>बुन्देली लोक साहित्य के संरक्षण-संवर्धन की आवश्यकता

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किसी भी क्षेत्र के विकास में उस क्षेत्र संस्कृति की अहम् भूमिका रहती है। संस्कृति, भाषा, बोली आदि के साथ-साथ उस क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत, लोकसाहित्य, लोककथाओं, लोकगाथाओं, लोकविश्वासों, लोकरंजन के विविध पहलुओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। सांस्कृतिकता का, ऐतिहासिकता का लोप होने, उसके विनष्ट होने से उस क्षेत्र में विकास की गति और भविष्य का उज्ज्वल पक्ष कहीं दूर तिरोहित होने लगता है।

(चित्र गूगल छवियों से साभार)

बुन्देली संस्कृति के सामने, इस क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत, भाषा-बोली के सामने अपने अस्तित्व का संकट लगातार खड़ा हो रहा है। किसी समय में अपनी आन-बान-शान का प्रतीक रहा बुन्देलखण्ड वर्तमान में गरीबी, बदहाली, पिछड़ेपन के लिए जाना जा रहा है। विद्रूपता यह है कि इसके बाद भी बुन्देलखण्ड के नाम पर राजनीति करने वालों की कमी नहीं है। सांस्कृतिक विरासत से सम्पन्न, स्वाभिमान से ओत-प्रोत, शैक्षणिक क्षेत्र में सफलता के प्रतिमान स्थापित करने वाले इस क्षेत्र की विरासत को पूरी तरह से नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। विचार करना होगा कि इस क्षेत्र में पर्याप्त नदियाँ हैं; वैविध्यपूर्ण उपजाऊ मृदा है; प्रचुर मात्रा में खनिज सम्पदा है; वनाच्छादित हरे-भरे क्षेत्र हैं फिर भी इस क्षेत्र को विकास के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकार का मुँह ताकना पड़ता है।

संसाधनों की पर्याप्तता के बाद भी क्षेत्र का विकास न होना यदि सरकारों की अरुचि को दर्शाता है तो साथ ही साथ यहां के जनमानस में भी जागरूकता की कमी को प्रदर्शित करता है। किसी भी क्षेत्र, समाज, राज्य, देश के विकास में किसी भी व्यक्ति का योगदान उसी तरह से महत्वपूर्ण होता है जैसे कि उस व्यक्ति का अपने परिवार के विकास में योगदान रहता है। परिवार के विकास के प्रति अरुचि होने से विकासयात्रा बाधित होती है, कुछ ऐसा ही बुन्देलखण्ड के साथ हो रहा है। यहां के निवासी उन्नत अवसरों की तलाश में यहाँ से पलायन कर रहे हैं। युवा पीढ़ी अपने आपको किसी भी रूप में इस क्षेत्र में स्थापित नहीं करना चाहती है। इस कारण से इधर के शैक्षणिक संसाधन, औद्योगिक क्षेत्र, खेत-खलिहान, गाँव आदि बदहाली की मार को सह रहे हैं।

बुन्देलखण्ड के कुछ जोशीले, उत्साही नौजवानों और अनुभवी बुजुर्गों के प्रयासों, प्रदर्शनों, संघर्षों, माँगों आदि के द्वारा बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण हेतु कार्य किया जा रहा है। इस प्रयास के चलते और बुन्देलखण्ड के नाम पर राजनीति करने की मंशा से सरकार ‘पैकेज’ आदि के द्वारा आर्थिक सहायता का झिझकता भरा कदम उठाने लगती हैं। बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक विरासत को देखते हुए इस तरह के प्रयास खुशी नहीं वरन् क्षोभ पैदा करते हैं। यह सब कहीं न कहीं इस क्षेत्र के जनमानस का अपने क्षेत्र के प्रति स्नेह, अपनत्व, जागरूकता में कमी के कारण ही होता है।

जागरूकता में कमी अपनी सांस्कृतिक विरासत को लेकर बहुत अधिक है जो नितान्त चिन्ता का विषय होना चाहिए। युवा पीढ़ी को बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिकता, ऐतिहासिकता से किसी प्रकार का कोई सरोकार नहीं दिखाई देता है। उसे क्षेत्र के लोकसाहित्य, लोककला, लोकगाथा, लोककथा, लोकविश्वास, लोकपर्व आदि के साथ ही साथ इस क्षेत्र की विशेषताओं के बारे में भी पता करने की आवश्यकता नहीं। किसी क्षेत्र का स्वर्णिम अतीत उसके उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला बनता है किन्तु वर्तमान पीढ़ी को अतीत को जानने की न तो चाह है और न ही वह इसके भविष्य को उज्ज्वल बनाने को प्रयासरत् है। यहां की बोली-भाषा को अपनाना-बोलना उसे गँवारू और पिछड़ेपन का द्योतक लगता है। इस दोष के शिकार युवा हैं तो बुजुर्गवार भी कम दोषी नहीं हैं जो अपने गौरवमयी अतीत की सांस्कृतिक विरासत का हस्तांतरण नहीं कर रहे हैं।

हमें समझना होगा कि संस्कृति का, विरासत का हस्तांतरण किसी भी रूप में सत्ता का, वर्चस्व का हस्तांतरण नहीं होता है। इस प्रकार का हस्तांतरण क्षेत्र की सांस्कृतिकता का, सामाजिकता का विकास ही करता है। यह ध्यान हम सभी को रखना होगा कि संस्कृतिविहीन, भाषाविहीन मनुष्य पशु समान होता है और बुन्देलखण्ड को हम संस्कृतिविहीन, भाषाविहीन, बोलीविहीन करके उसकी गौरवगाथा को मिटाते जा रहे हैं। यदि इस दिशा में शीघ्र ही प्रयास न किये गये; वर्तमान पीढ़ी को बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत से, भाषाई-बोली की मधुरता से परिचित न करवाया गया तो बुन्देलखण्ड को एक शब्द के रूप में केवल शब्दकोश में देख पायेंगे। इसके अलावा हम बुन्देलखण्ड के लोक से सम्बन्धित विविध पक्षों को भी सदा-सदा को विलुप्त कर चुके होंगे। स्थिति बद से बदतर हो इसके पूर्व ही हम सभी को सँभलना होगा, इस दिशा में सकारात्मक प्रयास करना होगा।

>जब ‘चोरों’ में ही चुनाव की अनिवार्यता हो तो आखिर शत-प्रतिशत मतदान से इस देश का भाग्य कैसे बदलेगा !

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गुजरात में चुनाव में मतदान अनिवार्य किया गया है। यह सच है कि मौजूदा सरकारों के नकारा और जनविरोधी रवैये और मतदान में आने वाली कई अड़चनों परेशानियों के कारण कई सारे लोग वोट डालने में रुचि नहीं लेते है और अंततः तीस-चालीस प्रतिशत राजनैतिक रूप से मोटीवेटेड वोटरों के बीच पॉच-दस प्रतिशत वोटो के दम पर सरकारें बन जाती हैं । ये अल्पमत की सरकारें बहुमत पर बेशर्मी से राज करती हैं। हालाँकि यह राजनैतिक पार्टियों के लिए फायदे का सौदा है मगर प्रजातंत्र के लिए एक बेहद निराशाजनक स्थिति, फिर भी सिर्फ इस वजह से हंटर से हाँककर जबदस्ती वोट डलवाने की प्रक्रिया को किसी भी दृष्टि से लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता। यह सरासर एक नादिरशाही रवैया है।
मतदान को अनिवार्य कर दिये जाने का सीधा मतलब है एक और फासीवादी कानून बनाकर डंडे के दम पर नागनाथ या साँपनाथ को जबरदस्ती चुनवाकर जनता के सिर पर बिठाया जाना। मौजूदा चुनाव प्रक्रिया की यह विडंबना है कि चंद गुंडे-बदमाश, डाकू-लुटेरे, बेईमान-दलाल और भ्रष्ट किस्म के लोग अपने आपको हमारे नेता के रूप में पेश करते हैं और हमें इन असामाजिक तत्वों को चुनने की मजबूरी से दो-चार होना पड़ता है। दिन पर दिन कम होते जा रहे मतदान प्रतिशत् के कारण तंत्र की निगाहें मतदान ना करने वाले मतदाताओ पर तो वक्र हो रही है परन्तु हमारे इन तथाकथित ‘अगुओं’ को जो कि अपनी स्थार्थपरता एवं लोभी प्रवृति के कारण अब बस जूते खाने लायक रह गए हैं, उन्हें सुधारने की ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा। इस स्थिति में मतदाता यदि जानबूझकर अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं करता है तो कौन सा अपराध करता है। मतदान अनिवार्य किये जाने की वकालत करने वालों को इस बात का भी जवाब देना चाहिये कि जब ‘चोरों’ में ही चुनाव की अनिवार्यता हो तो आखिर शत-प्रतिशत मतदान से इस देश का भाग्य कैसे बदलेगा!
इस मुद्दे को एक दूसरे नज़रिए से भी देखने की आवश्यकता है। सत्ता कब्जाए रखने के लिए अंग्रेजों ने जन्म दी, फूट डालो राज करो की नीति पर कायम रहते हुए पिछले बासठ सालों में आई-गई सभी राजनैतिक पार्टियों की सरकारों द्वारा देश की जनता को जात-पात, धर्म-प्रांत भाषा-सम्प्रदाय के नाम पर लगातार विखंडित किया जाता रहा है। किसी ने सोचा तक न था कि विखंडन का यह सिलसिला बहुत दूर तक जाकर इतनी भयानक व्यक्तिवादी मानसिकता पनपा देगा कि लोग सामाजिक स्वार्थ को भी ताक पर रख देंगे। सत्ता पर काबिज बने रहने के लालच में सत्ताधारी ताकतों द्वारा जाने-अनजाने पूरे देश का जन-मानस कर्तव्य एवं जिम्मेदारी की भावना से दूर कर दिया गया। परिणामस्वरूप, लम्बे सामाजिक संघर्ष के बाद राजनैतिक प्रणाली के तौर पर उपजी चुनावी प्रक्रिया के प्रति देश की अधिकांश जनता गैर जिम्मेदाराना मानसिकता से ग्रसित होती चली गई।
सामाजिक, राजनैतिक आर्थिक एवं सांस्कृतिक क्रियाकलापों का एक दूसरे से समन्वयविहीन पृथक-पृथक रूप से परिचालित होते रहने की वस्तुगत परिस्थिति, जिसे पूँजीवादी सत्ता ने अपने पक्ष में एकतरफा इस्तेमाल किया, ने भी आम जन-साधारण को सामाजिक चेतना के स्तर पर निष्क्रीय किया है। इसी कारण राजनैतिक स्तर पर जनविरोधी कार्यव्यापार, व्यापक भ्रष्टाचार एवं अनैतिक गतिविधियों के बावजूद आम जन साधारण की ओर से किसी प्रकार की कोई सचेत प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिलती। इसलिए मतदान अनिवार्य करने जैसी अवधारणा का समर्थन करने की बजाय ज्यादा जरूरी यह लगता है कि सामाजिक राजनैतिक शक्तियाँ एक व्यापक पुनर्जागरण आन्दोलन का सूत्रपात करें जिससे ना केवल चुनाव जैसी सामाजिक गतिविधियों में स्वार्थी एवं भ्रष्ट समाज विरोधी तत्वों को दूर रखा जा सके साथ ही सामाजिक गतिविधियों से दूर हो गये लोगों को सहज स्वयंस्फूर्त तरीके से जिम्मेदारी की भावना के साथ चुनाव को एक अनिवार्य सामाजिक गतिविधि के तौर पर सम्पन्न कराने की भूमिका निभाने का मौका मिल सके।
आम जनसाधारण को भी इस बात को समझना आवश्यक है कि हम एक सामाजिक प्राणी हैं और यह राजनैतिक तंत्र समाज विरोधी ताकतों द्वारा हथियाकर अपने पक्ष में इस्तेमाल किया जा रहा है । इस स्थिति में हम अपने आप को तटस्थ रखकर, चुनाव प्रक्रिया में भाग ना लेकर, चुनाव का बहिष्कार करके इन समाज विरोधी शक्तियों को ही मजबूत बना रहे हैं। हमें यदि इस चुनाव प्रक्रिया में ही कोई खोट लगता है, जो कि है ही, तो इसे बदलने के लिए सामाजिक रूप से संगठित एवं सक्रिय होने की ऐतिहासिक अनिवार्यता सम्मुख है, इससे मुँह नहीं मोड़ा जा सकता। आज की महती आवश्यकता यह है कि चुनाव प्रक्रिया को आमूल-चूल बदल दिया जावे और उन सब खामियों को दूर किया जाए जिससे समाज के वास्तविक सर्वमान्य नेताओं, प्रगतिशील एवं रचनात्मक मानसिकता के लोगों, निस्वार्थ सामाजिक-राजनैतिक शक्तियों का ही चुनाव सुनिश्चित किया जा सके, ताकि विगत 62 वर्षों से कीचड़ में धंसे इस देश को बाहर निकालकर धोया-पोछा जा सकें।

>पृथ्वी के सर्वनाश को कतई नहीं रोका जा सकता, यदि

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कोपेनहेगन में पर्यावरण की चिंता को लेकर दुनिया भर के लोग इकट्ठे हुए हैं और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से होने वाले नुकसान और उससे बचाव के रास्ते खोजने की मशक्कत करने वाले हैं। इरादा तो बेहद नेक है मगर इस जमावड़े के गर्भ से कई बातों की एक बात निकलती दिखाई दे रही है वह यह कि अब सचमुच विश्व पूँजीवादी-साम्राज्यवादी शक्तियों को पर्यावरण की चिंता होने लगी है, क्योंकि यह खतरा खुद उसके अस्तित्व पर सीधा वार करने लगा है।
ज़ाहिर है आग के गोले में तब्दील होती जा रही इस पृथ्वी से दूर, चन्द्रमा, मंगल या अन्य किसी ग्रह पर जीवन की संभावनाओं की खोज में देरी हो रही है। इस स्थिति में निर्णायक संकट आने पर पृथ्वी के गरीब-गुरबों और मध्यमवर्गीय आम जनता को छोड़कर भागने की फिलहाल कोई सूरत बन नहीं पा रही है, इसलिए किसी तरह स्थिति को थोड़ा बहुत संभाला जाए, यही नीयत इस पूरी कवायद से स्पष्ट हो रही है। मगर पूँजीवाद-साम्राज्यवाद के आपसी अन्तर्विरोधों की पृष्ठभूमि में इस सम्मेलन से कुछ फैसले सफलतापूर्वक निकाले जा सकेंगे और उन फैसलों पर पूँजी के भूखे दुनिया भर के औद्योगिक घराने अमल कर पाऐंगे इस में शक है।
मसलन, भारत के ही कुछ औद्योगिक घरानों से आवाज़ें आने लगीं हैं कि हमारी राय नहीं ली जा रही है और यदि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में रोकथाम के बहाने, उद्योग-धंधों की चहल-पहल में कटौती की गई तो फिर हम 9 प्रतिशत की विकास दर कैसे हासिल कर पाएँगे! यह सुर भारत जैसे विकासशील देशों के पूँजीपतियों के हैं जिनके पेट अभी पूँजीवादी शोषण से भरे नहीं हैं। इन सूरों में यह आलाप भी शामिल है कि यह सम्मेलन साम्राज्यवादी देशों का षड़यंत्र है जो कि भारत, चीन जैसे आर्थिक विकास की ओर अग्रसर देशों के कदम रोकने के लिए हैं, और यहीं से कोपेनहेगन से कोई सिद्धांत निकलने के पहले ही उसके असफल होने का अंदेशा उपजता ।
पर्यावरण की सूरतेहाल में किसी तरह का कोई परिवर्तन आने की कोई संभावना नहीं है अगर पूँजीवादी शक्तियाँ अपने निहित स्वार्थों से समझौता न करें। पर्यावरण के साथ संतुलन की चिंता किये बगैर यदि अंधाधुंध औद्योगिकरण की सनक पर अंकुश नहीं लगाया गया, वातावरण को कार्बन प्रदूषण से मुक्त नहीं किया गया, विकास के नाम पर हरियाली को स्वाहा कर यदि कांक्रीट के जंगल खड़े किये जाते रहे, ग्रामों को शहरों से जोड़कर विकास की धारा में लाने के बहाने खेती योग्य ज़मीन का खात्मा कर डामर और सीमेंट की सड़कों का जाल बिछाया जाता रहा, चंद रुपयों की लिए यदि वनों की अंधाधुध कटौती कराई जाती रही, नदियों तालाबों और समुद्र को रसायनों के सांद्र घोल में तब्दील होने से नहीं रोका गया, तो पृथ्वी के सर्वनाश को कतई नहीं रोका जा सकता। कुल जमा, स्वार्थी लोगों के अन्दर से इफरात पैसा उगाहने की भूख पर रोकथाम नहीं की गई तो कोपेनहेगन जैसे कई सम्मेलन करलो उसका कोई नतीजा नहीं निकलने वाला।अंततः यह मुद्दा आम जनता को ही अपने हाथ में लेना पडे़गा। सरकारों को, उद्योगों को मजबूर करना पड़ेगा कि वे अपनी पैसा कमाने की हवस पर अंकुश लगाएँ और विकास का ऐसा रास्ता चुने जिससे सही मायने में विकास हो बरबादी नहीं।

>मंदिर-मस्ज़िद के बहाने क़त्लेआम का जवाब लो

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आज 6 दिसम्बर है, बाबरी मस्ज़िद के ध्वंस की १७ वी वर्षगांठ। आज ही के दिन कुछ धार्मिक उन्मादियों ने अयोध्या में बाबरी मस्ज़िद को ढहाकर देश में हिन्दु-मुस्लिम नफरत के एक और अध्याय की शुरूआत की थी। हिन्दुओं ने पाँच हज़ार वर्ष पूर्व के एक राजघराने के राजा रामचंद्र की तथाकथित जन्मभूमि पर, मंदिर निर्माण के मुद्दे को और मुसलमानों ने एक अज्ञात-अंजानी शक्ति ‘अल्लाह’ की इबादतगाह की रक्षा को अपनी-अपनी अस्मिता के प्रश्न से जोड़कर जी भरकर मानवता का खून बहाया है।
इस नाजुक मौके पर कुछ बुनियादी बातों पर चर्चा की जाना गैरवाजिब नहीं होगा। हो सकता है ये बातें कुछ लोगों को बुरी लगे परन्तु मनुष्य मात्र के भले के लिए इसे बहस का मुद्दा बनाया जाना ज़रूरी है।
यदि उनका अस्तित्व था भी तो, पाँच हज़ार वर्ष पूर्व के एक राजा की स्तुति-अंधभक्ति का आज इक्कीसवी शताब्दी में क्या औचित्य है यह समझ से परे है, जबकि सामंती युग को तिरोहित हुए अर्सा हो गया है। उस युग की सामंती परम्पराओं और सांस्कृतिक मूल्यबोधों का वर्तमान प्रजातांत्रिक परिवेश में कोई महत्व ना होने के बावजूद हम क्यों आस्था के बहाने उस एक नाम को ढोते चले जा रहे हैं ? इतना ही नहीं आज जबकि आधुनिक युग के सामाजिक मूल्यबोधों, धर्मनिरपेक्षता पर आधारित स्वतंत्रता, समानता, भाईचारे के सिद्धांतों की रक्षा की सख़्त आवश्यकता है, हम क्यों मंदिर-मस्ज़िद के नाम पर इन मूल्यों का तिरस्कार करते चले आ रहे हैं।
मुसलमानों के सामने भी यह प्रश्न रखा जाना ज़रूरी है कि क्या सैंकड़ों साल पहले अस्तित्व में आए इस्लामिक सोच-विचार, मूल्यबोधों को आधुनिक समाज की रोशनी में दफ्न नहीं हो जाना चाहिए था। क्या एक ऐसी शक्ति जिसके अस्तित्व का कोई प्रमाण दुनिया में नहीं है के नाम पर वे हमेशा अपने आप को दकियानूसी बनाए रखेंगे, क्या वे शरीयत के नाम पर हमेशा व्यापक सामाजिक हितों एवं प्रजातांत्रिक मूल्यों से दूरी बनाए रखेंगे। क्या उनका धार्मिक कठमुल्लापन वर्तमान सामाजिक प्रतिबद्धताओं से उन्हें विमुख नहीं करता, जबकि एक देश का अभिन्न हिस्सा होने के कारण उन्हें भी व्यापक समाज के एक अभिन्न अंग की तरह पेश आना चाहिए!
सभी जाति, धर्म, सम्प्रदाय के लोगों के सम्मुख यह प्रश्न उठाया जाना चाहिए कि एक राष्ट्र के अभिन्न अंग के तौर पर समाज वे अपनी क्या भूमिका आंकते हैं। चाहे हिन्दु हों या मुसलमान या और कोई बिरादरी, आधुनिक प्रजातांत्रिक मूल्यबोधों का तकाज़ा है कि हम अपने व्यक्तिगत धार्मिक पूर्वाग्रहों को ताक पर रखकर मानव के रूप में अपने समय में जीना सीखें। बेशक एक बेहतर आज के लिए कल से सबक लिया जाना जरूरी है मगर इसका अर्थ यह नहीं है कि पुरातन की अर्थी अपने कांधों पर रखकर अपने वर्तमान के सच को पैरों तले रोंदा जाए। हिन्दुओं-मुसलमानों और सभी धर्म सम्प्रदाय, जाति, भाषा, के लोगों को यह समझना जरूरी है कि परम्परा के नाम पर उनके ऊपर लादकर रखे गए ये लबादे उनकी मनुष्य के रूप में पहचान पर हावी होते जा रहे हैं। वे अपनी मानवीय विशेषताओं से नीचे गिरकर पशुवत होते चले जा रहे हैं।
यह नष्ट-भ्रष्ट हो चुका पूँजीवादी समाज है। मोहम्मद हो या राम, या और कोई पैगम्बर या अवतार, कोई भी इस पूँजीवादी समाज की बुराइयों, विडंबनाओं से निबटने में इन्सान की मदद नहीं कर सकता। चूक चुके मूल्यों के आधार पर आधुनिक चुनौतियों का सामना नहीं किया जा सकता। हम शोषण पर आधारित मानव संबंधों की सामाजिक संरचना का शोषित-पीड़ित हिस्सा हैं। हमारी एकता शोषक शासक वर्ग के लिए खतरनाक होती आई है और आगे भी रहेगी, इसलिए हम हिन्दु या मुसलमान या अन्य कुछ बनाकर रखे जाते हैं। इसलिए हम परम्परा और संस्कृति के नाम पर राम या पैगम्बर मोहम्मद के अनुयाई के रूप में प्रचारित किये जाते हैं। यह शोषक-शासक वर्ग हमें जात-पात-धर्म सम्प्रदाय की बेड़ियों में जकडे़ रखकर, हमारे बीच आपसी संघर्ष को भड़काकर, उसे पाल-पोसकर हमें आपस में उलझाए रखता है। यह वह ताकत है जो नहीं चाहती कि इन्सान धर्मनिरपेक्षता आधारित स्वतंत्रता, समानता भाईचारे के मूल्यों को सही मायने में समझ पाएँ जिन्हें एक दिन धर्म की सत्ता को नेस्तोनाबूद कर हासिल किया गया था।
आज के दिन के लिए इससे बड़ा सबक दूसरा कोई हो नहीं सकता कि हम अपने अस्तित्व की धार्मिक, जातीय, साम्प्रदायिक, भाषाई पहचान को अपने अन्दर दफ्न कर उस व्याधि से मुक्ति पाएँ जो एक मनुष्य के रूप में हमारी एकता में बाधक है और एक व्यापक सामाजिक प्रतिबद्धता में बंधकर एक राष्ट्र में तब्दील होने के संघर्ष में उतरें और क़ातिलों से, चाहे वे हिन्दु हो या मुसलमान, मंदिर-मस्ज़िद के बहाने हजारों बेगुनाहों के क़त्लेआम का जवाब माँगें।