>साढ़े बारह बजे का किया इन्तेजार पर कसाब को फाँसी ना मिली

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आज सुबह से साढ़े बारह बजने का इन्तेजार कर रहा था . उत्सुकता और बेचैनी दिमाग पर काबिज थी . सुबह सात बजे उठ कर जामिया के लिए निकल गया . साढ़े नौ से साढ़े बारह तक परीक्षा थी और स्टार न्यूज़ के मुताबिक इसी समय तक भारत के सरकारी दामाद की सजा का ऐलान भी होना था . परीक्षा भवन में भी दिमाग का आधा हिस्सा इसी पर लगा हुआ था . जल्दी -जल्दी ऑटो से घर भागे . यहाँ आये तो पता चला कि साहब , कसाब को फाँसी देने में कई साल भी लग सकते हैं . अब हम जैसे कानून के अनपढ़ों को कौर्ट -कचहरी की भाषा भला कहाँ समझ आती है  ? लेकिन परेशानी यही नहीं है .  मामला तो तब बिगड़ता है जब कार्यपालिका , व्यवस्थापिका और न्यायपालिका को हमारी ये बात समझ में नहीं आती ! क्यों , सही कहा ना ! अगर उनको ये बात समझ में आती तो अफजल गुरु अभी तक तिहाड़ में हमारे पैसों की रोटी नहीं तोड़ रहा होता . कसाब के लिए करोड़ों नहीं उडाये जाते वो भी उस देश में जहाँ लोग भूख से जान देते हो . पता नहीं इस देश का सिस्टम (कार्यपालिका , व्यवस्थापिका और न्यायपालिका) आखिर कौन सी मिसाल कायम करना चाहता है  ? अरे , मिसाल तो अमेरिका ने कायम किया बिलकुल लोकतान्त्रिक तरीके से सद्दाम को कम से कम समय में फाँसी लगवा कर .  लेकिन नहीं यह तो भारतवर्ष है … जहाँ हत्या करने पर दस और हत्या का लाइसेंस देती है ये सरकार !

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>मैं कहता, यहाँ लोकतंत्र नहीं

>हाँ बहुत दुःख होता है,
जब कोई भूखा सोता है.
ये दिल मेरा कलपता है,
जब एक नेता चार हजार करोड़ लूट कर
उन भूखो का निवाला छीन लेता है.
दर्द फिर तब होता हैं
जब ऐसे राजनेताओं को सजा मिलना
मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन होता है.
आत्मा धिक्कारते है,
ऐसे लोगो को, जो विकास की झूठी ख़बरें फैलाते हैं.
तरस होता है ये देखकर
जब लोग कसाब के लिए फांसी नहीं मांगते
बस मुंबई के बेगुनाहों को याद करते मोमबत्तियां जलाकर
सुनकर हंसी आती है
देश का चौथा स्तम्भ भी हिल गया है.
जो नोट लेकर सरकारी नेताओ से मिल गया है.
डर लगता है ऐसे मानवाधिकार से
जिसका पूरा चरित्र ही बदल गया है.
अफज़ल को हर कीमत पर छोड़ दो
क्या ये भी पाकिस्तान से मिल गया है.
गुस्सा आता है… कुछ कामचोर पार्टियो से
जो आम जनता का काम नहीं करते
बस देते रहते भाषण
हैं राम के ये भक्त
पर अल्लाह-अल्लाह कहकर
बात-बात पर कहते, दे दो उन्हें आरक्षण
घिन्न आती है ऐसे समाज से
जो आधुनिकता का लिवास ओढ़कर
खुले अंग की नुमाईस करते
और मुह फेर लेते भारतीय शर्म, हया और लाज से
अफसोस होता है ये देखकर
बेतुकी कहानियों वाली अधनंगी फिल्म
बॉक्स ऑफिस पर हिट जाती है
और “ये मेरा इंडिया, १९७१, स्वदेश” जैसी फिल्मे
बॉक्स ऑफिस पर पिट जाती है.
निराशा घेर लेती है चारो ओर
जब भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, क्षेत्रवाद, जातिवाद, फैला हो हर ओर
क्या मिलता है उन्हें
जो सैनिक, सीमा में शहीद हो जाते है.
मिलता है तो बस, उन खिलाडिओं को
जो जीते या हारे
बस जाकर आइपीएल में शामिल हो जाते है.
मैं कहता, यहाँ लोकतंत्र नहीं है.
बिलकुल राजतन्त्र सी कहानी है
जहाँ प्रधान कोई मंत्री नहीं
न कोई मंत्री प्रधान है.
यहाँ प्रधान तो है एक युवराज
जिसकी इतालियन मम्मी यहाँ की रानी है.
लगता है छोड़ दू सब कुछ सोचना
उस ऊपर वाले के हाल पर
शायद वो कुछ नया कर दिखाए
आने वाले अगले साल पर.

>महाराष्ट्र की जनता -जनार्दन का सार्थक कदम

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उम्मीदवारों के भाग्य का विधाता तो मतदाता ही होता है। कई दिग्गजों और मंत्रियों को घर का रास्ता दिखाने के साथ ही तमाम राजनेताओं के लाडलों को विधायक बना दिया। मगर उन प्रत्याशियों को मतदाताओं ने धोखा दे दिया, जो आपराधिक पृष्ठभूमि के थे। महाराष्ट्र की विभिन्न अदालतों में जिन प्रत्याशियों के खिलाफ मामला दर्ज हैं, उनमें मंत्री, विधायक और पहली बार किस्मत आजमा रहे नेताओं का समावेश था। सभी को मतदाताओंने विधानसभा जाने से रोक दिया। अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि के लिए मशहूर निवर्तमान राज्यमंत्री सिद्धराम म्हात्रे, विधायक पप्पू कालानी, अरूण गवली, हितेंद्र ठाकुर को जहां झटका लगा है, वहीं शिवसेना प्रत्याशी विजय चौगुले और मनसे के सुधाकर चव्हाण की उम्मीदों पर पानी फिरा है। सोलापुर की अक्कलकोट सीट से पूर्व में कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुने गए सिद्धराम म्हात्रे को आघाड़ी सरकार में गृहराज्य मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद से नवाजा गया था। अपने आपराधिक इतिहास के चलते इस चुनाव में म्हात्रे को मतदताओं को बेरूखी की शिकार होना पड़ गया और वे विधायक बनते-बनते रह गए। माफिया डॉन से राजनेता बने अखिल भारतीय सेना प्रमुख अरूण गवली पिछली बार तो विधायक बन लिए थे, लेकिन इस चुनव में उसको पराजय का मुंह देखना पड़ा। इसी तरह उल्हासनगर के बाहुबली विधायक पप्पू कालानी को भी इस चुनाव में भाजपा के कुमार आयलानी के सामने पराजय का मुंह देखना पड़ा। अपने आपराधिक सम्राज्य के बूते लंबे समय से उल्हासनगर की सत्ता पर काबिज कालानी की पत्नी ज्योति वहां की महापौर भी रह चुकी हैं। फिलहाल ज्योति कालानी इस समय राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में हैं और पप्पू कालानी रिपब्लिकन पार्टी से विधायक चुने गए थे। इस बार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उतरे कालानी को मतदाताओं ने खारिज कर दिया। वसई के निर्वतमान विधायक हितेंद्र ठाकुर का नाम भी बाहुबली विधायकों की सूची में दर्ज है। गत लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपनी पार्टी बहुजन विकास आगाड़ी का सांसद भी पालघर क्षेत्र में जिताया। सांसद बलीराम जाधव ने केंद्र में कांग्रेस का समर्थन दिया, तो विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने तीन सीटें ठाकुर के लिए छोड़ दी। ठाकुर की पार्टी से बोईसर में चुनाव लड़ रहे विलास तरे के साथ ही जूनियर ठाकुर क्षितिज नालासोपारा से तो जीतने में कामयाब रहे, लेकिन पैनल से वसई सीट पर उतरे नारायण माणकर को निर्दलीय विवेक पंडित ने ढेर कर दिया। ज्ञात हो कि नायगांव से लेकर विरार तक ठाकुर कंपनी का एकछत्र साम्राज्य हुआ करता था, लेकिन हाल ही में ठाकुर समेतउसके समर्थकों पर जिस तरह से ग्रामीणों ने हमला किया। उससे हितेंद्र को जमीन खिसकती हुई नजर आई और उन्होंने रणछोड़ दास बनने में ही भलाई समझी। हितेंद्र का अंदाज सही निकला वो समझ गए थे कि अगर इस सीट से लड़े तो इज्जत का कचरा हो जाएगा। इसलिए मैदान से हट गए और आखिरकार उनके उम्मीदवार को शिवसेना समर्थित विवेक पंडित ने पराजित कर दिया। आपराधिक इतिहास वाले उम्मीदवारों में ऐरोली से शिवसेना प्रत्याशी विजय चौगुले का भी नाम आता है, जो सिर्फ राकांपा प्रत्याशी संदीप नाईक से हार गए, क्योंकि क्रिमिनल रिकार्ड की वजह से वहां के मतदाताओं ने चौगुले को नापसंद कर दिया। लोकसभा चुनाव में संदीप के बड़े भाई संजीव के सामने भी चौगुले अपनी आपराधिक छवि के कारण हार गए थे। इसी क्रम में ओवला माजीवड़ा सीट से मनसे प्रत्याशी सुधाकर चव्हाण की पराजय का कारण भी उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि ही रही। उनके सामने उतरे शिवसेना प्रत्याशी प्रताप सरनाईक अपनी स्वच्छ छवि के चलते मैदान मारने में कामयाब रहे। कुल मिलाकर इस चुनाव के परिणामों से साफ जाहिर हो गया कि विधानसभा में आपराधियों की बजाय उन्हें भेजा जाए, जिनका दामन साफ हो।

साभार : हम प्रवासी ब्लॉग से {http://humhaipravasi.blogspot.com/2009/11/blog-post.html}

महाराष्ट्र की जनताजनार्दन ने सालों से लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में व्याप्त अपराधीकरण के पुजारियों को वोटों की मार से बाहर का रास्ता दिखा दिया है जो बेहद सराहनीय पहल हैइस चुनाव से भारतवर्ष के सभी मतदाताओं को सबक लेने की जरुरत हैमहाराष्ट्र की जनता ने अपराधियों से अपने प्रतिनिधित्व को मुक्त कर यह साबित किया है कि आज भी लोकतंत्र में जनता हीं जनार्दन हैकम से कम बिहार और यूपी की जनता को आज ऐसे हीं सुधारात्मक कदम उठाने की जरुरत हैआख़िर कब तक बेवकूफ बनेगी बिहार और यूपी की जनता ? सत्ता परिवर्तन तो जरुर हुआ है पर क्या फायदा , राज तो वही चंद बाहुबलियों का है ! आज बसपा में है कल सपा में , आज राजद तो कल जदयू ,इन गुंडों से छुटकारा कहाँ है ? चुनाव आयोग भी सिस्टम के हाथों मजबूर होकर हाथ पर हाथ धरे बैठी है लेकिन जनता इतना तो कर हीं सकती है कि जिनके ऊपर किसी प्रकार की आपराध का आरोप हो उनको चुनाव की दौड़ से बाहर का रास्ता दिखाए

>नक्सलवाद पर डॉ० मधु लोमेश के विचार

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नक्सल आतंकवाद ,माओवादी हिंसा की घटनाएँ जो कभी छिट-पुट रूप में दिखाई देती थी आज  तकरीबन देश के बीस राज्यों में पैर पसारे दिख रही है .राजनीतिक गलियारों में भले हीं इसे किसी आतंकवाद के सदृश घोषित कर दिया हो पर आम जनता  इस  सत्य   को  जान  चुकी  है  कि  वास्तव  में  ऐसी  घटनाएँ  सरकारी  तंत्र  की  विफलता ,अव्यवस्था , भ्रष्टाचार ,सरकारी  धन  के  दुरूपयोग , नीतियों  के  सही  क्रियान्वयन  ना  होने  से  उत्पन्न   आक्रोश ,असंतोष  की  ही  परिचायक  है  जिसे  हम  सब   जज्ब  किये  बैठे  हैं . उनके  हिंसक  प्रदर्शनों ,हमलों  पर  रोक -थाम  के  लिए  आवश्यक  है  कि  सरकार  अपनी  कथनी  और  करनी  के  अंतर  की समीक्षा  करे .नक्सल प्रभावित  संवेदनशील  इलाकों  में  अंतर्विरोधों  को  समाप्त  करने  की  पहल   करें . रोटी ,कपडा  ,मकान  ,रोजगार  समंधी  ठोस  कदम उठाये   ना  कि  बल  पूर्वक  नाक्साली  आन्दोलन  को  कुचलते  हुए  उन्हें  अधिक  उग्र  बनने  पर  विवश  करे .
हिंसा  किसी  समस्या  का  समाधान  नहीं  पर  विकास  के  नाम पर करोडों  के  घोटाले ,सरकार  की  उदासीनता , नेताओं  की  स्वार्थलोलुपता  , भुखमरी ,बेरोजगारी  से  जूझते  लोगों  के  नक्सालियों  के  रूप  में  परिवर्तित  होने  के  लिए  जिम्मेदार  कौन  है ? इस  की  समीक्षा  की  जानी  चाहिए …
डॉ० मधु लोमेश { अदिति महाविद्यालय में पत्रकारिता की शिक्षिका है }

>In INDIA we are not INDIANS

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बेगानेपन का अहसास दबाये दिल वालों की दिल्ली में पूर्वोत्तर भारतीय समय काट रहे हैं .मुनिरका ,मुखर्जीनगर ,कटवारिया ,लाडोसराय आदि  इलाकों के दरबे जैसे घरों में रहने वाले इन बेगाने भारतीयों को कदम-कदम पर अपमान का घूंट पी कर जीना पड़ता है . राह चलते चिंकी ,सेक्सी , माल ,नेपाली ,चाइनीज जैसे फिकरे सुनना तो इनकी नियति बन गयी है . हद तो तब हो जाती है मनचले हाथ लगाने पर उतर आते हैं . ऐसा नहीं है कि ये हरकतें कम-पढ़े लिखे आवारा किस्म के लड़के करते हैं बल्कि डीयु ,जामिया,आई आई टी सरीखे नामी गिरामी शिक्षण संसथानों के तथाकथित सभी छात्र भी इनसे मज़े लेने में कोई कसर नहीं छोड़ते .राजधानी में पूर्वोत्तर की लड़की की आई आई टी के छात्र द्वारा हत्या और ग्यारहवीं के छात्रों द्वारा जामिया के मॉस कॉम में पढ़ रही अरुणाचल की लड़की के कपडे फाड़ने की घटना इन बातों को साबित करने के लिए काफी है . इनकी हालत उन बिहारी रिक्शा चालकों जैसी है जिन्हें दायें -बाएं से आने गुजर रहे हर दुपहिया -चरपहिया वालों की लताड़ खानी पड़ती है . इतना हीं नहीं जब तब सरकार की  भेदभावपूर्ण नीतियों  का शिकार भी इन्हें होना पड़ता है . भारोत्तोलक मोनिका देवी मामले में भारतीय खेल प्राधिकरण का रवैया इसका ताजा उदाहरण है .अकसर हम इनको राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल करने की बात करते हैं लेकिन क्या इन सबके बावजूद  पूर्वोत्तर राज्यों से पढ़ाई या नौकरी के लिए देश की राजधानी आए लोगों  के मन में भारतीय होने का अहसास बच पायेगा ?  
ईटानगर में आयोजित एक सेमीनार में का किस्सा याद आ रहा है . हम संयोगवश वहां पहुंचे थे . हमने सेमिनार का विषय “in india we are not indians ” देखा तो आश्चर्यचकित हो गये . अब  अहसास  हो रहा है, वो गलत नहीं थे . पूर्वोत्तर में हमेशा गृहयुद्ध की हालत को भोग रहे ये लोग जब दिल्ली -मुंबई का रुख करते हैं तब हमसे तिरस्कार ,घृणा के सिवा इन्हें क्या मिलता है ?  विश्वबंधुत्व का ढिंढोरा पीटने वाले हम भारतवासी क्या भारतीय कहलाने के काबिल रह गये हैं ?  हम समय के साथ अपने भारतीय होने की अपनी पहचान को खोते जा रहे हैं . यह एक गिरते हुए समाज की तस्वीर है .जो शक्ति खुद के लिए , समाज के लिए और देश के लिए प्रयोग करनी चाहिए थी वह खुद को हीं बदनाम करने में प्रयोग हो रहा है .इस मामले को महज पुलिस कार्यक्षेत्र का मसला समझ कर भूल जाना हमें महंगा पड़ेगा .पुलिस की नाकामी से पहले यह समाज की और समाज से पहले व्यक्ति की नाकामी और पतन का  सूचक है . आखिर ऐसी मानसिकता समाज से हीं तो पैदा हो रही है जो युवाओं को एक खास वर्ग या समुदाय के प्रति नीचता करने को प्रेरित करती है ? समाज को चलाने का दंभ करने वाले बुद्धिजीवी लोग भी इस मसले पर मूकदर्शक बने नज़र आते हैं .मुंबई में राज ठाकरे की गुंडई पर गला फाड़ने वाले पत्रकार बंधू भी गला साफ़ करने में लगे रहते हैं .क्या जो उत्तर भारतीयों के साथ मुंबई में होता है वही पूर्वोत्तर वालों के साथ दिल्ली में नहीं हो रहा है ? फ़िर ,विरोध में भेदभाव क्यों ? क्या देश के चौथे स्तम्भ की उदासीनता { बाकि तो पहले से कन्नी कटे हुए हैं } से मान लिया जाए चीन की बात सही है कि अरुणाचल उनका हिस्सा है ? क्या इसी तरह सांस्कृतिक के आधार पर थोड़े अलग इन भारतीयों को गैरभारतीय मान लिया जाए जिन्हें दिल्ली -मुंबई में शरण दे कर हमने उन पर अहसान किया है ? जरा इन सवालों पर सोचते हुए पूर्वोत्तर में जन्मे बिहार -झारखण्ड में पढ़े -लिखे और दिल्ली में पत्रकारिता कर रहे एक भारतीय की इन पंक्तियों को ध्यान से पढ़िये :-
                                                   
                                               अजनबी शहर में हम जहां हैं वह देश जैसा दिखाई देता है. 
                                                                                पर है परदेश. 
                                                        सरकारी विज्ञप्तियां बताती हैं यह हमारा देश है. 
                                  लेकिन आवाजों का संजाल कहीं न कहीं से कचोट कर हकीकत को सामने रख देता है. 
                                                                         दुष्यंत होते तो कहते:-
                            “हमको पता नहीं था हमे अब पता चला, इस मुल्क में हमारी हूकूमत नहीं रही.”
                                           इसी परदेश और देश की संधि रेखा पर खडे होकर हम बात करेंगे. 
                                         सीमाओं की जो हमने नहीं खींची. धरती पर आने के साथ हमें मिली हैं.
 

>राजशेखर रेड्डी के गम में मरने लिए 5000-5000 रूपये बांटे कांग्रेस ने

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अभी पिछले दिनों आँध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी की मौत विमान दुर्घटना में हो गई.सभी समाचार चैनल में कहा गया  कि  उनकी मौत के दुख में 462 लोगो ने आत्महत्या कर ली. आश्चर्य होता है न आज के समय में किसी नेता के लिए इतना प्यार देखकर!!! लेकिन बाद में मालूम पड़ा की ये प्यार नेता के लिए नहीं बल्कि पैसे के लिए था मतलब की कांग्रेस सरकार ने देश को जितने भी लोगो को खुदख़ुशी करने वालों में गिनाया था वो सभी खुदखुशी के कारण नहीं बल्कि अपनी स्वाभाविक मौत मरे थे.
जी हां एक सनसनीखेज़ खुलासे में ये बात सामने आई है की मरने वाले लोगो के घर वालो को सरकार ने 5000-5000 Rs. दिए थे और बदले में उनलोगों को ये बोलना था की “मरने वाला आदमी अपनी स्वाभाविक मौत नहीं मरा बल्कि उसने मुख्यमंत्री के गम में आत्महत्या की है.”
शर्म आती है ये बाते सुन-सुन कर की आज की कांग्रेस इतनी गिर चुकी है की लोगो की मौत पर भी राजनीति करने लगी
काश ये पैसा उन लोगो को मरने से पहले दिया जाता तो शायद वो दुनिया में होते .
 { ऑरकुट पर भाव्यांश के स्क्रेप का अंश  } 

>अभी तो महंगाई की शुरुआत है……

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आज देश जिस स्थिति से गुजर रहा है,वह आने वाले समय की हकीकत बयान कर रहा है!नई सरकार के आने से हुई खुशी काफूर हो चुकी है!सरकार के अधिकाँश मंत्री गण भी अपना पैसा बनाने में लगे है!आख़िर चुनावी खर्चे की भरपाई भी तो करनी है !तभी तो देखिये ना मनमोहन सिंह जी इतने बड़े अर्थशाष्त्री होते हुए भी महंगाई को रोकने में असफल रहे है ,और जनता से कह रहे है की अभी महंगाई और बढेगी!देश के कृषि मंत्री खुले आम कह रहे है कि चीनी और चावल कि किल्लत है सो ये और मंहगे होंगे!जी ठीक है आपने कहा हमने मान लिया ,पर जनता करे क्या !सारा देश जानता है कि कितनी चीनी मिलें शरद पवार की है?जब देश के मुखिया हार गए तो अब क्या हो?आप देश के संचालक है,जनता का दुःख दूर करिए!चीनी की कमी है तो आयात कीजिये….,राशनिंग ….कुछ भी कीजिये लेकिन यूँ हार के ना बैठिये ..!महंगाई दर शुन्य है लेकिन महंगाई आसमान छु रही है ..और आप .हाथ पे हाथ धर के बैठे है?आगे त्योंहारों का सीजन है !ये महंगाई तो दिवाली का दिवाला निकाल देगी…!क्या फ़िर महंगाई मार .गई जैसे गाने फ़िर चलेंगे…!देश के लिए आगामी कुछ महीने बहुत कष्टदायक होने वाले है !क्या सरकार कुछ कर पाएगी,ये हर देश वासी जानना चाहता है…!आख़िर सरकार भी तो हमने ही चुनी है ,हमें जानने का भी पूरा हक है….

राष्ट्रीय एकता परिषद का राजनीतिक दुरुपयोग

कांग्रेस सरकार राष्ट्रीय एकता परिषद के मंच का राजनीतिक दुरुपयोग कर रहा है। यह राष्ट्रीय एकता का ढकोसला है। विगत सप्ताह एकता परिषद की दिल्ली में हुई बैठक के एजेंडे से ही यह झलक मिल रही थी कि यह बैठक बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद को घरने के दुराग्रह के साथ आयोजित की जा रही थी क्योंकि आज देश के सामने जो सबसे गंभीर संकट है अर्थात आतंकवाद, वह इस बैठक के एजेंडे में ही नहीं था। बल्कि उड़ीसा और कर्नाटक की हिंसक घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में साम्प्रदायिकता को बैठक का केन्द्रीय विषय बनाया गया। यह स्पष्ट है कि परिषद की यह बैठक आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर साम्प्रदायिकता के नाम पर हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों और भाजपा को आरोपित कर छद्म सेकुलर जमात अल्पसंख्यक समुदायों को यह संदेश देना चाहती थी कि वही उनकी हिमायती है। बजरंग दल के खिलाफ स्वर को मुखर करने के लिए समाजवादी पार्टी के महासचिव अमर सिंह को परिषद का सदस्य मनोनीत किया गया जबकि अमर सिंह ने आतंकवादियों के खिलाफ पुलिस मुठभेड़ में शहीद हुए पुलिस अधिकारी शहादत पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया था। अमर सिंह जैसे लोगों को परिषद में शामिल कर सरकार क्या संदेश देना चाहती है। इस बैठक की गंभीरता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि बैठक में विशष आमंत्रित के रूप में बुलाए गए कामरेड ज्योति बसु ने स्वयं उपस्थित न होकर अपना जो संदेश भेजा वह परिषद की कार्यशैली व भूमिका पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। भाजपा द्वारा आतंकवाद जैसे गंभीर विषय को बैठक के एजेंडे में शामिल करने के लिए जोर देने पर सरकार ने चरम पंथ को एजेंडे में शामिल किया क्यों कि संप्रग सरकार व उसके छद्म धर्मनिरपेक्ष घटक दल जानते हैं कि आतंकवाद पर व्यापक बहस हुई तो उन सबकी पोल खुलेगी और फिर देश की जनता जानेगी कि सोनिया पार्टी की सरकार और लालू,पासवान व मुलायम सिंह जैसे उसके सहयोगी किस तरह मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए न केवल आतंकवाद के खिलाफ कड़े कदम उठाने से कतरा रहे हैं बल्कि आतंकवादी समूहों के पैरोकारी कर रहे हैं।
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