>हिन्दी की शोकसभा में गये थे क्या ?

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आज तथाकथित  हिंदी दिवस है . ब्लॉग -जगत से लेकर जनसत्ता के सम्पादकीय पृष्ठ पर  भारत के माथे की बिंदी हिंदी की दुर्दशा का बयान किया गया . अचानक से सितम्बर जो कि खुद अंग्रेजी का महीना है , के इस पखवाड़े में हर तरफ लोग हिंदी के भविष्य को लेकर चिंतित हैं. सभी सरकारी उपक्रमों के दफ्तरों के  आगे बड़े-बड़े बैनर लगे पड़े हैं .विभिन्न संस्थाओं द्वारा आयोजित तरह -तरह  की शोकसभाओं में प्रखर वक्ताओं ने जाने क्या -क्या कहा होगा ! ज्यादा कुछ नहीं कहूँगा . कई बड़े -बड़े हिंदी हितैषी लोग काफी कुछ लिख चुके हैं . लेकिन एक सवाल कि क्या किसी भी काम को करने का कोई खास दिन होता है ? कितने सजग हैं हम ! हिंदी की चिंता  साल में एक दिन करते आये  हैं, विश्व हिंदी सम्मलेन में कुछ चाटुकारों को विदेश यात्रा करवाते रहे हैं , करोडों रूपये हिंदी इस्तेमाल के लिए अपील करने वाले विज्ञापन पर खर्च करते आये हैं  और इन सब का नतीजा हमारे ही अनुसार सिफर है !
हिंदी को सर्वप्रचलित करने के ये तमाम प्रक्रम एक दिवस रूप में सिमटे हुए दम घोट रहे हैं . हिंदी खुद को एक दिन की भाषणबाजी में निपटाते देख कर आंसू बहा रही है . तो क्या आप सुधीजनों के पास इन आंसुओं का है कोई जबाव ? 
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>फुंक दो बिगुल बदल दो इतिहास भारी-भरकम साहित्य का

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हिन्दी अकादमी में विवाद गहराने लगा है। वजह बनी है एक ऐसा शक्स, जिस पर आरोप लगायें जा रहे है कि वह गंभीर नहीं है बल्कि हास्यवादी है। जो अपने चिंता और चिंतन को माथे के सिकन की लकीरों में तबदील होने नहीं देता बल्कि अपनी चुटिली अंदाजों से पल में हवा कर देता है। जी हाँ हम बात कर रहे है डाॅ. अशोक चक्रधर जी की। जिनके हिन्दी अकादमी में उपाध्यक्ष बनते ही गंभीर साहित्यकार इस कदर तनाव में आ गये है कि उनकी सारी सुझ-बूझ इस्तीफे में तबदील होने लगी है। जी हां यह हादसा या कहे भारी-भरकम भूचाल आया है महा गंभीर मैन ज्योतिष जोशी के साथ। दरअसल इस विवाद की सबसे बड़ी वजह बनी है वो हिन्दी साहित्य जिसे चंद दकियानुसी साहित्यकार अपनी मुट्ठी में रखना चाहते है। आज देश की विडम्बना कहे या हिन्दी जगत के चंद सूरमाकारों की करतूत जिन्होंने हिन्दी साहित्य को गंभीर बनाने के चक्कर में इतनी जटीलता ला दी है कि लोग अब हिन्दी से कटने लगे है। और हिन्दी की जगह लोग अंग्रेजी का सहारा लेने लगे है। आज देश में जितने हिन्दी नहीं पढ़े जाते उससे कही अधिक लोगों में अंग्रेजी और अंग्रेजी साहित्य के प्रति रूचिया बढ़ने लगी है। जो हमारी कलिष्ठ हिन्दी भाषा या साहित्य से काफी सरल दिखाई पड़ती है। साथ ही हिन्दी साहित्यकारों के भारी-भरकम सोच और तेवरों के कारण ही आज के नवीन और उभरते साहित्यकार को उस कदर सफलता नहीं मिल पाई है जितनी उन्हें मिलनी चाहिए थी। क्योंकि आज के युवा जिस प्रवेश में पल-बढ़ रहे है, जिसमें अंग्रेजी, हिन्गलीश, क्षेत्रिय आदि भाषाओं का दबाव रहता है कि वह भारी-भरकम शब्दों का चयन अपने लेखनी में नहीं कर पाते। या कही न कही आर्थिक तंगी और जीविकोपार्जन में इस कदर जुझते रहते है कि वह न तो गंभीर और मंहगी साहित्य खरीद पाते है और ना ही उसे पढ़ने के लिए वक्त निकाल पाते है। ऐसे में जब उनकी आत्मिक और बौद्धिक चिंतन की तरंगे निकलती है जिसे वो किताबों के पन्नों पर लिख अपना नाम साहित्य जगत में गढ़ना चाहते है तो क्या उनका हक नहीं बनता। अगर कोई साहित्यकार व कवि अपनी पंक्तियों में कलिष्ठ भाषाओं का प्रयोग किये बगैर सरल भाषाओं के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाना चाहता है तो क्या उनका ये अधिकार नहीं बनता। मैं तो मानता हूं कि युग परिवर्तन के साथ ही साहित्य में भी परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। जब देश और देशवासी ही पूर्ण हिन्दी भाषी नहीं रहे तो भला साहित्य को कलिष्ठ भाषी बनाये रखना कहा की समझदारी है। हम जैसे नवीन कवियों को इस बात की खुशी है कि अब हमारा भी पैरोकार करने वाला हिन्दी अकादमी के मंच पर जगमगाने वाला है। और आने वाले समय में कई नये साहित्यकार उभरकर सामने आयेंगे जिनकी सोच लिखे हुए किताबों के पन्नों पर इस कदर सरल भाषा में दिखाई पड़ेंगे, जिसे एक कार्यालय का चपरासी और अफसर दोनो आसानी से पढकर समझ पायंेगे। साहित्य को लेकर उनकी बीच की खाई को आसानी से पाट दिया जाएगा। इतना ही नहीं ऐसे भी लोग साहित्य से जुड़ने लगेंगे जो छोटे-छोटे शहरों और कसबों में रहते है। हिन्दी साहित्य जगत की एक और विडम्बना सुनी होगी कि भारत जैसे हिन्दी भाषी देश में हैरी पोर्टर की किताबें सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबों में शामिल की गई। चलियें देर ही सही लेकिन कृष्ण के रूप में अशोक चक्रधर अपना चक्र चलाकर भारी-भरकम बोझ से झुके हिन्दी साहित्य के मकड़जाल को कांटकर सरल साहित्य का रूप देने में कामयाब रहे तो कई सारे प्रांतीय स्तर के रचनाकारों का भाग्य उज्जवल जरूर हो जाएगा। लेकिन देखना होगा कि वे जिस भारी-भरकम साहित्यकारों के चक्रव्यूह में फंसे हुए है, उसे अपने चक्र से कांट भी पाते है या अभिमन्यू की तरह बीच में ही दम तोड़ देते है। इसलिए जरूरत है कि तमाम साहित्य में रूचि रखने वाले नौजवान और नये-नये उभरते साहित्यकार और कवि जो जिस भी छंद में लेखन करते है, जिन्हे लगता हो कि साहित्य को कलिष्ठ बनाने की जगह सरस और सरल होना चाहिए, जिससे जन-जन तक साहित्य का प्रचार प्रसार हो सके। और देश में फिर से हिन्दी की दशा सुधरने लगे। डाॅ. अशोक चक्रधर की हौशला अफजाई या कहे उनके इस प्रयास के बढ़ते कदम में ताकत डालने के लिए समर्थन का बिगुल फुंकना बेहद जरूरी है। क्योंकि नेतृत्व करता में तब तक जोश नहीं आता जब तक की जय हो का जयकारा न लगे।