>मंजर

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उसको छूकर गुजर गए जो मंजर ,

आंखों ही आंखों में उतर गए मंजर ।

आहे मजलूम का असर मत पूछ ,

खाक जैसे बिखर गए मंजर । ।

वो जो आए महफ़िल में ,

ख़ुद ब ख़ुद ही संवर गए मंजर ।

अबके बरसा न अब्रे शौक ‘सचिन ‘

अबके मायूस कर गए मंजर॥

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