>खिसयाई बिल्ली खम्भा नोचे

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” हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम , वो क़त्ल भी करते है तो चर्चा नहीं होती. जो कुछ मुंबई मे हुआ वह पहली दफा नहीं हुआ जब मीडिया को प्रताड़ित किया गया . जब कभी मीडिया सच बोलता है तो उसे उसकी कीमत चुकानी पड़ती है. आज बाला साहब हुंकार करके मीडिया की भर्त्सना कर रहे है लेकिन , जब राज उत्पात मचा रहे थे तब उन्होंने कुछ नहीं कहा .जब राज वहां क्षेत्रवाद का नंगा नाच कर रहे थे बल्कि यूं कहें अपना जनाधार तैयार कर रहे थे तब कोई गुस्सा कोई हमला नही !लेकिन अब ऐसा क्या हो गया जो उनके रगों मे बहता खून उबाल मारने लगा यह समझने के लिए महाराष्ट्र चुनाव की तरफ़ रुख करना होगा जहाँ शिव सेना औंधा मुह गिरा. उस चुनाव परिणाम में साफ़ देखा जा सकता था की बाला साहब की ढलती उम्र शिव सेना को अपनी चपेट में ले रही थी .इसी बनती छवि और मनसे की कामयाबी से वो तिलमिला उठे ,जरा सा बात यह है की उन्हें अब मनसे से खतरा लगता है .उन्हें लगता है की उनके पैरों के निचे से सियासत की जमीं खिसक रही है .वह अपना खोया जनाधार हासिल करना चाहते है .यह महज पोलिटिकल स्टंट है .और रही बात सचिन को भगवन मानने की तो यह भारतीय इतिहास की विडम्बना ही है की जिसके पास शास्त्र नहीं तो वह भगवन नहीं .तो किसके हाथ तीर तरकस से लैस और कौन निहत्था है यह बताने की जरुरत नहीं .

>उनको क्या …………

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उम्मीद लगाये खड़े है

जग सारा यहाँ ,

पर उन्हें क्या फ़िक्र है

वो तो अपने दफ्तरों में बैठे ,

प्राइवेट क्लीनिक की सोच में डूबे हैं ।

लोग-बाग़ आ रहे हैं

चिल्ला रहे हैं ,

एक दुसरे पर अपनी खीज उतार रहे हैं ।

>दर्द

>दर्द संभाले कब तक आख़िर ,
हर दर्द एक दास्ताँ होता है ।
दिन ढलते ही रत जवांहोती है ,
हर रात अनोखी शमांहोती है॥
हुश्न मनो दुकांहोता है ,
दिल जिसका मकांहोता है ।
बेबस यहाँ हर जुबांहोता है ,
पहली किरण के साथ ये नवां होता ह ॥
दास्ताँ ऐ दर्द जब दावा होता है ,
तब ये तब्बसुम में रवां होता ह ।
अक्स धुन्धो गर सागर के सिने पे तो ,
रेंतके घरौंदों पर भी “सचिन”निशांहोता है॥

>आँखे

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देखकर वो झुका गई आँखे ,

ख़ुद ब ख़ुद ही भर गई आँखे ।

मौसम का असर मत पूछ ,

सिंदूरी लाल हो गई आँखे ॥

जब जब वो चली शरमाकर ,

इशारे कर गई उनकी आँखे ।

सोचा न था इस कदर ,

जो शरारत कर गई आँखे ।

वो जो आई नजदीक हमारे,

उन पर ही टिक गई “सचिन” तुम्हारी आँखे ॥

>तन्हाई

>हम तो जी रहे हैं आपके सहारे ,
अब इस जहाँ से रुसवाई क्या होगी ।
तनहा जिया था अब तक ,
अब बर्दाशत तन्हाई क्या होगी ।
वक्त बेवक्त याद आयेगी आपकी ,
मैखाने में अब जगहंसाई क्या होगी ।
गम -ऐ – हालात जुदाई से बढकर क्या होगी ,
चीज़ बेवफाई से बढकर क्या होगी ।
जिसे देनी हो सजा उम्र भर के लिए “सचिन”,
तन्हाई से बढकर सजा और क्या होगी । ।

>रुसवाई

>

शमां जली शाम को और ,
अँधेरा मेरी जिन्दगी को कर गई ।
जब रौशन हुआ शमां तो ,
दहशत उजालों से हो गई ।।
अबके बरसा ना अब्रे शौक ,
भ्रम उनके परछाई की हो गई ।
जब-जब याद आई उनकी ,
याराना तन्हाई से हो गई । ।
ख़ुद को पाया जब अकेलेपन में ,
मरहूम जान की अदायगी हो गई ।
उसने चाहा ही न था शिद्दत से ,
ग़लतफहमी ही ‘सचिन’ रुसवाई हो गई ॥

:- आत्मानंद ‘सचिन’