
अपनी कक्षा में अव्वल रहने की जिद में उसने लेखन में कई कार्य किये। अपनी कलात्मक सोच में भी तीक्ष्णता लाता गया। कॉलेज में होने वाले कार्यक्रमों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगा। लड़कियों के साथ भी खिल-खिलाकर हंसने की कला सीख ली थी उसने। इस बीच अपने ही कॉलेज से प्रकाशित होने वाली पुस्तक का सम्पादन किया। कई सारे लेख और कविताएं उनमें डाले। इसी बीच सहपाठी कन्या का दिल में दस्तक देना आरम्भ हुआ। दोनो में फ़ौरन अच्छी दोस्ती भी हो गई। लेकिन बेचार एक बार फ़िर पप्पू बन गया क्योंकि लड़की शर्मीली थी। और थोड़ी कसर उसने भी पूरी कर दी। न उधर से इस प्यार के आग को हवा दी गई और न ही उसमें इतनी हिम्मत थी कि आग में घी डाल सके। हां बातों-बातो में मुहावरों से जरूर समझाने का प्रयास किया परन्तु विफल रहा। एक दिन हिम्मत कर उसने सब कुछ कहना चाहा तो उससे पहले ही पता चला उसे कोई और प्यार करता था। इतना ही नहीं उस के प्रेमी ने धमकी दे रखी थी, अगर तुमने बेवफाई की तो आत्महत्या कर लूंगा। वो बेचारा सोच में पड़ गया। किसी की जान से ज्यादा उसका प्यार कीमती नहीं हो सकता। उसने उसे दिल से निकाल दिया। दोस्ती रखी पर वो एहसास खत्म कर दिये, जिसने उसके दिल को विचलित कर रखा था। पर दिल खाली कहां रहता है वह भी उम्र के ऐसे पड़ाव में। तलाश तो सबको रहती है अपने लिए एक साथी की।
इन एक सालों में वह दिल्ली की संस्कृति से पूरी तरह अवगत हो चुका था। कि यहां सच्चे प्यार की कोई कद्र नहीं है। सब पैसे के भूखे है। हर जिस्म की कीमत होती है यहां। लेकिन उसे जिस्म से ज्यादा एक साथी की तलाश थी। ताकि उसके कमी के एहसास को भर सके। लेकिन नाकामयाब रह गया। तब तक साल भी बीत चुके थे। वह रेगिस्तान में तड़पते प्यासे की तरह प्यार के लिए प्यासा ही रह गया। आज वो नौकरी की जुगत में जहाँ -तहां भटक रहा है। जिस पत्राकारिता के दम पर उसने समाज में बिखरी बुराईयों को मिटाने का बीड़ा उठा रखा था। आज उसी पत्राकारिता के बदले स्वरूप जिसमें जातिवाद, क्षेत्रावाद, भाई-भतीजावाद और बाजारवाद के बढ़ते चलन ने काफ़ी निराशा पहुचाई है। वह समझ चुका है कि पत्राकारिता अपनी पुरानी धरा खो चुकी है। जिसके उफान मात्रा से ही बड़े से बड़े चट्टान ध्ूल में परिणत हो जाते थे। बल्कि वैश्वीकरण के इस युग में यह भी एक खूबसुरत रंगीन लिफाफे की तरह दिखता है। समय के तकाजे को भांपते हुए अब उसने भी खुद को बदलने का पफैसला कर लिया है क्योंकि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। इस बदली हुई परिस्थिति में नई सोच के साथ खुद के लिए मुकम्मल स्थान पाने का प्रयास उसका जारी है। देखना होगा आने वाले दिनों में वह कितना सपफल हो पाता है।
इस बीच उसे मालूम चला कि उसका पहला सच्चा प्यार, जिसे किसी के आत्महत्या की ध्मकी ने उसके एहसास तक मिटाने के लिए विवश कर दिया था। उसकी मांग अब सजने वाली है। हाथों में मेंहदी रचाने जा रही है पर वह भी किसी और से। लेकिन एक बड़ी आश्चर्य करने वाली बात सामने आई कि वह उस पप्पू से प्यार करती थी, लेकिन उसे कभी कहने की हिम्मत नहीं हुई थी। ऐसे में एक बात अवश्य सामने आती है कि बेचारे लड़के को पप्पू की संज्ञा दी जाती है। लेकिन उन लड़कियों का क्या नाम दिया जाए जो पप्पू वाली हरकते करती रहती है। विचार करे!
नरेंद्र ‘निर्मल’

>एक व्यंग : बड़े साहब का बाथरूम ….

>एक व्यंग : बड़े साहब का बाथरूम
ट्रिन ! ट्रिन !-टेलीफोन की घंटी बजी
‘हेलो !हेलो! ,बड़े साहब हैं?”
“आप कौन बोल रहे हैं?”
: आफिस से बड़ा बाबू बोल रहा हूँ “
” तो थोडी देर बाद फोन कीजिएगा ,साहब बाथरूम में है “
बड़ा बाबू का माथा ठनका रामदीन तो कह रहा था की साहब आज घर पर ही है तो वह बाथरूम में कब घुस गए हूँ ! साहब लोगों के बाथरूम भी क्या चीज़ होती होगी होती होगी कोई चीज़ मस्त-मस्त हमें क्या!
‘बाथरूम’ का यदि शब्दश: हिंदी रूपान्तर किया जाय तो अर्थ होता है -‘स्नान-घर’ परन्तु जो बात अंग्रेजी के ‘बाथरूम’ में होता है वह हिंदी के ‘स्नान-घर में नहीं “बाथरूम” शब्द से एक अभिजात्य वर्ग का बोध होता है -टाइल्स लगी हुई दीवार ,मैचिंग करते हुए बेसिन ,शीशे- सी चमकती हुई फर्श ,हलकी-हलकी फैली हुई गुलाब की खुशबू की जो कल्पना ‘बाथरूम ‘ से उभरती है वह चिथड़े गंदे टंगे परदे हिंदी के स्नान-घर से नहीं.ज्ञातव्य है की साहब लोगों के बाथरूम में मात्र स्नान कर्म ही नहीं होता अपितु ‘नित्य-कर्म’ का निपटान भी होता है. जन साधारण के लिए ‘साहब बाथरूम में है ” का सामान्य अर्थ होता है कि साहब ‘दैनिक-निपटान-क्रिया ‘ में व्यस्त हैं.
उस दिन श्रीमती जी एक सहेली आई थीं .गोद में ६ महीने का एक बच्चा भी था.थीं तो ‘भृगु-क्षेत्र’ (बलिया) की परन्तु जब से रांची आई है इधर दो-चार अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग करना सीख रही हैं.
वह अंग्रेजी भी भोजपुरी शैली में बोलती हैं उदाहरणत: -‘जानती हैं भाभी जी इस्कूल-उस्कूल में पढाई-लिखाई नहीं होती हैं न ,गौरमिंट के इम्प्लाई है सब टीउशनवे में मन लगता है
उस दिन सोफे पर बच्चे ने सू-सू कर दिया ,बेचारी सकुचा गई ‘….लो लो लो राजा बाबा ने सोफे पर “बाथरूम’ कर दिया ना..ना..ना.. तब मुझे बाथरूम शब्द का एक और व्यापक अर्थ मिला सत्य भी है- शब्द वही जो श्रोता को अपना अभीष्ट अर्थ सम्यक प्रेषित करे
एक घंटे पश्चात ,बड़े बाबू ने पुन: फोन किया /घंटी बजी ,किसी ने टेलेफोन उठाया बोला-‘अरे! कह दिया न साहब बाथरूम में है ‘ थोडी देर बाद टेलीफोन कीजिएगा …’
बड़े बाबू सोचने लगे कि यह साहब लोग भी क्या चीज़ होते है ,हमेशा बाथरूम में ही बैठे रहते हैं ‘बाथरूम न हुआ ड्राइंग रूम हो गया सत्य भी है बड़े बाबू को साहब लोगो के बाथरूम कि कल्पना भी नहीं होगी .होती भी कैसे? गाँव-गिरांव में ऐसे बाथरूम तो होते नहीं.उस कार्य के लिए वहां खेत है ,मैदान है .नीचे खुली ज़मीन है ऊपर आसमान है और शहर में? एक अदद सरकारी क्वार्टर है जिसमे मात्र एक बाथरूम है बाथरूम भी इतना छोटा कि मात्र 5 मिनट में दम घुटने लगता है .अत: जल्दी बाहर आ जाते है दियासलाई का डिब्बा भी उनके बाथरूम से बड़ा होता है. बकौल बशीर साहेब :-
‘पाँव फैलाऊं तो दीवार से सर लगता है’
यही कारण है कि छोटे कर्मचारी बाथरूम में कम ही पाए जाते है. यह बात अन्य है कि उचित रख-रखाव व अनुरक्षण के अभाव में पूरा का पूरा कमरा ही बाथरूम नज़र आता है
मगर साहब लोगो का बाथरूम ? जितना बड़ा साहब उतना बड़ा बाथरूम .अगर श्रेणी चार का आवास है तो २ बाथरूम ,श्रेणी 5 का आवास है तो ३ बाथरूम .अगर निजी आवास है तो कई बाथरूम .हो सकता है कई कमरें में संलग्न बाथरूम हो.जितने बाथरूम होते है उतनी ही दुर्गन्ध फैलती है .ऐसे ही लोग समाज में ज्यादा गंध फैलाते है.कभी यह घोटाला ,कभी वह घोटाला.पास बैठेंगे तो विचारों से भी दुर्गन्ध आती है.फिर बड़ी शान से बताते हैं कि कैसे वह ‘रिंद के रिंद रहे सुबह को तौबा कर ली ‘क्या बिगाड़ पाई सी०बी०आइ० ,कोर्ट-कचहरी या व्यवस्था ?
सूना है हिरोइनों के बाथरूम काफी बड़े व महंगे होते है.लाखो रुपये कि तो इतालियन मार्बल ही लगी रहती है चाहे तो आप अपना चेहरा भी देख सकते हैं बशर्ते कि काले धन से आप का चेहरा काला न हो गया हो
एक बार पढ़ा था कि अमुक हिरोइन के बाथरूम के जीर्णोध्दार मात्र में उस ज़माने में १० लाख का खर्च आया था .अब यह बात डिब्बी वाले बाथरूम के बड़ा बाबू क्या समझेंगे !
वर्मा जी ने अपना बाथरूम बहुत बड़ा बनवाया था .आयकर विभाग में अधिकारी थे .उन्होंने संगमरमरी फर्श के अतिरिक्त काफी साज-ओ-सामान लगवा रखा था .गर्म पानी केलिए गीजर, ठंडे पानी के लिए फ्रिज ,केबुल टी०वी० ,एक बुक-स्टैंड ,कुछ पत्रिकाएँ ,कुछ किताबें ,एक कोने में एक सोफा भी डाल रखा था सुबह ही सुबह अपना मोबाईल फोन व समाचार पत्र लेकर बाथरूम में जो घुसते तो दो घंटे बाद ही निकलते .समाचार भी पढ़ते तो पत्र का नाम -पता-अंक-वर्ष- प्रकाशन संस्करण से लेकर प्रकाशक-मुद्रक तक पढ़ डालते थे
एक अधिकारी थे शर्मा जी . किसी राज्य स्तरीय घोटाले में लिप्त थे .सोचते थे मेरे घोटाले से वर्मा का घोटाला ज्यादा सफ़ेद क्यों.? मेरे बाथरूम से वर्मा का बाथरूम बड़ा क्यों? क्यों वर्मा ने बाथरूम में केबुल टी०वी० फ्रिज टेलीफोन लगा रखा है ? स्साले का बाथरूम न हुआ ड्राइंग रूम हो गया
अत: शर्मा जी ने ‘बाथरूम ‘ को बड़ा करने के बजाय बाथरूम को ही अपने ड्राइंग रूम में लेते आये.अब उनका दीवान भी समंजित हो गया .आत्म-तुष्टि हो गई .उनको इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह पहले से ज्यादा स्पष्ट नंगा नज़र आने लगे.पूछने पर कहते हैं ‘…हमने तो छुप-छुपा कर ही घोटाला किया था परन्तु यह सी०बी०आइ० वालों ने नंगा कर दिया .अब बचा ही क्या है छुपाने के लिए ? और बाथरूम में तो यूँ ही सब नंगे होते है .मेरा ड्राइंग रूम ही मेरा बाथरूम है.कितना बड़ा है मेरा बाथरूम ….” और उन्हें मन ही मन अपने बड़े होने का एहसास होने लगा
शायद इसी कारण उनकी सोच ,उनके विचारों में दूषित गंध है उन्हें पता नहीं है.वह स्वस्थ समाज की सुगन्धित हवाओं से परिचित क्यों नहीं हैं.वह अपनी दुर्गन्ध को ही सुगंध मानते हैं.सूअरों को गन्दगी का एहसास नहीं होता .शायद ऐसे ही जगहों पर लोट-पोट कर आनंद प्राप्त होता है.ऐसे लोगो का आतंरिक सौन्दर्य बोध व चेतना मर जाती है.फिर वह बाथरूम के भीतर नंगे हों या बाहर नंगे हो ,अंतर नहीं पड़ता
साहब लोग बाथरूम में करते क्या है? बाथरूम में सभी ‘दैनिक-क्रिया’ का निपटान ही करते हैं /किसी को यह ‘निपटान ‘जल्दी हो जाता है किसी को विलंब से बड़ा साहब है तो बडा समय लगेगा. गरीबो को तो खाने के ही लाले पड़े रहते है क्या खाए ?,क्या निकाले ?आफिस के बाबू किरानी को तो साग-सब्जी पर ही संतोष करना पड़ता है .पेट में कुछ है ही नहीं तो खायेगा क्या निकालेगा क्या. अत: 5 मिनट में ही निवृत हो कर बाहर आ जाता है
और बड़ा साहब ! बड़ा साहब-बड़ा पेट वह खाता है मांस-मछली,मुर्ग-मुस्सलम ,चिली-चिकेन,चिकेन-बिरयानी,…. वह पीता है बीयर,व्हिस्की अगर इस से भी तुष्टि नहीं मिलती तो खाता है चारा ,अलकतरा ,शेयर तोप,पनडुब्बी ,टेलीफोन यूंरिया ,.. इस से भी आगे खाता है गरीबो के मुंह का निवाला ,सड़क,मकान,पुल के ठेके .दूकान के ठेके ,अगर मौका मिला तो आदमी को भी कच्चा खा सकता है ….
जब पेट में इतने गरिष्ठ भोजन हो तो कब्जियत की शिकायत होगी ही.विचारों में गरिष्टता छायेगी ही. फिर फिर ‘बाथरूम में कौन सी पची-अनपची चीज़ पहले बाहर निकले स्पष्ट नहीं हो पाता फिर हो जाता है बवासीर…निकलता है खून जो गरीबो का पीया होता है.
‘ट्रिन ! ट्रिन !! ट्रिन !!! ‘- बड़े बाबू ने फोन किया —‘साहब है ?
‘ नहीं, साहब बाथरूम में है ‘
अस्तु

—आनंद

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