>धर्म के नाम पर ऎसी छूट लाजवाब है

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आधुनिकता का हवाला देकर हम आज अपनी संस्कृति, सभ्यता की, धर्म की बहुत सी बातों को विस्मृत करते जा रहे हैं। धर्म-कर्म में हमारा विश्वास उठता जा रहा है। महिलाओं द्वारा किये जा रहे व्रत-त्यौहारों को उनके दकियानूसी होने की संज्ञा दी जाती है। पुरुषों के लिए किये जाने वाले व्रत कहकर उनका मजाक बनाया जाता है। कई बार तो ऐसी महिलाओं को पुरुषों के गुलाम भी बताया जाता है। पूर्ण समन्वित
अब दूसरा दृश्य देखिये। अब पुरुष भी महिलाओं के साथ करवा चैथ का व्रत करते देखे जा रहे हैं। (हालांकि इस सत्य को बहुत सी महिलायें नहीं स्वीकारेंगीं) कई साल पहले आई अमिताभ बच्चन की फिल्म बागवान ने पुरुष वर्ग को भी जागरूक किया। आज बहुत से लोग अपनी पत्नी के साथ व्रत करते हैं।
इसे क्या कहेंगे? हमारे धर्म, संस्कृति का सम्मान या फिल्म सभ्यता का प्रभाव अथवा महिलाओं का और धर्मभीरू हो जाना? एक ओर हम धर्म से महिलाओं को, युवाओं को विमुख करते नजर आ रहे हैं वहीं दूसरी ओर इस तरह के कार्यों से प्रसन्न भी हो रहे हैं।
सोचिये कि हम क्या चाहते हैं? यदि धर्म सही है तो वह हमेशा सही है, यदि गलत है तो किसी भी रूप में सही नहीं हो सकता है। मात्र इसलिए धर्म का उदाहरण दिया जाये कि हमारे कुछ कार्य स्वीकार्य हो जायें तो यह गलत है। (जैसा कि अभी समलैंगिकता को लेकर धर्म की परिभाषाओं को दिया जा रहा था।)
सोचिए कि हम आने वाली पीढ़ी को देना क्या चाहते हैं? ऐसा धर्म जिसे जब चाहे गलत साबित करो और जग चाहो उसे सहज स्वीकार्य समझ लो अथवा ऐसा धर्म जो सर्वमान्य रूप से सर्व स्वीकार्य हो?