>बच्चे जब आपके बाप बन जाएँ तो उनका सम्मान करें

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खुशी मनाने के कुछ बिन्दु

1- आपके परिवार के बेटे-बेटी मानने लगें कि उनका जन्म आपके परिवार की अभिलाषा नहीं वरन् उन बच्चों के माता-पिता के शारीरिक सुखों की परिणति है।

2- आपके बच्चे मानते हों कि आपने उनके लिए कभी कुछ किया ही नहीं जो कुछ किया है वो इस कारण से क्योंकि आपने अपने शारीरिक सुखों के एवज में उनको पैदा करने का अपराध जो किया था।

3- इस अपराध की सजा के रूप में आपने अपने बच्चों की परवरिश की।

4- खुशी मनाइये कि आपके बच्चे अब आपका कहा हुआ बिलकुल भी नहीं मानते।

5- आपका कुछ भी कहना उनके ऊपर तानाशाही दिखाने जैसा लगने के कारण वे अब घर से बाहर रहना शुरू कर रहे हैं।

6- जलसा मनाइये कि आपके बच्चे अब खुल्लमखुल्ला अपने विपरीतलिंगियों के साथ दिन गुजारने के साथ-साथ रातें भी गुजार रहे हैं।

7- यह आपके लिए खुशी की बात है कि इतनी उम्र के बाद भी आपकी बेटी गर्भवती नहीं हुई है और न ही किसी लड़की ने आकर आपके बेटे से कहा है कि मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बनने वाली हूँ, अर्थात दोनों सुरक्षित साधनों का प्रयोग कर रहे हैं।

8- खुशी अब मनाइये कि आपके बच्चों ने आपको दादा-नाना बनाने वाली खुबर सुना दी, वह भी बिना शादी किये। इसका मतलब है कि आपके बच्चे उतने पिछड़े नहीं जितना कि मुहल्ले वाले समझ रहे थे।

9- यह क्या कम खुशी की बात है कि आपके मना करने की स्थिति में आपके बच्चे घर से भाग सकते हैं। आप उनके भागने का नहीं उनके किसी भी ऐरे-गैरे से शादी करने का इंतजाम करिये।

10- खुश होइये कि आपके ऊपर यह दोष नहीं आयेगा कि आपने अपनी बेटी को किसके पल्ले बाँध दिया अथवा बेटे के पल्ले किसको बाँध दिया।

11- यह तो बहुत खुशी की बात है कि आपकी बेटी ने ऐसे व्यक्ति को अपना जीवनसाथी चुना है जो लगातार अपराध की दुनिया से जुड़ा रहा। आखिर आप ऐसा दामाद खोज सकते थे?

12- यह भी खुश होने वाली खबर है कि आपका बेटा अब तक कइयों लड़कियों को झाँसा देकर गर्भवती बनाता रहा और अब तो शादी कर ही बैठा किसी शादीशुदा महिला से, उसको भगा कर।

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खुश
होने के और भी बिन्दु हैं पर कृपया खुशी में ऑनर किलिंग जैसी हरकत नहीं कीजिए। आप स्वयं विचार करके देखें कि आपको इतनी इज्जत और कौन देगा? आपके बेटे और बेटी ही यदि इस तरह की इज्जत नहीं देंगे तो क्या समाज देगा? आप अपने बेटे और बेटी का बस यहीं तक अच्छा सोच सकते थे, इसके बाद तो सोचना उनका काम है कि किस लड़के अथवा लड़की के साथ वो सुखी रहेंगे।

आप क्यों बिलावजह अपने आदेश को पारित करने का प्रयास करते हैं। याद रखिये एक उम्र के बाद आपके बेटे और बेटियाँ आपके बाप हो जाते हैं। इस अवस्था में आपको अपने इन दत्तक बापों का आदर करना चाहिए।

ऐसे बेटे और बेटियों को ससम्मान समाज में प्रतिष्ठित करो जो अपने माता-पिता की गरिमा, उनकी भावनाओं का आदर नहीं कर सकते हैं।

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(चित्र गूगल छवियों से साभार)

सन्देश—
ऊपर के संदेश का सार समझें और आइये समाज हित में किसी भी तरह की हिंसा को, किलिंग (जो कम से कम ऑनर जैसी तो नहीं है) को बन्द करें।

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>माया की माया

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माया की माया अपरम्पार है. इनके प्रशंसक इनके गलत कामों में भी अच्छाई ढूढ़ लेते हैं. एसी रूम या न्यूज़ चैनल के दफ्तर में बैठ कर माया का गुणगान करने वाले जमीनी हकीकत से उतने वाकिफ नहीं होते जितनी वे बातें करते हैं.

माया की मायागिरी ने कानपुर की मस्तमौला छवि को बहुत ठेस पहुँचायी है. मायावती को हर वो काम करने में खुशी हासिल होती है, जिसके करने से उन्हें व्यक्तिगत लाभ हो और साथ ही उनके समर्थक उनके जयकारे लगाएं। आम लोगों की परेशानियां से उन्हें कोई सरोकार नहीं है। शहर बिजली और पानी की कमी से त्रस्त है, पर मज़ाल है कि प्रशासन के कान में जूँ तक रेंग जाए. प्रशासन अपने उच्चाधिकारियों को खुश करने के लिए आँकड़ों से खेलता है इसलिए पेपर में बिजली कटौती सिर्फ आठ घंटे दिखाई जाती है, जो हकीकत से परे है. कानपुर के पिछले प्रवास ने मेरी नींद ही उड़ा दी. पता नहीं कौन बुद्धिमान व्यक्ति बिजली कटौती का वक्त निर्धारित करता, वो जो भी होगा, मुफ्त की बिजली का उपभोग कर रहा होगा और बिजली उसके यहां से न जाए इसकी व्यवस्था भी उसने पूरी तरह कर रखी होगी, इसीलिए वह आम लोगों की समस्याओं को समझ नहीं पाता।

शहर में बिजली संकट बेकाबू हो चुका है. बिजली कटौती का कोई निर्धारित समय नहीं है. जब बत्ती की सबसे ज्यादा जरूरत होती, तब घंटों के लिए लाइट चली जाती है. इस भीषण गरमी में 12 से 14 घंटे बिजली के गायब रहने से लोग परेशान हैं. बिजली कटौती के अलावा फाल्ट और ब्रेक डाउन के कारण भी घंटों बिजली गायब रहती है. सबसे ज्यादा उलझन तो तब होती है, जब रात के ठीक बारह बजे बिजली गुल हो जाती है जो फिर सुबह ही आती है.

औद्योगिक क्षेत्र की हालत तो और भी खराब है यहां रात में छह घंटे की बिजली की कटौती शुरू होने के साथ, पावर के रेट भी बढ़ा दिए गए हैं. पावर रोस्टिंग से रात की शिफ्ट में फैक्ट्रियां बंद करना मजबूरी हो गई है. इससे मजदूरों के सामने बेरोजगारी का संकट खड़ा हो गया.

केस्को के शहर में तकीब 72 सब स्टेसन और 3323 ट्रांसफ्र्मर हैं. इनके जरिए ही केस्को 3.90 लाख डोमेस्टिक, 86 हजार कामर्शियल, 9 हजार हैवी वावर कंज्यूमर्स, 9 हजार हैवीपावर कंज्यूमर्स तक बिजली पहुँचाता है, लेकिन केस्को की लाइने बेहद जर्जर होने के कारण आए दिन टूट जाती हैं. जम्फर और ट्रंसफार्मर के फ्यूज उड़ना आम बात है. यही हाल ट्रंसफार्मर का है. इसमें ऑयल ही नही, लोड, सिलिका, अर्थिंग आदि जरूरी प्वाइंट को चेक करने भी केस्को लापरवाही बरतता है.

जैसा की मैंने पहले भी कहा की कि माया की माया निराली है. उसे हर कोई नहीं समझ सकता. उनके पास आम जनता को देने के लिए बिजली नहीं है परंतु बुतों को प्रकाशमान रखने के लिए पर्याप्त बिजली है.

इतनी भायनक गरमी में बिजली न आने से लोग बीमार हो हे हैं. छोटे बच्चे गरमी के कारण रात भर रोते रहते हैं तथा स्कूल जाने वाले बच्चे, अपने स्कूल की वैन, बस, रिक्शे या क्लासरूम में अपनी नींद पूरी करते हैं.

कानून व्यवस्था के कहने ही क्या? सड़कों पर अँधेरा छाया रहने के कारण चोर-उचक्कों को राम-राज्य मिल गया है. पुलिस इतनी निकम्मी है कि चार माह की बच्ची के बालात्कारी को लोग इस आशा से पकड़ कर पुलिस के हवाले करते हैं कि वह उस पर कठोर कारर्वाई करेगी, पर पुलिस पैसे देकर मामला रफा-दफा कर देती है.

आपने सुना होगा कि मायावती बुतों की सुरक्षा के लिए एक फोर्स बना रही हैं. इस फोर्स में रिटायर्ड सैनिकों की भरती की जाएगी, ताकि प्रदेश के अराजक तत्त्वों से उनकी रक्षा की जा सके. इन सब कामों के लिए उनके पास पर्याप्त धन है, लेकिन बच्चो की शिक्षा के लिए उनके पास धन नहीं है. मायावती बहुत दूरदर्शी है, उन्हें पता है कि बच्चो को साक्षर बनाने से उन्हें कोई लाभ नहीं है. साक्षरता सोचने समझने की ताकत देती है और उन्हें अपने अधिकारों का ज्ञान कराती है, ऐसी स्थिति में वे सरकार से उसके कामकाज को लेकर प्रति प्रश्न कर सकते हैं। अक्सर देखा गया है कि जब जनता सरकार से प्रति-प्रश्न करती है तो प्रायः सत्ता की चूले हिलने लगती हैं, इसलिए जनता को मूढ़ बनाए रखने में ही सत्ता की भलाई होती है और मयावती वही कर रही हैं लेकिन ऐसा करते हुए वह भूल रही हैं कि इस तरह वे अनपढ़ लोगों की अराजक फौज को जन्म देने जा रही है.

मुलायम और मायावती के शासन ने कानपुर की जनता को काफी हद तक स्वालंबी बना दिया है क्योंकि लाइट कम आती है तो घर-घर में इन्वर्टर आ गए हैं. पानी के लिए भी वे सरकार पर ज्यादा निर्भर नहीं है (खासकर जो नई बस्तियां बनी हैं) हर घर में हैंडपाइप है, मोटर लगी है, जैसे ही बिजली आती है, लोग पानी भरने के लिए दौड़ पड़तें है। नहीं तो हैंडपम्प तो है ही। इसलिए यहां इस बात का कोई चिंतन नहीं है की सरकार पानी देती है या नहीं, लेकिन उन इलाको में जहां पानी की सप्लाई सरकार द्वारा की जाती है हालत बहुत खराब है. लोग बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं। और पानी के लिए झगड़ा होना आम बात है।

पानी और बिजली से संबंधित एक बड़ा रोचक तथ्य है कि पानी नहीं आता पर वाटर टैक्स आता है. इसी तरह शहर के बिजली चोरों के कारण सरकार को जो राजस्व की हानि होती है उसका हरजाना नियमित रूप से बिजली का बिल भरने वालों से वसूला जाता है. वैसे कानपुर के बारे में बहुजन समाजवादी पार्टी की राय कम रोचक नहीं है, वे कहते हैं कि जब कानपुर के लोगों ने हमें एक भी सांसद और विधायक नहीं दिया है तो हम उनके विकास पर क्यों ध्यान दें?

मायावती को समझना चाहिए कि वे सिर्फ दलित वोटों से जीत कर सत्ता में नहीं आई है. उनको जिताने में सभी जाति और धर्म के लोगों का हाथ है. जनता ने उन्हें स्पष्ट बहुमत इसलिए दिया था ताकि प्रदेश का विकास सुचारु रूप से हो सके न की प्रदेश के विकास को दरकिनार कर सारा पैसा बुतों की तामीर में खर्च कर दिया जाए. अभी भी समय है यदि सरकार चेत जाए तो प्रदेश का भविष्य बदल सकता है।

-प्रतिभा वाजपेयी.

>क्या इंसा जो लेकर आया

>कितने सपने संजोये हमने
पर वो ख्वाब अधुरे है
सावन आये पल के लिए
पर पतझड़ अभी भी पूरे है

ये नदिया बहती सदियों से
पर सागर में मिल जाती है
अरे फूल खीले हो कितने भी
पर एक दिन वो मुरझाते/मिट जाते है

क्या इंसा जो लेकर आया
क्या लेकर वो जायेगा
खुषी मिले या गम कितने भी
सब छोड़ यहां चला जायेगा


जब अज्ञानी मैं जो था
ये तेरा ये मेरा था
जब जाना ये सबकुछ मैंने
सब माया का फेरा था

सोचा था मैंने कुछ हटके
जाउ जग से नया कुछ करके
वरना खुदा फिर कहेगा मुझसे
आया एक नया पशु फिर मर के

        कितने सपने संजोये हमने
        पर वो ख्वाब अधुरे है
        सावन आये पल के लिए
        पर पतझड़ अभी भी पूरे है

>मैं कहता, यहाँ लोकतंत्र नहीं

>हाँ बहुत दुःख होता है,
जब कोई भूखा सोता है.
ये दिल मेरा कलपता है,
जब एक नेता चार हजार करोड़ लूट कर
उन भूखो का निवाला छीन लेता है.
दर्द फिर तब होता हैं
जब ऐसे राजनेताओं को सजा मिलना
मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन होता है.
आत्मा धिक्कारते है,
ऐसे लोगो को, जो विकास की झूठी ख़बरें फैलाते हैं.
तरस होता है ये देखकर
जब लोग कसाब के लिए फांसी नहीं मांगते
बस मुंबई के बेगुनाहों को याद करते मोमबत्तियां जलाकर
सुनकर हंसी आती है
देश का चौथा स्तम्भ भी हिल गया है.
जो नोट लेकर सरकारी नेताओ से मिल गया है.
डर लगता है ऐसे मानवाधिकार से
जिसका पूरा चरित्र ही बदल गया है.
अफज़ल को हर कीमत पर छोड़ दो
क्या ये भी पाकिस्तान से मिल गया है.
गुस्सा आता है… कुछ कामचोर पार्टियो से
जो आम जनता का काम नहीं करते
बस देते रहते भाषण
हैं राम के ये भक्त
पर अल्लाह-अल्लाह कहकर
बात-बात पर कहते, दे दो उन्हें आरक्षण
घिन्न आती है ऐसे समाज से
जो आधुनिकता का लिवास ओढ़कर
खुले अंग की नुमाईस करते
और मुह फेर लेते भारतीय शर्म, हया और लाज से
अफसोस होता है ये देखकर
बेतुकी कहानियों वाली अधनंगी फिल्म
बॉक्स ऑफिस पर हिट जाती है
और “ये मेरा इंडिया, १९७१, स्वदेश” जैसी फिल्मे
बॉक्स ऑफिस पर पिट जाती है.
निराशा घेर लेती है चारो ओर
जब भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, क्षेत्रवाद, जातिवाद, फैला हो हर ओर
क्या मिलता है उन्हें
जो सैनिक, सीमा में शहीद हो जाते है.
मिलता है तो बस, उन खिलाडिओं को
जो जीते या हारे
बस जाकर आइपीएल में शामिल हो जाते है.
मैं कहता, यहाँ लोकतंत्र नहीं है.
बिलकुल राजतन्त्र सी कहानी है
जहाँ प्रधान कोई मंत्री नहीं
न कोई मंत्री प्रधान है.
यहाँ प्रधान तो है एक युवराज
जिसकी इतालियन मम्मी यहाँ की रानी है.
लगता है छोड़ दू सब कुछ सोचना
उस ऊपर वाले के हाल पर
शायद वो कुछ नया कर दिखाए
आने वाले अगले साल पर.

>तो फिर अब नपुंसक जनता तैयार रहे

>

देश की नीति-नियती निर्धारित करने वाली राष्ट्रीय राजधानी की गलियों में मंहगाई के खिलाफ गूंजते नारे नक्कारखाने में तूती की बोलती से अधिक कुछ और नहीं है। सशक्त विपक्ष के रूप में खुद को साबित करने के लिए भाजपा ने जनता की दुखती रग पर हाथ रखा है .आलू-प्याज ,आटा-दाल, तेल-पानी, बिजली-बस- मेट्रो की बढ़ती महंगाई के मुद्दे पर दिल्ली बंद , भाजपा कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे, अनेक जगहों पर दुकाने और परिवहन सेवा ठप रही परन्तु क्या इसे बंद कहा जाना चाहिए? नहीं यह एक राजनैतिक दल का सफल अभियान जरूर है, पर बंद नहीं।
बंद से जनता नदारद रही। जीने के लिए आवश्यक हर वस्तु की कीमत सुरसा मुख की तरह बढ़ती जा रही है। महंगाई का रोना हर कोई रो रहा है। जब कुछ करने की बारी आती है तो मुंह छुपा कर घर में दुबक जाते हैं। क्या ऐसे अकर्मण्य नागरिकों को महंगाई के लिए सरकार को कोसने का हक है जो अपने हक की लड़ाई नहीं लड़ सकते?
अकर्मण्यता या कर्म भीरूता का यह विषाणु तो सदियो से हमारे भीतर रहा है। जो मानव इतिहास में सबसे अधिक 1500 सालों तक पराधीन रहने का कारण है। अंग्रेजो से आजादी की लड़ाई के वक्त ९५% भारतीय सामान्य गुलामी की जिंदगी बसर कर रहे थे। 5 % लोग लड़ते और शहीद होते रहे तभी गांधी नाम एक उद्घारक आया जिसने उन कायरों को कलंक धोने लायक बना डाला। गांधी ने जब समझाया कि बगैर कुछ खोए सभा में बैठकर सड़को पर नारे लगाकर हमें आजादी पा सकते है तब ये चूहो की तरह बिलों से निकल-निकल कर गांधी सभाओं में,अहिंसक आंदोलनों में भागीदारी करने लगे। अपनी कायरता/नपुंसकता को सहिष्णुता / अहिंसकता/ दयालुता के चादर में लपेट कर आने वाली पीढी को अपने देशप्रेम का सबूत दिया गया।
आज परिस्थितियां और भी बदतर है। अपने ही चंद लोगों ने गुलाम बना रखा है हमें। हमारी जरूरतों की एक-एक चीज, हमारी शिक्षा, हमारी जीवनशैली, चंद उद्योगपतियों, जन प्रतिनिधियों और कुछ विदेशी दलालों (जिनमें मीडियाकर्मियों से लेकर नव एनजीओ चालक तक शामिल है) के अनुसार तय होती है। इनकी पकड़ सामाजिक राजनीति और आर्थिक व्यवस्था पर इतनी सूक्ष्म है कि नंगी आंखों से एक बारगी देखने पर भी समझ पाना बेहद कठिन है।
लेकिन कुछ चीजें प्रत्यक्ष दिखती हैं जैसे महंगाई। महंगाई जैसी कुव्यवस्था से लड़ने का लोकतांत्रिक हथियार है बंद, चक्का जाम, धरना प्रदर्शन। आज जनता में इतना साहस भी नहीं बचा कि अपनी ही चुनी हुई सरकार से अपने प्रतिनिधि से महंगाई का हिसाब मांग सके। सरकार निकम्मी थी तो काम चल जाता था। भ्रष्टाचार से लेकर महंगाई और सुरक्षा आदि मुद्दों पर विपक्ष जनता के साथ मिलकर सरकार का घेराव करती थी और सरकार को जनहित को प्राथमिकता देनी पड़ती। अब सरकार के साथ-साथ जनता निकम्मी हो चली है।
अपने हक की लड़ाई को राजनीति का हिस्सा समझ कर खुद को उससे अलग मानने लगी है। सरकार और विपक्ष के बीच बैटिंग-बॉलिंग हो रही है और फील्डिंग करने वाली जनता नदारद है। ऐसे हालात में लोकतंत्र का यह खेल ज्यादा समय तक सुचारू रूप से खेला जाना संभव नहीं है।
“ठेके’’ के इस युग में सरकार जिस तरह से सार्वजनिक उपक्रमो को निजी कंपनियों के हवाले कर रही है वैसे ही जनता ने अपने अधिकार और कर्तव्य दोनों नेताओ को ठेके पर दे रखा है तो फिर अब नपुंसक जनता तैयार रहे…………….. किस चीज के लिए………….. यह तो वक़्त बताएगा।

>महाराष्ट्र की जनता -जनार्दन का सार्थक कदम

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उम्मीदवारों के भाग्य का विधाता तो मतदाता ही होता है। कई दिग्गजों और मंत्रियों को घर का रास्ता दिखाने के साथ ही तमाम राजनेताओं के लाडलों को विधायक बना दिया। मगर उन प्रत्याशियों को मतदाताओं ने धोखा दे दिया, जो आपराधिक पृष्ठभूमि के थे। महाराष्ट्र की विभिन्न अदालतों में जिन प्रत्याशियों के खिलाफ मामला दर्ज हैं, उनमें मंत्री, विधायक और पहली बार किस्मत आजमा रहे नेताओं का समावेश था। सभी को मतदाताओंने विधानसभा जाने से रोक दिया। अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि के लिए मशहूर निवर्तमान राज्यमंत्री सिद्धराम म्हात्रे, विधायक पप्पू कालानी, अरूण गवली, हितेंद्र ठाकुर को जहां झटका लगा है, वहीं शिवसेना प्रत्याशी विजय चौगुले और मनसे के सुधाकर चव्हाण की उम्मीदों पर पानी फिरा है। सोलापुर की अक्कलकोट सीट से पूर्व में कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुने गए सिद्धराम म्हात्रे को आघाड़ी सरकार में गृहराज्य मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद से नवाजा गया था। अपने आपराधिक इतिहास के चलते इस चुनाव में म्हात्रे को मतदताओं को बेरूखी की शिकार होना पड़ गया और वे विधायक बनते-बनते रह गए। माफिया डॉन से राजनेता बने अखिल भारतीय सेना प्रमुख अरूण गवली पिछली बार तो विधायक बन लिए थे, लेकिन इस चुनव में उसको पराजय का मुंह देखना पड़ा। इसी तरह उल्हासनगर के बाहुबली विधायक पप्पू कालानी को भी इस चुनाव में भाजपा के कुमार आयलानी के सामने पराजय का मुंह देखना पड़ा। अपने आपराधिक सम्राज्य के बूते लंबे समय से उल्हासनगर की सत्ता पर काबिज कालानी की पत्नी ज्योति वहां की महापौर भी रह चुकी हैं। फिलहाल ज्योति कालानी इस समय राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में हैं और पप्पू कालानी रिपब्लिकन पार्टी से विधायक चुने गए थे। इस बार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उतरे कालानी को मतदाताओं ने खारिज कर दिया। वसई के निर्वतमान विधायक हितेंद्र ठाकुर का नाम भी बाहुबली विधायकों की सूची में दर्ज है। गत लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपनी पार्टी बहुजन विकास आगाड़ी का सांसद भी पालघर क्षेत्र में जिताया। सांसद बलीराम जाधव ने केंद्र में कांग्रेस का समर्थन दिया, तो विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने तीन सीटें ठाकुर के लिए छोड़ दी। ठाकुर की पार्टी से बोईसर में चुनाव लड़ रहे विलास तरे के साथ ही जूनियर ठाकुर क्षितिज नालासोपारा से तो जीतने में कामयाब रहे, लेकिन पैनल से वसई सीट पर उतरे नारायण माणकर को निर्दलीय विवेक पंडित ने ढेर कर दिया। ज्ञात हो कि नायगांव से लेकर विरार तक ठाकुर कंपनी का एकछत्र साम्राज्य हुआ करता था, लेकिन हाल ही में ठाकुर समेतउसके समर्थकों पर जिस तरह से ग्रामीणों ने हमला किया। उससे हितेंद्र को जमीन खिसकती हुई नजर आई और उन्होंने रणछोड़ दास बनने में ही भलाई समझी। हितेंद्र का अंदाज सही निकला वो समझ गए थे कि अगर इस सीट से लड़े तो इज्जत का कचरा हो जाएगा। इसलिए मैदान से हट गए और आखिरकार उनके उम्मीदवार को शिवसेना समर्थित विवेक पंडित ने पराजित कर दिया। आपराधिक इतिहास वाले उम्मीदवारों में ऐरोली से शिवसेना प्रत्याशी विजय चौगुले का भी नाम आता है, जो सिर्फ राकांपा प्रत्याशी संदीप नाईक से हार गए, क्योंकि क्रिमिनल रिकार्ड की वजह से वहां के मतदाताओं ने चौगुले को नापसंद कर दिया। लोकसभा चुनाव में संदीप के बड़े भाई संजीव के सामने भी चौगुले अपनी आपराधिक छवि के कारण हार गए थे। इसी क्रम में ओवला माजीवड़ा सीट से मनसे प्रत्याशी सुधाकर चव्हाण की पराजय का कारण भी उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि ही रही। उनके सामने उतरे शिवसेना प्रत्याशी प्रताप सरनाईक अपनी स्वच्छ छवि के चलते मैदान मारने में कामयाब रहे। कुल मिलाकर इस चुनाव के परिणामों से साफ जाहिर हो गया कि विधानसभा में आपराधियों की बजाय उन्हें भेजा जाए, जिनका दामन साफ हो।

साभार : हम प्रवासी ब्लॉग से {http://humhaipravasi.blogspot.com/2009/11/blog-post.html}

महाराष्ट्र की जनताजनार्दन ने सालों से लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में व्याप्त अपराधीकरण के पुजारियों को वोटों की मार से बाहर का रास्ता दिखा दिया है जो बेहद सराहनीय पहल हैइस चुनाव से भारतवर्ष के सभी मतदाताओं को सबक लेने की जरुरत हैमहाराष्ट्र की जनता ने अपराधियों से अपने प्रतिनिधित्व को मुक्त कर यह साबित किया है कि आज भी लोकतंत्र में जनता हीं जनार्दन हैकम से कम बिहार और यूपी की जनता को आज ऐसे हीं सुधारात्मक कदम उठाने की जरुरत हैआख़िर कब तक बेवकूफ बनेगी बिहार और यूपी की जनता ? सत्ता परिवर्तन तो जरुर हुआ है पर क्या फायदा , राज तो वही चंद बाहुबलियों का है ! आज बसपा में है कल सपा में , आज राजद तो कल जदयू ,इन गुंडों से छुटकारा कहाँ है ? चुनाव आयोग भी सिस्टम के हाथों मजबूर होकर हाथ पर हाथ धरे बैठी है लेकिन जनता इतना तो कर हीं सकती है कि जिनके ऊपर किसी प्रकार की आपराध का आरोप हो उनको चुनाव की दौड़ से बाहर का रास्ता दिखाए

>नक्सलवाद पर डॉ० मधु लोमेश के विचार

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नक्सल आतंकवाद ,माओवादी हिंसा की घटनाएँ जो कभी छिट-पुट रूप में दिखाई देती थी आज  तकरीबन देश के बीस राज्यों में पैर पसारे दिख रही है .राजनीतिक गलियारों में भले हीं इसे किसी आतंकवाद के सदृश घोषित कर दिया हो पर आम जनता  इस  सत्य   को  जान  चुकी  है  कि  वास्तव  में  ऐसी  घटनाएँ  सरकारी  तंत्र  की  विफलता ,अव्यवस्था , भ्रष्टाचार ,सरकारी  धन  के  दुरूपयोग , नीतियों  के  सही  क्रियान्वयन  ना  होने  से  उत्पन्न   आक्रोश ,असंतोष  की  ही  परिचायक  है  जिसे  हम  सब   जज्ब  किये  बैठे  हैं . उनके  हिंसक  प्रदर्शनों ,हमलों  पर  रोक -थाम  के  लिए  आवश्यक  है  कि  सरकार  अपनी  कथनी  और  करनी  के  अंतर  की समीक्षा  करे .नक्सल प्रभावित  संवेदनशील  इलाकों  में  अंतर्विरोधों  को  समाप्त  करने  की  पहल   करें . रोटी ,कपडा  ,मकान  ,रोजगार  समंधी  ठोस  कदम उठाये   ना  कि  बल  पूर्वक  नाक्साली  आन्दोलन  को  कुचलते  हुए  उन्हें  अधिक  उग्र  बनने  पर  विवश  करे .
हिंसा  किसी  समस्या  का  समाधान  नहीं  पर  विकास  के  नाम पर करोडों  के  घोटाले ,सरकार  की  उदासीनता , नेताओं  की  स्वार्थलोलुपता  , भुखमरी ,बेरोजगारी  से  जूझते  लोगों  के  नक्सालियों  के  रूप  में  परिवर्तित  होने  के  लिए  जिम्मेदार  कौन  है ? इस  की  समीक्षा  की  जानी  चाहिए …
डॉ० मधु लोमेश { अदिति महाविद्यालय में पत्रकारिता की शिक्षिका है }

>In INDIA we are not INDIANS

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बेगानेपन का अहसास दबाये दिल वालों की दिल्ली में पूर्वोत्तर भारतीय समय काट रहे हैं .मुनिरका ,मुखर्जीनगर ,कटवारिया ,लाडोसराय आदि  इलाकों के दरबे जैसे घरों में रहने वाले इन बेगाने भारतीयों को कदम-कदम पर अपमान का घूंट पी कर जीना पड़ता है . राह चलते चिंकी ,सेक्सी , माल ,नेपाली ,चाइनीज जैसे फिकरे सुनना तो इनकी नियति बन गयी है . हद तो तब हो जाती है मनचले हाथ लगाने पर उतर आते हैं . ऐसा नहीं है कि ये हरकतें कम-पढ़े लिखे आवारा किस्म के लड़के करते हैं बल्कि डीयु ,जामिया,आई आई टी सरीखे नामी गिरामी शिक्षण संसथानों के तथाकथित सभी छात्र भी इनसे मज़े लेने में कोई कसर नहीं छोड़ते .राजधानी में पूर्वोत्तर की लड़की की आई आई टी के छात्र द्वारा हत्या और ग्यारहवीं के छात्रों द्वारा जामिया के मॉस कॉम में पढ़ रही अरुणाचल की लड़की के कपडे फाड़ने की घटना इन बातों को साबित करने के लिए काफी है . इनकी हालत उन बिहारी रिक्शा चालकों जैसी है जिन्हें दायें -बाएं से आने गुजर रहे हर दुपहिया -चरपहिया वालों की लताड़ खानी पड़ती है . इतना हीं नहीं जब तब सरकार की  भेदभावपूर्ण नीतियों  का शिकार भी इन्हें होना पड़ता है . भारोत्तोलक मोनिका देवी मामले में भारतीय खेल प्राधिकरण का रवैया इसका ताजा उदाहरण है .अकसर हम इनको राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल करने की बात करते हैं लेकिन क्या इन सबके बावजूद  पूर्वोत्तर राज्यों से पढ़ाई या नौकरी के लिए देश की राजधानी आए लोगों  के मन में भारतीय होने का अहसास बच पायेगा ?  
ईटानगर में आयोजित एक सेमीनार में का किस्सा याद आ रहा है . हम संयोगवश वहां पहुंचे थे . हमने सेमिनार का विषय “in india we are not indians ” देखा तो आश्चर्यचकित हो गये . अब  अहसास  हो रहा है, वो गलत नहीं थे . पूर्वोत्तर में हमेशा गृहयुद्ध की हालत को भोग रहे ये लोग जब दिल्ली -मुंबई का रुख करते हैं तब हमसे तिरस्कार ,घृणा के सिवा इन्हें क्या मिलता है ?  विश्वबंधुत्व का ढिंढोरा पीटने वाले हम भारतवासी क्या भारतीय कहलाने के काबिल रह गये हैं ?  हम समय के साथ अपने भारतीय होने की अपनी पहचान को खोते जा रहे हैं . यह एक गिरते हुए समाज की तस्वीर है .जो शक्ति खुद के लिए , समाज के लिए और देश के लिए प्रयोग करनी चाहिए थी वह खुद को हीं बदनाम करने में प्रयोग हो रहा है .इस मामले को महज पुलिस कार्यक्षेत्र का मसला समझ कर भूल जाना हमें महंगा पड़ेगा .पुलिस की नाकामी से पहले यह समाज की और समाज से पहले व्यक्ति की नाकामी और पतन का  सूचक है . आखिर ऐसी मानसिकता समाज से हीं तो पैदा हो रही है जो युवाओं को एक खास वर्ग या समुदाय के प्रति नीचता करने को प्रेरित करती है ? समाज को चलाने का दंभ करने वाले बुद्धिजीवी लोग भी इस मसले पर मूकदर्शक बने नज़र आते हैं .मुंबई में राज ठाकरे की गुंडई पर गला फाड़ने वाले पत्रकार बंधू भी गला साफ़ करने में लगे रहते हैं .क्या जो उत्तर भारतीयों के साथ मुंबई में होता है वही पूर्वोत्तर वालों के साथ दिल्ली में नहीं हो रहा है ? फ़िर ,विरोध में भेदभाव क्यों ? क्या देश के चौथे स्तम्भ की उदासीनता { बाकि तो पहले से कन्नी कटे हुए हैं } से मान लिया जाए चीन की बात सही है कि अरुणाचल उनका हिस्सा है ? क्या इसी तरह सांस्कृतिक के आधार पर थोड़े अलग इन भारतीयों को गैरभारतीय मान लिया जाए जिन्हें दिल्ली -मुंबई में शरण दे कर हमने उन पर अहसान किया है ? जरा इन सवालों पर सोचते हुए पूर्वोत्तर में जन्मे बिहार -झारखण्ड में पढ़े -लिखे और दिल्ली में पत्रकारिता कर रहे एक भारतीय की इन पंक्तियों को ध्यान से पढ़िये :-
                                                   
                                               अजनबी शहर में हम जहां हैं वह देश जैसा दिखाई देता है. 
                                                                                पर है परदेश. 
                                                        सरकारी विज्ञप्तियां बताती हैं यह हमारा देश है. 
                                  लेकिन आवाजों का संजाल कहीं न कहीं से कचोट कर हकीकत को सामने रख देता है. 
                                                                         दुष्यंत होते तो कहते:-
                            “हमको पता नहीं था हमे अब पता चला, इस मुल्क में हमारी हूकूमत नहीं रही.”
                                           इसी परदेश और देश की संधि रेखा पर खडे होकर हम बात करेंगे. 
                                         सीमाओं की जो हमने नहीं खींची. धरती पर आने के साथ हमें मिली हैं.
 

>धर्म के नाम पर ऎसी छूट लाजवाब है

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आधुनिकता का हवाला देकर हम आज अपनी संस्कृति, सभ्यता की, धर्म की बहुत सी बातों को विस्मृत करते जा रहे हैं। धर्म-कर्म में हमारा विश्वास उठता जा रहा है। महिलाओं द्वारा किये जा रहे व्रत-त्यौहारों को उनके दकियानूसी होने की संज्ञा दी जाती है। पुरुषों के लिए किये जाने वाले व्रत कहकर उनका मजाक बनाया जाता है। कई बार तो ऐसी महिलाओं को पुरुषों के गुलाम भी बताया जाता है। पूर्ण समन्वित
अब दूसरा दृश्य देखिये। अब पुरुष भी महिलाओं के साथ करवा चैथ का व्रत करते देखे जा रहे हैं। (हालांकि इस सत्य को बहुत सी महिलायें नहीं स्वीकारेंगीं) कई साल पहले आई अमिताभ बच्चन की फिल्म बागवान ने पुरुष वर्ग को भी जागरूक किया। आज बहुत से लोग अपनी पत्नी के साथ व्रत करते हैं।
इसे क्या कहेंगे? हमारे धर्म, संस्कृति का सम्मान या फिल्म सभ्यता का प्रभाव अथवा महिलाओं का और धर्मभीरू हो जाना? एक ओर हम धर्म से महिलाओं को, युवाओं को विमुख करते नजर आ रहे हैं वहीं दूसरी ओर इस तरह के कार्यों से प्रसन्न भी हो रहे हैं।
सोचिये कि हम क्या चाहते हैं? यदि धर्म सही है तो वह हमेशा सही है, यदि गलत है तो किसी भी रूप में सही नहीं हो सकता है। मात्र इसलिए धर्म का उदाहरण दिया जाये कि हमारे कुछ कार्य स्वीकार्य हो जायें तो यह गलत है। (जैसा कि अभी समलैंगिकता को लेकर धर्म की परिभाषाओं को दिया जा रहा था।)
सोचिए कि हम आने वाली पीढ़ी को देना क्या चाहते हैं? ऐसा धर्म जिसे जब चाहे गलत साबित करो और जग चाहो उसे सहज स्वीकार्य समझ लो अथवा ऐसा धर्म जो सर्वमान्य रूप से सर्व स्वीकार्य हो?

>बाज़ार के बिस्तर पर स्खलित ज्ञान कभी क्रांति का जनक नहीं हो सकता.: जनोक्ति

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आज एक दुनिया देखी हमने, जहां अभिव्यक्ति विकृति की संस्कृति में ढल रही है .हिंदी समाज की विडंबना हीं कहिये , सामाजिक सरोकारों पर मूत्र त्याग कर व्यक्तिगत स्वार्थों में लिप्त हो लेखन  कर्म को वेश्यावृत्ति से भी बदतर बना दिया गया है .अंतरजाल में शीघ्रता से फ़ैल रहे हिंदी पाठक कुंठित दिखते हैं . मौजूदा समय में धार्मिक कुप्रचार ,निजी दोषारोपण,अमर्यादित भाषा ,तथ्य और तर्क विहीन लेखन यत्र तत्र बिखरे पड़े हैं .

जब विचारों को किसी वाद या विचारधारा का प्रश्रय लेकर  ही समाज में स्वीकृति  मिलने का प्रचलन बन जाए तब  व्यक्तित्व का निर्माण संभव नही. आज यही कारण है कि  भारत या तमाम विश्व में पिछले ५० वर्षो में कोई अनुकरणीय और प्रभावी हस्ताक्षर का उद्भव नही हुआ. वाद के तमगे  में जकड़ी मानसिकता अपना स्वतंत्र विकास नही कर सकती और न ही सर्वसमाज का हित सोच सकती है.

 मानवीय प्रकृति में मनुष्य की संवेदना तभी जागृत होती है जब पीड़ा का अहसास प्रत्यक्ष रूप से हो.जीभ को दाँतों के होने का अहसास तभी बेहतर होता है ,जब दातो में दर्द हो. शायद यही वजह रही कि  औपनिवेशिक समाज ने बड़े विचारको और क्रांति को जन्म दिया. आज के नियति और नीति निर्धारक इस बात को बखूबी समझते है . अब किसी भी पीड़ा का भान समाज को नही होने दिया जाता ताकि क्रांति न उपजे. क्रांति के बीज को परखने और दिग्भ्रमित करने के उद्देश्य से सता प्रायोजित धरना प्रदर्शन का छद्म  खेल द्वारा हमारे आक्रोश को खोखले नारों की गूंज में दबा देने की साजिश कारगर साबित हुई है.  कई जंतर मंतर जैसे कई सेफ्टी-वाल्व को स्थापित कर बुद्धिजीवी वर्ग जो क्रांति के बीज समाज में बोया करते थे, उनको बाँझ बना दिया गया है.इतिहास साक्षी है कि कलम और क्रांति में चोली दामन का साथ है. अब कलम को बाज़ार का सारथि बना दिया गया. ऐसे में किसी क्रांति की भूमिका कौन लिखेगा? तथाकथित  कलम के वाहक बाज़ार की महफिलों में राते रंगीन कर रहे है.बाज़ार के बिस्तर पर स्खलित  ज्ञान कभी क्रांति का जनक नही हो सकता.

तो अब जबकि  बाज़ार के चंगुल से मुक्त अभिव्यक्ति का मन्च ब्लागिंग के रूप में सामानांतर विकल्प बन कर उभरा है तो हमारी जिम्मेदारी है कि छोटी लकीरों के बरक्स कई बड़ी रेखाए खिची जाएं. बाज़ारमुक्त और वादमुक्त हो समाजहित से राष्ट्रहित कि ओर प्रवाहमान लेखन समय की मांग है.

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