>कौन देगा इन सवालों के जवाब???

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‘कसाब बयान से पलटा’ इस खबर ने नींद ही उड़ा दी। मन में जो सवाल कसाब की गिरफ्तारी के समय से घुमड़ रहे थे वहीं आपके सामने—

‘‘क्या नौ आतंकवादियों को मार देने के बाद हमारे सैनिकों के पास एक गोली कसाब के लिए नहीं बची थी?’’
‘‘कसाब के द्वारा हम किन सबूतों को इकट्ठा करने की खोखली बातें कर रहे हैं?’’
‘‘यदि सबूत मिले भी और सभी सबूत पाक के खिलाफ हुए तब भी हमारी सरकार क्या करेगी?’’
‘‘किसी प्रकार वकीलों की जिरह और अदालत में प्रस्तुत किये सबूतों के आधार पर यदि कसाब छूट गया तो?’’
नींद इसी ‘तो’ ने उड़ा रखी है। सभी के सामने मय सबूतों के पकड़े गये अपराधी के साथ न्याय करने में हमारी व्यवस्थाओं की यह स्थिति है तो आम आदमी को मिलने वाले न्याय के बारे में सिर्फ सोचा जा सकता है।
नींद अभी भी उड़ी है कि कसाब बयान से पलटा और बच गया ‘तो’!!!!!
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चित्र साभार गूगल से लिया है

>राजशेखर रेड्डी के गम में मरने लिए 5000-5000 रूपये बांटे कांग्रेस ने

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अभी पिछले दिनों आँध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी की मौत विमान दुर्घटना में हो गई.सभी समाचार चैनल में कहा गया  कि  उनकी मौत के दुख में 462 लोगो ने आत्महत्या कर ली. आश्चर्य होता है न आज के समय में किसी नेता के लिए इतना प्यार देखकर!!! लेकिन बाद में मालूम पड़ा की ये प्यार नेता के लिए नहीं बल्कि पैसे के लिए था मतलब की कांग्रेस सरकार ने देश को जितने भी लोगो को खुदख़ुशी करने वालों में गिनाया था वो सभी खुदखुशी के कारण नहीं बल्कि अपनी स्वाभाविक मौत मरे थे.
जी हां एक सनसनीखेज़ खुलासे में ये बात सामने आई है की मरने वाले लोगो के घर वालो को सरकार ने 5000-5000 Rs. दिए थे और बदले में उनलोगों को ये बोलना था की “मरने वाला आदमी अपनी स्वाभाविक मौत नहीं मरा बल्कि उसने मुख्यमंत्री के गम में आत्महत्या की है.”
शर्म आती है ये बाते सुन-सुन कर की आज की कांग्रेस इतनी गिर चुकी है की लोगो की मौत पर भी राजनीति करने लगी
काश ये पैसा उन लोगो को मरने से पहले दिया जाता तो शायद वो दुनिया में होते .
 { ऑरकुट पर भाव्यांश के स्क्रेप का अंश  } 

>कौन कहे कुछ क्योंकि सच बोलना मना है

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सच की कीमत क्या है? सच बोलने की कीमत क्या है? सच साबित करने की कीमत क्या है? ये सवाल अपने आपमें महत्वपूर्ण हो सकते हैं पर कितने? इस सच को कौन देखेगा? चलिए सच बोलना मना है तो बहुत छोटे-छोटे से सच (क्या आपको लगता है कि सच है?)

संसद पर हमला, कार्यवाही अभी तक नहीं, सच बोलना मना है।
कसाब को सबने देखा, गवाहों से पहचान अभी भी, सच बोलना मना है।
आरक्षण में कई प्रतिभायें दफन, कमतर अंक वाले भी बने डाक्टर, इंजीनियर, सच बोलना मना है।
गरीब और गरीब, अमीर और अमीर, मंदी में मँहगाई, उनकी शानो-शौकत में कमी न आई, सच बोलना मना है।
दाल-आटे के भाव आसमान पर, कम्प्यूटर सस्ते, गाँव-गाँव तक इंटरनेट, सच बोलना मना है।
फूहड़ता का विरोध, संस्कृति पर चोट, आधुनिकता है यह, सच बोलना मना है।
टी0आर0पी0 का चक्कर, दौलत का खेल, विरोध की राजनीति, सच बोलना मना है।

और भी बहुत कुछ है, आपको भी पता है। क्या सुधरेगी व्यवस्था? क्या बदलेंगे हालात? कौन सुधारेगा व्यवस्था? कौन बदलेगा हालात? आप भी तो कहते हो, सच बोलना मना है।

>सच है तो क्या नंगे होकर घूमा जाए?

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अभी हाल ही में टीवी पर एक कार्यक्रम शुरू हुआ ‘सच का सामना’। पहले लग रहा था कि कार्यक्रम में कुछ विशेष होगा किन्तु जब आये दिन इसके ट्रेलर दिखाये गये और बाद में इसकी पहली ही कड़ी के कुछ अंशों को देखा तो लगा कि हम भारतीय भी विकास की राह में कुछ ज्यादा ही आगे आ गये हैं।
21 सवाल और फिर सच और झूठ का निर्णय। अन्त में सब कुछ सच्चा तो एक करोड़ नहीं तो टाँय-टाँय फिस्स। सवाल कोई ऐसे नहीं जो आपकी मेधा का परीक्षण करें। सवाल ऐसे नहीं जो आपकी क्षमता को सिद्ध करें। सवाल वे भी नहीं जिनसे आपकी सामाजिक स्थिति का आकलन होता हो। इसके अलावा सवाल ऐसे भी नहीं जिनके माध्यम से कहा जा सके कि आपने सच का सामना करने की हिम्मत जुटाई।
सवाल ऐसे के परिवार टूट सकें। सवाल ऐसे कि परिवार बिखर सकें। सवाल इस दर्जे के कि आपस में अविश्वास पैदा हो सके। सवाल वो जो कलह मचवा दें। एक बानगी-
क्या आपने अपने पिता को चाँटा मारा?
क्या आप अपनी बेटी की उम्र की लड़की से शारीरिक सम्बन्ध बना चुके हैं?
क्या आप सार्वजनिक स्थल पर निर्वस्त्र हुए हैं?
आदि-आदि।
इस कार्यक्रम की पहली (शायद पहली ही थी) कड़ी में जब कार्यक्रम देखना शुरू किया तो सीट पर बैठी महिला पाँच लाख जीत चुकी थी। एक सवाल पूछा गया कि क्या आप किसी दूसरे आदमी के साथ शारीरिक सम्बन्ध बना सकतीं हैं, यदि आपके पति को इसका पता न लग सके? एक-दो क्षण के विचार करने के बाद उस महिला का जवाब था नहीं।
एक आवाज उभरी जिसने पालीग्राफ का परिणाम बताया और सभी ने सुना ‘आपका जवाब सही नहीं है।’ महिला सन्न रह गई, कहा नो…नो। पास में बैठे उसके पति ने अपने सिर पर हताशा से हाथ फेरा। चश्में को सिर पर चढ़ा कर अपनी आँखों को हाथों से ढँका।
एंकर ने महिला को सीट से उठाकर उसके पति और अन्य परिवारीजनों के पास तक पहुँचाया, साथ ही परिवार के सुखी रहने की बधाई दी। बधाई….सुखी परिवार की। जब वहाँ सवाल रहा हो शारीरिक सम्बन्ध का, बच्चों का साथ मिले इस कारण शादी को स्वीकारते रहने का तो सोचा जा सकता है कि परिवार कितना सुखी होगा?
आखिर ऐसे सवालों के द्वारा हम किस सच का और किस हिम्मत का सामना करने की बात कर रहे हैं?
अपने आपको नंगा दिखाने का प्रयास हमारी हिम्मत है?
अपनी बहू-बेटियों को, लड़को को सरेआम सबके सामने नंगा करवा देना क्या सच का सामना है?
ऐसे कार्यक्रमों में एक करोड़ जीतने के बाद किस तरह की बधाई देंगे? शाबास, अपनी बेटी की उम्र वाली लड़की से सेक्स करने की बधाई। अपने पिता को थप्पड़ मारने की बधाई। किसी के साथ भी कुछ भी कर गुजरने की हिम्मत रखने की बधाई।
यही सब है जो हमें बताता है कि हम कहाँ जा रहे हैं। इस तरह के सवालों के बाद परिवार में पर्दे में रखने जैसा बचा ही क्या है? अब एक आराम तो है कि घर में नये दम्पत्ति के लिए किसी तरह के संकोच की जरूरत नहीं। सब जाने हैं कि बन्द कमरे में पति-पत्नी करते क्या हैं। जगह की कमी के कारण सब एकसाथ लेटो-बैठो। सब लोग सब जानते हैं, सबक सामने ही करने लगो। (यही तो कहते हैं ऐसे कार्यक्रमों का समर्थन करने वाले कि आजकल सभी को पता है कि सच क्या है)
चलिए सच के लिए अब नंगा होकर घूमा जाये क्योंकि सभी को मालूम है कि कपड़ों के भी इन्सान नंगा ही है।