>हमें बताना…..

>हमें बताना नहीं आता
ग़म के साथ ए हसीना हमें जीना नहीं आता
मोहब्बत तो हम भी करते हैं,
मगर ठुकराए इज़हार पर पीना हमें नहीं आता
मयख़ाने की शिरक़त हम अक्सर किया करते हैं,
मगर बस्ल ए इंतज़ार में, आंखे भिगाना हमें नहीं आता
क़ॉलेज के गेट पर हो खड़े,
राह तेरी तकता ज़रूर हूं, मगर क्या करूं
दिल को एक जगह टिकाना हमें नहीं आता
दुनिया के हुज़ूर से कहना ज़रूर, बुरक़े के भीतर छुपे
बदन पर इतराना हमें नहीं भाता
कनखियों से सुरमाई आंखे क़हर ढाती तो हैं
मगर पसंद इस तरह किसी को
बहकाना हमें नहीं आता
सुर्ख आफताब से गालों पर लेकर डिंपल हंसना हसीना
तुम्हे पाने की मशक्कत में पसीना बहाना हमें नहीं आता
होगी नवाब की भोपाली झील तेरी नीली आंखे
मगर इन आंखों की चाह में आंसु बहाना हमें नहीं आता
गुलाबी बाग की हसरतें हैं,तेरे होठों की तरह फड़फड़ाने की
मगर असल में बस्ल की चाह में
सब कुछ लुटाना हमें नहीं आता
चले जाओगे ज़िंदगी से क्या समझते हो
ख़ुदा की नेमत “जान” इस तरह गंवाना हमें नहीं आता
एक बात तुमसे कहे देता हूं,
मेरी “जान” मेरे बदन में नहीं ,
बसती है तुममें बताना हमें नहीं आता
वरुण के सखाजी
पत्रकार
ज़ी24घंटे,छत्तीसगढ़
9009986179

>एक अफगानी मित्र के प्रति संवेदना सहित: प्रशांत प्रेम

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 हजारों टन बमों और
सैकड़ो क्रुज़ मिस्साइले गिरने का मतलब तुम्हे नहीं पता,
तुम्हे नहीं पता- भूख और बेवशी की पीड़ा,
तुम्हे मालुम भी नहीं
सर्दियों में सिर्फ तन ढकने के कपड़ो के बिना
ठिठुर कर मर जाना |
तुम्हे नहीं पता
गरीबी और गरीबों की बीमारियाँ,
तुम्हे नहीं पता
दवाओं के बिना बुखार में तप कर मरना |
तुम तो एन्थ्रेक्स से सिर्फ एक मौत पर
दुनिया भर की प्रयोगशालाओं में तैयार करवाने लगे हो एन्टीडोट्स |

तुम्हारी मीनारों के जमीन छूने की एवज में
तुमने मिटा डाला है जमीन का ए़क टुकडा ही
जहां लाखों लोग तबाह है |

तुम स्वर्ग के बाशिंदों
तुम्हे क्या पता — भूख और ठंढ से मरने से बेहतर है
हमारे लिए
तुम्हारे बमों की आंच में मरना
जब मरना ही हो आख़िरी विकल्प |

चलो अच्छा है !
इस “इनफाएनाईट जस्टिस” की आड़ में
आजमा लो तुम भी अपने सारे नए ईजाद,
साफ़ कर लो अपने जंग लगते सारे हथियार |
ताकि फिर कोई दुसरा अफगानिस्तान न उजडे
और ना ही कोई मुनिया रोये
अपने काबुलीवाला को याद कर-कर |


Note :- कविता 5 साल पुरानी है…. पर कहानी नहीं| आप अफगानिस्तान की जगह ईराक रख ले नाईजिरिया या येरुशलम…..


>सोचते किस भाषा में हैं?

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बहुत से फ़िल्मी सितारे लंदन आते रहते हैं. उनमें से बहुत कम हैं जो सहजता से हिंदी बोल पाते हों.
जो भाषा आपको रोज़ी-रोटी मुहैया करा रही है उससे ऐसी विमुखता?
लेकिन बात विदेश की ही क्यों क्या भारत में ऐसा नहीं है?
राजधानी या शताब्दी एक्सप्रेस से सफ़र करते हुए जब मैंने हिंदी अख़बार की मांग की तो अटेंडेंट को जाकर मेरे लिए अख़बार लाना पड़ा.
आज़ादी के साठ साल बाद आज भी अंग्रेज़ी बोलना गर्व और हिंदी बोलना शर्म की बात क्यों है?
क्या आने वाली पीढ़ी हिंदी के समृद्ध साहित्य से परिचित भी हो पाएगी? हम अपने बच्चों को इस विराट विरासत से महरूम क्यों कर रहे हैं ?