JNU के प्रोफ़ेसर आरक्षण नहीं चाहते, वामपंथियों के पाखण्ड का एक और उदाहरण… … Reservation in JNU, JNU and Communists, Caste system and Communist

JNU की एकेडेमिक काउंसिल के 30 प्रोफ़ेसरों ने कुलपति बीबी भट्टाचार्य से लिखित में शिकायत की है कि विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर और असोसियेट प्रोफ़ेसरों के लिये 149 पदों के लिये आरक्षण नहीं होना चाहिये। यह सुनकर उन लोगों को झटका लग सकता है, जो वामपंथियों को प्रगतिशील मानते हों, जबकि हकीकत कुछ और ही है। अपने बयान में प्रोफ़ेसर बिपिनचन्द्र कहते हैं, “असिस्टेंट प्रोफ़ेसर से ऊपर के पद के लिये आरक्षण लागू करने से इस विश्वविद्यालय की शिक्षा का स्तर गिरेगा… और यह संस्थान थर्ड-क्लास संस्थान बन जायेगा…” (अर्थात प्रोफ़ेसर साहब कहना चाहते हैं कि आरक्षण की वजह से स्तर गिरता है, और जिन संस्थानों में आरक्षण लागू है वह तीसरे दर्जे के संस्थान बन चुके हैं)… एक और प्रोफ़ेसर साहब वायके अलघ फ़रमाते हैं, “जेएनयू का स्टैण्डर्ड बनाये रखने के लिये आरक्षण सम्बन्धी कुछ मानक तय करने ही होंगे, ताकि यह यूनिवर्सिटी विश्वस्तरीय बनी रह सके…” (हा हा हा हा, कृपया हँसिये नहीं, राजनीतिक अखाड़ा बनी हुई, भाई-भतीजावाद से ग्रस्त और भारतीय इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने वाली नकली थीसिसों की यूनिवर्सिटी पता नहीं कब से विश्वस्तरीय हो गई…)। अब दो मिनट के लिये कल्पना कीजिये, कि यदि यही बयान भाजपा-संघ के किसी नेता ने दिया होता तो मीडिया को कैसा “बवासीर” हो जाता। (खबर यहाँ पढ़ें… http://www.outlookindia.com/article.aspx?263782 )

जब भाजपा के नये अध्यक्ष गडकरी ने कार्यभार संभाला और नई टीम बनाई तो अखबारों, मीडिया और चैनलों पर इस बात को लेकर लम्बी-चौड़ी बहसें चलाई गईं कि भाजपा ब्राह्मणवादी पार्टी है और इसमें बड़े-बड़े पदों पर उच्च वर्ग के नेताओं का कब्जा है तथा अजा-जजा वर्ग को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। आईये जरा एक निगाह डाल लेते हैं वामपंथी नेतृत्व के खासमखास त्रिमूर्ति पर – प्रकाश करात (नायर क्षत्रिय), सीताराम येचुरी (ब्राह्मण), बुद्धदेब भट्टाचार्य (ब्राह्मण), अब बतायें कि क्या यह जातिवादी-ब्राह्मणवादी मानसिकता नहीं है? वामपंथियों के ढोंग और पाखण्ड का सबसे अच्छा उदाहरण केरल में देखा जा सकता है, जहाँ OBC (एझावा जाति) हमेशा से वामपंथियों का पक्का वोट बैंक और पार्टी की रीढ़ रही है, लेकिन जब-जब भी वहाँ पार्टी को बहुमत मिला है, तब-तब इन्हें पीछे धकेलकर किसी उच्च वर्ग के व्यक्ति को मुख्यमंत्री की कुर्सी दी गई है। केरल में कम्युनिस्ट आंदोलन की प्रमुख नेत्री केआर गौरी (जो सबसे अधिक समय विधानसभा सदस्या रहीं) मुख्यमंत्री पद के लिये कई बार उपयुक्त पाये जाने के बावजूद न सिर्फ़ पीछे कर दी गईं बल्कि उन्हें “पार्टी विरोधी गतिविधियों” के नाम पर पार्टी से भी निकाला गया। इसी प्रकार वर्तमान मुख्यमंत्री अच्युतानन्दन भी पिछड़ा वर्ग से (50 साल के कम्युनिस्ट शासन के पहले पिछड़ा वर्ग मुख्यमंत्री) हैं, लेकिन जिस दिन से उन्होंने पद संभाला है उस दिन से ही किसी बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि पार्टी के सदस्यों ने ही उनकी लगातार आलोचना और नाक में दम किया गया है और उन्हें अपमानजनक तरीके से पोलित ब्यूरो से भी निकाला गया है, लेकिन फ़िर भी अकेली भाजपा ही ब्राह्मणवादी पार्टी है? मजे की बात तो यह है कि “धर्म को अफ़ीम” कहने वाले नास्तिक ढोंगियों (अर्थात वामपंथियों) की पोल इस मुद्दे पर भी कई बार खुल चुकी है, जब इनकी पार्टी के दिग्गज कोलकाता के पूजा पाण्डालों या अय्यप्पा स्वामी के मन्दिर में देखे गये हैं, फ़िर भी आलोचना भाजपा की ही करेंगे।

इसी प्रकार बंगाल के तथाकथित “भद्रलोक” कम्युनिस्टों को ही देख लीजिये, वहाँ कितने पिछड़ा वर्ग के मुख्यमंत्री हुए हैं? उच्च वर्ग हो या अजा-जजा वर्ग के बंगाली हों, बांग्लादेशी मुसलमानों द्वारा कम से कम 9 जिलों में लगातार उत्पीड़ित किये जा रहे हैं, लेकिन दूसरों को जातिवादी बताने वाले पाखण्डी वामपंथियों की कानों पर जूँ भी नहीं रेंगती। सन् 2008 में कम्युनिस्ट कैडर द्वारा पत्नी और बच्चों के सामने एक दलित युवक के गले में टायर डालकर उसे जला दिया गया था जिसकी कोई खबर किसी न्यूज़ चैनल या अखबार में प्रमुखता से नहीं दिखाई दी।

पिछले कुछ दिनों से मोहल्ला सहित 2-4 ब्लॉग्स पर वर्धा के हिन्दी विवि के प्रोफ़ेसर अनिल चमड़िया (जो कि बेहतरीन लिखते हैं, विचारधारा कुछ भी हो) को निकाले जाने को लेकर बुद्धिजीवियों(?) में घमासान मचा हुआ है… जिनमें से कुछ “नेतानुमा प्रोफ़ेसर” हैं, कुछ “पत्रकारनुमा नेता” हैं और कुछ “परजीवीनुमा बुद्धिजीवी” हैं… और हाँ कुछ वामपंथी है तो कुछ दलितों के कथित मसीहा भी… कुल मिलाकर ये कि उधर जमकर “भचर-भचर” हो रही है…(अच्छा हुआ कि मैं बुद्धिजीवी नहीं हूं), लेकिन जेएनयू (JNU) के प्रोफ़ेसर अपने संस्थान में आरक्षण नहीं चाहते… इस महत्वपूर्ण बात पर कोई बहस नहीं, कोई मीडिया चर्चा नहीं, किसी चैनल पर कोई इंटरव्यू नहीं… ऐसे होते हैं दोमुंहे और “कब्जाऊ-हथियाऊ” किस्म के वामपंथी…। सच बात तो यह है कि बरसों से जुगाड़, चमचागिरी और सेकुलरिज़्म के तलवे चाट-चाटकर जो प्रोफ़ेसर जेएनयू में कब्जा जमाये बैठे हैं उन्हीं को आरक्षण नहीं चाहिये। यदि यह बात किसी हिन्दू संगठन या भाजपा ने कही होती तो अब तक इन्ही सेकुलरों का पाला हुआ मीडिया “दलित विमर्श” को लेकर पता नहीं कितने सेमिनार करवा चुका होता… लेकिन मामला JNU का है जो कि झूठों का गढ़ है तो अब क्या करें…।
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एक अनुरोध – जब तक मीडिया का हिन्दुत्व विरोधी रवैया जारी रहेगा, जब तक मीडिया में हिन्दू हित की खबरों को पर्याप्त स्थान नहीं मिलता, ऐसी खबरों, कटिंग्स, ब्लॉग्स, लेखों आदि को अपने मित्रों को अधिकतम संख्या में फ़ेसबुक, ऑरकुट, ट्विटर आदि पर “सर्कुलेट” करके नकली सेकुलरिज़्म और वामपंथियों का “पोलखोल जनजागरण” अभियान सतत चलायें…

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भाषाई विवादों को पीछे छोड़ते और “राज ठाकरेवाद” को सबक देते दो युवा कलाकार… … Zee Marathi Saregamapa, Rahul Saxena, Abhilasha Chellam, Urmila Dhangar

महाराष्ट्र की लावणी/तमाशा परम्परा को जीवित करती और “जेण्डर बायस” की त्रासदी दर्शाती नई मराठी फ़िल्म “नटरंग”… Natrang, Atul Kulkarni, Marathi Movies, Tamasha

महाराष्ट्र की ग्रामीण लोक-परम्परा में “लावणी” और “तमाशा” का एक विशिष्ट स्थान हमेशा से रहा है। यह लोकनृत्य और इसमें प्रयुक्त किये जाने वाले गीत-संगीत-हावभाव आदि का मराठी फ़िल्मों में हमेशा से प्रमुख स्थान रहा है। बीते कुछ वर्षों में हिन्दी फ़िल्मों के बढ़ते प्रभाव, फ़िल्मों के कथानक का “कमाई” के अनुसार बाज़ारीकरण, तथा मराठी फ़िल्मों में भी पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते असर की वजह से अव्वल तो ग्रामीण पृष्ठभूमि पर बनने वाली फ़िल्में ही कम हो गईं और उसमें भी लावणी और तमाशा के गीत तथा दृश्य मृतप्राय हो गये थे।

महाराष्ट्र के लोगों में नाटक-कला-संस्कृति-फ़िल्में-गायन-वादन-खेल आदि की परम्परा सदा से ही पुष्ट रही है। इसमें भी “नाटक” और “गायन” प्रत्येक मराठी के दिल में बसता है, और यदि संगीत-नाटक (जिसमें कहानी के साथ गीत भी शामिल होते हैं) हो तो क्या कहने। बदलते आधुनिक युग के साथ महाराष्ट्र के ग्रामीण भागों में भी लावणी-तमाशा की परम्परा धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। अलबत्ता मुम्बई जैसे महानगर अथवा नासिक, पुणे, औरंगाबाद, सोलापुर, कोल्हापुर आदि शहरों में अच्छे नाटकों के शो आज भी हाउसफ़ुल जाते हैं।

1 जनवरी 2010 को महाराष्ट्र की इस विशिष्ट परम्परा को पुनर्जीवित करने का प्रयास करते हुए एक फ़िल्म प्रदर्शित हुई है, नाम है “नटरंग”, रिलीज़ होने से पहले ही इसका संगीत बेहद लोकप्रिय हो चुका था और रिलीज़ होने के बाद इस फ़िल्म ने पूरे महाराष्ट्र में धूम मचा रखी है। जी टॉकीज़ द्वारा निर्मित यह फ़िल्म प्रख्यात मराठी लेखक और महाराष्ट्र साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष आनन्द यादव के उपन्यास पर आधारित है और इसमें मुख्य भूमिका निभाई है “अतुल कुलकर्णी” ने। अतुल कुलकर्णी को हिन्दी के दर्शक, – हे-राम, पेज 3, चांदनी बार, रंग दे बसन्ती, ये है इंडिया, जेल आदि फ़िल्मों में महत्वपूर्ण भूमिकाओं में देख चुके हैं।

 दो साल पहले जब इस फ़िल्म के उपन्यास पर आधारित पटकथा जी टॉकीज़ वालों को सुनाई गई थी, उस समय इसकी कहानी के फ़िल्म बनने पर “कमाऊ” होने में निश्चित रूप से संशय था, क्योंकि लावणी-तमाशे की मुख्य पृष्ठभूमि पर आधारित ग्रामीण कहानी पर फ़िल्म बनाना एक बड़ा जोखिम था, लेकिन जी टॉकीज़ वालों ने निर्देशक की मदद की और यह बेहतरीन फ़िल्म परदे पर उतरी। रही-सही कसर अतुल कुलकर्णी जैसे “प्रोफ़ेशन” के प्रति समर्पित उम्दा कलाकार ने पूरी कर दी।

हिन्दी के दर्शक अतुल के बारे में अधिक नहीं जानते होंगे, लेकिन मराठी से आये हुए अधिकतर कलाकार चाहे वह रीमा लागू हों, डॉ श्रीराम लागू हों, नाना पाटेकर, अमोल पालेकर, मधुर भण्डारकर या महेश मांजरेकर कोई भी हों… सामान्यतः नाटक और मंच की परम्परा के जरिये ही आते हैं इसलिये फ़िल्म निर्देशक का काम वैसे ही आसान हो जाता है। हिन्दी में भी परेश रावल, सतीश शाह, पंकज कपूर, नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी आदि मंजे हुए कलाकार नाटक मंच के जरिये ही आये हैं। बात हो रही थी अतुल कुलकर्णी की, इस फ़िल्म की पटकथा और कहानी से वे इतने प्रभावित थे कि उन्होंने सात महीने की एकमुश्त डेट्स निर्देशक को दे दीं, तथा इस बीच अपने रोल के साथ पूरा न्याय करने के लिये उन्होंने मणिरत्नम, विशाल भारद्वाज और रामगोपाल वर्मा जैसे दिग्गजों को नई कहानी या पटकथा सुनाने-सुनने से मना कर दिया।

इस फ़िल्म में अतुल कुलकर्णी का रोल इंटरवल के पहले एक पहलवान का है, जबकि इंटरवल के बाद तमाशा में नृत्य करने वाले एक हिजड़ानुमा स्त्री पात्र का है, जिसे “तमाशा” में मुख्य स्त्री पात्र का सहायक अथवा “नाच्या” कहा जाता है। फ़िल्म में पहलवान दिखने के लिये पहले दुबले-पतले अतुल कुलकर्णी ने अपना वज़न बढ़ाकर 85 किलो किया और जिम में जमकर पसीना बहाया। फ़िर दो माह के भीतर ही भूमिका की मांग के अनुसार इंटरवल के बाद “स्त्री रूपी हिजड़ा” बनने के लिये अपना वज़न 20 किलो घटाया। सिर्फ़ तीन माह के अन्तराल में अपने शरीर के साथ इस तरह का खतरनाक खिलवाड़ निश्चित रूप से उनके लिये जानलेवा साबित हो सकता था, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फ़िजिकल ट्रेनर शैलेष परुलेकर की मदद से यह कठिन काम भी उन्होंने पूरा कर दिखाया।

अतुल कुलकर्णी ने 30 वर्ष की आयु में 1995 में नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा से कोर्स पूरा किया, उसी के बाद उन्होंने अभिनय को अपना प्रोफ़ेशन बनाना निश्चित कर लिया। अतुल कुलकर्णी ने अब तक 4 भाषाओं में आठ नाटक, 6 भाषाओं में छब्बीस फ़िल्में की हैं तथा उन्हें दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। उनका कहना है कि फ़िल्म की भाषा क्या है, अथवा निर्देशक कौन है इसकी बजाय कहानी और पटकथा के आधार पर ही वे फ़िल्म करना है या नहीं यह निश्चित करते हैं, मुझे अधिक फ़िल्में करने में कोई रुचि नहीं है, अच्छी फ़िल्में और रोल मिलते रहें बस… बाकी रोजी-रोटी के लिये नाटक तो है ही…”।

अब थोड़ा सा इस अदभुत फ़िल्म की कहानी के बारे में…

फ़िल्म का मुख्य पात्र गुणा कागलकर अर्थात अतुल एक ग्रामीण खेत मजदूर हैं। गुणाजी को सिर्फ़ दो ही शौक हैं, पहलवानी करना और तमाशा-लावणी देखना, उसके मन में एक दबी हुई इच्छा भी है कि वह अपनी खुद की नाटक-तमाशा कम्पनी शुरु करे, उसमें स्वयं एक राजा की भूमिका करे तथा विलुप्त होती जा रही लावणी कला को उसके शिखर पर स्थापित करे। ग्रामीण पृष्ठभूमि और सुविधाओं के अभाव में उसका संघर्ष जारी रहता है, वह धीरे-धीरे गाँव के कुछ अन्य नाटकप्रेमी लोगों को एकत्रित करके एक ग्रुप बनाता है जिसमें लावणी नृत्य पेश किया जाना है। उसे हीरोइन भी मिल जाती है, जो उसे भी नृत्य सिखाती है। इन सबके बीच समस्या तब आन खड़ी होती है, जब “नाच्या” (स्त्री रूपी मजाकिया हिजड़े) की भूमिका के लिये कोई कलाकार ही नहीं मिलता, लेकिन गुणाजी पर नाटक कम्पनी खड़ी करने और अपनी कला प्रदर्शित करने का जुनून कुछ ऐसा होता है कि वह मजबूरी में खुद ही “नाच्या” बनने को तैयार हो जाता है। उसके इस निर्णय से उसकी पत्नी बेहद खफ़ा होती है और उनमें विवाद शुरु हो जाते हैं, उस पर गाँव की भीतरी राजनीति में नाटक की हीरोइन तो “जेण्डर बायस” की शिकार होती है साथ ही साथ हिजड़े की भूमिका निभाने के लिये गुणाजी को भी गाँव में हँसी का पात्र बनना पड़ता है। कहाँ तो गुणाजी अपने तमाशे में एक “विशालकाय मजबूत राजा” का किरदार निभाना चाहता है, लेकिन बदकिस्मती से उसे साड़ी-बिन्दी लगाकर एक नचैया की भूमिका करना पड़ती है…नाटक के अपने शौक और अपनी लावणी कम्पनी शुरु करने की खातिर वह ऐसा भी करता है। बहरहाल तमाम संघर्षों, पक्षपात, खिल्ली, धनाभाव, अपने परिवार की टूट के बावजूद गुणाजी अन्ततः अपने उद्देश्य में सफ़ल होता है और उसकी नाटक कम्पनी सफ़लता से शुरु हो जाती है, लेकिन उसकी पत्नी उसे छोड़कर चली जाती है। (अतुल कुलकर्णी की हिजड़ानुमा औरत वाली भूमिका की तस्वीर जानबूझकर नहीं दे रहा हूं, क्योंकि वह देखने और अनुभव करने की बात है)

मराठी नाटकों की सौ वर्ष से भी पुरानी समृद्ध नाट्य परम्परा में लावणी-तमाशा में “नाच्या” की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि यह नाच्या कभी कहानी को आगे बढ़ाने के काम आता है, कभी सूत्रधार, कभी विदूषक तो कभी नर्तक बन जाता है। इस तरह नृत्य करने वाली मुख्य नृत्यांगना के साथ ही इसका रोल भी जरूरी होता है, लेकिन जैसा कि हमारे समाज में होता आया है, “थर्ड जेण्डर” अर्थात हिजड़ों के साथ अन्याय, उपेक्षा और हँसी उड़ाने का भाव सदा मौजूद होता है, वैसा नाच्या के साथ भी जेण्डर बायस किया जाता है, जबकि अधिकतर तमाशों में यह भूमिका पुरुष ही निभाते आये हैं। मराठी नाटकों में पुरुषों द्वारा स्त्री की भूमिका बाळ गन्धर्व के ज़माने से चली आ रही है, कई-कई नाटकों में पुरुषों ने स्त्री की भूमिका बगैर किसी फ़ूहड़पन के इतने उम्दा तरीके से निभाई है कि नाटक देखते वक्त कोई जान नहीं सकता कि वह कलाकार पुरुष है। ऐसे ही एक महान मराठी कलाकार थे गणपत पाटील, जिन्होंने बहुत सारी फ़िल्मों में “नाच्या” की भूमिका अदा की, और उनके अभिनय में इतना दम था तथा उनकी भूमिकाएं इतनी जोरदार थीं कि नाटक-फ़िल्मों के बाहर की दुनिया में भी उनके बच्चों को भी लोग उनका बच्चा मानने को तैयार नहीं होते थे, अर्थात जैसी छवि हिन्दी फ़िल्मों में प्राण अथवा रंजीत की है कि ये लोग बुरे व्यक्ति ही हैं, ठीक वैसी ही छवि गणपत पाटील की हिजड़े के रूप में तथा निळू फ़ुले की “खराब आदमी” के रूप में मराठी में प्रचलित है।

मराठी नाटकों की समृद्ध परम्परा की बात निकली है तो एक उल्लेख करना चाहूंगा कि मराठी फ़िल्मों के स्टार प्रशांत दामले 1983 से अब तक नाटकों के 8000 “व्यावसायिक” शो कर चुके हैं तथा एक ही दिन में 3 विभिन्न नाटकों के 5 शो हाउसफ़ुल करने के लिये लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स में उनका नाम  दर्ज है…।

चलते-चलते :-

उज्जैन में प्रतिवर्ष सरकारी खर्च और प्रचार पर कालिदास समारोह आयोजित किया जाता है, जिसमें संस्कृत और हिन्दी के नाटक खेले जाते हैं, लेकिन सारे तामझाम के बावजूद कई बार 100 दर्शक भी नहीं जुट पाते, जो दर्शक इन हिन्दी नाटकों में पाये जाते हैं, उनमें से कुछ सरकारी अधिकारी होते हैं जिनकी वहां उपस्थिति “ड्यूटी” का एक भाग है, कुछ अखबारों के कथित समीक्षक, तथा कुछ आसपास घूमने वाले अथवा टेण्ट हाउस वाले दिखाई देते हैं। जबकि इसी उज्जैन में जब महाराष्ट्र समाज द्वारा मराठी नाटक मुम्बई अथवा इन्दौर से बुलवाया जाता है, तब बाकायदा “टिकिट लेकर” देखने वाले 500 लोग भी आराम से मिल जाते हैं।

फ़िल्म रिलीज़ के मौके पर मंच पर प्रस्तुत इस फ़िल्म का एक गीत यहाँ देखा जा सकता है…

http://www.youtube.com/watch?v=79xzHDM11eQ

तथा “नटरंग” फ़िल्म का ट्रेलर यहाँ देखा जा सकता है…

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मिग-21 के एक जाँबाज और जीवट वाले “लेखक पायलट” के बारे में जानिये…… Paralyzed Fighter Pilot Writer

वर्ष का अन्त और नववर्ष की शुरुआत हिम्मत और जीवट से करने के लिये मैंने इस लेख को चुनना तय किया। जैसी हिम्मत और जीवट मिग-21 के पायलट एमपी अनिल कुमार ने दिखाई और दिखा रहे हैं, वैसा जज़्बा और जोश सभी लोग दिखायें… ऐसी आशा करता हूं…

ज़रा कल्पना कीजिये कि आयु के 24वें वर्ष में एक युवक का एक्सीडेण्ट हो जाये और गर्दन के नीचे का पूरा शरीर पक्षाघात से पीड़ित हो जाये तब उसे हिम्मत हारते देर नहीं लगेगी? लेकिन भारत के जाँबाज सैनिक केरल के एमपी अनिल कुमार किसी और ही मिट्टी के बने हैं। जी हाँ, 24 वर्ष की आयु में एक सड़क हादसे में उन्हें गहरी दिमागी चोट लगी और गर्दन के नीचे का शरीर किसी काम का न रहा, लेकिन पिछले 19 वर्ष से वे न सिर्फ़ ज़िन्दगी को ठेंगा दिखाये हुए हैं, बल्कि कम्प्यूटर को अपना साथी बनाकर एक उम्दा लेखक के रूप में भी सफ़ल हुए हैं। विकलांगता पर लिखा हुआ उनका एक लेख महाराष्ट्र के स्कूलों में पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है, जिसमें उन्होंने सभी विकलांगो में जोश भरते हुए अपने बारे में भी लिखा है।

पुणे के खड़की में सैनिक रीहैबिलिटेशन केन्द्र के सबसे पहले कमरे में आप व्हील चेयर पर फ़्लाइंग ऑफ़िसर एमपी अनिल कुमार को देख सकते हैं। उनका कमरा, उनकी व्हीलचेयर, और उनका कम्प्यूटर… यही उनकी दुनिया है, लेकिन इस छोटी सी दुनिया में बैठकर दाँतों में एक लकड़ी की स्टिक पकड़कर वे सामने टंगे की-बोर्ड पर एक-एक करके अक्षर टाइप करते जाते हैं, और उम्दा लेख, बेहतरीन सपने और जीवटता की नई मिसाल रचते जाते हैं। 28 जून 1988 को रात में लौटते समय उनका एक्सीडेण्ट हुआ था, उस दिन के बाद से वे व्हील चेयर पर ही हैं।

1980 में उन्होंने पुणे की नेशनल डिफ़ेंस एकेडमी में दाखिला लिया था। त्रिवेन्द्रम से 35 किमी दूर एक गाँव से वे भारतीय वायु सेना में फ़ाइटर पायलट बनने का सपना लिये आये हुए युवक थे। NDA की तीन वर्ष की कठिन ट्रेनिंग के बाद उनका चयन वायुसेना में एक और बेहद कठिन ट्रेनिंग के लिये हुआ, लेकिन उसे उन्होंने आसानी से हँसते-हँसते पास कर लिया।

अनिल कुमार के सहपाठी याद करते हुए कहते हैं कि “अनिल एक आलराउंडर टाइप के व्यक्ति हैं, लम्बी दौड़ के साथ ही वे एक बेहतरीन जिमनास्ट भी हैं। उन्हें NDA की ट्रेनिंग के दौरान “सिल्वर टॉर्च” का पुरस्कार मिला था, जो कि प्रत्येक नये सैनिक का सपना होता है। हैदराबाद के वायुसेना अड्डे पर उनकी पोस्टिंग हुई, और देखते ही देखते उन्होंने हवाई जहाज उड़ाना, कलाबाजियाँ दिखाना और सटीक बमबारी करना सीख लिया। जवानी के दिनों में उनकी पोस्टिंग एक बार पठानकोट के वायुसेना बेस पर भी हुई, जहाँ उनके सीनियर भी उनसे सलाह लेने में नहीं हिचकते थे। यदि 19 साल पहले वह दुर्घटना न हुई होती तो पता नहीं अनिल कुमार आज कहाँ होते, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और एक सच्चे फ़ायटर की तरह जीवन से युद्ध किया और अब तक तो जीत ही रहे हैं।

उन्होंने अपनी विकलांगता को कैसे स्वीकार किया, कैसे उससे लड़ाई की, कैसे हिम्मत बनाये रखी आदि संस्मरणों को उन्होने एक लेख “एयरबोर्न टू चेयरबोर्न” में लिखा और उसकी लोकप्रियता ने उनके “लेखकीय कैरियर” की शुरुआत कर दी। अपने घर केरल से मीलों दूर पुणे के सैनिक अस्पताल में पहले-पहल उन्होंने दाँतों में पेन पकड़कर लिखना शुरु किया, लेकिन कम्प्यूटर के आने के बाद उन्होंने सामने की-बोर्ड लटकाकर लकड़ी की पतली डंडी से टाइप करना सीख लिया। महाराष्ट्र तथा केरल के अंग्रेजी माध्यम बोर्ड में उनका लिखा हुआ लेख पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया, और इस लेख ने उनके कई-कई युवा मित्र बनवा दिये।

आज की तारीख में खड़की का यह सैनिक पुनर्वास केन्द्र ही उनका स्थायी पता बन चुका है, रोज़ाना सुबह और शाम कुछ घण्टे वे लेखन में बिताते हैं। उनके लेख मुख्यतया सेना, रक्षा मामले और वायुसेना के लड़ाकू विमानों की नई तकनीक पर आधारित होते हैं और उनके अनुभव को देखते हुए ये लेख नये सैनिकों के लिये काफ़ी लाभकारी सिद्ध होते हैं। भले ही वे किसी की मदद के बिना हिलडुल नहीं सकते, लेकिन उनका दिमाग एकदम सजग और चौकन्ना है तथा उनका लेखन भी चाक-चौबन्द। उनका मानना है कि “संकट के बादलों में भी अवसरों की चमक छिपी होती है”, इसलिये कभी भी हिम्मत न हारो, संघर्ष करो, जूझते रहो, सफ़लता अवश्य मिलेगी… “संघर्ष जितना अधिक तीखा और कठिन होगा, उसका फ़ल उतना ही मीठा मिलेगा…”।

जल्द ही उनके लेखों को संकलित करती एक पुस्तक भी प्रकाशित होने वाली है…। नववर्ष की पूर्व संध्या पर तथा आने वाले वर्ष की शुरुआत के लिये इस जाँबाज सैनिक को सेल्यूट करने से अच्छा काम भला और क्या हो सकता है…। आप उनसे सम्पर्क साध सकते हैं… पता है –

M P Anil Kumar
Paraplegic Rehabilitation Centre
Park Road
Khadki
Pune 411020
E-mail: anilmp@gmail.com

मैं मानता हूं कि देश के सामने अनगिनत समस्याएं हैं, महंगाई, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, धर्मान्तरण, साम्प्रदायिकता, जेहादी मानसिकता, गरीबी, अशिक्षा… लेकिन जैसा कि एमपी अनिल कुमार कहते हैं… संघर्ष जितना तीखा होगा, फ़ल उतना ही मीठा होगा… तो हमें भी इस फ़ाइटर पायलट की तरह संघर्ष करना है, हिम्मत नहीं हारना है और जुटे रहना है…

जय हिन्द, जय जवान… आप सभी को अंग्रेजी नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं…

एनडी तिवारी के बहाने दो-तीन प्रमुख मुद्दों पर बहस की दरकार… ND Tiwari, Sex Scandal, Governor of AP

पिछले कुछ दिनों से आंध्र के पूर्व राज्यपाल एनडी तिवारी ने चहुंओर हंगामा मचा रखा है। इसके पक्ष-विपक्ष में कई लेख और मत पढ़ने को मिले, जिसमें अधिकतर में तिवारी के चरित्र पर ही फ़ोकस रहा, किसी ने इसे तुरन्त मान लिया, कुछ लोग सशंकित हैं, जबकि कुछ लोग मानने को ही तैयार नहीं हैं कि तिवारी ऐसा कर सकते हैं। ज्ञानदत्त पाण्डेय जी के ब्लॉग पर विश्वनाथ जी ने बड़े मासूम और भोले-भाले से सवाल उठाये, जबकि विनोद जी ने चीरफ़ाड़ में कांग्रेस की फ़ाड़कर रख दी, वहीं एक तरफ़ डॉ रूपचन्द्र शास्त्री जी उन्हें दागी मानने को ही तैयार नहीं हैं। हालांकि कुछ बिन्दु ऐसे हैं जिनका कोई जवाब अभी तक नहीं मिला है, जैसे –

1) यदि नैतिकता के इतने ही पक्षधर थे तो, एनडी तिवारी ने इस्तीफ़ा इतनी देर से और केन्द्र के हस्तक्षेप के बाद क्यों दिया?

2) नैतिकता का दावा मजबूत करने के लिये इस्तीफ़ा “स्वास्थ्य कारणों” से क्यों दिया, नैतिकता के आधार पर देते?

3) जब रोहित शेखर नामक युवक ने पिता होने का आरोप लगाया था, तब नैतिकता की खातिर खुद ही DNA टेस्ट के लिये आगे कर दिया होता, दूध का दूध पानी का पानी हो जाता?

4) पहले भी ऐसे ही “खास मामलों” में राजनैतिक गलियारों में इनका ही नाम क्यों उछलता रहा है, किसी और नेता का क्यों नहीं?

बहरहाल सवाल तो कई हैं, लेकिन ऐसे माहौल में दो महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात छूट गई लगती है, इसलिये उन्हें यहाँ पेश कर रहा हूं…

पहला मुद्दा – क्या अब भी हमें राज्यपाल पद की आवश्यकता है?

पिछले कुछ वर्षों में (जबसे राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें मजबूत हुईं, तब से) यह देखने में आया है कि राज्यों में राज्यपाल केन्द्र के “जासूसी एजेण्ट” और “हितों के रखवाले” के रूप में भेजे जाते हैं। राज्यपाल अधिकतर उन्हीं “घाघ”, “छंटे हुए”, “शातिर” लोगों को ही बनाया जाता है, जिन्होंने “जवानी” के दिनों में कांग्रेस (यानी गाँधी परिवार) की खूब सेवा की हो, और ईनाम के तौर पर उनका बुढ़ापा सुधारने (यहाँ “मजे मारने” पढ़ा जाये) के लिये राज्यपाल बनाकर भेज दिया जाता है। राज्यपालों को कोई काम-धाम नहीं होता है, इधर-उधर फ़ीते काटना, उदघाटन करना, चांसलर होने के नाते प्रदेश के विश्वविद्यालयों में अपनी नाक घुसेड़ना, प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति यदि राज्य के दौरे पर आयें तो उनकी अगवानी करना, विधानसभा सत्र की शुरुआत में राज्य सरकार का ही लिखा हुआ बोरियत भरा भाषण पढ़ना… और सिर्फ़ एक महत्वपूर्ण काम यह कि कौए की तरह यह देखना कि कब राज्य में राजनैतिक संकट खड़ा हो रहा है (या ऐसा कोई संकट खड़ा करने की कोशिश करना), फ़िर पूरे लोकतन्त्र को झूला झुलाते हुए केन्द्र क्या चाहता है उसके अनुसार रिपोर्ट बनाकर देना…। ऐसे कई-कई उदाहरण हम रोमेश भण्डारियों, सिब्ते रजियों, बूटा सिंहों आदि के रूप में देख चुके हैं। तात्पर्य यह कि राज्यपाल नामक “सफ़ेद हाथी” जितना काम करता है उससे कहीं अधिक बोझा राज्य के खजाने (यानी हमारी जेब पर) डाल देता है। जानना चाहता हूं कि क्या राज्यपाल नामक “सफ़ेद हाथी” पालना जरूरी है? एक राजभवन का जितना खर्च होता है, उसमें कम से कम दो राज्य मंत्रालय समाहित किये जा सकते हैं, जो शायद अधिक काम के साबित हों…।

अब आते हैं दूसरे मुद्दे पर…

क्या भारतीय राजनीति में “टेब्लॉयड संस्कृति” का प्रादुर्भाव हो रहा है? यदि हो रहा है तो होना चाहिये अथवा नहीं?

भारत के राजनैतिक और सामाजिक माहौल में अभी ब्रिटेन की “टेब्लॉयड संस्कृति” वाली पत्रकारिता एक नई बात है। जैसा कि सभी जानते हैं, ब्रिटेन के दोपहर में निकलने वाले अद्धे साइज़ के अखबारों को टेब्लॉयड कहा जाता है, जिसमें, किस राजनेता का कहाँ चक्कर चल रहा है, किस राजनेता के किस स्त्री के साथ सम्बन्ध हैं, कौन सा राजनैतिक व्यक्ति कितनी महिलाओं के साथ कहाँ-कहाँ देखा गया, जैसी खबरें ही प्रमुखता से छापी जाती हैं। चूंकि पश्चिमी देशों की संस्कृति(?) में ऐसे सम्बन्धों को लगभग मान्यता प्राप्त है इसलिये लोग भी ऐसे टेब्लॉयडों को पढ़कर चटखारे लेते हैं और भूल जाते हैं।

डॉ शास्त्री, तिवारी जी के प्रति अपनी भक्तिभावना से प्रेरित होकर और विश्वनाथ जी एक सामान्य सभ्य नागरिक की तरह सवाल पूछ रहे हैं, लेकिन सच्चाई कहीं अधिक कटु होती है। जो पत्रकार अथवा जागरूक राजनैतिक कार्यकर्ता सतत इस माहौल के सम्पर्क में रहते हैं, वे जानते हैं कि इन नेताओं के लिये “सर्किट हाउसों”, रेस्ट हाउसों तथा फ़ार्म हाउसों में क्या-क्या और कैसी-कैसी व्यवस्थाएं की जाती रही हैं, की जाती हैं और की जाती रहेंगी… क्योंकि जब सत्ता, धन और शराब तीनों बातें बेखटके, अबाध और असीमित उपलब्ध हो, ऐसे में उस जगह “औरत” उपलब्ध न हो तो आश्चर्य ही होगा। भारतीय मीडिया अभी तक ऐसी खबरों के प्रकाशन अथवा उसे “गढ़ने”(?) में थोड़ा संकोची रहा है, लेकिन यह हिचक धीरे-धीरे टूट रही है… ज़ाहिर है कि इसके पीछे “बदलते समाज” की भी बड़ी भूमिका है, वरना कौन नहीं जानता कि –

1) भारत के एक पूर्व प्रधानमंत्री के कम से कम 3 महिलाओं से खुल्लमखुल्ला सम्बन्ध रहे थे।

2) दक्षिण का एक सन्यासी, जो कि हथियारों का व्यापारी भी था कथित रूप से एक पूर्व प्रधानमंत्री का बेटा कहा जाता है।

3) एक विशेष राज्य के विशेष परिवार के मुख्यमंत्री और उसका बेटे के “घरेलू” सम्बन्ध एक पूर्व प्रधानमंत्री के पूरे परिवार से थे।

4) एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री के लाड़ले बेटे की “चाण्डाल चौकड़ी” ने न जाने कितनी महिलाओं को बरबाद (एक प्रसिद्ध अभिनेत्री की माँ को) किया, जबकि कितनी ही महिलाओं को आबाद कर दिया (उनमें से एक वर्तमान केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में भी है)।

5) मध्यप्रदेश की एक आदिवासी महिला नेत्री का राजनैतिक करियर उठाने में भारत के एक पूर्व प्रधानमंत्री का हाथ है, जिनकी एकमात्र योग्यता सुन्दर होना है।

6) एक प्रसिद्ध फ़िल्म अभिनेता की माँ के भी एक पूर्व प्रधानमंत्री से सम्बन्ध काफ़ी चर्चित हैं।

नेताओं अथवा धर्मगुरुओं के प्रति भावुक होकर सोचने की बजाय हमें तर्कपूर्ण दृष्टि से सोचना चाहिये…। एक और छोटा सा उदाहरण – हाल ही में अपनी हरकतों की वजह से कुख्यात हुए एक “सिन्धी” धर्मगुरु तथा मुम्बई के एक प्रसिद्ध “सिन्धी” बिल्डर के बीच यदि धन के लेन-देन और बेनामी सौदों की ईमानदारी से जाँच कर ली जाये तो कई राज़ खुल जायेंगे… एक और प्रवचनकार द्वारा आयकर छिपाने के मामले खुल रहे हैं।

(तात्पर्य यह शास्त्री जी अथवा विश्वनाथ जी, कि भारतीय राजनीति में ऐसे कई-कई उदाहरण मौजूद हैं, हालांकि ऊपर दिये गये उदाहरणों में मैं नामों का उल्लेख नहीं कर सकता, लेकिन जो लोग राजनैतिक रूप से “जागरूक” हैं, वे जानते हैं कि ये किरदार कौन हैं, और ऐसी बातें अक्सर सच ही होती हैं और बातें भी हवा में से पैदा नहीं होती, कहीं न कहीं धुँआ अवश्य मौजूद होता है) चूंकि अब मामले खुल रहे हैं, समाज छिन्न-भिन्न हो रहा है, विश्वास टूट रहे हैं… तो लोग आश्चर्य कर रहे हैं, तब सवाल उठना स्वाभाविक है कि –

अ) क्या पश्चिमी प्रेस का प्रभाव भारतीय मीडिया पर भी पड़ा है?

ब) जब हम हर बात में पश्चिम की नकल करने पर उतारू हैं तो नेताओं के ऐसे यौनिक स्टिंग ऑपरेशन भी होने चाहिये (अब जनता ने भ्रष्टाचार को तो स्वीकार कर ही लिया है, इसे भी स्वीकार कर लिया जायेगा), धीरे-धीरे ऐसे नेताओं को नंगा करने में क्या बुराई है?

स) भारतीय संस्कृति में ऐसी खबरें हेडलाइन्स के रूप में छपेंगी तो समाज पर क्या “रिएक्शन” होगा?

ऐसे उप-सवालों का मूल सवाल यही है कि “ऐसे स्टिंग ऑपरेशन और नेताओं के चरित्र के सम्बन्ध में मीडिया को सबूत जुटाना चाहिये, खबरें प्रकाशित करना चाहिये, खोजी पत्रकारिता की जानी चाहिये अथवा नहीं?”

मूल बहस से हटते हुए एक महत्वपूर्ण तीसरा और अन्तिम सवाल यहाँ फ़िर उठाना चाहूंगा कि जब ऐसी कई जानकारियाँ मेरे जैसा एक सामान्य ब्लागर सिर्फ़ अपनी आँखे और कान खुले रखकर प्राप्त कर सकता है तो फ़िर पत्रकार क्यों नहीं कर सकते, उन्हें तो अपने मालिक का, कानून का कवच प्राप्त होता है, संसाधन और सम्पर्क हासिल होते हैं, और यदि यही संरक्षण ब्लागरों को भी मिलने लगे तो कैसा रहे?

बहरहाल अधिक लम्बा न खींचते हुए इन दोनों (बल्कि तीनों) मुद्दों पर पाठकों की बेबाक राय जानना चाहूंगा…
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चलते-चलते :- मैं सीरियसली सोच रहा हूं कि तिवारी जी ने इस्तीफ़े में “स्वास्थ्य कारणों” की वजह बताई, वह सही भी हो सकती है, क्योंकि वियाग्रा के ओवरडोज़ से स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो ही जाती हैं… है ना? और तिवारी जी की गलती इतनी बड़ी भी नहीं है, उन्होंने तो कांग्रेस की स्थापना के 125 वर्ष का जश्न थोड़ा जल्दी मनाना शुरु कर दिया था, बस…

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इसीलिये रतन टाटा वन्दनीय और "सरकारी व्यवस्था" निन्दनीय हैं… Ratan Tata, 26/11 Terrorist Attack, Taj Hotel

कोई भी कर्मचारी अपनी जान पर खेलकर अपने मालिक के लिये वफ़ादारी और समर्पण से काम क्यों करता है? इसका जवाब है कि उसे यह विश्वास होता है कि उसका मालिक उसके हर सुख-दुख में काम आयेगा तथा उसके परिवार का पूरा ख्याल रखेगा, और संकट की घड़ी में यदि कम्पनी या फ़ैक्ट्री का मालिक उस कर्मचारी से अपने परिवार के एक सदस्य की भाँति पेश आता है तब वह उसका भक्त बन जाता है। फ़िर वह मालिक, मीडिया वालों, राजनीतिबाजों, कार्पोरेट कल्चर वालों की निगाह में कुछ भी हो, उस संस्थान में काम करने वाले कर्मचारी के लिये एक हीरो ही होता है। भूमिका से ही आप समझ गये होंगे कि बात हो रही है रतन टाटा  की।

26/11 को ताज होटल पर हमला हुआ। तीन दिनों तक घमासान युद्ध हुआ, जिसमें बाहर हमारे NSG और पुलिस के जवानों ने बहादुरी दिखाई, जबकि भीतर होटल के कर्मचारियों ने असाधारण धैर्य और बहादुरी का प्रदर्शन किया। 30 नवम्बर को ताज होटल तात्कालिक रूप से अस्थाई बन्द किया गया। इसके बाद रतन टाटा ने क्या-क्या किया, पहले यह देख लें –

1) उस दिन ताज होटल में जितने भी कर्मचारी काम पर थे, चाहे उन्हें काम करते हुए एक दिन ही क्यों न हुआ हो, अस्थाई ठेका कर्मचारी हों या स्थायी कर्मचारी, सभी को रतन टाटा ने “ऑन-ड्यूटी” मानते हुए उसी स्केल के अनुसार वेतन दिया।

2) होटल में जितने भी कर्मचारी मारे गये या घायल हुए, सभी का पूरा इलाज टाटा ने करवाया।

3) होटल के आसपास पाव-भाजी, सब्जी, मछली आदि का ठेला लगाने वाले सभी ठेलाचालकों (जो कि सुरक्षा बलों और आतंकवादियों की गोलाबारी में घायल हुए, अथवा उनके ठेले नष्ट हो गये) को प्रति ठेला 60,000 रुपये का भुगतान रतन टाटा की तरफ़ से किया गया। एक ठेले वाले की छोटी बच्ची भी “क्रास-फ़ायर” में फ़ँसने के दौरान उसे चार गोलियाँ लगीं जिसमें से एक गोली सरकारी अस्पताल में निकाल दी गई, बाकी की नहीं निकलने पर टाटा ने अपने अस्पताल में विशेषज्ञों से ऑपरेशन करके निकलवाईं, जिसका कुल खर्च 4 लाख रुपये आया और यह पैसा उस ठेले वाले से लेने का तो सवाल ही नहीं उठता था।

4) जब तक होटल बन्द रहा, सभी कर्मचारियों का वेतन मनीऑर्डर से उनसे घर पहुँचाने की व्यवस्था की गई।

5) टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस की तरफ़ से एक मनोचिकित्सक ने सभी घायलों के परिवारों से सतत सम्पर्क बनाये रखा और उनका मनोबल बनाये रखा।

6) प्रत्येक घायल कर्मचारी की देखरेख के लिये हरेक को एक-एक उच्च अधिकारी का फ़ोन नम्बर और उपलब्धता दी गई थी, जो कि उसकी किसी भी मदद के लिये किसी भी समय तैयार रहता था।

7) 80 से अधिक मृत अथवा गम्भीर रूप से घायल कर्मचारियों के यहाँ खुद रतन टाटा ने अपनी व्यक्तिगत उपस्थिति दर्ज करवाई, जिसे देखकर परिवार वाले भी भौंचक थे।

8) घायल कर्मचारियों के सभी प्रमुख रिश्तेदारों को बाहर से लाने की व्यवस्था की गई और सभी को होटल प्रेसिडेण्ट में तब तक ठहराया गया, जब तक कि सम्बन्धित कर्मचारी खतरे से बाहर नहीं हो गया।

9) सिर्फ़ 20 दिनों के भीतर सारी कानूनी खानापूर्तियों को निपटाते हुए रतन टाटा ने सभी घायलों के लिये एक ट्रस्ट का निर्माण किया जो आने वाले समय में उनकी आर्थिक देखभाल करेगा।

10) सबसे प्रमुख बात यह कि जिनका टाटा या उनके संस्थान से कोई सम्बन्ध नहीं है, ऐसे रेल्वे कर्मचारियों, पुलिस स्टाफ़, तथा अन्य घायलों को भी रतन टाटा की ओर से 6 माह तक 10,000 रुपये की सहायता दी गई।

11) सभी 46 मृत कर्मचारियों के बच्चों को टाटा के संस्थानों में आजीवन मुफ़्त शिक्षा की जिम्मेदारी भी उठाई है।

12) मरने वाले कर्मचारी को उसके ओहदे के मुताबिक नौकरी-काल के अनुमान से 36 से 85 लाख रुपये तक का भुगतान तुरन्त किया गया। इसके अलावा जिन्हें यह पैसा एकमुश्त नहीं चाहिये था, उन परिवारों और आश्रितों को आजीवन पेंशन दी जायेगी। इसी प्रकार पूरे परिवार का मेडिकल बीमा और खर्च टाटा की तरफ़ से दिया जायेगा। यदि मृत परिवार ने टाटा की कम्पनी से कोई लोन वगैरह लिया था उसे तुरन्त प्रभाव से खत्म माना गया।

हाल ही में ताज होटल समूह के प्रेसिडेंट एचएन श्रीनिवास ने एक इंटरव्यू दिया है, जिसमें उन्होंने उस हमले, हमले के दौरान ताज के कर्मचारियों तथा हमले के बाद ताज होटल तथा रतन टाटा के बारे में विचार व्यक्त किये हैं। इसी इंटरव्यू के मुख्य अंश आपने अभी पढ़े कि रतन टाटा ने क्या-क्या किया, लेकिन संकट के क्षणों में होटल के उन कर्मचारियों ने “अपने होटल” (जी हाँ अपने होटल) के लिये क्या किया इसकी भी एक झलक देखिये –

1) आतंकवादियों ने अगले और पिछले दोनों गेट से प्रवेश किया, और मुख्य द्वार के आसपास RDX बिखेर दिया ताकि जगह आग लग जाये और पर्यटक-सैलानी और होटल की पार्टियों में शामिल लोग भगदड़ करें और उन्हें निशाना बनाया जा सके, इन RDX के टुकड़ों को ताज के कुछ सुरक्षाकर्मियों ने अपनी जान पर खेलकर हटाया अथवा दूर फ़ेंका।

2) उस दिन होटल में कुछ शादियाँ, और मीटिंग्स इत्यादि चल रही थीं, जिसमें से एक बड़े बोहरा परिवार की शादी ग्राउंड फ़्लोर पर चल रही थी। कई बड़ी कम्पनियों के CEO तथा बोर्ड सदस्य विभिन्न बैठकों में शामिल होने आये थे।

3) रात 8.30 बजे जैसे ही आतंकवादियों सम्बन्धी हलचल हुई, होटल के स्टाफ़ ने अपनी त्वरित बुद्धि और कार्यक्षमता से कई हॉल और कान्फ़्रेंस रूम्स के दरवाजे बन्द कर दिये ताकि लोग भागें नहीं तथा बाद में उन्हें चुपके से पिछले दरवाजे से बाहर निकाल दिया, जबकि खुद वहीं डटे रहे।

4) जिस हॉल में हिन्दुस्तान लीवर लिमिटेड की एक महत्वपूर्ण बैठक चल रही थी वहाँ की एक युवा होटल मैनेजमेंट ट्रेनी लड़की ने बिना घबराये दरवाजे मजबूती से बन्द कर दिये तथा इसके बावजूद वह कम से कम तीन बार पानी-जूस-व्हिस्की आदि लेने बाहर गई। वह आसानी से गोलियों की रेंज में आ सकती थी, लेकिन न वह खुद घबराई न ही उसने लोगों में घबराहट फ़ैलने दी। चुपके से एकाध-दो को आतंकवादी हमले के बारे में बताया और मात्र 3 मिनट में सबको किचन के रास्ते पिछले दरवाजे से बाहर निकाल दिया।

5) थॉमस जॉर्ज नामक एक फ़्लोर कैप्टन ने ऊपरी मंजिल से 54 लोगों को फ़ायर-एस्केप से बाहर निकाला, आखिरी व्यक्ति को बाहर निकालते समय गोली लगने से उसकी मौत हो गई।

6) विभिन्न वीडियो फ़ुटेज से ही जाहिर होता है कि कर्मचारियों ने होटल छोड़कर भागने की बजाय सुरक्षाकर्मियों को होटल का नक्शा समझाया, आतंकवादियों के छिपे होने की सम्भावित जगह बताई, बिना डरे सुरक्षाकर्मियों के साथ-साथ रहे।

ऐसे कई-कई असली बहादुरों ने अपनी जान पर खेलकर कई मेहमानों की जान बचाई। इसमें एक बात यह भी महत्वपूर्ण है कि ताज होटल का स्टाफ़ इसे अपनी ड्यूटी समझकर तथा “टाटा” की इज्जत रखने के लिये कर रहा था। 26 नवम्बर को यह घटना हुई और 21 दिसम्बर को सुबह अर्थात एक महीने से भी कम समय में होटल का पूरा स्टाफ़ (मृत और घायलों को छोड़कर) मेहमानों के समक्ष अपनी ड्यूटी पर तत्परता से मुस्तैद था।

जमशेदजी टाटा  ने होटल व्यवसाय में उस समय कदम रखा था जब किसी अंग्रेज ने उनका एक होटल में अपमान कर दिया था और उन्हें बाहर करवा दिया था। उन्होंने भारत में कई संस्थानों की नींव रखी, पनपाया और वटवृक्ष बनाया।  उन्हीं की समृद्ध विरासत को रतन टाटा आगे बढ़ा रहे हैं, जब 26/11 हमले के प्रभावितों को इतनी मदद दी जा रही थी तब एक मीटिंग में HR मैनेजरों ने इस बाबत झिझकते हुए सवाल भी किया था लेकिन रतन टाटा का जवाब था, “क्या हम अपने इन कर्मचारियों के लिये ज्यादा कर रहे हैं?, अरे जब हम ताज होटल को दोबारा बनाने-सजाने-संवारने में करोड़ों रुपये लगा रहे हैं तो हमें उन कर्मचारियों को भी बराबरी और सम्मान से उनका हिस्सा देना चाहिये, जिन्होंने या तो अपनी जान दे दी या “ताज” के मेहमानों और ग्राहकों को सर्वोपरि माना। हो सकता है कि कुछ लोग कहें कि इसमें टाटा ने कौन सा बड़ा काम कर दिया, ये तो उनका फ़र्ज़ था? लेकिन क्या किसी अन्य उद्योगपति ने अरबों-खरबों कमाने के बावजूद इतनी सारी दुर्घटनाओं के बाद भी कभी अपने स्टाफ़ और आम आदमी का इतना खयाल रखा है? इसमें मैनेजमेण्ट गुरुओं के लिये भी सबक छिपा है कि आखिर क्यों किसी संस्थान की “इज्जत” कैसे बढ़ती है, उसके कर्मचारी कम तनख्वाह के बावजूद टाटा को छोड़कर क्यों नहीं जाते? टाटा समूह में काम करना व्यक्तिगत फ़ख्र की बात क्यों समझी जाती है? ऐसे में जब रतन टाटा कहते हैं “We Never Compromise on Ethics” तब सहज ही विश्वास करने को जी चाहता है। एक घटिया विचार करते हुए यदि इस इंटरव्यू को टाटा का “प्रचार अभियान” मान भी लिया जाये, तो अगर इसमें बताई गई बातों का “आधा” भी टाटा ने किया हो तब भी वह वन्दनीय ही है।

अब दूसरा दृश्य देखिये –

26/11 के हमले को एक वर्ष बीत चुका है, मोमबत्ती ब्रिगेड भी एक “रुदाली पर्व” की भाँति अपने-अपने घरों से निकलकर मोमबत्ती जलाकर वापस घर जा चुकी, “मीडियाई गिद्धों” ने 26/11 वाले दिन भी सीधा प्रसारण करके जमकर माल कमाया था, एक साल बाद पुनः “देश के साथ हुए इस बलात्कार” के फ़ुटेज दिखा-दिखाकर दोबारा माल कूट लिया है। इस सारे तमाशे, गंदी राजनीति और “सदा की तरह अकर्मण्य और सुस्त भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था” के बीच एक साल गुज़र गया। महाराष्ट्र सरकार और केन्द्र अपने आधिकारिक जवाब में यह मान चुके हैं कि 475 प्रभावित लोगों में से सिर्फ़ अभी तक सिर्फ़ 118 प्रभावितों को मुआवज़ा मिला है, रेल्वे के कई कर्मचारियों को आज भी प्रशस्ति-पत्र, नकद इनाम, और अनुकम्पा नियुक्ति के लिये भटकना पड़ रहा है। महाराष्ट्र चुनाव में “लोकतन्त्र की जीत”(?) के बाद 15 दिनों तक पूरी बेशर्मी से मलाईदार विभागों को लेकर खींचतान चलती रही, शिवराज पाटिल किसी राज्य में राज्यपाल बनने का इंतज़ार कर रहे हैं, आरआर पाटिल नामक एक अन्य निकम्मा फ़िर से गृहमंत्री बन गया, रेल्वे मंत्रालय कब्जे में लेकर बैठी ममता बैनर्जी के एक सहयोगी का 5 सितारा होटल का बिल लाखों रुपये चुकाया गया है, कसाब नामक “बीमारी” पर अभी तक 32 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, आगे भी पता नहीं कितने साल तक होते रहेंगे (इतने रुपयों में तो सभी घायलों को मुआवज़ा मिल गया होता), केन्द्र के मंत्री चार दिन की “खर्च कटौती नौटंकी” दिखाकर फ़िर से विदेश यात्राओं में मगन हो गये हैं, उधर राहुल बाबा हमारे ही टैक्स के पैसों से पूरे देश भर में यात्राएं कर रहे हैं तथा “नया भारत” बनाने का सपना दिखा रहे हैं… तात्पर्य यह कि सब कुछ हो रहा है, यदि कुछ नहीं हो पाया तो वह ये कि एक साल बीतने के बावजूद मृतकों-घायलों को उचित मुआवज़ा नहीं मिला, ऐसी भ्रष्ट “व्यवस्था” पर लानत भेजने या थूकने के अलावा कोई और विकल्प हो तो बतायें।

जनता का वोट लेकर भी कांग्रेस आम आदमी के प्रति सहानुभूतिपूर्ण नहीं है, जबकि व्यवसायी होते हुए भी टाटा एक सच्चे उद्योगपति हैं “बिजनेसमैन” नहीं। तो क्या यह माना जाये कि रतन टाटा की व्यवस्था केन्द्र सरकार से अधिक चुस्त-दुरुस्त है? यदि हाँ, तो फ़िर इस प्रकार के घटिया लोकतन्त्र और हरामखोर लालफ़ीताशाही को हम क्यों ढो रहे हैं और कब तक ढोते रहेंगे?
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विषयान्तर – संयोग से पिछले वर्ष मेरे भतीजे का चयन कैम्पस इंटरव्यू में एक साथ दो कम्पनियों मारुति सुजुकी और टाटा मोटर्स में हुआ, मुझसे सलाह लेने पर मैंने उस समय निःस्संकोच उसे टाटा मोटर्स में जाने की सलाह दी थी, तब न तो 26/11 का हमला हुआ था, न ही यह इंटरव्यू मैंने पढ़ा था… आज सोचता हूँ तो लगता है कि मेरी सलाह उचित थी, टाटा अवश्य ही उसका खयाल रखेंगे…

Thanks Givind Day, Turkeys Killing, Bakrid, Goat Salughter, Muslims and Jews, Hindu Rituals and Cruelty, Nepal Government and Hinduism, New York Times, रतन टाटा, ताज होटल, मुम्बई हमला, 26/11 का आतंक, घायलों को मुआवज़ा, महाराष्ट्र और केन्द्र की कांग्रेस सरकारें, लालफ़ीताशाही, अफ़सरशाही, , Blogging, Hindi Blogging, Hindi Blog and Hindi Typing, Hindi Blog History, Help for Hindi Blogging, Hindi Typing on Computers, Hindi Blog and Unicode

साइट पर विज्ञापन/खबरें देखिये, पैसा कमाईये…

जैसा कि सभी जानते हैं हम सभी टीवी पर आने वाले विज्ञापन चाहे फ़िल्मों में हों या न्यूज़ में सभी जगह परेशान रहते हैं, जैसे ही विज्ञापन आता है, हम तत्काल चैनल बदल लेते हैं… अखबार में आये हुए पेम्फ़लेट को एक नज़र देखते भी नहीं, होर्डिंग पर भी उड़ती सी नज़र तभी पड़ती है जब ट्रेफ़िक जाम में फ़ँसे हों या कोई खूबसूरत मॉडल दिखाई दे। यह बात अब विज्ञापन कम्पनियाँ भी जान गई हैं कि लोग विज्ञापनों से उकताने लगे हैं, परेशान होने लगे हैं। जैसे-जैसे इंटरनेट का प्रसार बढ़ रहा है, अब कम्पनियाँ अपना फ़ोकस इधर शिफ़्ट कर रही हैं। नेट पर विज्ञापन दिखाना तो और भी मुश्किल है, क्योंकि कम्प्यूटर/लेपटॉप पर काम करने वाले की निगाहों का फ़ोकस अमूमन अपने काम पर ही होता है, ज्यादातर लोगों ने “पॉप-अप ब्लॉकर” चालू किये होते हैं। तब सवाल उठता है कि उपभोक्ता को विज्ञापन कैसे दिखाये जायें, जवाब मिला कि उसे विज्ञापन देखने का भी पैसा दिया जाये, तब कम से कम कुछ प्रतिशत लोग नेट पर इसी बहाने विज्ञापन देखेंगे। इसलिये आजकल “पेड-विज्ञापन” देखो वाली साईटें आ रही हैं।

कुछ दिनों पूर्व जब मैंने “ओबामा तेल” वाली पोस्ट लिखी थी, उस समय कुछ पाठकों ने मुझसे मजाक में पूछा था कि क्या यह विज्ञापन के तौर पर लिखी गई “प्रमोशनल” पोस्ट है? ज़ाहिर है कि ऐसा नहीं था, लेकिन मेरी आज की यह पोस्ट विशुद्ध रूप से एक प्रमोशनल पोस्ट है। हालांकि इस प्रकार के “आईडियाज़” देने में अवधिया जी, पाबला जी जैसे ब्लॉगर सिद्धहस्त हैं और नेट से कमाई करने में शायद अव्वल भी। मैंने कभी-कभी विज्ञापन, एडसेंस आदि से कमाई करने के बारे में विचार किया, प्रयास भी किया लेकिन आज तक सफ़लता नहीं मिली है।

हाल ही में मेरे एक मित्र ने मुझे एक वेबसाईट के बारे में बताया जिसके द्वारा उसे सिर्फ़ विज्ञापन देखने की वजह से आय हुई। ऐसी बातों पर मुझे जल्दी विश्वास नहीं होता, इसलिये मैंने उसे सबूत देने को कहा और उसने खुद सहित तीन अन्य मित्रों को कम्पनी से आया हुआ 1200/- रुपये का चेक दिखा दिया, तो ब्लॉगर मित्रों और प्रिय पाठकों, वही वेबसाईट अर्थात http://viewbestads.com/ref/MTU2ODc=aXY= और उसकी तमाम जानकारी मैं आपके लिये यहाँ पेश कर रहा हूं।

फ़ण्डा सीधा-सादा है, कि आपको इस वेबसाईट का सदस्य रजिस्टर होना है (कोई शुल्क नहीं), आपको एक कन्फ़र्मेशन मेल भेजा जायेगा तथा आपका खाता खुल जायेगा (बिलकुल मुफ़्त)। फ़िर आपको प्रतिदिन सिर्फ़ 5-6 विज्ञापन तथा 2-3 समाचार देखना है (जो कि कुल जमा 5-8 मिनट का काम है), जिसके बाद आपके खाते में कुछ अंक जमा कर दिये जायेंगे, कुछ निश्चित अंकों के होने पर एक निश्चित रकम बढ़ती जायेगी, और जैसे ही आपके खाते में 1200/- रुपये की रकम एकत्रित हो जायेगी, आपसे बैंक अकाउंट नम्बर तथा पहचान पत्र (ड्रायविंग लायसेंस, पेन कार्ड आदि) लेकर “आपके नाम से” चेक बनाया जायेगा।

हम भारत के लोग हमेशा, फ़र्जीवाड़ा कैसे किया जाये, तथा मुफ़्त में मिलने वाली चीज़ का भी अधिकाधिक फ़ायदा कैसे लिया जाये इस जुगाड़ में लगे रहते हैं। इस वेबसाइट के “विज्ञापन देखो” वाली नीति में कोई MLM वाली पद्धति नहीं है, ऐसा कोई बन्धन नहीं है कि आपको अपने नीचे डाउनलाइन में कोई सदस्य बनाना हो। इस वेबसाईट द्वारा एक व्यक्ति का (घर के पते और मेल आईडी अनुसार) एक ही रजिस्ट्रेशन किया जायेगा। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति दो-चार फ़र्जी नामों से ईमेल आईडी देकर विज्ञापन देखता भी है तो जब पैसा लेने की बारी आयेगी तब बैंक अकाउंट क्रमांक से वह पकड़ में आ जायेगा (इसमें लोचा यह है कि यदि आपके अलग-अलग नामों से 2-3 बैंकों में खाते हों तब यह फ़र्जीवाड़ा किया जा सकता है)। इसी प्रकार एक दिन में एक आईडी से सिर्फ़ एक बार ही विज्ञापन देखे जा सकते हैं, एक बार विज्ञापन और न्यूज़ देख लेने के बाद उस पर एक टिक का निशान बन जाता है, और फ़िर आप उस मेल आईडी से अगले दिन ही विज्ञापन देख सकते हैं।

बहरहाल, आते हैं मुख्य बात पर… जब रजिस्ट्रेशन हो जायेगा और आपका प्रोफ़ाइल पूरा अपडेट हो जायेगा तब View Ads पर क्लिक करके आपको एक-एक विज्ञापन देखना है, क्लिक करने पर एक नई विण्डो खुलेगी, जिसमें कुछ सेकण्डों का समय चलता हुआ दिखेगा, उतने सेकण्ड पश्चात जब आपके खाते में अंकों के जमा होने की सूचना झलकेगी तब वह विण्डो बन्द करके नया विज्ञापन खोल लें। ऐसा दिन में एक खाते से एक बार ही किया जा सकेगा, तथा यह कुल मिलाकर सिर्फ़ 5-7 मिनट का काम है। जब आप सारे विज्ञापन और समाचार देख लें तब फ़िर अगले दिन ही आप लॉग-इन करें। सावधानी यह रखनी है कि जब तक वह विज्ञापन पूरा खत्म न हो जाये और अंक जमा होने की सूचना न आ जाये, तब तक विज्ञापन वाली विण्डो बन्द नहीं करना है, तथा एक बार में एक ही विज्ञापन की विण्डो खोलना है, एक साथ सारे विज्ञापनों की विण्डो खोलने पर आपका अकाउंट फ़्रीज़ होने की सम्भावना है। मेरे खयाल में हम लोग नेट पर जितना समय बिताते हैं उसमें से 5-7 मिनट तो आसानी से इस काम के लिये निकाले जा सकते हैं, और जब कोई शुल्क नहीं लग रहा है तब इस पर रजिस्ट्रेशन करने में क्या बुराई है। अर्थात नुकसान तो कुछ है नहीं, “यदि” हुआ तो फ़ायदा अवश्य हो सकता है।

अब आप कहेंगे कि आप ये सब क्यों लिख रहे हैं? इससे आपको क्या फ़ायदा है…बताता हूं, फ़ायदा सिर्फ़ इतना है कि जो लिंक मैं आपको दे रहा हूं, आप उस लिंक पर क्लिक करके मेरे डाउनलाइन (Referred by ID) में सदस्य बनेंगे तो कुछ अंक मेरे खाते में जुड़ जायेंगे। यदि आप चाहें तो सीधे वेबसाइट के पते पर क्लिक करके भी सदस्यता ले सकते हैं, लेकिन इससे किसी का फ़ायदा नहीं होगा, जबकि मेरे ID क्रमांक से सदस्यता लेने पर मुझे कुछ फ़ायदा हो सकता है (यह सेल्समैन टाइप की बेशर्मी भरा वक्तव्य है)। हालांकि इस स्कीम में कमाई की गति धीमी है (मैंने इस वेबसाइट पर 16 नवम्बर को रजिस्ट्रेशन करवाया है, ईमानदारी से सिर्फ़ एक आईडी से इन 15 दिनों में मेरे खाते में अभी 300 रुपये जमा हुए हैं), लेकिन मुफ़्त में मिलने वाले और रोज़ाना सिर्फ़ 5-7 मिनट का समय देने पर आपको इससे अधिक की उम्मीद भी नहीं करनी चाहिये। इसलिये विज्ञापन देखें और रोज अपने खाते में कुछ रुपये जमा करें… मुझे धन्यवाद दें और मेरे डाउनलाइन में जुड़ जायें… जब भी नेट पर बैठें, दिन में एक बार विज्ञापन देखें, खबरें पढ़ें और पैसा कमायें। एक बार भरोसा करके देखने में क्या हर्ज है, जबकि जेब से कुछ भी अतिरिक्त नहीं लग रहा।

पूरी विधि एक बार फ़िर से –

1) http://viewbestads.com/ref/MTU2ODc=aXY= इस लिंक पर क्लिक करके साइट पर पहुँचें

2) ई-मेल आईडी भरकर रजिस्टर करवायें (रजिस्टर करते समय ध्यान रखें कि Referred ID में 15687 पर टिक करें)

3) आपके मेल बाक्स में एक मेल आयेगी, उस लिंक पर क्लिक करके कन्फ़रमेशन करें।

4) अपना सही-सही प्रोफ़ाइल पूरा भरें, ताकि यदि पैसा (चेक) मिले तो आप तक ठीक पहुँचे।

5) बस, विज्ञापन देखिये और खाते में अंक और पैसा जुड़ते देखिये (दिन में एक बार)

6) अपने मित्रों को अपनी लिंक फ़ारवर्ड करें और उन्हें अपनी डाउनलिंक में सदस्य बनने के लिये प्रोत्साहित करें ताकि कुछ अंक आपके खाते में भी जुड़ें (हालांकि ऐसा कोई बन्धन नहीं है)…

मुझे लगता है, ब्लॉग से तो कुछ कमाई हो नहीं रही, अतः ऐसे तरीके आजमाने में कोई बुराई नहीं है। यदि फ़ायदा नहीं भी हुआ, तो नुकसान यकीनन नहीं होगा… रोज़ाना नेट पर काम करते-करते 5-10 मिनट अतिरिक्त निकाले जा सकते हैं।

खदानों में हाथ डालिये, मधु कोड़ा और रेड्डियों जैसे खरबपति बनिये… Mining Mafia, Jharkhand, Madhu Koda, Congress

जब झारखण्ड में काले चश्मे वाले राज्यपाल सिब्ते रजी के जरिये काला खेल करवाकर “धर्मनिरपेक्षता” के नाम पर तथा “भाजपा को अछूत बनाकर” सत्ता से दूर रखने का खेल खेला गया था, उसमें “भ्रष्टाचार की माँ” कांग्रेस-राजद और बाकी के लगुए-भगुए किसी धर्मनिरपेक्ष सिद्धान्त के नाम पर एकत्रित नहीं हुए थे… निर्दलीय विधायक को मुख्यमंत्री बनाने पर राजी वे इसलिये नहीं हुए थे कि भाजपा के खिलाफ़ उन्हें लड़ाई लड़ना थी… बल्कि सारे के सारे ठग भारत माँ के सीने में छेद करके खदानों के जरिये होने वाली अरबों-खरबों की कमाई में हिस्सा बटोरने के लिये “गैंग” बनाये हुए थे। जैसे-जैसे मधु कोड़ा की लूट के किस्से उजागर हो रहे हैं, देश का मेहनतकश और निम्न-मध्यमवर्गीय व्यक्ति कुछ अचम्भे से, कुछ निराशा-हताशा से, कुछ गुस्से से और कुछ मजबूरी से इन लुटेरों को मन मसोसकर देख रहा है।

एक समय में मामूली से कंस्ट्रक्शन वर्कर और खदानकर्मी से मुख्यमंत्री बनने और भारतभूमि की अरबों की सम्पत्ति हड़प करने वाले की हरकतों के बारे में लालू और कांग्रेस को पता ही नहीं चला होगा, ऐसा कोई मूर्ख ही सोच सकता है। जबकि जो लोग कोड़ा और कांग्रेस को जानते हैं उन्हें पता था कि ऐसा कोई महाघोटाला कभी न कभी सामने आयेगा।

झारखण्ड से कोयले का अवैध खनन सालाना करीब 8000 करोड़ रुपयों का है, जिसमें लगभग 500 माफ़िया गुट अलग-अलग स्तरों पर जुड़े हुए हैं। कोयला खदानों के अधिकारी और स्थानीय गुण्डे इस रैकेट का एक मामूली पुर्जा मात्र हैं। मनचाहे इलाके में ट्रांसफ़र करवाने के लिये अधिकारियों द्वारा छुटभैये नेताओं से लेकर मुख्यमंत्री तक करोड़ों रुपये की रिश्वत अथवा “अरबों रुपये कमाकर देने की शपथ” का प्रावधान है। इस माफ़िया गैंग की कार्यप्रणाली एकदम सीधी और स्पष्ट है, ऐसी खदानों की पहचान की जाती है जो “बन्द” या समाप्त घोषित की जा चुकी हैं (अथवा मिलीभगत से “बन्द” घोषित करवा दी गई हैं), फ़िर उन्हीं खदानों में से फ़िर से लोहा और अयस्क निकालकर बेच दिया जाता है, और ऐसा दिनदहाड़े किया जाता है, क्योंकि ऊपर से नीचे तक सबका हिस्सा बाँटा जा चुका होता है। बताया जाता है कि सारे खेल में “सेल” (स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया लिमिटेड) के उच्चाधिकारी, खान मंत्रालय और झारखण्ड सरकार मिले हुए होते हैं। खदानों से निकली हुई लाल मिट्टी और अयस्क को कच्चे लोहे में परिवर्तित करने वाले हजारों “क्रशर्स” झारखण्ड में यत्र-तत्र देखे जा सकते हैं जिनमें से 95% के मालिक नेता ही हैं, जो फ़र्जी नामों से छोटे-मोटे खदान ठेकेदार आदि बने हुए हैं। इस प्रकार की छोटी-छोटी फ़ैक्टरियाँ ही करोड़ों कमा लेती हैं, जिसे अंग्रेजी में “टिप ऑफ़ आईसबर्ग” कहा जाता है (हिन्दी में इसे “भ्रष्टाचार के महासागर की ऊपरी लहरें” कहा जा सकता है)

http://ibnlive.in.com/news/exclusive-how-exjharkhand-cm-madhu-koda-profited-from-mines/105088-3.html?utm_source=IBNdaily_MCDB_121109&utm_medium=mailer

वैसे तो यह लूट सालों से जारी है, जब कांग्रेस सत्ता में थी तब भी, और जब 15 साल लालू सत्ता में थे तब भी। झारखण्ड के बिहार से अलग होने का सबसे अधिक दुख लालू को यों ही नहीं हुआ था, असल में एक मोटी मुर्गी हाथ से निकल जाने का वह दुख था, ठीक उस प्रकार जैसे मध्यप्रदेश के नेताओं को छत्तीसगढ़ के निकल जाने का दुख हुआ, क्योंकि छत्तीसगढ़ “लूटने” के काम भी आता था और ईमानदार और सख्त अफ़सरों को सजा के बतौर बस्तर/अम्बिकापुर ट्रांसफ़र करने के काम भी आता था। कहने का मतलब ये कि मधु कोड़ा तो हमारी नज़रों में सिर्फ़ इसलिये आये कि उन्होंने कम से कम समय में अधिक से अधिक कमाने का मौका नहीं गंवाया।

आंध्रप्रदेश के “राष्ट्रसन्त” वायएस राजशेखर रेड्डी, अनधिकृत रूप से देश के सबसे अधिक पैसे वाले नेता माने जाते हैं (शरद पवार के समकक्ष)। उन्हीं के नक्शेकदम पर चल रहे हैं उनके बिजनेस पार्टनर कर्नाटक के खनन माफ़िया रेड्डी बन्धु। एक छोटा सा उदाहरण देता हूं… मध्यप्रदेश में एक सड़क ठेकेदार पर खनन विभाग ने 32 लाख रुपये की वसूली का जुर्माना निकाला, ठेकेदार ने सड़क निर्माण करते-करते सड़क के दोनों ओर नाली खुदाई करके उसमें से निकलने वाली मुरम चुपके से अंटी कर ली, जबकि कुछ का उपयोग वहीं सड़क बनाने में कर दिया… अब सोचा जा सकता है कि सिर्फ़ 8 किलोमीटर की सड़क के ठेके में सड़क के दोनों तरफ़ खुदाई करके ही ठेकेदार लाखों की मुरम निकालकर सरकार को चूना लगा सकता है, तो सुदूर जंगलों में धरती से 100-200 फ़ुट नीचे क्या-क्या और कितना खोदा जा रहा होगा और बाले-बाले ही बेचा जा रहा होगा (ठेकेदार पर 32 लाख का जुर्माना भी “ऑफ़िशियल” तौर पर हुआ, हकीकत में उस ठेकेदार ने पता नहीं कितना माल ज़मीन से खोदा होगा, ऊपर कितना पहुँचाया होगा और जुर्माना होने के बाद सरकारी अफ़सरों के घर कितना पहुँचाया होगा, इसका हिसाब आप कभी नहीं लगा सकते)।

असल में आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि खनन के काम में कितनी अनाप-शनाप कमाई है। मधु कोड़ा का भ्रष्टाचार का आँकड़ा, इन तीनों रेड्डियों (एक दिवंगत और दो बाकी) तथा उनके बेटे जगनमोहन के मुकाबले कुछ भी नहीं है। एक मोटे अनुमान के अनुसार चारों रेड्डियों ने इस देश के राजस्व को लगभग 75,000 करोड़ रुपये से अधिक का चूना लगाया है। पिछले दिनों कर्नाटक में जो खेल खेला गया उसके पीछे भी आंध्रप्रदेश के रेड्डी का ही हाथ है, जिसने येद्दियुरप्पा को भी रुलाकर रख दिया। उनका असली खेल यह था कि किसी तरह येदियुरप्पा न मानें और भाजपा में टूट हो जाये फ़िर कांग्रेस के अन्दरूनी-बाहरी समर्थन से सरकार बना ली जाये, ताकि आंध्र-कर्नाटक की सीमा पर स्थित बेल्लारी की खदानों पर सारे रेड्डियों का एकछत्र साम्राज्य स्थापित हो जाये। बेशर्म लालच की इन्तेहा देखिये कि रेड्डियों ने आंध्र-कर्नाटक की सीमा पर स्थित जंगलों में भी बेतहाशा अवैध खनन किया है और अब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें फ़टकार लगाई है। आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री रोसैया को इसका फ़ायदा हुआ है और अब वह सीबीआई और जाँच की धमकी की तलवार के बल पर जगनमोहन रेड्डी को दबोचे हुए हैं।

अब आते हैं नक्सलियों पर, नक्सली विचारधारा और उसके समर्थक हमेशा से यह आरोप लगाते आये हैं कि आदिवासी इलाकों से लौह अयस्क और खनिज पदार्थों की लूट चल रही है, सरकारों द्वारा इन अति-पिछड़े इलाकों का शोषण किया जाता है और खदानों से निकलने वाले बहुमूल्य खनिजों का पूरा मुआवज़ा इन इलाकों को नहीं मिलता आदि-आदि। लेकिन तथाकथित विचारधारा के नाम पर लड़ने वाले इसे रोकने के लिये कुछ नहीं करते, क्योंकि खुद नक्सली भी इन्हीं ठेकेदारों और कम्पनियों से पैसा वसूलते हैं। यहीं आकर इनकी पोल खुल जाती है, क्योंकि कभी यह सुनने में नहीं आता कि नक्सलियों ने किसी भ्रष्ट ठेकेदार अथवा खदान अफ़सर की हत्याएं की हों, अथवा कम्पनियों के दफ़्तरों में आग लगाई हो…। मतलब ये कि खदानों और खनिज पदार्थों की लूट को रोकने का उनका कोई इरादा नहीं है, वे तो चाहते हैं कि उसमें से एक हिस्सा उन्हें मिलता रहे, ताकि उनके हथियार खरीदी और ऐश जारी रहे और यह सब हो रहा है आदिवासियों के भले के नाम पर। नक्सली खुद चाहते हैं कि इन इलाकों से खनन तो होता रहे, लेकिन उनकी मर्जी से… है ना दोगलापन!!! यदि नक्सलियों को वाकई जंगलों, खनिजों और पर्यावरण से प्रेम होता तो उनकी हत्या वाली “हिट लिस्ट” में मधु कोड़ा और राजशेखर रेड्डी तथा बड़ी कम्पनियों के अधिकारी और ठेकेदार होते, न कि पुलिस वाले और गरीब निरपराध आदिवासी।
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विषयान्तर :- ऐसे भ्रष्ट संस्कारों और संस्कृति की जन्मदात्री है कांग्रेस…। इसके जवाब में यह तर्क देना कि भाजपा-बसपा-सपा-शिवसेना-कमीनिस्ट सभी तो भ्रष्ट हैं, नितान्त बोदा और बेकार है, क्योंकि ये भी उसी संस्कृति की पैदाइश हैं। असली सवाल उठता है कि ऐसी “खाओ और खाने दो” की संस्कृति का विकास किसने किया और इसे रोकने के प्रयास सबसे पहले किसे करना चाहिये थे और नहीं किया…। फ़िर भी लोग मुझसे पूछते हैं कि मैं कांग्रेस से घृणा क्यों करता हूं? (इस विषय पर जल्दी ही एक पोस्ट आयेगी…)

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ओबामा को समर्पित एक प्रोडक्ट (यह पोस्ट सिर्फ़ पुरुष पाठक पढ़ें)…

अमेरिकी राष्ट्रपति का एक चौथाई कार्यकाल बीतने को है, अब तक वे कुछ खास काम नहीं कर पाये हैं। उनकी लोकप्रियता दिनोंदिन गिरती जा रही है –

1) वे इराक और अफ़गानिस्तान में फ़ेल हो गये…

2) पाकिस्तान को अरबों डालर की सहायता भी बहाल कर दी…

3) बराक “हुसैन” ओबामा ने चीन को खुश करने के लिये वहाँ भी दण्डवत कर दिया…

4) जापान के नरेश के सामने कोई अमेरिकी राष्ट्रपति कभी भी इतना नहीं झुका होगा कि उसके पिछवाड़े पर एक लात जमाने का लोभ न पैदा हो… (देखें चित्र)

5) इज़राइल के साथ भी उनके सम्बन्ध उतने सहज नहीं हैं जितने पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों के होते थे…

6) पश्चिम एशिया के लिये अभी तक वे कुछ ठोस योजना लेकर नहीं आये हैं…

7) खुद अमेरिका में ही अर्थव्यवस्था में सुधार करने के लिये उनके प्रयास बेकार साबित हुए हैं…

ऐसे में भारत के मालवा प्रदेश (इन्दौर-उज्जैन) से एक ऐसा “धांसू प्रोडक्ट” आया है, जो उनके लिये मददगार साबित हो सकता है… हालांकि यह प्रोडक्ट भारतीय नेताओं के लिये अधिक उपयोगी है, क्योंकि 26/11 की बरसी नज़दीक है (कसाब एसी और अखबार के मजे लूट रहा है) तथा अफ़ज़ल गुरु भी चिकन उड़ा रहा है… ऐसे में यदि भारतीय नेता इस प्रोडक्ट का उपयोग करें तो अच्छा होगा… लेकिन चूंकि यह प्रोडक्ट ओबामा से जुड़ा हुआ है, इसलिये वे भी इसका उपयोग कर सकते हैं, शायद उन्हें कोई कामयाबी मिल ही जाये…

(इस प्रोडक्ट को देखने के बाद मालवा के लोगों की दूरदर्शिता के आप कायल हो जायेंगे, क्योंकि ओबामा के प्रेसिडेण्ट बनने से पहले ही यह प्रोडक्ट बाज़ार में आ गया था, यानी इसके निर्माताओं को पूरा भरोसा था कि बराक हुसैन ओबामा को इसकी जरूरत पड़ेगी)… मनमोहन सिंह जल्दी ही अमेरिका यात्रा पर जा रहे हैं, उनसे अनुरोध है कि इस प्रोडक्ट का एक सैम्पल साथ ले जायें… बराक ओबामा खुश हो जायेंगे और कभी भी भारत-विरोधी नीतियाँ नहीं अपनायेंगे…

अब सस्पेंस लम्बा खींचने की कोई तुक नहीं है… पेश है मालवा का धांसू प्रोडक्ट…

ढेण टणेण टारा डारा डारा डारा
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ढेण टणेण टारा डारा डारा डारा
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ढेण टणेण
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चलते-चलते एक और “शरारत” झेल ही जाईये…

नीचे दिया हुआ चित्र देखकर निम्न में से एक विकल्प का चुनाव कीजिये…
1) क्या यह कण्डोम का विज्ञापन है?
2) क्या यह गर्भनिरोधक गोली का विज्ञापन है?
3) क्या यह मुल्ला देशों की “शुद्ध अंग्रेजी” का विज्ञापन है?
4) Condemn को Condom लिखने पर “ऑक्सफ़ोर्ड” द्वारा AIDS के लिये कोई फ़ण्ड मिलता है?
 सही जवाब पर “ओबामा गोल्ड ऑइल” की एक शीशी इनाम में…

कहीं मेरे पाठक यह मुगालता न पाल लें कि मैं सिर्फ़ गम्भीर, हिन्दुत्व-राष्ट्रवाद वाले लम्बे-लम्बे लेख ही लिख सकता हूं, इसलिये यह एक “छवि-तोड़क” पोस्ट है… 🙂

लम्बे लेख लिखने के लिये सर्च करते समय नेट पर सर्च करते समय, ऐसा भी बहुत कुछ मिल जाता है… तो सोचा कि माहौल को हल्का-फ़ुल्का बनाने के लिये आपके साथ शेयर करता चलूं…) हालांकि यह एक राजनैतिक हास्य-व्यंग्य है, लेकिन यदि किसी को यह पोस्ट अश्लील लगा हो तो क्षमाप्रार्थी हूं…

(नोट – गम्भीर लेखन करते-करते, कभीकभार शरारत का मूड हो जाता है, अतः इस पोस्ट को सिर्फ़  एक मजाक के तौर पर लिया जाये…)

चिदम्बरम जी, जंगली भालू पालने के बारे में क्या विचार है? (माइक्रो पोस्ट)

सुरक्षा एजेंसियों द्वारा दी गई जानकारी में बताया गया है कि कश्मीर के कुलगाम इलाके के घने जंगलों में एक जंगली भालू ने हिज़बुल मुजाहिदीन के तो खतरनाक आतंकवादियों को मार गिराया है। डंडनार के घने जंगलों में छिपे बैठे हिजबुल के दो आतंकवादी सैफ़ुल्लाह और कैसर का सामना एक जंगली भालू से हो गया, जिसने उन दोनों को मौत की नींद सुला दिया। बताया जाता है कि सैफ़ुल्लाह हिजबुल का जिला कमाण्डर था जबकि कैसर तहसील कमाण्डर था। जिस पहाड़ी गुफ़ा में ये दोनों आतंकवादी छिपे बैठे थे, शायद वह उस भालू की थी। सुरक्षा बलों ने गुफ़ा में से दो एके-47 रायफ़लें, चार मैगजीन गोलियाँ और अन्य उपकरण बरामद किये हैं। दो दशक से चल रहे इस छद्म युद्ध में यह पहला मौका है, जब घने जंगलों में आतंकवादियों के छिपने के गुप्त ठिकाने पर किसी जंगली जानवर ने हमला किया है…

http://in.news.yahoo.com/43/20091102/812/tnl-wild-bear-kills-two-hizb-guerrillas.html

इस घटना से कुछ बातों पर गौर किया जाना आवश्यक है –

1) शायद चिदम्बरम जी सेना में जंगली भालुओं की नियुक्ति के बारे में गम्भीरता से विचार करेंगे, जिन्हें प्रशिक्षित करने में सेना के जवानों के मुकाबले कम खर्च आयेगा। (मेनका गाँधी से पूछ लीजियेगा)

2) फ़िर शायद ये जंगली भालू किसी मुफ़्ती या अब्दुल्ला के फ़ालतू आदेशों को न मानें।

3) एक सबक भी मिलता है कि जंगली भालू, भारत के लोगों से कहीं बेहतर हैं, जो अपने “घर” में घुसपैठ करने वाले को मार गिराते हैं। इसलिये सिफ़ारिश की जाती है कि बांग्लादेश सीमा पर भी कुछ भालू भेजे जायें…

4) एक सबक आतंकवादियों के लिये भी – कि किराये पर मिली एके47 रायफ़ल से जब वे एक भालू का मुकाबला न कर सके तो इतने बड़े भारत का मुकाबला कैसे करेंगे। एके47 चलाने के लिये “कायराना उंगलियाँ” काफ़ी होती हैं, लेकिन घुसपैठिये को मार गिराने के लिये जिगर वाले “भारतीय” भालू का निहत्था होना भी काफ़ी है।

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नोट – दो हफ़्ते के भीतर मेरे दोनों ही कम्प्यूटर और एक प्रिंटर खराब होने और रिपेयर करवाने की वजह से आर्थिक क्षति हुई है अतः मूड खराब होने के कारण बड़ी पोस्ट नहीं लिख पा रहा हूं, फ़िलहाल इस माइक्रो पोस्ट से काम चला लीजिये…। एकाध माइक्रो पोस्ट और जल्द ही भेजता हूं…

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