>साढ़े बारह बजे का किया इन्तेजार पर कसाब को फाँसी ना मिली

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आज सुबह से साढ़े बारह बजने का इन्तेजार कर रहा था . उत्सुकता और बेचैनी दिमाग पर काबिज थी . सुबह सात बजे उठ कर जामिया के लिए निकल गया . साढ़े नौ से साढ़े बारह तक परीक्षा थी और स्टार न्यूज़ के मुताबिक इसी समय तक भारत के सरकारी दामाद की सजा का ऐलान भी होना था . परीक्षा भवन में भी दिमाग का आधा हिस्सा इसी पर लगा हुआ था . जल्दी -जल्दी ऑटो से घर भागे . यहाँ आये तो पता चला कि साहब , कसाब को फाँसी देने में कई साल भी लग सकते हैं . अब हम जैसे कानून के अनपढ़ों को कौर्ट -कचहरी की भाषा भला कहाँ समझ आती है  ? लेकिन परेशानी यही नहीं है .  मामला तो तब बिगड़ता है जब कार्यपालिका , व्यवस्थापिका और न्यायपालिका को हमारी ये बात समझ में नहीं आती ! क्यों , सही कहा ना ! अगर उनको ये बात समझ में आती तो अफजल गुरु अभी तक तिहाड़ में हमारे पैसों की रोटी नहीं तोड़ रहा होता . कसाब के लिए करोड़ों नहीं उडाये जाते वो भी उस देश में जहाँ लोग भूख से जान देते हो . पता नहीं इस देश का सिस्टम (कार्यपालिका , व्यवस्थापिका और न्यायपालिका) आखिर कौन सी मिसाल कायम करना चाहता है  ? अरे , मिसाल तो अमेरिका ने कायम किया बिलकुल लोकतान्त्रिक तरीके से सद्दाम को कम से कम समय में फाँसी लगवा कर .  लेकिन नहीं यह तो भारतवर्ष है … जहाँ हत्या करने पर दस और हत्या का लाइसेंस देती है ये सरकार !

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>क्या यह कांग्रेसियों का स्वांग नहीं है ?

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राजनीति में श्रेय का बड़ा महत्व है . किसी भी काम का श्रेय  छीनने की होड़ में कभी-कभी कुछ अच्छा काम भी हो जाया करता है . दो दशकों से भी अधिक समय तक मुंबई में ठाकरे की घिनौनी राजनीति ने कहर मचा रखी है . बड़े ठाकरे के बाद अब छोटे ठाकरे अपनी अलग पार्टी बना कर उछल-कूद कर रहे हैं . पहले लुंगी वालों की पुंगी बजाई अब भाइयों की बारी आई . गैर मराठियों को जम कर मारा पीटा गया . राज्य से लेकर केंद्र तक कांग्रेस और राष्ट्रवादी कोंग्रेस चुप रही . आज अचानक क्या हो गया जो गृहमंत्री देश की एकता -अखंडता को लेकर चिंतित हो गये . मीडिया में उनका ब्यान आने लगा कि भारतीय संविधान किसी भी भारतीय को कहीं भी बसने और काम करने की स्वतंत्रता देता है और केंद्र सरकार इसे सुनिश्चित करेगी . आखिर क्या वजह है ? साफा है कि संघ का इस मुद्दे पर आया ब्यान सरकार में खलबली मचा गया है . सोनिया ब्रिगेड घबरा गयी कि कहीं इसका श्रेय संघ के पास ना चला जाए …………. यहाँ तक तो ठीक है पर जनता कैसे पचा पाएगी गृहमंत्री के बयान को जब हाल हीं में अशोक चाहवान सरकार ने भाषावाद से ओत-प्रोत होकर मुंबई में टेक्सी परमिट का नया कानून लागू किया है . क्या गृह मंत्री और महारष्ट्र के मुख्यमंत्री का कृत्य आपस में विरोधाभाषी नहीं है ? क्या यह कांग्रेसियों का स्वांग नहीं है ? 

>कम्युनिस्ट पार्टी के सेक्स क्रांति से दुखी वामपंथी ब्लोगर

>एगो गर्दाउड़ान  खबर लाये हैं गुरु ! आपहुं पढ़ लेयो ! ” चीन की कम्युनिस्ट पार्टी सेक्स क्रांति की ओर ”  . अरे इतना भड़क कहे रहे हैं भैया ? ई बात कौनो हम थोड़े कह रहे हैं ? ई तो श्रीमान जगदीश्‍वर चतुर्वेदी जी जेएनयु वाले कह रहे हैं . अबे , आप लोगन के  मजाक लगता है  ई सब … हई लो अ पढ़ ल्यो खुदहीं ……

चीन की कम्‍युनि‍स्‍ट पार्टी में रखैलों का जलवा

आज के टाइम्‍स ऑफ इण्‍डि‍या में एक बड़ी ही शर्मनाक  खबर है ,चीन की कम्‍युनि‍स्‍ट और चीन के प्रशासन के अधि‍कारि‍यों का एक बड़ा तबका भ्रष्‍टाचार से परेशान है। भ्रष्‍टाचार भी असामान्‍य कोटि‍ का है। पढ़कर वि‍श्‍वास नहीं हो रहा था बाद में मेरे चीनी कम्‍युनि‍स्‍ट दोस्‍तों ने फोन पर बताया कि‍ बात सही है। चीन की कम्‍युनि‍स्‍ट पार्टी में एक बड़ा तबका है जो रखैल रखता है। क्रांति‍कारी पार्टी का क्रांति‍ से सेक्‍स क्रांति‍ तक का यह रूपान्‍तरण कि‍सी भी तर्क से गले उतरने वाली बात नहीं है। चीनी प्रशासन ने सर्कुलर जारी कि‍या है कि‍ अधि‍कारी लोग रखैल रखना बंद कर दें और यदि‍ रखना ही चाहें तो अपने खर्चे से रखैलों को पालन पोषण करें। उल्‍लेखनीय है चीन में फि‍जूलखर्ची रोकने के लि‍ए जो सरकारी और पार्टी स्‍तर का अभि‍यान चल रहा है उसके दौरान यह नि‍र्देश जारी कि‍या गया है। एक अनुमान के अनुसार चीन की कम्‍युनि‍स्‍ट पार्टी के सक्रि‍य नेतृत्‍व का एक बड़ा तबका रखैल को रखता रहा है। यह वहां स्‍वीकृत परंपरा है। साथ ही मंहगी मदशालाओं में भी उनकी आवाजाही बढ़ गयी है जि‍से चीनी प्रशासन रोकना चाहता है। स्‍थि‍ति‍ की भयावहता का ही परि‍णाम है कि‍ पार्टी को खुलेआम सर्कुलर नि‍कालकर आपत्‍ति‍ प्रकट करनी पड़ रही है। सरकारी प्रसारण माध्‍यमों से इसे बार-बार प्रचारि‍त कि‍या जा रहा है। आम तौर पर अधि‍कारि‍यों को जो तनख्‍वाह मि‍लती है उससे वे रखैलों का खर्चा नहीं उठा पाते और पैसे की कमी को पूरा करने के लि‍ए घूस लेते हैं। घूसखोरी और व्‍यभि‍चार ये दो बड़ी बीमारि‍यां हैं जि‍नसे चीन की कम्‍युनि‍स्‍ट पार्टी जूझ रही है। सर्कुलर में कहा गया है कि‍ यदि‍ अधि‍कारी और पार्टी के सदस्‍य रखैलों से अपने को दूर कर लें तो भ्रष्‍टाचार स्‍वत: ही कम हो जाएगा। यह तो वैसे ही हुआ कि‍ आप चीनी खाना बंद कर दीजि‍ए दाम अपने आप कम हो जाएंगे। स्‍थि‍ति‍ की भयावहता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि‍ शंघाई पार्टी के महासचि‍व पर भ्रष्‍टाचार और यौन दुराचार के अनेक आरोप हैं। उनकी अनेक रखैलें भी हैं। रखैलों के पूरे कुनबे को संभालने के लि‍ए व्‍यापक पैमाने पर पैसा भी चाहि‍ए और जाहि‍र है पैसा सि‍र्फ घूसखोरी से ही मि‍लता है और पार्टी का नेतृत्‍व इससे बेहद परेशान है। आम पार्टी मेम्‍बर व्‍यभि‍चार  और भ्रष्‍टाचार के धंधे से बचकर रहे इसके लि‍ए मीडि‍या में बड़े नेताओं के सदवि‍चार भी सुनाए जा रहे हैं लेकि‍न इस सबका कोई असर नजर नहीं आ रहा।          

>मकबूल फ़िदा हुसैन को ठेंगा

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मकबूल फिदा हुसैनः चित्रकार या हुस्नप्रेमी!

मकबूल फिदा हुसैन को मैंने न कभी चित्रकार माना, न ही चित्रकार की हैसियत से उन्हें देखने की कोशिश की। हुसैन साहब मुझे चित्रकार कम ‘बेकार’ ज्यादा लगते हैं। हुसैन साहब के पास बेकार की बातों को कहने-सोचने का वक्त काफी है और दिमाग भी। हुसैन साहब के प्रेमी उनकी बेकार की बातों और कथ्य को प्रगतिशिलता की मिसाल कहते-बताते हैं। उनकी नजर में हुसैन साहब सिर्फ चित्रकार ही नहीं, बल्कि ‘चित्रकारी के भगवान’ हैं। हुसैन साहब को भगवान मानकर कहीं-कहीं पूजा भी जाता है। तथाकथित प्रगतिशील जमात उनकी शान में उनकी हैसियत से कहीं ज्यादा ‘कसीदे’ पढ़ती व गढ़ती है। हुसैन साहब की आड़ी-तिरछी लकीरों को वे मार्डन या प्रोग्रेसिव आर्ट कहते-बताते हैं। वे उनकी आड़ी-तिरछी लकीरों पर इस कदर फिदा हैं कि अपना दिल तक उन्हें निकालकर दे सकते हैं, अगर वे कहें।

खैर, मैं कला की न कोई बहुत बड़ी जानकार हूं, न ही कला मेरा विषय रहा है। परंतु कला के प्रति रूचि और संवेदना को रखते हुए तस्वीरों के अच्छे-बुरे पक्ष को समझ तो सकती ही हूं। पता नहीं क्यों, हुसैन साहब की चित्रकला में मुझे न कला नजर आती है न संवेदना न ही कोई संदेश। आड़ी-तिरछी लकीरों के बीच रंगे-पूते चित्र पता नहीं किस आधुनिक कला को दर्शाते हैं, ये या तो हुसैन साहब जाने या उनके अंध-प्रेमी।
बहरहाल, मुद्दे पर आती हूं। हुसैन साहब कला से ज्यादा हुस्न के दीवाने रहते हैं। कमसीन शरीर उन्हें अच्छा लगता है। कहना चाहिए, दीवानगी की हद तक अच्छा लगता है। कभी किसी जमाने में वे माधुरी दीक्षित के अन्यन प्रेमी हुआ करते थे। उन्हें, दरअसल, माधुरी से नहीं उनके ‘कमसीन हुस्न’ से प्यार था। हुसैन साहब ने माधुरी की कई पेंटिंगस बनाईं। जब पेंटिंगस से दिल न भरा, तो उन्होंने उनके साथ एक ‘असफल फिल्म’ भी बना डाली। उस फिल्म को मैंने भी देखा था, पर अफसोस फिल्म के अंत तक समझ नहीं पाई कि हुसैन साहब दर्शकों को आखिर कहना, दिखाना या समझाना क्या चाहते हैं?
समय गुजरा। माधुरी की शादी हुई। उनका हुस्न भी थोड़ा ढला। देखते-देखते हुसैन साहब के दिलो-दिमाग से माधुरी की तस्वीर उतरने लगी और नई-नई तस्वीरें वहां जगह पाने लगीं। हुसैन साहब करते भी क्या तमाम पुरुषों की तरह उन्होंने भी पुरुष-दिमाग ही पाया है।
सुना है कि अब उनकी रंगीन दुनिया में एक और नई हुस्नवाली आ गई है। नाम है, अमृता राव। जी हां, ‘विवाह’ और ‘वेल्कम टू सज्जनपुर’ वाली अमृता राव। फिदा हुसैन अमृता राव पर फिदा हैं। वे उनके साथ ईद मनाना चाहते हैं और ‘वेल्कम टू सज्जनपुर’ भी देखना चाहते हैं। अमृता के हुस्न की तारीफ में हुसैन कहते हैं, ‘अमृता तो खुदा की बनाई हुई परफेक्ट पेंटिग हैं। उनकी बाडी लैंग्वेज इस कदर खूबसूरत है कि उसे बस कैनवस पर ही कैपचर किया जा सकता है।’ हुसैन साहब, जहां तक मुझे ध्यान पड़ता है, कुछ ऐसी ही बातें आपने माधुरी दीक्षित को देखकर भी कही थीं। यानी आप नए-नए हुस्न को देखकर अपनी कला के मापदंड़ों में रदो-बदल करते रहते हैं, मुबारक हो।
हुसैन साहब शायद इतनी प्रसिद्धि कभी नहीं पा पाते, अगर उन्होंने उन विवादास्पद चित्रों को न बनाया होता। भोंड़े चित्रों को बनाकर उन्हें ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ कहना प्रगतिशीलों और खुद हुसैन साहब को गंवारा हो सकता है, लेकिन मैं उसे न कला मानती हूं, न ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। मेरा एक सवाल है प्रगतिशीलों से कि क्या हुसैन साहब को इतनी ही ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ अपने धर्म के ईश्वर के स्कैच को बनाने के लिए मिल या दी जा सकती है?
चलो मान लेते हैं, हुसैन साहब के वे चित्र ‘कला की अभिव्यक्ति’ थे परंतु उस अभिव्यक्ति में कितनी कला या क्या संदेश छिपा था, जरा यह भी तो बताने का कष्ट करें।
आगे चलकर जब सांप्रदायिक विवाद खड़ा हुआ, तब हुसैन साहब चुपचाप यहां से खिसक लिए। उनमें तो तसलीमा नसरीन जैसा हौसला भी नहीं था कि यहां आकर एक दफा अपने विरोधियों से रू-ब-रू होते। लेकिन तसलीमा ने ऐसा किया। उसकी सजा भी उन्हें मिली। मगर वे हारी नहीं। अरे, हुसैन साहब तो मर्द हैं, तसलीमा तो फिर भी औरत हैं। कोई कुछ कहे या माने, मगर मेरी निगाह में तसलीमा का कद हुसैन साहब से कहीं ज्यादा बड़ा और सम्मानीय है और हमेशा ही रहेगा।
साभार :http://anuja916.blogspot.com/2008/09/blog-post_28.html

>बटला हाउस मुठभेड़ और आईबीएन वाले आशुतोष की पोस्ट

> कल उन्नीस सितम्बर था .पिछले साल इसी दिन बटला हाउस मुठभेड़ हुआ था जिसमें जामिया के छात्र जिन पर आतंकी होने का आरोप है , मारे गये थे । उसी मुठभेड़ में मोहन चंद शर्मा की शहादत भी हुई थी । ( ध्यान रहे , अगर भविष्य में कभी मुठभेड़ को फर्जी साबित कर दिया जाए तब भी वो शहीद हीं कहलायेंगे क्योंकि वो तो घर से देश की रक्षा करने निकले थे ) उस चर्चित काण्ड की बरसी पर ३० सितम्बर ०८ को लिखे गये आईबीएन के पत्रकार आशुतोष की इस पोस्ट को फ़िर से प्रकाशित कर रहा हूँ । इस मुद्दे पर एक बार फ़िर से बहस की जरुरत हैं क्योंकि कल-परसों हीं राष्ट्रीय जेहाद पार्टी के एक विधायक इसी नाम पर जीत कर आए हैं । तो पढिये और आशुतोष के सवालों का जबाव खोजिये :-

” जामिया एनकाउंटर और मुस्लिम पहचान

मैंने अनवर से पूछातुम क्या कर रहे हो?

उसने पलटकर पूछाइसका क्या मतलब ?

मैंने कहाअबे जामिया में ये रैली करने की क्या जरूरत है? तुम क्यों नहीं समझते? इससे गलत संदेश जाएगा। भगवान के लिए ऐसा मत करो।

ये सुनते ही अनवर आपा खो बैठा और बोलातुम्हारा क्या मतलब है? कानूनी सहायता देना मूलभूत अधिकार है। मैं उस पर भला कैसे आपत्ति कर सकता हूं। मैंने कहादेखो, कोई भी भला आदमी इस बात पर उंगली नहीं उठाएगा पर यह वह समय नहीं है। ऐसे में जब कोई ये नहीं जानता कि कहां बम फटेगा और हम घर लौटेंगे भी या नहीं तब आप कैसे किसी से समझदारी की उम्मीद कर सकते हैं।

काफी देर गर्मागर्मी होती रही। एक बार तो ऐसा लगा कि दोस्ती खतरे में है। अनवर और मैं 1988-90 में जेएनयू में साथसाथ थे। तब से हम परिवार की तरह हैं। हमारे बीच कई बार काफी नोंकझोंक होती रही, और ढेरों मुद्दों पर हमारे विचार काफी अलगअलग भी रहे लेकिन कभी भी हमारी दोस्ती पर आंच नहीं आयी।

बहसाबहसी में मैंने महसूस किया कि हमारे गुस्से के कारण कुछ और है शायद हम एक दूसरे से जो कहना चाहते हैं वो कह नहीं पा रहे हैं। मैं शायद ये कहना चाहता था कि मुसलमानों के साथ कुछ गड़बड़ है। तुम लोग हमेशा बम फोड़ते हो और वह शायद यह कहना चाहता था कि सरकारी अमले और मीडिया में हिंदुओं का बोलबाला है, जो हमेशा ये सोचते हैं कि मुसलमान आतंकवादी होते हैं और उन्हें सबक सिखाना ही चाहिए इसलिए निर्दोष मुस्लिम आतंकवाद के नाम पर निशाना बनते हैं।

यह वास्तव में अजीब था क्योंकि कट्टरवाद और फिरकापरस्ती से लड़ने का हम दोनों का लंबा इतिहास रहा है। हम दोनों ऐसी ताकतों के खिलाफ जोरदार ढंग से आवाज उठाते रहे हैं। तो फिर ये गरमागर्मी क्यों? मुझे अगली सुबह इस बात का जवाब मिल गया जब मैंने वरिष्ठ पत्रकार और लेजेंडरी संपादक एम जे अकबर का लेख पढ़ा। अकबर ने बड़े दबे छुपे शब्दों में उस बात को लिख मारा जो अनवर नहीं कह पाया। मैं ये साफ कर दूं कि एम जे के प्रति हमेशा से मेरे मन में सम्मान रहा है, जो आज भी है। वे आधुनिक और बेहतर समझ वाले चुनिंदा संपादकों में से एक हैं। लेकिन टाइम्स आफ इंडिया में में रविवार को जो उन्होंने लिखा उसमें और शाह इमाम बुखारी के मुखर बयानों में काफी कुछ समानता मुझे दिखी।

मैं काफी निराश , उदास और परेशान था। मैं जवाब तलाश रहा था। क्या मेरी सोच में कहीं कुछ गड़बड़ है? क्या मैं बदल गया हूं? क्या मैं वही आदमी हूं जो अबतक हिंदू सांप्रदायिकता और उसकी मुस्लिम विरोधी विचारधारा का विरोध करता आया है? आखिर, क्यों मैं अनवर और एम जे की विश्वसनीयता पर शक कर रहा हूं।

सोचते वक्त मुझे जानेमाने पटकथा लेखक जावेद अख्तर का खयाल आया, जिन्होंने एक टीवी डिबेट के दौरान मेरे एक मंझे हुए एंकर संदीप चौधरी को यह कहकर झिड़क दिया था कि उनका सवाल सांप्रदायिक का है। मुझे ठीक से उनका वह सवाल याद नहीं लेकिन इतना याद है कि वह सवाल मुसलमानों और उनकी पहचान को लेकर था। तब मैंने गुस्से में एक हिंदी मैगजीन में एक तीखा लेख लिखा था और सवाल उठाया था कि क्यों आरिफ मोहम्मद खान को सैयद शहाबुद्दीन से 80 के दशक के अंत और 90 के दशक की शुरुआत में मात खानी पड़ी? आखिर क्यों ऐसा हुआ कि वी पी सिंह ने आरिफ मोहम्मद खान को इलाहाबाद जाने से रोक दिया जहां से वे 1988 में लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे लेकिन शहाबुद्दीन का स्वागत किया गया।

अचंभे की बात है कि मुझे इस मुद्दे पर जावेद अख्तर के कभी दोस्त रहे सलीम खान से जोरदार समर्थन मिला। उन्होंने दैनिक भास्कर में मेरे लिखे का हवाला देते हुए एक लेख लिखा था और मेरे कुछ तर्कों से सहमति जताई थी

मुझे यहां ये मानने में कोई संकोच नहीं है कि पिछले काफी समय से मेरे जेहन में ये सवाल रह रह कर गूंज रहा है कि अब मुस्लिम समुदाय के आत्ममंथन का वक्त गया है। समुदाय को खुद से ये सवाल पूछना होगा कि क्या अंदर कहीं कुछ गलत हो रहा है?

आखिर क्यों नैरोबी से दारसलाम, इंडोनेशिया से सूडान, मैड्रिड से मैनहटन, काबुल से कश्मीर, चेचेन्या से चीन तक उनकी पहचान एक ऐसे शख्स की बन रही है जो बम फोड़ता है , धमाका करता?

मुझे मालूम है कि ऐसा कह कर मैं क्या जोखिम मोल ले रहा हूं। मुझे मालूम है कि कुछ लोग यकायक कह उठेंगे कि देखा आशुतोष का चेहरा बेनकाब हो गया, धर्मनिरपेक्षता की आड़ में वो अबतक सांप्रदायिकता को बढ़ावा दे रहा था। यही है उसका असली चेहरा। अब उसकी हकीकत सामने आई है। लेकिन मुझे आज इसकी परवाह नहीं।

आज सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर क्यों 20वीं सदी के बेहरतीन दिमागों में से एक सलमान रुश्दी खुली हवा में सांस नहीं ले सकते और क्यों तसलीमा नसरीन देश की सबसे धर्मनिरपेक्ष मानी जाने वाली लेफ्ट सरकार के साए में शांति से नहीं रह सकतीं? आखिर क्यों लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह सिमी पर से बैन हटाने को सही ठहराने की कोशिश करते हैं? ऐसा क्यों होता है कि देवबंद के मौलाना मदनी रामलीला मैदान में आतंकवादी विरोधी रैली का आयोजन करते हैं और आतंकवाद का विरोध करते हैं तो उर्दू प्रेस उनकी आलोचना पर उतर आती है?

कोई ये सवाल भी उठा सकता है कि कट्टरपंथ और फिरकापरस्ती तो हर धर्म में है तो ये हंगामा क्यों? मैं मानता हूं लेकिन थोड़ा फर्क है। हिंदू समाज में अगर भड़काने वाली कट्टरपंथी आवाज है तो वहीं इसके बराबर या कहें इससे भी अधिक मजूबत उदारपंथी आवाज भी है। ईसाईयत में ये जंग धार्मिक कट्टरपंथ काफी पहले हार चुका है। ईसाईयत में ये तय हो चुका है कि धर्म निजी आस्था का मामला है और राजनीति में मजहब के लिये कोई जगह नहीं है। हिंदुत्व और ईसाईयत में अबुल अल मौदूदी जैसे लोग नहीं दिखाई पड़ते जो धर्म और राजनीति का घालमेल करना चाहते हैं। मौदूदी दावा करते हैं कि इस्लाम एक क्रांतिकारी विचारधारा है और एक सिस्टम भी जो सरकारों को पलट देता है।

मेरी नजर में मुस्लिम समुदाय में रैडिकल इस्लाम या राजनीतिक इस्लाम है जो खुद अपने ही लोगों और दुनिया के लिए मुसीबत पैदा कर रहा है। लेकिन हैरानी वाली बात ये है कि इस तथाकथित रैडिकल इस्लाम के खिलाफ कोई पुरजोर आवाज बुलंद नहीं करता ही भारत में और ही दूसरी जगहों पर। उदारपंथियों का एक बड़ा तबका अकसर चुप रहता है या फिर वह इसका इतनी ताकत से विरोध नहीं करता कि पूरा समुदाय इसको सुने।

फरीद जकरिया ने अपनी किताबपोस्ट अमेरिकन वर्ल्डमें लिखा है कि मुस्लिम जगत भी बदल रहा है लेकिन बाकी की तुलना में काफी धीमे। इसमें भी कई ऐसे लोग हैं जो इस बदलाव के विरोध में खडे़ हो खुद को इस तबके का नेता मानने का अहसास पाले बैठे हैं। दूसरी संस्कृतियों की तुलना में इस्लाम के अंदर प्रतिक्रियावादी ज्यादा कट्टर हैंइनमें जड़ता व्याप्त है। हालांकि इनकी संख्या काफी कम है। काफी अल्पसंख्या में हैं।

मैं मानता हूं कि मौदूदी जैसे लोग कम संख्या में हैं। नहीं तो अनवर, साजिद और आर्फीन जैसे मेरे दोस्त नहीं होते लेकिन बदकिस्मती से वे ऐसे कुछ लोगों को बाकी लोगों पर राज करने का मौका देते हैं। मुस्लिम समुदाय के बहुसंख्यक तबके की ये चुप्पी तकलीफदेह है और अब यह चुप्पी काफी जटिल रूप अख्तियार करती जा रही है। यह इसीकांप्लेक्सका नतीजा है कि जामिया नगर कापुलिस एनकाउंटरमुस्लिम बौद्धिक वर्ग के लिये अपनी मुस्लिम पहचान बनाने का जरिया बन जाती है।

मेरा सवाल यह है कि आखिर क्यों एक एनकाउंटर को मुस्लिम समुदाय के ऊपर हमला माना जा रहा है? पुलिस एनकाउंटर कोई नया नहीं है। ये असली या फर्जी दोनों ही होते हैं। यह हर रोज होता है। लेकिन ऐसा क्यों होता है कि जब कोई आतिफ अमीन मारा जाता है तो हंगामा हो जाता है, प्रदर्शन होते हैं। यहां कोई नंदू मारा जाता है तब जंतरमंतर और जामिया पर रैली क्यों नहीं होती?

मुझे एम जे अकबर को ये बताने की जरूरत नहीं कि एक नकली एनकाउंटर को असली बनाने के लिए पुलिसवाले अकसर खुद को गोली मारते हैं? राजबीर, दया नायक और प्रदीप शर्मा असली गोली चला कर हीरो नहीं बने बल्कि ये अकसर उन लोगों को मारकर हीरो बने है जिनकों इन्होंने पकड़ कर रखा था। मोहनचंद शर्मा भी कोई साधू नहीं था लेकिन एमजे को यह कहने की जरूरत क्यों पड़ी कि जामिया नगर एनकाउंटर में एम सी शर्मा पुलिस की गोलियों का भी शिकार हो सकते हैं? मेरा सवाल ये है कि क्या वो एक आम मुसलमान की तरहरिऐक्टकर रहे हैं या फिर देश के एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर। यही सवाल मेरा अपने प्रिय मित्र अनवर से भी है।

ये मेरा अनुमान नहीं बल्कि यकीन है कि दोनों महानुभाव एक नागरिक की तरह व्यवहार नहीं कर रहे हैं और उनके शब्दों में वही कुछ झलक रहा है जो कि जमिया नगर, सराय मीर और आजमगढ़ की सड़कों पर आम मुसलमान की बातों में झलक रहा है। यहां खुले रूप से कहा जा रहा है किकाउंटर टेररिज्मके नाम पर मासूम मुस्लिमों को शिकार बनाया जा रहा है। पहले आम मुसलमान और पढ़ेलिखे मुसलमान में फर्क था। लेकिन अब ये तस्वीर कुछकुछ धुंधली होती दिख रही है। और ये बात परेशान करने वाली है।

भारतीय संदर्भ में क्या इसका ये मतलब है कि मुस्लिम समुदाय में उदारता कम होती जा रही है? मेरा जवाब हैबिग नो फिर ऐसी प्रतिक्रिया क्यों? मैं इसेलिटिल ब्वाय सिंड्रोमकहता हूं। एक ऐसा बच्चा जिसे बारबार उस शैतानी के लिए दोषी ठहराया जाता है जो उसने की ही नहीं। अवसाद के चलते वह जिद्दी और हठी हो जाता हैस्वीकारतावादी और वो चिढ़ कर , तंग आकर , परेशान हो कर कह उठता है – “हां मैंने ही किया है। आप क्या कर लोगे?”

तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जा करने और अल कायदा और ओसामा बिन लादेन के उभरने के बाद से उदारपंथी मुसलमानों के दिक्कतें शुरू हो गयीं, उनकी पहचान को खतरा पैदा हो गया है। दुनिया के हर कोने में उन पर लगातार नजर रखी जा रही हैं। उनका नाम आते ही उन्हेअजीब सी नजरोंसे देखा जाता है मानो वो आम इंसान होकर आतंकवादी हों। न्यूयॉर्क हो या नई दिल्ली सब जगह यही हाल है। एक उदारपंथी मुसलमान जानता है कि उसका कट्टरपंथियों की सोच से कोई लेना देना नहीं है।

उसका बम फोड़ों आंतकवादी सोच से दूरदूर तक का कोई वास्ता नहीं है। ही वो ये मानता है कि हिंदूयहूदीईसाई या भारतइस्राइलअमेरिका इस्लाम को नेस्तनाबूद करने के लिये साजिश रच रहे हैं। लेकिन वो कर क्या सकता है। वो असहाय है। उसे मालूम है कि उसकी सुनने वाला कोई नहीं। वो अंदर भी टूट रहा है और बाहर भी उनपर कोई यकीन नहीं कर रहा है कि ये खतरनाक सोच उसकी जिंदगी का हिस्सा नहीं है। और यही असहायता उसके अंदर एक ऐसे कांप्लेक्स को जन्म देती है जिसे हम लिटिल ब्वाय सिंड्रोम कहते हैं।

अनवर मेरे दोस्त, तुम्हें इस सिंड्रोम से बाहर आना होगा क्योंकि अगर तुम मौदूदी और सैयद कुतुब और ओसामा और जवाहिरी जैसी सोच का शिकार हो गए तो इस धर्म का कोई भविष्य नहीं बचेगा जो शांति और क्षमा का पाठ पढ़ाता है। इस आततायी मानसिकता का जोरदार विराध करने का वक्त गया है। अगर अब ऐसा नहीं होगा तो मैं, तुम और एम जे जैसे लोग इतिहास में विलेन के रूप में देखे जाएंगे और हिंदू कट्टरपंथी जैसी ताकतें इस देश पर राज करेंगी।

हिन्दु आतंकवादी एक और कंलक का कोशिश

14 नवम्बर 2004 दिपावली के ठीक पहले शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र स्वामी को ठीक पुजा करते समय गिरफ्तार किया गया सेकुलर के द्वारा यह किसी विश्व विजय से कम नही था जम कर खुशीयाँ मनायी गया। इस खुशी के माहौल को दुगना करने में मिडीया का भरपुर सहयोग मिला मिडीया पुलिस और खूफिया ऎजेन्सी से ज्यादा तेज निकला और डेली एक नया सबूत लाकर टी.वी समाचार के माध्यम से दिखाया जाने लगा हिन्दु साधु-संत को जम कर गालिया दिया जाने लगा सभी को हत्यारा कहा जाने लगा। लेकिन सेकुलर और मिडीया का झुठ ज्यादा दिन तक नही टिका और शकराचार्य स्वामी जयेन्द्र स्वामी के खिलाफ सेकुलर और मिडीया कुछ भी नहीं साबित कर रहा था, सभी आरोप को बकवास करार दिया गया, उच्चतम न्यायालय का फैसला शकराचार्य स्वामी जयेन्द्र स्वामी के पक्ष में आया उन्हे हत्या के आरोप से जमानत के द्वारा रिहा कर दिया गया।

इस दीवाली हिन्दुओ के उपर एक और कंलक लगाने का कोशिश किया जा रहा हिन्दु आतंकवादी का बैगर किसी सबूत के एक हिंदू साध्वी को मालेगांव विस्फोटों में उसकी कथित तौर पर शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। पुलिस के पास सबूत नही है। जिस मोटर बाइक का उपयोग विस्फोट में करने के बारे में बताया जा रहा है उस बाइक को कुछ साल पहले बेच दिया गया था। स्पेशल पुलिस रविवार को साध्वी प्रज्ञा सिंह के किराए के मकान पर छापा मारा, लेकिन वहाँ से कुछ भी आपत्तिजनक नहीं मिला। मुंबई एटीएस प्रदेश में साध्वी प्रज्ञा से जुड़े लोगों की गतिविधियों की जानकारी एकत्रित कर रही है। लेकिन अभी तक पुलिस को कोई खास सफलता मिला लगता नही है। लेकिन इस मुद्दे पर काग्रेसी और उसके सहयोगी के द्वारा झुठा प्रचार सुरु कर दिया गया है । चुनाव से पहले खुफिया ऎजेन्सी और पुलिस को अपने चुनाव ऎजेन्ट के रुप में काम करवाया जा करवा दिया है। काग्रेस के नेता और उनके सहयोगी दल इसी कोशीश में लगे हैं कि किस हिन्दु संघठन को चुनाव तक हिन्दु आतंकवादी का तगमा लगा कर रखा जाये जिससे चुनाव में फायदा उठाया जा सके।

कांग्रेस सरकार इस पांच साल में इस देश को क्या दिया है। इस सरकार के दौरान सबसे ज्यादा मुस्लिम आतंकी का भयावह चेहरा हिन्दुस्तान देखा है। आंतकी को सरक्षण देने के लिये पोटा हटा दिया गया। परमाणु करार के द्वारा सरकार अपना परमाणु और रक्षा निती अमेरिका के हाथ में गिरवी रख दिया है। आखिर कौन सा चेहरा मुंह कांग्रेस उन किसानो के पास वोट मागने जायेगा जिसके परिजन आत्महत्या कर चुके हैं। हिन्दुस्तान का अर्थव्यवस्था आज जिस गति से निचे गिर रहा है उतना तेजी से शायद सचिन और धोनी ने रन भी नही बनाता है। हमारे अमेरिकन स्कालर प्रधानमंत्री और उनके सहयोगी वित्त मंत्री के द्वारा लाख भरोसा और आश्वासन के बाबजुद भी अर्थव्यवस्था का गिरना बन्द नही हो रहा है अगर हालत यही रहा तो 1-2 महीना के अन्दर हिन्दुस्तान में भुखमरी सुरु हो जायेगा।

सोचने योग्य बाते हैं आखिर हिन्दु अपने देश हिन्दुस्तान में क्यों बम विस्फोट करेंगे। उन्हें ना तो किसी देवता के द्वारा जिहाद करने को कहा गया है। नही हिन्दु इस देश को दारुल हिन्दुस्तान बनाना चाहता है। हिन्दु के किसी धर्म ग्रन्थ में कही भी यैसा भी नही लिखा है कि दुसरे धर्म वालो को तलवार से सर कलम कर दो। उसके बच्चों को उसी के सामने पटक कर मार दो उसकी बहन और बेटी का बलात्कार करो। किसी हिन्दु धर्मगुरु ने मंदिर के उपर चढकर अपने भक्तों को कभी नही कहा होगा की तुम्हे अपने घर में हथियार रखना जरुरी है और हिन्दु जिहाद के नाम पर चन्दाँ इकट्ठा कर के आतंकवादीयों को सुरक्षा मुहैया करना है आतंकवादीयों को अपने घर में पनाह देना है। और उसे न तो किसी आतंकवादी देश के द्वारा छ्दम युद्ध लड़ने के लिये पैसा मिलता है। आखिर क्या कारण है कि हिन्दु अपने घर को तवाह करना चाहते हैं। कोई कारण समझ में नही आता है सिर्फ इतना ही समझ में आरहा है कि हिन्दु आतंकवाद का डर दिखा कर कुछ मुस्लिम तुस्टिकरण में लिप्त, आतंकवादियों के सहयोगी राजनिती पार्टी को चुनाव में फायदा होगा। और कोई कारण नही है इस हिन्दु आतंकवादी का।

सत्यमेव जयते के सिद्धान्त का पालन करते हुये हिन्दु इसी आशा में बैढे हैं कि जिस तरह से शकराचार्य स्वामी जयेन्द्र स्वामी को न्यायालय के द्वारा बाइज्जत बरी किया गया उसी तरह इस साध्वी प्रज्ञा सिंह भी एक दिन इज्जत के साथ जेल से रिहा होगी और तथाकथित सेकुलरिज्म का नकाव पहने, समाचार के नाम पर दलाली करने बाले मिडीया के गाल में तमाचा मारते हुये। फिर से इस देश में अपने ओजस्वी भाषण, देशभक्ती कार्य के द्वारा इस देश को परम वैभव में पहुचाने के कार्य में लग जायेगी।

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