उत्तर-दक्षिण के बीच बढती खाई

विश्व बैंक की ताजा सर्वेक्षण रिपोर्ट में बताया गया है कि केरल और उत्तरप्रदेश के मानव विकास सूचकांक में काफ़ी बडा़ अन्तर आ गया है । शिक्षा, स्वास्थ्य, जनभागीदारी के कार्यक्रम, शिशु मृत्यु दर, बालिका साक्षरता, महिला जागरूकता आदि कई बिन्दुओं पर विश्व बैंक ने इस तथ्य को रेखांकित किया है कि सामाजिक विकास की दृष्टि से केरल भारत के अग्रणी राज्यों में से एक है, और उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्यप्रदेश (जिसकी स्थिति बाकी तीनों से कुछ बेहतर बताई गई है) ये चारों राज्य अब तक “बीमारू” राज्यों की श्रेणी से बाहर नहीं निकल सके हैं, और ना ही निकट भविष्य में इसकी कोई सम्भावना है ।
कुछ वर्षों पूर्व जब संसद में सीटों की संख्या बढाये जाने का प्रस्ताव विचाराधीन था, तब दक्षिण के राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने राजनैतिक पूर्वाग्रहों और मतभेदों से ऊपर उठकर इस बात का विरोध किया था कि संसद में सीटों की संख्या को जनसंख्या के अनुपात में बढाया जाये । उनका तर्क था कि इस तरह तो पुनः उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे राज्यों को इसका फ़ायदा मिल जायेगा, क्योंकि जनसंख्या तो वहीं की सबसे ज्यादा बढ रही है, जबकि दक्षिण के राज्यों को एक तरह से इसकी “सजा” मिलेगी, क्योंकि उन्होंने जनसंख्या नियन्त्रण को प्रभावी तरीके से सफ़ल बनाया है । दक्षिणी राज्यों का विरोध बिलकुल सही था, क्योंकि अभी भी दक्षिण के राज्यों को संसद में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता है, जबकि उत्तरप्रदेश (उत्तराखण्ड मिलाकर) ८५ एवं बिहार (झारखण्ड मिलाकर) ५४ सांसद संख्या के मामले में संसद में अपनी उपस्थिति से सारे गणित को उलटफ़ेर करने में सक्षम हैं । भारत के अधिकतर प्रधानमन्त्री उत्तरप्रदेश से आते हैं, क्योंकि लोकतन्त्र संख्या बल से चलता है (यहाँ सिर गिने जाते हैं, सिरों के भीतर क्या है यह नहीं देखा जाता), परन्तु यह संख्या बल के साथ-साथ उस जनता का भी अपमान है, जिसने स्वतः होकर जनसंख्या नियन्त्रण में महती भूमिका निभाई है, यह उनके साथ अन्याय होता कि मात्र जनसंख्या के आधार पर उत्तरप्रदेश और बिहार संसद में सभी पर हावी हो जाते हैं (लगभग यही स्थिति हिन्दी और उसके आग्रह को लेकर है और जिस पर क्षेत्रीय राज्यों को गहरी आपत्ति है, लेकिन यह बहस का अलग विषय है)… बहरहाल आर्थिक दृष्टि से अपने को समृद्ध करने के लिये चारों दक्षिणी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की कुछ समय पहले एक बैठक हुई थी, जिसमें इन चारों राज्यों ने अपने राजनैतिक विचारधाराओं और पार्टियों की सीमा से ऊपर उठकर आपस में समझदारी बनाई कि चारों राज्यों को आपस में मिलकर व्यापार, परिवहन, कर प्रणाली आदि में तालमेल बनाकर उसे सरल एवं सभी के लिये फ़ायदेमन्द बनाने की कोशिश करनी चाहिये । इस प्रक्रिया में उन्होंने महाराष्ट्र को भी शामिल कर लिया है । अब भविष्य में स्थिति धीरे-धीरे यह बनने जा रही है कि दक्षिण के राज्यों का एक आर्थिक महासंघ आकार ग्रहण करेगा, जाहिर है कि इससे वहाँ की जनता को दीर्घकालीन लाभ प्राप्त होगा । दक्षिण के राज्य पहले से ही शिक्षा और स्वास्थ्य के मानकों में उत्तरी राज्यों से काफ़ी आगे हैं, लेकिन सामाजिक सुरक्षा, बुनियादी ढाँचे एवं ग्रामीण विकास में भी उत्तरी राज्य बहुत पिछडे हुए हैं, जबकि उतरप्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश से दर्जनों मन्त्री केन्द्र मे हैं और पहले भी रहते आये हैं (रेल मंत्रालय पर तो लगभग हमेशा बिहार का ही कब्जा रहा है), तर्क देने वाले अक्सर कहते हैं कि बिहार राज्य से अधिकतर आईएएस और आईपीएस चुनकर आते हैं, जरूर आते हैं, लेकिन इसलिये नहीं कि बिहार में शिक्षा का स्तर अच्छा है, बल्कि इसलिये कि बिहार में इन सिविल सेवाओं के प्रति सामाजिक आकर्षण एवं भययुक्त आदर आज भी मौजूद है । उत्तरी राज्यों के पिछडने का प्रमुख कारण अशिक्षा और बुनियादी सेवाओं (सडक, विजली, सिंचाई और संचार) की बेहद कमी है । ऊपर से “करेला और वो भी नीम चढा” की तर्ज पर जातीय समीकरणों वाली राजनीति ने स्थिति को और खराब कर दिया है । जबकि दक्षिणी राज्यों और महाराष्ट्र में कई सफ़ल सामाजिक आन्दोलन हुए, छुआछूत, भेदभाव, विधवा विवाह आदि पर कई समाज सुधारकों ने वहाँ समाज को जगाया, परन्तु राज्यों के विकास की कीमत पर नहीं । परन्तु उत्तर भारत में इसका ठीक उलटा हुअ, यहाँ दलितों, राजपूतों, और ब्राह्मणों को सिर्फ़ एक वोट बैंक की तरह विकसित किया गया, जोड़तोड़ से सरकार बनाओ, अपनी जातियों का भला करो, उन्हें बढावा दो, उनकी गलतियों को नजरअंदाज करो, मुफ़्तखोरी को सरकारी जामा पहना दो, अपनी गलतियों को केन्द्र के मत्थे मढने की कोशिश करो, राज्य का विकास गया भाड में । अब स्थिति यह हो गई है कि दक्षिण के राज्य केन्द्र से मिलने वाली सहायता को “परफ़ॉर्मेंस” आधारित करने की माँग कर रहे हैं, जो कि सही भी है । जैसे कि जो राज्य विद्युत पारेषण एवं उपयोग की पूरी राशि चुकायेंगे उन्हें पर्याप्त बिजली मिलनी चाहिये । इस मामले में हरियाणा का उदाहरण आश्चर्यजनक किन्तु सत्य है कि हरियाणा देश का पहला राज्य बन गया, जिसके विद्युत मण्डल ने जबरदस्त मुनाफ़ा कमाया और वहाँ किसानों को भरपूर बिजली मिल रही है । यह तो सिर्फ़ एक उदाहरण है, लेकिन बात साफ़ है कि जब तक उत्तरी राज्य जातीय राजनीति और अशिक्षा के जाल में फ़ँसे रहेंगे, समूची जनता का नुकसान तय है, और इसके कारण उत्तर भारत की प्रतिभा का पलायन मुम्बई, दिल्ली, बेंगलोर, हैदराबाद की ओर हो रहा है । यह बात भारत के भविष्य के लिये भी ठीक नहीं है, क्योंकि इसके कारण अलगाव की भावना पैदा होती है, जिसे मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ के सन्दर्भ में समझा जा सकता है । छत्तीसगढ के लोगों में यह भावना मजबूत हो गई थी कि मध्यप्रदेश उसके अधिकतम संसाधनों का उपयोग कर रहा है, लेकिन वहाँ के निवासियों को इसका पूरा फ़ायदा नहीं मिल रहा है, उलटे किसी अधिकारी को “सजा” के तौर पर छत्तीसगढ ट्रांसफ़र किया जाता था, लगभग यही बात झारखण्ड और बिहार पर भी लागू होती है । व्यापक परिप्रेक्ष्य में देशहित में यह ठीक बात नहीं है…दक्षिणी राज्यों से प्रचुर राजस्व वसूली करके उत्तरी राज्यों को सबसिडी देना ठीक नहीं है । लेकिन जब तक जनता जाति विशेष को आरक्षण, मुफ़्त बिजली, कर्जा माफ़ी, धर्म परिवर्तन आदि मुद्दों में उलझी रहेगी, तब तक विकास नहीं हो सकता । आरक्षण से क्या हासिल होने वाला है, नौकरियाँ तो पहले से ही नहीं हैं जो हैं वे भी जाने वाली हैं, मुफ़्त बिजली बाँटकर नेताओं की जेब से क्या जाता है, कटौती तो जनता को ही भुगतना होता है, धर्म परिवर्तन रोकने या करवाने पर हल्ला मचाने से ज्यादा जरूरी है आदिवासियों की सामाजिक / आर्थिक हालत सुधारना, अवैध कालोनियों को वैध करने से अतिक्रमण रुकना तो दूर बल्कि भूमाफ़िया और जमीन दबा लेंगे । तात्पर्य यह कि नेताओं को घोषणायें करने में कुछ नहीं लगता, उन्हें तो मालूम है कि तेल तो तिल्ली में से ही निकलेगा (यानी जनता की जेब से), बस एक बार वोट दो और पाँच साल की फ़ुर्सत, परन्तु लाख टके का सवाल तो यही है कि जनता कब जागेगी ?

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>उत्तर-दक्षिण के बीच बढती खाई

>विश्व बैंक की ताजा सर्वेक्षण रिपोर्ट में बताया गया है कि केरल और उत्तरप्रदेश के मानव विकास सूचकांक में काफ़ी बडा़ अन्तर आ गया है । शिक्षा, स्वास्थ्य, जनभागीदारी के कार्यक्रम, शिशु मृत्यु दर, बालिका साक्षरता, महिला जागरूकता आदि कई बिन्दुओं पर विश्व बैंक ने इस तथ्य को रेखांकित किया है कि सामाजिक विकास की दृष्टि से केरल भारत के अग्रणी राज्यों में से एक है, और उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्यप्रदेश (जिसकी स्थिति बाकी तीनों से कुछ बेहतर बताई गई है) ये चारों राज्य अब तक “बीमारू” राज्यों की श्रेणी से बाहर नहीं निकल सके हैं, और ना ही निकट भविष्य में इसकी कोई सम्भावना है ।
कुछ वर्षों पूर्व जब संसद में सीटों की संख्या बढाये जाने का प्रस्ताव विचाराधीन था, तब दक्षिण के राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने राजनैतिक पूर्वाग्रहों और मतभेदों से ऊपर उठकर इस बात का विरोध किया था कि संसद में सीटों की संख्या को जनसंख्या के अनुपात में बढाया जाये । उनका तर्क था कि इस तरह तो पुनः उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे राज्यों को इसका फ़ायदा मिल जायेगा, क्योंकि जनसंख्या तो वहीं की सबसे ज्यादा बढ रही है, जबकि दक्षिण के राज्यों को एक तरह से इसकी “सजा” मिलेगी, क्योंकि उन्होंने जनसंख्या नियन्त्रण को प्रभावी तरीके से सफ़ल बनाया है । दक्षिणी राज्यों का विरोध बिलकुल सही था, क्योंकि अभी भी दक्षिण के राज्यों को संसद में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता है, जबकि उत्तरप्रदेश (उत्तराखण्ड मिलाकर) ८५ एवं बिहार (झारखण्ड मिलाकर) ५४ सांसद संख्या के मामले में संसद में अपनी उपस्थिति से सारे गणित को उलटफ़ेर करने में सक्षम हैं । भारत के अधिकतर प्रधानमन्त्री उत्तरप्रदेश से आते हैं, क्योंकि लोकतन्त्र संख्या बल से चलता है (यहाँ सिर गिने जाते हैं, सिरों के भीतर क्या है यह नहीं देखा जाता), परन्तु यह संख्या बल के साथ-साथ उस जनता का भी अपमान है, जिसने स्वतः होकर जनसंख्या नियन्त्रण में महती भूमिका निभाई है, यह उनके साथ अन्याय होता कि मात्र जनसंख्या के आधार पर उत्तरप्रदेश और बिहार संसद में सभी पर हावी हो जाते हैं (लगभग यही स्थिति हिन्दी और उसके आग्रह को लेकर है और जिस पर क्षेत्रीय राज्यों को गहरी आपत्ति है, लेकिन यह बहस का अलग विषय है)… बहरहाल आर्थिक दृष्टि से अपने को समृद्ध करने के लिये चारों दक्षिणी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की कुछ समय पहले एक बैठक हुई थी, जिसमें इन चारों राज्यों ने अपने राजनैतिक विचारधाराओं और पार्टियों की सीमा से ऊपर उठकर आपस में समझदारी बनाई कि चारों राज्यों को आपस में मिलकर व्यापार, परिवहन, कर प्रणाली आदि में तालमेल बनाकर उसे सरल एवं सभी के लिये फ़ायदेमन्द बनाने की कोशिश करनी चाहिये । इस प्रक्रिया में उन्होंने महाराष्ट्र को भी शामिल कर लिया है । अब भविष्य में स्थिति धीरे-धीरे यह बनने जा रही है कि दक्षिण के राज्यों का एक आर्थिक महासंघ आकार ग्रहण करेगा, जाहिर है कि इससे वहाँ की जनता को दीर्घकालीन लाभ प्राप्त होगा । दक्षिण के राज्य पहले से ही शिक्षा और स्वास्थ्य के मानकों में उत्तरी राज्यों से काफ़ी आगे हैं, लेकिन सामाजिक सुरक्षा, बुनियादी ढाँचे एवं ग्रामीण विकास में भी उत्तरी राज्य बहुत पिछडे हुए हैं, जबकि उतरप्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश से दर्जनों मन्त्री केन्द्र मे हैं और पहले भी रहते आये हैं (रेल मंत्रालय पर तो लगभग हमेशा बिहार का ही कब्जा रहा है), तर्क देने वाले अक्सर कहते हैं कि बिहार राज्य से अधिकतर आईएएस और आईपीएस चुनकर आते हैं, जरूर आते हैं, लेकिन इसलिये नहीं कि बिहार में शिक्षा का स्तर अच्छा है, बल्कि इसलिये कि बिहार में इन सिविल सेवाओं के प्रति सामाजिक आकर्षण एवं भययुक्त आदर आज भी मौजूद है । उत्तरी राज्यों के पिछडने का प्रमुख कारण अशिक्षा और बुनियादी सेवाओं (सडक, विजली, सिंचाई और संचार) की बेहद कमी है । ऊपर से “करेला और वो भी नीम चढा” की तर्ज पर जातीय समीकरणों वाली राजनीति ने स्थिति को और खराब कर दिया है । जबकि दक्षिणी राज्यों और महाराष्ट्र में कई सफ़ल सामाजिक आन्दोलन हुए, छुआछूत, भेदभाव, विधवा विवाह आदि पर कई समाज सुधारकों ने वहाँ समाज को जगाया, परन्तु राज्यों के विकास की कीमत पर नहीं । परन्तु उत्तर भारत में इसका ठीक उलटा हुअ, यहाँ दलितों, राजपूतों, और ब्राह्मणों को सिर्फ़ एक वोट बैंक की तरह विकसित किया गया, जोड़तोड़ से सरकार बनाओ, अपनी जातियों का भला करो, उन्हें बढावा दो, उनकी गलतियों को नजरअंदाज करो, मुफ़्तखोरी को सरकारी जामा पहना दो, अपनी गलतियों को केन्द्र के मत्थे मढने की कोशिश करो, राज्य का विकास गया भाड में । अब स्थिति यह हो गई है कि दक्षिण के राज्य केन्द्र से मिलने वाली सहायता को “परफ़ॉर्मेंस” आधारित करने की माँग कर रहे हैं, जो कि सही भी है । जैसे कि जो राज्य विद्युत पारेषण एवं उपयोग की पूरी राशि चुकायेंगे उन्हें पर्याप्त बिजली मिलनी चाहिये । इस मामले में हरियाणा का उदाहरण आश्चर्यजनक किन्तु सत्य है कि हरियाणा देश का पहला राज्य बन गया, जिसके विद्युत मण्डल ने जबरदस्त मुनाफ़ा कमाया और वहाँ किसानों को भरपूर बिजली मिल रही है । यह तो सिर्फ़ एक उदाहरण है, लेकिन बात साफ़ है कि जब तक उत्तरी राज्य जातीय राजनीति और अशिक्षा के जाल में फ़ँसे रहेंगे, समूची जनता का नुकसान तय है, और इसके कारण उत्तर भारत की प्रतिभा का पलायन मुम्बई, दिल्ली, बेंगलोर, हैदराबाद की ओर हो रहा है । यह बात भारत के भविष्य के लिये भी ठीक नहीं है, क्योंकि इसके कारण अलगाव की भावना पैदा होती है, जिसे मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ के सन्दर्भ में समझा जा सकता है । छत्तीसगढ के लोगों में यह भावना मजबूत हो गई थी कि मध्यप्रदेश उसके अधिकतम संसाधनों का उपयोग कर रहा है, लेकिन वहाँ के निवासियों को इसका पूरा फ़ायदा नहीं मिल रहा है, उलटे किसी अधिकारी को “सजा” के तौर पर छत्तीसगढ ट्रांसफ़र किया जाता था, लगभग यही बात झारखण्ड और बिहार पर भी लागू होती है । व्यापक परिप्रेक्ष्य में देशहित में यह ठीक बात नहीं है…दक्षिणी राज्यों से प्रचुर राजस्व वसूली करके उत्तरी राज्यों को सबसिडी देना ठीक नहीं है । लेकिन जब तक जनता जाति विशेष को आरक्षण, मुफ़्त बिजली, कर्जा माफ़ी, धर्म परिवर्तन आदि मुद्दों में उलझी रहेगी, तब तक विकास नहीं हो सकता । आरक्षण से क्या हासिल होने वाला है, नौकरियाँ तो पहले से ही नहीं हैं जो हैं वे भी जाने वाली हैं, मुफ़्त बिजली बाँटकर नेताओं की जेब से क्या जाता है, कटौती तो जनता को ही भुगतना होता है, धर्म परिवर्तन रोकने या करवाने पर हल्ला मचाने से ज्यादा जरूरी है आदिवासियों की सामाजिक / आर्थिक हालत सुधारना, अवैध कालोनियों को वैध करने से अतिक्रमण रुकना तो दूर बल्कि भूमाफ़िया और जमीन दबा लेंगे । तात्पर्य यह कि नेताओं को घोषणायें करने में कुछ नहीं लगता, उन्हें तो मालूम है कि तेल तो तिल्ली में से ही निकलेगा (यानी जनता की जेब से), बस एक बार वोट दो और पाँच साल की फ़ुर्सत, परन्तु लाख टके का सवाल तो यही है कि जनता कब जागेगी ?

>धर्मनिरपेक्षता की जय ?

>क्या आप धर्मनिरपेक्ष हैं ? जरा फ़िर सोचिये और स्वयं के लिये इन प्रश्नों के उत्तर खोजिये…..
१. विश्व में लगभग ५२ मुस्लिम देश हैं, एक मुस्लिम देश का नाम बताईये जो हज के लिये “सब्सिडी” देता हो ?
२. एक मुस्लिम देश बताईये जहाँ हिन्दुओं के लिये विशेष कानून हैं, जैसे कि भारत में मुसलमानों के लिये हैं ?
३. किसी एक देश का नाम बताईये, जहाँ ८५% बहुसंख्यकों को “याचना” करनी पडती है, १५% अल्पसंख्यकों को संतुष्ट करने के लिये ?
४. एक मुस्लिम देश का नाम बताईये, जहाँ का राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री गैर-मुस्लिम हो ?
५. किसी “मुल्ला” या “मौलवी” का नाम बताईये, जिसने आतंकवादियों के खिलाफ़ फ़तवा जारी किया हो ?
६. महाराष्ट्र, बिहार, केरल जैसे हिन्दू बहुल राज्यों में मुस्लिम मुख्यमन्त्री हो चुके हैं, क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि मुस्लिम बहुल राज्य “कश्मीर” में कोई हिन्दू मुख्यमन्त्री हो सकता है ?
७. १९४७ में आजादी के दौरान पाकिस्तान में हिन्दू जनसंख्या 24% थी, अब वह घटकर 1% रह गई है, उसी समय तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब आज का अहसानफ़रामोश बांग्लादेश) में हिन्दू जनसंख्या 30% थी जो अब 7% से भी कम हो गई है । क्या हुआ गुमशुदा हिन्दुओं का ? क्या वहाँ (और यहाँ भी) हिन्दुओं के कोई मानवाधिकार हैं ?
८. जबकि इस दौरान भारत में मुस्लिम जनसंख्या 10.4% से बढकर 14.2% हो गई है, क्या वाकई हिन्दू कट्टरवादी हैं ?
९. यदि हिन्दू असहिष्णु हैं तो कैसे हमारे यहाँ मुस्लिम सडकों पर नमाज पढते रहते हैं, लाऊडस्पीकर पर दिन भर चिल्लाते रहते हैं कि “अल्लाह के सिवाय और कोई शक्ति नहीं है” ?
१०. सोमनाथ मन्दिर के जीर्णोद्धार के लिये देश के पैसे का दुरुपयोग नहीं होना चाहिये ऐसा गाँधीजी ने कहा था, लेकिन 1948 में ही दिल्ली की मस्जिदों को सरकारी मदद से बनवाने के लिये उन्होंने नेहरू और पटेल पर दबाव बनाया, क्यों ?
११. कश्मीर, नागालैण्ड, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय आदि में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं, क्या उन्हें कोई विशेष सुविधा मिलती है ?
१२. हज करने के लिये सबसिडी मिलती है, जबकि मानसरोवर और अमरनाथ जाने पर टैक्स देना पड़ता है, क्यों ?
१३. मदरसे और क्रिश्चियन स्कूल अपने-अपने स्कूलों में बाईबल और कुरान पढा सकते हैं, तो फ़िर सरस्वती शिशु मन्दिरों में और बाकी स्कूलों में गीता और रामायण क्यों नहीं पढाई जा सकती ?
१४. गोधरा के बाद मीडिया में जो हंगामा बरपा, वैसा हंगामा कश्मीर के चार लाख हिन्दुओं की मौत और पलायन पर क्यों नहीं होता ?
१५. क्या आप मानते हैं – संस्कृत सांप्रदायिक और उर्दू धर्मनिरपेक्ष, मन्दिर साम्प्रदायिक और मस्जिद धर्मनिरपेक्ष, तोगडिया राष्ट्रविरोधी और ईमाम देशभक्त, भाजपा सांप्रदायिक और मुस्लिम लीग धर्मनिरपेक्ष, हिन्दुस्तान कहना सांप्रदायिकता और इटली कहना धर्मनिरपेक्ष ?
१६. अब्दुल रहमान अन्तुले को सिद्धिविनायक मन्दिर का ट्रस्टी बनाया गया था, क्या मुलायम सिंह को हजरत बल दरगाह का ट्रस्टी बनाया जा सकता है ?
१७. एक मुस्लिम राष्ट्रपति, एक सिख प्रधानमन्त्री और एक ईसाई रक्षामन्त्री, क्या किसी और देश में यह सम्भव है, यह सिर्फ़ सम्भव है हिन्दुस्तान में क्योंकि हम हिन्दू हैं और हमें इस बात पर गर्व है, दिक्कत सिर्फ़ तभी होती है जब हिन्दू और हिन्दुत्व को साम्प्रदायिक कहा जाता है ।
स्वामी विवेकानन्द ने कहा था – “हिन्दुत्व कोई धर्म नहीं है, यह एक उत्तम जीवन पद्धति है” । गाँधी के खिलाफ़त आन्दोलन के समर्थन और धारा ३७० पर भी काफ़ी कुछ लिखा जा चुका है और ज्यादा लिखने की जरूरत नहीं है, इसलिये नहीं लिखा, फ़िर भी…..उपरिलिखित विचार किसी राजनैतिक उद्देश्य के लिये नहीं हैं, ये सिर्फ़ ध्यान से चारों तरफ़ देखने पर स्वमेव ही दिमाग में आते हैं और एक सच्चे देशभक्त नागरिक होने के नाते इन पर प्रकाश डालना मेरा कर्तव्य है
(एक ई-मेल के सम्पादन और अनुवाद पर आधारित)

धर्मनिरपेक्षता की जय ?

क्या आप धर्मनिरपेक्ष हैं ? जरा फ़िर सोचिये और स्वयं के लिये इन प्रश्नों के उत्तर खोजिये…..
१. विश्व में लगभग ५२ मुस्लिम देश हैं, एक मुस्लिम देश का नाम बताईये जो हज के लिये “सब्सिडी” देता हो ?
२. एक मुस्लिम देश बताईये जहाँ हिन्दुओं के लिये विशेष कानून हैं, जैसे कि भारत में मुसलमानों के लिये हैं ?
३. किसी एक देश का नाम बताईये, जहाँ ८५% बहुसंख्यकों को “याचना” करनी पडती है, १५% अल्पसंख्यकों को संतुष्ट करने के लिये ?
४. एक मुस्लिम देश का नाम बताईये, जहाँ का राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री गैर-मुस्लिम हो ?
५. किसी “मुल्ला” या “मौलवी” का नाम बताईये, जिसने आतंकवादियों के खिलाफ़ फ़तवा जारी किया हो ?
६. महाराष्ट्र, बिहार, केरल जैसे हिन्दू बहुल राज्यों में मुस्लिम मुख्यमन्त्री हो चुके हैं, क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि मुस्लिम बहुल राज्य “कश्मीर” में कोई हिन्दू मुख्यमन्त्री हो सकता है ?
७. १९४७ में आजादी के दौरान पाकिस्तान में हिन्दू जनसंख्या 24% थी, अब वह घटकर 1% रह गई है, उसी समय तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब आज का अहसानफ़रामोश बांग्लादेश) में हिन्दू जनसंख्या 30% थी जो अब 7% से भी कम हो गई है । क्या हुआ गुमशुदा हिन्दुओं का ? क्या वहाँ (और यहाँ भी) हिन्दुओं के कोई मानवाधिकार हैं ?
८. जबकि इस दौरान भारत में मुस्लिम जनसंख्या 10.4% से बढकर 14.2% हो गई है, क्या वाकई हिन्दू कट्टरवादी हैं ?
९. यदि हिन्दू असहिष्णु हैं तो कैसे हमारे यहाँ मुस्लिम सडकों पर नमाज पढते रहते हैं, लाऊडस्पीकर पर दिन भर चिल्लाते रहते हैं कि “अल्लाह के सिवाय और कोई शक्ति नहीं है” ?
१०. सोमनाथ मन्दिर के जीर्णोद्धार के लिये देश के पैसे का दुरुपयोग नहीं होना चाहिये ऐसा गाँधीजी ने कहा था, लेकिन 1948 में ही दिल्ली की मस्जिदों को सरकारी मदद से बनवाने के लिये उन्होंने नेहरू और पटेल पर दबाव बनाया, क्यों ?
११. कश्मीर, नागालैण्ड, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय आदि में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं, क्या उन्हें कोई विशेष सुविधा मिलती है ?
१२. हज करने के लिये सबसिडी मिलती है, जबकि मानसरोवर और अमरनाथ जाने पर टैक्स देना पड़ता है, क्यों ?
१३. मदरसे और क्रिश्चियन स्कूल अपने-अपने स्कूलों में बाईबल और कुरान पढा सकते हैं, तो फ़िर सरस्वती शिशु मन्दिरों में और बाकी स्कूलों में गीता और रामायण क्यों नहीं पढाई जा सकती ?
१४. गोधरा के बाद मीडिया में जो हंगामा बरपा, वैसा हंगामा कश्मीर के चार लाख हिन्दुओं की मौत और पलायन पर क्यों नहीं होता ?
१५. क्या आप मानते हैं – संस्कृत सांप्रदायिक और उर्दू धर्मनिरपेक्ष, मन्दिर साम्प्रदायिक और मस्जिद धर्मनिरपेक्ष, तोगडिया राष्ट्रविरोधी और ईमाम देशभक्त, भाजपा सांप्रदायिक और मुस्लिम लीग धर्मनिरपेक्ष, हिन्दुस्तान कहना सांप्रदायिकता और इटली कहना धर्मनिरपेक्ष ?
१६. अब्दुल रहमान अन्तुले को सिद्धिविनायक मन्दिर का ट्रस्टी बनाया गया था, क्या मुलायम सिंह को हजरत बल दरगाह का ट्रस्टी बनाया जा सकता है ?
१७. एक मुस्लिम राष्ट्रपति, एक सिख प्रधानमन्त्री और एक ईसाई रक्षामन्त्री, क्या किसी और देश में यह सम्भव है, यह सिर्फ़ सम्भव है हिन्दुस्तान में क्योंकि हम हिन्दू हैं और हमें इस बात पर गर्व है, दिक्कत सिर्फ़ तभी होती है जब हिन्दू और हिन्दुत्व को साम्प्रदायिक कहा जाता है ।
स्वामी विवेकानन्द ने कहा था – “हिन्दुत्व कोई धर्म नहीं है, यह एक उत्तम जीवन पद्धति है” । गाँधी के खिलाफ़त आन्दोलन के समर्थन और धारा ३७० पर भी काफ़ी कुछ लिखा जा चुका है और ज्यादा लिखने की जरूरत नहीं है, इसलिये नहीं लिखा, फ़िर भी…..उपरिलिखित विचार किसी राजनैतिक उद्देश्य के लिये नहीं हैं, ये सिर्फ़ ध्यान से चारों तरफ़ देखने पर स्वमेव ही दिमाग में आते हैं और एक सच्चे देशभक्त नागरिक होने के नाते इन पर प्रकाश डालना मेरा कर्तव्य है
(एक ई-मेल के सम्पादन और अनुवाद पर आधारित)

>मटुकनाथ और जूली कस्बा-ए-उज्जैन में

>अभी कुछ सप्ताह पहले ही इन्दौर में एक समाचार पत्र के उदघाटन समारोह में मीडिया द्वारा बहुचर्चित “लव-गुरु” (?) मटुकनाथ और उनकी प्रेमिका जूली को आमंत्रित किया गया था, समाचार पत्र का नाम है “धर्मयुद्ध”…कैसा लगा नाम और उस नाम से “मैच” करता उनका उदघाटनकर्ता । अब यह सोचने की बात है कि मटुकनाथ और जूली को सामने रखकर किस प्रकार का “धर्मयुद्ध” लड़ने की तैयारी की जा रही है ? क्या अब समाचार-पत्र भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरह बेशर्म और समाज से कटे हुए होने लगे हैं ? यदि हाँ, तो यह एक राष्ट्रीय चिन्ता का विषय नहीं होना चाहिये ? प्रेस काऊंसिल किस मर्ज की दवा है ? और यदि नहीं… तो फ़िर इस तरह के “आइकॉन” (? यदि वे हैं तो यह हमारा दुर्भाग्य है) को एक समाचार पत्र के उदघाटन के लिये बुलाने का क्या मकसद है ? उक्त समाचार पत्र किस तरह की खबरें अपने पाठकों को देना चाहेगा, क्या यह उसका पूर्वाभास मात्र था, या येन-केन प्रकारेण किसी भी भौंडे तरीके से क्यों ना हो…थोडा सा प्रचार हासिल करना या अपने “प्रोडक्ट” के बारे में ध्यान आकर्षित करवाना ? लेकिन जब कोई अखबार एक “प्रोडक्ट” बन जाता है तो वह आम जनता के सरोकारों से कट जाता है, उसका एकमात्र उद्देश्य अधिक से अधिक “बिकना” होता है, जैसा कि टीवी चैनलों के “टीआरपी” से सन्दर्भ में होता है, जिसके लिये वे किसी भी हद तक गिर सकते हैं… बहरहाल बात है मटुकनाथ और जूली की… चूँकि वे इन्दौर आये थे तो जैसा कि सभी लोग करते हैं वे हमारे उज्जैन भी पधारे…महाकाल के दर्शन करने और एक कार्यक्रम में भाग लेने । कार्यक्रम क्या था ?… अजी उनका सम्मान, और क्या ? चौंकिये नहीं.. उन जैसों का ही आजकल सम्मान होता है । तो वे इस कस्बानुमा, “टू बी शहर” और इन्दौर की भौंडी नकल में माहिर, स्थल पर पधारे । जैसा कि हरेक कस्बे या छोटी जगहों में होता है एक गुट विशेष के लोगों का मीडिया पर, उदघाटन समारोहों, सम्मान समारोहों आदि पर कब्जा होता है, उन्हीं मे से कुछ लोग फ़िर लायंस या रोटरी जैसे “स्टार” युक्त क्लबों के महानुभाव भी होते हैं, उनकी उपस्थिति में इन दोनों हस्तियों का सम्मान किया गया.. हँसी-ठिठोली की गई..खी-खी करके दाँत भी निपोरे गये, लोकल मीडिया ने उन्हें अच्छा कवरेज दिया (देना ही था, क्योंकि उनका ‘इंतजाम’ पूरा किया गया था)। इस पूरे तमाशे में सबसे अधिक खटकने वाली बात यह थी कि मटुकनाथ का सम्मान करने वालों में अधिकतर वे तथाकथित संभ्रांत लोग थे जो समाज के उच्च तबके के कहे जाते हैं, जिनसे उम्मीद (झूठी ही सही) की जाती है कि वे समाज में व्याप्त बुराईयों के खिलाफ़ आवाज उठायेंगे… इन्हीं लोगों ने सबसे पहले फ़िल्म “निःशब्द” की आलोचना की थी, शायद वह इसलिये होगी कि अमिताभ बाबा मन्दिरों के चक्कर लगाते-लगाते जिया खान से इश्क क्यों फ़रमाने लगे, कुछ ऐसे लोग भी उस सम्मान समारोह में थे, जिन्होंने “वाटर” का विरोध किया था, कुछ ऐसे लोग भी थे जो भारत की क्रिकेट टीम के हारने पर सर मुंडवा लेंगे, लेकिन परदे की झूठी छवियों का विरोध करने वाले ये खोखले लोग उस मटुकनाथ के सम्मान समारोह में खुशी-खुशी उपस्थित थे, जो अपनी ब्याहता पत्नी और बच्चों को छोडकर अपने से आधी उम्र की एक छोकरी के साथ सरेआम बेशर्मी से घूम रहा था, हँस रहा था । उन तथाकथित सज्जनों से एक सवाल करने को जी चाहता है कि यदि उनकी पुत्री को उनकी आँखों के सामने उसी का टीचर भगा ले जाये, तो वे क्या करेंगे ? क्या संस्कृति पर खतरे वाली बात उस समय वे भूल जायेंगे ? या इसे भी हँसकर टाल देंगे और बेटी से कहेंगे “कोई बात नहीं..तू एक शादीशुदा के साथ उसकी प्रेमिका बनकर रह, हमें कोई आपत्ति नहीं है” । और आज ही एक खबर पर नजर गई…कि बिहार में एक और “लव-गुरु” (?) ने अपनी पत्नी को त्यागकर अपनी शिष्या से प्रेम विवाह कर लिया है । लगता है कि ये तो अभी शुरुआत है, आगे-आगे देखिये होता है क्या…

मटुकनाथ और जूली कस्बा-ए-उज्जैन में

अभी कुछ सप्ताह पहले ही इन्दौर में एक समाचार पत्र के उदघाटन समारोह में मीडिया द्वारा बहुचर्चित “लव-गुरु” (?) मटुकनाथ और उनकी प्रेमिका जूली को आमंत्रित किया गया था, समाचार पत्र का नाम है “धर्मयुद्ध”…कैसा लगा नाम और उस नाम से “मैच” करता उनका उदघाटनकर्ता । अब यह सोचने की बात है कि मटुकनाथ और जूली को सामने रखकर किस प्रकार का “धर्मयुद्ध” लड़ने की तैयारी की जा रही है ? क्या अब समाचार-पत्र भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरह बेशर्म और समाज से कटे हुए होने लगे हैं ? यदि हाँ, तो यह एक राष्ट्रीय चिन्ता का विषय नहीं होना चाहिये ? प्रेस काऊंसिल किस मर्ज की दवा है ? और यदि नहीं… तो फ़िर इस तरह के “आइकॉन” (? यदि वे हैं तो यह हमारा दुर्भाग्य है) को एक समाचार पत्र के उदघाटन के लिये बुलाने का क्या मकसद है ? उक्त समाचार पत्र किस तरह की खबरें अपने पाठकों को देना चाहेगा, क्या यह उसका पूर्वाभास मात्र था, या येन-केन प्रकारेण किसी भी भौंडे तरीके से क्यों ना हो…थोडा सा प्रचार हासिल करना या अपने “प्रोडक्ट” के बारे में ध्यान आकर्षित करवाना ? लेकिन जब कोई अखबार एक “प्रोडक्ट” बन जाता है तो वह आम जनता के सरोकारों से कट जाता है, उसका एकमात्र उद्देश्य अधिक से अधिक “बिकना” होता है, जैसा कि टीवी चैनलों के “टीआरपी” से सन्दर्भ में होता है, जिसके लिये वे किसी भी हद तक गिर सकते हैं… बहरहाल बात है मटुकनाथ और जूली की… चूँकि वे इन्दौर आये थे तो जैसा कि सभी लोग करते हैं वे हमारे उज्जैन भी पधारे…महाकाल के दर्शन करने और एक कार्यक्रम में भाग लेने । कार्यक्रम क्या था ?… अजी उनका सम्मान, और क्या ? चौंकिये नहीं.. उन जैसों का ही आजकल सम्मान होता है । तो वे इस कस्बानुमा, “टू बी शहर” और इन्दौर की भौंडी नकल में माहिर, स्थल पर पधारे । जैसा कि हरेक कस्बे या छोटी जगहों में होता है एक गुट विशेष के लोगों का मीडिया पर, उदघाटन समारोहों, सम्मान समारोहों आदि पर कब्जा होता है, उन्हीं मे से कुछ लोग फ़िर लायंस या रोटरी जैसे “स्टार” युक्त क्लबों के महानुभाव भी होते हैं, उनकी उपस्थिति में इन दोनों हस्तियों का सम्मान किया गया.. हँसी-ठिठोली की गई..खी-खी करके दाँत भी निपोरे गये, लोकल मीडिया ने उन्हें अच्छा कवरेज दिया (देना ही था, क्योंकि उनका ‘इंतजाम’ पूरा किया गया था)। इस पूरे तमाशे में सबसे अधिक खटकने वाली बात यह थी कि मटुकनाथ का सम्मान करने वालों में अधिकतर वे तथाकथित संभ्रांत लोग थे जो समाज के उच्च तबके के कहे जाते हैं, जिनसे उम्मीद (झूठी ही सही) की जाती है कि वे समाज में व्याप्त बुराईयों के खिलाफ़ आवाज उठायेंगे… इन्हीं लोगों ने सबसे पहले फ़िल्म “निःशब्द” की आलोचना की थी, शायद वह इसलिये होगी कि अमिताभ बाबा मन्दिरों के चक्कर लगाते-लगाते जिया खान से इश्क क्यों फ़रमाने लगे, कुछ ऐसे लोग भी उस सम्मान समारोह में थे, जिन्होंने “वाटर” का विरोध किया था, कुछ ऐसे लोग भी थे जो भारत की क्रिकेट टीम के हारने पर सर मुंडवा लेंगे, लेकिन परदे की झूठी छवियों का विरोध करने वाले ये खोखले लोग उस मटुकनाथ के सम्मान समारोह में खुशी-खुशी उपस्थित थे, जो अपनी ब्याहता पत्नी और बच्चों को छोडकर अपने से आधी उम्र की एक छोकरी के साथ सरेआम बेशर्मी से घूम रहा था, हँस रहा था । उन तथाकथित सज्जनों से एक सवाल करने को जी चाहता है कि यदि उनकी पुत्री को उनकी आँखों के सामने उसी का टीचर भगा ले जाये, तो वे क्या करेंगे ? क्या संस्कृति पर खतरे वाली बात उस समय वे भूल जायेंगे ? या इसे भी हँसकर टाल देंगे और बेटी से कहेंगे “कोई बात नहीं..तू एक शादीशुदा के साथ उसकी प्रेमिका बनकर रह, हमें कोई आपत्ति नहीं है” । और आज ही एक खबर पर नजर गई…कि बिहार में एक और “लव-गुरु” (?) ने अपनी पत्नी को त्यागकर अपनी शिष्या से प्रेम विवाह कर लिया है । लगता है कि ये तो अभी शुरुआत है, आगे-आगे देखिये होता है क्या…