सुभाषित क्रमांक – 2

रामचरित मानस से

पर हित सरिस धर्म नहीं भाई।
पर पीड़ा नहिं अधमाई।।

अर्थ – भगवान श्री राम अपने भाईयों से कहते है – हे भाई! दूसरों की भलाई करने के समान कोई धर्म नही है। दूसरों को दु:ख पहुँचाने के समान कोई पाप नहीं है।
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सुभाषित क्रमांक – 1

बाल्‍मीकीय रामायण से-

उत्‍साहो बलवानार्य नास्‍त्‍युसाहात्‍परं बलम् ।
सोत्‍साहस्‍य हि लोकेशु, न किंचिदपि दुर्लभम्।।

अर्थ – उत्‍साह बलवान होता है, उत्‍साह से बढ़कर दूसरा कोई बल नही है, उत्‍साही व्‍यक्ति के लिये संसार में कुछ भी दुर्लभ नही है।