>क्यों भगवान्, हमें वही पुरातन युग मिला था पैदा करने को !!!

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हाय रे! हम किस समय में पैदा हो गये थे? हाय रे! हमारे समय में खुशबू जैसी कोई हीरोइन क्यों नहीं हुई? हे भगवान! हमारे समय में अदालतों ने ऐसे क्रांतिकारी निर्णय क्यों नहीं दिये? हाय राम!, हाय रे! हे भगवान!…….और कितना चिल्लायें, कोई अब तो सुन लो।



जबसे अदालत का फैसला सुना कि विवाहपूर्व यौन सम्बन्ध बनाने और सहजीवन में कोई अपराध जैसा नहीं, कानूनी मान्यता है तबसे दिल पर साँप लोट गया। कई बार भगवान से भी शिकायत कर चुके हैं कि क्या बिगड़ जाता जो उसने हमें ऐसे वर्ष में पैदा किया होता कि आज हम 22-24 वर्ष के ही हुए होते। नहीं भगवान को भी उस समय पैदा करना था जब परिवार में संस्कार दिया जाना प्रमुखता में शामिल था। अपने घर की तो छोड़ो, मोहल्ले की, आसपड़ोस की लड़कियों तक को बहिन मानने की शिक्षा दी जाती थी। साथ में पढ़ने वाली लड़कियाँ भी राखी बाँध दिया करतीं थीं।

कितनी
तंग मानसिकता में जीने का पाठ पढ़ाया जाता था हमें। कितनी संकुचित मानसिकता में जीना सिखाया था हमारे माता-पिता ने हमें। कोई दूसरा रिश्ता ही नहीं, बस भाई-बहिन, बहुत हुए तो ऐसे दोस्त जिसके ऊपर माताजी की, दीदी की, बड़े भैया की पैनी निगाह बनी ही रहती थी। इनसे बचे तो पता चला कि पिताजी के दोस्तों की निगाहें पीछा कर रहीं हैं, भैया के दोस्तों ने जासूसी लगा रखी है। कितनी संकुचित मानसिकता रही थी उस समय घर वालों की, घर वालों के सहयोगियों की। उफ! खुद तो लम्बे वैवाहिक जीवन में बस एक के साथ गठजोड़ करके बने रहे और हमें भी शिक्षा देते रहे।

वाह
! आह!…… आह तो अपना अतीत याद करके निकल पड़ी, वैसे वाह! ही निकलनी है अबके समय को देखकर। क्या जमाना है, खुली छूट है, स्वतन्त्रता है, स्वच्छन्दता है, क्या नहीं है, जो पर्दे के पीछे था अब खुलेआम है। कोई रोक कर तो दिखाये, कानून साथ है, समाज के आधुनिकता समर्थक साथ हैं। मजा तो अब है जिन्दगी का। चाहे जैसे रहो, चाहे जिसके साथ रहो। खुल्लमखुल्ला रहो, बिंदास रहो मौका लगे तो ‘‘कंडोम, बिन्दास बोल’’ का नारा भी धमक दो। देखें कौन क्या कहता है, क्या करता है।



हमें
तो लगता है कि हमने कुछ किया ही नहीं। बस टुकुरटुकुर देख लिया और रातों में जागजागकर कविता करने लगे। स्वयं को कवि समझने लगे। हाय! डर भी लगा रहता था कि कोई देख न ले, कोई परेशान न करे, कोई घर पर न बता दे। अब काहे का डर, उँह, हो जिसमें हिम्मत वो सामने आकर तो दिखाये, न पकड़वा दिया पुलिस से। अब बाप घबराते घूम रहे हैं कहीं किसी रेस्टोरेंट में, पार्क में, सड़क चलते सुपुत्र या सुपुत्री मिल न जायें किसी और के गले में बाँहे डाले। किसी और में अब तो कोई भी होने का डर लगा रहता है, पिताओं को,माताओं को।

माता
पिता सिसियाए से घूम रहे हैं और बेटा-बेटी पूरी धमक और हनक के साथ अपने गुलछर्रों में मगन हैं। लगता है कि कैसी किस्मत है उन मातापिताओं की जो अपनी युवावस्था में अपने मातापिता से डरकर अपनी आँखों-आँखों में चलती प्रेम कहानी को कागजों तक सीमित रख पाये। न उसे दे सके और न उसे बता सके, साथ में मार खाने के डर से छिपते भी रहे, बचते भी रहे। और अब जबकि उनके बेटेबेटी युवा हैं तो मातापिता को उनसे फिर डरना पड़ रहा है, उनके सम्बन्धों के ज्वार से, नये रिश्तों के उभार से। डरो-डरो, डरना सीखो क्योंकि तुमको सिखाया यही गया है जबकि आज की पीढ़ी कहती है ‘‘डरना मना है।’’



अरे
! हम कहाँ माता-पिता, बेटा-बेटी में भटक गये। अपना दुख भुलाकर दूसरों के दुख का बखान करने लगे। काश, हमारा समय भी ऐसा होता तो हम भी कुछ धमाल कर जाते। किसी पार्क में, मॉल में, रेस्टोरेंट में अपनी उनको कुछ खिलाते, कुछ सिखाते और मौका ताड़ किसी दिन किसी और को बाँहों में झुलाते। हाय! अब क्या हो? संस्कारों के मारे हम अब तो ले चुके सात फेरे उनके साथ, कसम खाई है कि नहीं छूटेगा सात जन्मों का साथ। कितना अच्छा है आज का समय जहाँ सात जन्मों तक की कौन कसम खाये, सात दिन का भी ठौर नहीं। एक के साथ कौन सात चक्कर खाये, सातसात से एक बार में चक्कर चलाये। क्यों विवाह जैसे मुश्किल भरे माहौल में अपने कदम फँसाये, अपनी गर्दन फँसाये जबकि विवाहपूर्व ही सभी सुविधाएँ कानूनी रूप से मुहैया हों।

हे
भगवान! यदि तुम सत्य के साँचे हो तो हमारी सुन लो, जैसे सबकी पीढ़ा हरते हो वैसी ही हमारी भी हर लो, जैसी सबकी बिगड़ी बनाते हो वैसी हमारी भी बना दो। हमें भी हमारे संस्कारों से मुक्ति दिला दो। हमें भी हमारी शिक्षाओं से मुक्ति दिला दो। हमें भी सात जन्मों वाले हमारे रिश्ते निभाने की कसम से छूट दिला दो।

भगवान
तुम्हें अपने अस्तित्व को बचाना है तो हमारी सुन लो, नहीं तो अदालत है हमारी बात सुनने के लिए। संस्कारों और रिश्तों की मर्यादा को तुम अपने पास ही रखो, शायद किसी और युग में फिर इसकी जरूरत पड़े। इस युग में तो अभी किसी को इनकी जरूरत नहीं।

(सभी चित्र गूगल छवियों से साभार लिए गए हैं)

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>सेक्स चर्चा ….. राम ……….राम ……. लाहौल बिलाकुवत …………..

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अरे , भाई यह क्या गजब हो गया .मैंने तो सेक्स / काम – चर्चा की कड़ियाँ लिखनी शुरू कर दी .अब लोगों को कैसे साबित करूँगा कि मैं ब्लॉग हित ,देश हित ,जन हित …. में लिखता हूँ  ! . सेक्स /काम का जन से क्या सरोकार !  कुछ अन्य ब्लॉगर को देखो धर्म -चर्चा में विलीन हैं, अपने -अपने ब्लॉग पर अवतारों की चर्चा  करते हैं , और मैं मूढ़ सेक्स की बात करता हूँ ! छि छि छि ….. मैं लोगों को विचारकों के हवाले से कहता हूँ कि सेक्स प्रेम की यात्रा का उदगम स्थल है . काम जीवन का बाह्य सच है जिसे अनुभव कर जिससे तृप्त होकर हीं प्रेम को और प्रेम में डूब कर परमात्मा को पाया जा सकता  है . जब जीवन की सबसे मूल बीज प्रक्रिया को ना समझ पाया तो इश्वर को जानने का सवाल नहीं बनता .
मान लीजिये मुझे हरिद्वार जाना हो और मैं तो दिल्ली रहता हूँ . तब पहला काम क्या होगा ? पहला काम होगा कि मैं दिल्ली के बारे में जानु दिल्ली कहाँj है , किस दिशा में है , आदि तब हरिद्वार का पता लागों कि किस दिशा में ,कितनी दूरी  पर कहाँ स्थित है . मतलब , पहले जहाँ मैं खड़ा हूँ वह स्थान तो मालुम हो कहाँ है क्या है आदि आदि ………………अर्थात यात्रा का प्रारंभ पहले है अंत बाद में . ठीक उसी तरह जीवन के सफ़र में मोक्ष / परमात्मा की प्राप्ति मानव का ध्येय है . हम जहाँ खड़े हैं वह प्राथमिक बिंदु ही सेक्स है , जहाँ पैदा हुए वह सेक्स है , तब इसके बगैर इश्वर की चर्चा व्यर्थ न होगी ?
मेरे आलेख में लोग सेक्स का प्रचलित रूप ( मस्त राम की कहानी) ढूंढने आते हैं . नहीं मिलता तो मैं क्या करूँ क्योंकि मेरा सेक्स गूगल सर्च में आने वाले सेक्स से अलग है . मेरा सेक्स उन तमाम विचारकों मसलन ,वात्स्यायन,फ्रायड ,ओशो आदि से प्रभावित है . इन सब के विचारों में अपनी समझ खोल कर बनाई जा रही अवधारणा है . ऐसे समय में जब दुनिया में प्रेम घट रहा है , सेक्स विकृत हो रहा है , समाज द्वारा स्थायित्व के लिए बनाई गयी व्यवस्था विवाह /शादी टूट  रही है , दुनिया में एक दुसरे के प्रति नफरत बढ़ती जा रही है , आध्यात्मिकता की घोर जरुरत है . आध्यात्म से काम को ,सेक्स को जोड़े जाने की टूटी कड़ियों को मिलाने की आवश्यकता है . लेकिन नहीं मुझे यह सब नहीं लिखना चाहिए यह समाज के खिलाफ है !   विद्यालयों में सेक्स शिक्षा के नाम पर सेक्स कैसे करें , ऐड्स से कैसे बचें, कंडोम क्या है ,आदि बताया जा रहा है .लेकिन फ़िर भी मुझे चुप रहना चाहिए ,आप सभी को चुप रहना चाहिए क्योंकि अब तक हम चुप रहते आये हैं सेक्स को नितांत निजी और बिस्तर भर का उपक्रम मानते ए हैं ! भला वर्षों की मानसिकता को कैसे ठोकर मार  दें ? मन  चाहे दिन-रात चिंतन में लगा रहे , इंटरनेट पर बैठते हीं भले उंगलियाँ गूगल में सेक्स टाइप करती रहे पर हम चर्चा नहीं करेंगे ! क्योंकि इससे देश हित ,समाज हित , नहीं  जुड़े हैं . हम अवतारों की झूठी अफवाहें जरुर फैलायेंगे , किसी भी बिल्डिंग को धार्मिक स्थल की नक़ल बताएँगे , दूसरे धर्म को गाली देंगे , आतंकवादियों / नक्सलियों का समर्थन करेंगे पर साहब सेक्स चर्चा ….. राम ……….राम …………… लाहौल बिलाकुवत …………..

>"लव जिहाद" सांप्रदायिक भड़ास निकलने का जरिया ….. जरुर पढिये

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अपने जीवन के 17 बसन्त देख चुकी श्रुति (काल्पनिक नाम) को यह नहीं मालूम था कि जो युवक विद्यालय जाते समय रास्ते में मिलता रहा और वे एक दूसरे के काफी नजदीक आ गये थे वह उससे प्रेम नहीं करता है बल्कि पूर्वांचल में चल रहे लव जिहाद का एक जेहादी है और वह उसे दलालों के जरियें खाडी देश के किसी शेख के हाथों बेच देगा। वह खुशकिश्मत थी कि बच गयी अन्यथा उसका भी वहीं हाल हुआ होता जो इस जेहाद की जद में फंस चुकी लड़कियों का हो रहा है।

आजमगढ़ जनपद के अहरौला कस्बे की रहने वाली श्रुति अग्रहरि पिछले एक माह से विद्यालय में पढ़ने जाती तो उसके पीछे एक युवक जो दिखने में स्मार्ट था वह लग जाता था। श्रुति और उसकी आंखे चार हो गयी। और वह उस युवक से प्रेम कर बैठी। वह युवक स्वंय को फूलपुर कस्बे के एक वैश्य परिवार का बताता था। बात शारीरिक सम्बन्धों तक नहीं पहुंची थी।इसी बीच 8 सितम्बर 2009 को श्रुति अचानक लापता हो गयी। परिजनों ने खोजबीन की इसी दौरान उन्हें सूचना मिली कि उनकी लड़की जौनपुर जनपद खुटहन के शाहगंज थानान्तगर्त अरन्द गांव के निवासी राशिद पुत्र जकरिया व अब्दुल पुत्र सन्तार जो शाहगंज के पक्का पोखरा के पास रहता है उन दोनों के साथ 8 सितम्बर को देखी गयी। इस बात की जानकारी जब परिजनों ने 9 सितम्बर को अहरौला थाने को दी तो थानाध्यक्ष ने कोई कार्यवाही नहीं की। इसके बाद परिजनों और अहरौला के कुछ लोग खुद अब्दुल के घर पहुंच गये और वहां से उसे पकड़कर लाये तथा अहरौला पुलिस को साँप दिया। 9 सितम्बर को जब ग्रामीणों ने आरोपी को खुद ही पुलिस को सौप दिया फिर भी पुलिस 24 घण्टे तक मूकदर्शक बनी रही। इसके बाद जब ग्रामीणों ने 10 सितम्बर को अहरौला थाने में तोड़ फोड़ शुरू कर दी तो पुलिस सक्रिय हुई और आरोपी पर थर्ड डिग्री का इस्तेमाल किया तो उसने जो रहस्योदघाटन किया उसके बाद तो पुलिस के पैरों तले से जमीन ही खिसक गयी पुलिस बैकफुट पर नजर आने लगी। उसने बताया कि युवती को उसने आजमगढ़ के फूलपुर कस्बे में रहने वाले बसपा नेता और पिछला विधानसभा चुनाव लड़ चुके इमरान खान उर्फ हिटलर के घर में रखा है। पुलिस इमरान खां उर्फ हिटलर के घर पर छापेमारी को लेकर मौन बनी रही। इसके बाद तों अहरौला के निवासियों और युवती के परिजनों ने ही सम्प्रदाय विशेष के प्रबल विरोध के बावजूद हिटलर के घर में घुसकर युवती को बरामद कर लिया और फूलपुर कोतवाली पर लाये। पुलिस सिर्फ तमाशबीन की भूमिका में रही। इसके बाद जब युवती ने बताया कि उसके साथ 10-12 की संख्या में अन्य युवतियां भी उस मकान में थी तो पुलिस को मानों सांप ही सूंघ गया। थाने से मात्र 200 मीटर की दूरी पर स्थित बसपा नेता के उस मकान पर छापेमारी करने में उसने 4 घंटे का समय लगा दिया। इसके बाद जब पुलिस छापेमारी करने पहुंुची तो उस मकान में आदमी तो क्या कोई परिन्दा भी नहीं मिला। इस घटना में राशिद भी पुलिस की गिरफ्त में आया लेकिन पुलिसिया पूछताछ में उसने क्या बताया यह बताने से पुलिस कतराती रही। 17 वर्षीय श्रुति को पुलिस फूलपुर कोतवाली ले गयी। और पहले तो वह उसके चरित्र हनन का प्रयास करती रही लेकिन जब वह अपनी बात पर अड़ी रही तो पुलिस ने मुकदमा दर्ज लिया और आगे की कार्यवाही कर रही है लेकिन वह भी घटना की तह में जाने से कतरा रही है। कारण यह है मामला काफी हाइप्रोफाइल नजर आ रहा है।

श्रुति बताती है कि 8 सितम्बर को जब वह स्कूल से आ रही थी तो उसी समय तीन की संख्या में लोगों ने उसके मुंह पर रूमाल रखकर उसे दबोच लिया। इसके बाद वह बेहोश हो गयी। जब वह होश में आयी तो देखा कि वह एक कमरे में है। उसके शरीर पर बुर्के जैसा वस्त्र है। उसके नाखून काट दिये गये है तथा गले की माला और हाथ का रक्षासूत्र भी काट लिया गया था। कुल मिलाकर उसकी पहचान समाप्त करने की कोशिश की गयी थी। उसके बाद 9 सितम्बर की दोपहर में फिर उसे बेहोश कर दिया गया। इसके बाद वह दूसरे स्थान पर थी। उसके पास खान नामक एक आदमी था जो मोबाइल पर बात कर रहा था कि लड़की को कहा पहुंचायें सर किस रास्ते व कैसे ले जाय इसके बाद पुन:उसे बेहोश कर दिया गया। जब उसे होश आया तो उसने अपने आपकों दूसरे कमरे में पाया जहां 10-12 की संख्या में और भी लड़कियां थी। होश आने के बाद उसे दुसरे कमरे में बन्द कर दिया गया जिसमें एक और महिला थी जिसे खान की बीबी कहा जा रहा था। 10 सितम्बर की सुबह फिर खान ने बात की। सर लड़की को क्या करें बात समाप्त होने के बाद खान की बीबी ने कहा कि मुंह धुल लों। इसके बाद उसने उसे जबरिया नकब पहनाना शुरू कर दिया। इसी बीच हंगामा हुआ और किसी ने दरवाजा खटखटाया फिर शोर हुआ तो मैने खान की बीबी का प्रतिरोध करके दरवाजा खोल दिया। इसके बाद मेरे परिजन मुझे वहां से निकालकर ले गये। इस बात की जानकारी होने के बाद पुलिस ने दुबारा वहां पर छापेमारी करने में 4घण्टे लगा दिये। तब तक वहां कोई नहीं था। प्यार की आड़ में चल रहे इस धंधे को ही लब जिहाद का नाम दिया गया है जिसमें सम्प्रदाय विशेष के युवक येन-केन-प्रकारेण हिन्दु युवतियों को अपने माया जाल में फंसाते है। और अपने बॉस को सौप देते है। बॉस उन युवतियों का क्या करता है यह तो मुख्य सरगना की गिरफ्तारी के बाद ही पता चलेगा। अभी तक पुलिस न तो मुख्य सरगना को गिरफ्तार कर सकी है और न ही इस प्रयास में ही दिखाई दे रहीं है ताकि लब जिहाद के मुख्य सरगना को दबोचा जा सके।

-डॉ। ईश्वरचंद्र त्रिपाठी (साभार :प्रवक्ता डौट कॉम )

लेखक ने अप्रत्यक्ष तौर पर किस ओर इशारा किया है यह कहने की जरुरत नहीं है । क्या एक संप्रदाय विशेष सचमुच ऐसा कर रहा है ? क्या कोई ऐसा कर रहा है तो इसके पीछे कौन सी सामाजिक परिस्थिति है ? क्या ऐसा नहीं कि दो बड़े समुदायों के मध्य फैली तरह-तरह की भ्रांतियां इसे बढावा दे रही है ? अक्सर मुसलमान युवकों के बीच इस बात की चर्चा होती है कि हिंदू लड़की के साथ सेक्स करने पर जन्नत हासिल होगी और हिंदू युवक कहते हैं एक मुस्लिम लड़की के साथ सेक्स करने पर सौ यज्ञों का पुन्य मिलेगा । क्या इन दुष्प्रचारों से तो ऐसा नहीं हो रहा ? समाज को अपनी सोच बदलनी होगी नही तो ये लव के नाम पर हो रहा जिहाद हमें ले डूबेगा ।



>बाजारवाद और बिकनी के चंगुल में गीतकार और संगीतकार

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गीत-संगीत अर्थात सुरो का सागर, जो मन की गहराईयों में पहुचकर शरीर के अंदर छीपे सुक्ष्म कोशिकाओं को तरंगीत कर उसे उर्जान्वित करने का काम करती है। संगीत भारत के लिए कोई नई अवधरणा नहीं है बल्कि यह हजारों सालों से धरती पर किसी न किसी रूप, रंग और भाषा के माध्यम से युगों-युगों से चलती आ रही है। देखा जाए तो धरती के निर्माण से पहले ही संगीत का निर्माण हो चुका था। क्योंकि हमारी प्राचीन मान्यताओं और ग्रन्थों के आधर पर ब्रह्‌माण्ड में पृथ्वी लोक के अलावा देव लोक भी है, जहां देवाधिष इन्द्र अक्सर नृत्यांगनाओं के नृत्य का आनन्द उठाते रहे है और सार्थक नृत्य बिना संगीत के हो ऐसा शायद ही संभव है। इसके अलावा विद्या की देवी सरस्वती जो स्वयं सुरो की जननी है। जिनके वीणा में न जाने कितने असंख्य सुरो का समागम होगा इसकी परिकल्पना करना मूर्खता ही कहलाएगी। जहां तक बात रही dharti की तो भिन्न-भिन्न देशों में संगीत के विभिन्न स्वरूप है जो भिन्न-भिन्न माध्यमों से विभिन्न भाषाओं के आधर पर लयबद्ध रूप में सजायें और संजोयें जाते रहे है। वहीं अगर हम भारत के संगीतमय इतिहास की बात करे तो तानसेन, मीरा, कबीर, सूरदास आदि ऐसे कई संगीतज्ञ थे जिन्होंने अपनी आंतरिक शक्ति, शोध् और भक्ति के माध्यम से विभिन्न रूपों में संगीत का परिमार्जन किया। लेकिन उस वक्त उन गीतों के स्वरूप को सहेजना संभव नहीं रहा। यही वजह है कि हम उनके लिखे गीतों को दोहा और चौपाई के माध्यम से पढ़ते और जहां जितना संभव हो सका कबीर और सूरदास जैसे गीतकारों के लिखे गीतों को क्लासिकल व आध्ुनिक संगीत देकर उन्हें जीवित रखा गया। लेकिन जैसे ही देश में सूचना-प्रसारण तकनीकि में थोड़ी बहुत वैज्ञानिक और बौधिक् क्षमता का विकास हुआ हमने गीतकारों और संगीतकारों के माध्यम से गीतों और संगीतों को सहेजना और विभिन्न माध्यम जैसे दृश्य-श्रव्य और श्रव्य माध्यमों से प्रसारित करना प्रारम्भ कर दिया। जिससे संगीत के प्रति भारतीय जनमानस में भी इसके प्रति विशेष रूची देखने को मिली। प्राचीनतम काल में जहां तानसेन की संगीत से निकले तरंगों को सुनकर न केवल इंसान झूम जाते बल्कि दीप खुद व खुद प्रज्जवलित हो उठते। मीरा की गीतों को सुन भगवान श्री कृष्ण दौड़े चले आते थे। सूरदास और कबीर ने तो अपने गीतों से भगवान को ही मंत्रामुग्ध् कर रखा था। वैसे ही दशकों पुराने कुछ संगीतकारों और गीतकारों की ध्ुनो और गीतों को सुन लोग इस कदर मंत्रमुग्ध् होते थे कि उनकी तमाम परेशानियां कुछ पलों में ही खत्म हो जाती थी। यहा तक की कई लाईलाज मानसिक बिमारियां जड़ से खत्म हो जाती थी। हर आदमी राह चलते, सामाजिक बैठकों, समूह में उन गीतों को गुनगुनाना नहीं भूलता और एक दूसरे से गीतों को लेकर चर्चाए चलती रहती थी। और तो और जिस तरह गीत मीठे और सुरीले हुआ करते थे ठीक उसी प्रकार उनके फिल्मो में भी सामाजिक समरसता और विचारधरा का समावेश दिखाई देता था। चूकि भारत में फिल्मो और गीतों का चलन आजादी के पूर्व से ही चला आ रहा है। इसलिए आजादी के पूर्व से लेकर ६०-७० के दशक तक सामाजिक, नैतिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक घटनाओं को ध्यान में रखकर फिल्मो और गीतों को निर्माण किया जाता था। ताकि इस माध्यम से भी लोगों में स्वतंत्रता और जनचेतना का संदेश प्राप्त हुआ करता था। ७०-९० के दशक में स्वतंत्रता और जनचेतना का स्वरूप बदलकर फिल्मो और गीतों ने सामाजिक और वैचारिक रूप धरण कर लिया। वहीं ८० से ९० के दशक में सामाजिक के साथ-साथ फिल्मो और गीतों में प्रेम और प्रेम के माध्ुर्य स्वभाव का अनोखा संगम देखने को मिला। लेकिन सामाजिक गीतों के सुरो में कमी आने लगी थी। ९० से २००० तक संगीत के नयें यंत्रो की मदद से कई नवीन कलाकार उभरे लेकिन उस वक्त भी ७० से ९० तक के गीतों का वहीं महत्व रहा जो १९९०-२००० के गीतों और गीतकारों का था। लेकिन २००० के बाद जो गीत अब लोगों को सुनने को मिल रहा है वह लोगों की मन और आत्मा को शांति देने की बजाये मन और जन को काफी व्याकुल और अशांत करने लगा है। यहा तक की कई प्रकार की बिमारियों को दावत भी देने लगी है। वहीं आज के आध्ुनिक गीतों को लोग ज्यादा दिनों तक झेल भी नहीं पाते। महज १ से २ महीने में ही इन गीतों से उबने लगते है। फ़िर चाहे उन गीतों को संगीत देने व गाने वाला कितना ही बड़ा संगीतकार व गायक हो। आज के गीतों का स्तर इस कदर गीर चुका है कि चंद दिनों या महिनों में ही गीत बेजान/बेकार सी लगने लगती है। खासतौर से आज के आध्ुनिक युवा पीढ़ी गानों को लेकर इस कदर असमंजस में दिखाई पड़ती है कि वह रोज बनते नये-नये गानों से तृप्ती नहीं मिल पाती। वही एक बूढ़ा आदमी और पुरानी पीढ़ी के लोग आज भी पुराने गीतों को सुनकर न केवल सुकून पाते है बल्कि अपने पुराने दिनों को याद ताजा करने उनमें खो जाते है। सबसे बिडम्बना वाली बात है कि आज के नवीनतम गीतकार और संगीतकार के पसन्दीदा गीत ६० से ९० के दशक के गाने है। वे अक्सर अपने साक्षात्कार में पसंदीदा गीतकारों में पंचम दा, किशोर, मो. रफी, मुकेश, के.एल.सेहगल आदि लोगों का नाम लेते है। तो ऐसे में सवाल उठता है कि अगर आपको उनके मीठे और सुरीले गीत पसंदीदा है तो आज के युवा के उस तरह के गीत क्यों नहीं सुना पाते। बेतुके और अर्थहीन गाने का निर्माण क्यों करते है? ऐसे संगीत और गानें क्यों नहीं बना पाते जिसे वर्षों तक नहीं दशकों तक सुना जाये और उसमें बोरियत भी महसूस न हो। लेकिन शायद जैसा मुझे लगता है, आज के सभी गीतकार, गायक और संगीतकार बाजारवाद के ही शिकार है। क्योंकि अर्थपूर्ण गानों में ब्रा और पैन्टीज पर नाचना शायद ही किसी अभिनेत्री और कलाकारों को संभव हो। और आज की आधुनिक फिल्मे तब तक नहीं चलती जबतक की फिल्मो में छलकते जिस्म की नुमाईश न हो। आज बाजारवाद ने लोगों की मानसिकता को इस कदर घृणीत बना दिया है कि बिना सेक्स सीन और अध्नंगेपन का दृश्य दिखाए बिना फ़िल्म हिट नहीं कहलाता। जो धीरे-धीरे भारतीय संस्कृति और समाज के लिए कोढ़ बनता जा रहा है। इसलिए समय रहते गानों और फिल्मो को भारतीय समाज और सांस्कृति के अनुरूप बनाने के लिए पुराने और नवीन गानों में सामनजस्य बनाने की बेहद आवश्यकता है। यह जरूरी नहीं कि गीतों और फिल्मो को पुराने ढ़र्रे पर लाया जाए लेकिन बदलाव का अर्थ नहीं है कि हम अपनी सामाजिक मान-मर्यादाओं और संस्कृति का सत्यानास कर डाले। इसलिए ऐसे अनोखे उपाय ढुंढने की आवश्यकता है जिससे भारतीय गानों में सामाजिकता और सांस्कृति समरसता पुनः जागृत की जा सके। और पाश्चात्य संस्कृति से पूरी तरह प्रभावित आधुनिक युवा के भटकते और डगमगाते पैरों को संभाला जा सके।

>राखी का स्वयंवर ……रक्षाबंधन भी आ रहा है ……….

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टेलीविजन कार्यक्रमों के कबाड़खाने में पुराना पर पैंट कर चमकाया गया एक और कचड़ा डाल दिया गया है । “स्वयंवर “राखी सावंत का एक और नया नाटक अरे राखी तुम्हे इसकी जरुरत क्यों पड़ी ,तुमसे बड़े नाटक की कल्पना कौन कर सकता है । तुम्हारे नाटक के सामने तो सेक्सपियर का किंग लियर भी बौना पड़ता है । इन्होने तो किताबों में चरित्र को जीवंत किया और बाद में बड़े परदे पर ,तुम तो जीती जागती एक अधूरी नाटक हो , जिसमे रोमियो जूलियट शिरी , फरहाद,सोनी, महिवाल ,न जाने कितनी प्रेम कथा समाहित होती है। हमारे यहाँ एक कहावत है “करनी न करतूत पलरी भर …………..इन कहावतों का कोई यथार्थ मालूम न था पर कहते है न कि समय हर कुछ समझा और बता देता है ,इस कहावत की समझ मुझे अब आई । अगर जिस्म नुमाइश ही शोहरत है तो ये तुम्ही से संभव है , तुमने जिस हथियार के इस्तेमाल से अपनी यह जगह बनाई है उसे सारा जग जानता है , रही बात तुम्हारे काम और मुकाम की वो सिमट जाता है “बुड्ढा मर गया तक”। मिका कांड से शुरुआत हुयी ,और नाच बलिये तक चला ,पर क्या यह काफी था । आखिर इंडस्ट्री को पता भी चले कि राखी का नाटक अभी बंद नही हुआ है । वो समय समय पर अपना कोई न कोई आईटम पेश करती रहेंगी। खैर जो भी सारा जग जानता है कि तुम्हे बिना कपडों के कमर मटकाने के अलावा और भी कुछ आता है ?अगर मेरी मानों तो एक सलाह दूंगा तुम एक अदाकारा तो नही बन पाई पर बेहतरीन नाटककार बन सकती हो । ये नाटक जो तुमने अभी तक पसारा है उसे जरुरत है किताबों में उतारने की खैर छोरो इन चोचलों को सुना है आजकल डिग्रिया भी बिकती है तो खरीदो और फिर कोई किताब प्रकाशित करा लो तुम्हारे साथ साथ लोगों का भी भला हो जाएगा । जितना कूड़ा फैलाना है फैलाओ । जानता का झारू चलेगा और सारा कूड़ा साफ़ । आखिर कब तक लोग गंदगी में रहेंगे । वैसे लगे रहो जब लोग इंडिया टी.वी झेल रहे है तो तुम्हे भी झेल ही लेंगे।


>आपने सुना, पशु-पक्षी भी Homosexual होते हैं ………..

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समलैंगिकता के समर्थकों से बहस टेढी खीर है । महाभारत काल से लेकर वात्स्यायन के कामसूत्र तक का जिक्र झटके में हो जाए तो कोई भी साधारण आदमी घबरा कर इधर-उधर ताकता नजर आता है । अरे इनकी माने तो दुनिया के आरम्भ से ही समलैंगिकता का स्थान मानव जीवन में बना हुआ है और कई प्राचीन ग्रन्थ उसके साक्षी हैं । ये वही प्रगतिशील लोग हैं जो इन्ही ग्रंथों को काल्पनिक बताते हैं , रामायण और महाभारत काल जैसी घटनाएँ इनके लिए अतीत न होकर मिथक है ! आज अपनी मानसिक विकृतियों के बचाव में उन्ही के संदर्भों का सहारा लेना क्या इनका दोगलापन नही है ? अरे – अरे , गलती हो गई भाई ! मैं तो भूल ही गया था १९८० में अमेरिकी मनोचिकित्सकों के संघ ने इसे मतदान की प्रक्रिया के सहारे मानसिक विकृतियों की सूची से मुक्ति दे दी थी । आज तो इसे सामान्य व्यवहार कहा जाने लगा है । बड़े -बड़े अख़बारों में , नामचीन लेखकगण कलम की स्याही घस रहे हैं । आज ही जनसत्ता में किसी ने इसकी वकालत में डार्विन को भी उतार दिया । बकौल लेखक डार्विन ने कहा था कि यह व्यवहार मानव समेत सभी जानवरों में पाया जाता है । वाह क्या बात है ! पर कहने से काम नही चलेगा चाहे किसी ने भी कहा हो । आप लोगों में से किसी ने भी अपने जीवन में पशुओं को समलिंगिक यौनाचार करते देखा है क्या? कुछ भी हो एक कुत्ता भी अपने लिए कुतिया ही खोजता है !
यह बहस व्यक्तिगत न होकर सार्वजनिक है और जब समाज की बात आती है तो व्यक्ति का गौण हो जाना ही उचित है । नैतिकता -अनैतिकता तथा प्राकृतिक-अप्राकृतिक होने से ज्यादा सामाजिक -गैरसमाजिक होने से फर्क पड़ता है । लोक-व्यवहार में उन बातों को ग़लत माना जाता है जिसकी प्रवृति कम लोगों में हो । “गे- कल्चर “ को अब तक भारत में सामाजिक मान्यता नहीं मिली है बावजूद इसके व्यक्तिगत स्वतंत्रता की छतरी लगाये अनैतिकता से बचने की कोशिश जारी है। समलैंगिक सेक्स पहले भी होता रहा है। किशोरावस्था में सेक्सुअल शारीरिक बदलावों से उत्पन्न उत्सुकता की वज़ह से एक्के -दुक्के लोग ऐसा करते थे । आज की तरह तब कोई लेस्बियन /गे समाज नही था। समाज की नजर में ये तब बुरी बात थी बहुत हद तक आज भी है। पर कहीं न कहीं आज ये सब फैशन बनता जा रहा है। समलैंगिक होना अप्राकृतिक है यह सब जानते -बुझते हैं। भला एक पुरूष -पुरूष के साथ ,एक स्त्री-स्त्री के साथ पूरा जीवन कैसे गुजार सकती है ? उनके मध्य वो भावनात्मक जुडाव कैसे आ सकता है जो दो विपरीत लिंगों के प्रति एक स्त्री-पुरूष के मध्य होता है। इस बात को विज्ञान भी मानता है। आज कदम -कदम पर आधुनिकता के नाम पर सामाजिक दायरे, सदियों से चली आ रही परम्पराए तोड़ी जा रही हैं। मुझे पता है आप कहेंगे कि परम्पराएँ टूटनी ही चाहिए। ठीक हैं मैं भी कहता हूँ, हाँ पर वो परम्पराएँ ग़लत होनी चाहिए। ध्यान रहे कभी प्रथाएं नहीं टूटी बल्कि कुप्रथाएं तोड़ी गई । इसे बदलाव नहीं आन्दोलन कहा गया। वर्तमान समय में युवा वर्ग मानसिक तौर पर उत्तर आधुनिक है या बनना चाहता है। आज का प्रगतिशील युवा अक्सर परम्पराओं को रूढ़ी कहना ज्यादा पसंद करता है। और इसको तोड़ कर ख़ुद को विकास की दिशा में अग्रसर समझता है। यहाँ हमें परम्पराओं तथा रुढियों में अन्तर करना सीखना होगा। समय रहते चेतिए । आधुनिकीकरण और विकसित बनने के चक्कर में कहीं आने वाली नस्लें केवल भोगवादी न हो जाए । इसी भोग ने सदियों से पूर्व और पाश्चात्य का भेद बना कर रखा है। दौर चाहे भूमंडलीकरण का हो या बाजारीकरण का हमें इस बात को समझना चाहिए कि भारत के चारो ओर भौगोलिक ही नहीं वरण सांस्कृतिक और संवेदनात्मक घेरा भी है ।

>संस्कृति खतरे में है……कोई तो बचाने आओ

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आज हमारी इस ब्लाग पर यह पहली पोस्ट है। चूँकि सच बोलना मना है (शायद इस कारण कि कड़वा होता है या फिर इस कारण कि इसे सुनना कोई पसंद नहीं करता) चलिए कुछ लिखने के पहले शपथ कि जो कहेंगे सच कहेंगे (पता नहीं कितना) सच के सिवाय भी बहुत कुछ कहेंगे।
सवाल यह कि क्या सच है और क्या नहीं? आज देश में उबाल आ गया है (जैसा बासी कढ़ी में आता है) अदालत के धारा 377 के ऊपर अपना निर्णय देने के बाद से। संस्कृति क्षरण का मामला दिख रहा है; देश की सभ्यता संकट में आती दिख रही है।
इस अदालती फैसले का बुरा तो हमें भी लगा क्यों लगा यह समझ नहीं आया? समलैंगिकों को देश की मुख्यधारा में जोड़ने का कोई एक यही तरीका नहीं था कि इसे कानूनी मदद दे दी जाये। ये तो वैसा ही हो गया जैसे कि डकैतों, चोरों, बलात्कारियों को देश की मुख्यधारा में लाने के लिए कानूनी सेरक्षण दे दिया जाये।
सहमति से बालिग स्त्री-स्त्री का और पुरुष-पुरुष का सम्बन्ध बनता है तो वह कानूनी अपराध नहीं है। बिना हत्या किये यदि डकैती डाल दी जाती है तो वह डकैती नहीं। बलात्कार किया जाये और महिला को शारीरिक चोट न पहुँचे या फिर वह गर्भवती न हो तो बलात्कार अपराध नहीं। समझ गये आप क्या कहना चाह रहे हैं हम?
जहाँ तक संस्कृति की बात है तो देश की संस्कृति को लोगों ने इतना सहज बना दिया है कि हर कोई उसकी व्याख्या करने लगता है। समलैंगिकता के समर्थकों ने तो कह दिया कि वेद-पुराण में भी ऐसे सम्बन्धों के बारे में चर्चा है। यहाँ गौर किया जाये कि समलैंगिकता का समर्थन करने वाली तादाद युवा वर्ग की है, लगभग शत-प्रतिशत। हास्यास्पद तो यह है कि जिस पीढ़ी को अपने माँ-बाप का, अपने परिवार की संस्कृति का पता नहीं वह हमारे वेद-पुराणों को पढ़ का उसका व्याख्यान दे रही है। जिस पीढ़ी को सहज सेक्स के बारे में ज्ञात नहीं वह वेद-पुराणों में सेक्स सम्बन्धों का चित्र प्रस्तुत कर रही है।
समलैंगिकता के सम्बन्धों का वेद-पुराणों में हवाला देने वाले बतायें कि कौन से वेद में इस तरह का वर्णन है? खजुराहो और कामसूत्र का जो लोग उदाहरण प्रस्तुत करते हैं वे यह बात अच्छी तरह जान लें कि इन साहित्यों की रचना इसी तरह के भ्रष्ट कामियों को राह दिखाने के लिए की गई थी।
अब कुछ संस्कृति के कथित रक्षकों के लिए भी। वह यह कि जो लोग भगवान राम को काल्पनिक मानते हैं वे शंबूक वध का सहारा लेकर समूची हिन्दू जाति, भगवान राम और सवर्ण जाति को गाली देते घूमते हैं। कृपया बताया जाये कि यदि उनकी दृष्टि में भगवान राम काल्पनिक हैं तो शंबूक वध कहाँ से वास्तविक है?
इसी तरह माता सीता का नाम लेकर समूचे पुरुष समाज को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। स्त्री के ऊपर अत्याचार का वर्णन किया जाता है। कितनी-कितनी बार अग्निपरीक्षा देने की दुहाई दी जाती है। ऐसा करने वालीं स्त्रियाँ, महिला सशक्तिकरण की समर्थक महिलायें उसी परिवार की एक महिला उर्मिला के त्याग को भूल जातीं हैं। सीता जी का नाम लेकर स्वयं को पुरुष वर्ग से टकराने तक की ताकत दिखाने वालीं महिलायें क्या उसी उर्मिला का नाम लेकर अपनी सास या ससुर की सेवा कर सकतीं हैं? बिना पति के घर-परिवार को चला सकतीं हैं? आज आलम यह है कि घर में आते ही एकल परिवार की अवधारणा को पुष्ट करने लगतीं हैं।
संस्कृति के नाम पर क्या हो रहा है, क्या होना चाहिए यह किसी को सही से ज्ञात नहीं। समलैंगिकता के नाम पर हो रहे हो-हल्ले से कुछ और हो या न हो उन लोगों के हौंसले अवश्य बढ़ेंगे जो प्राकृतिक सेक्स में असफल इसी तरह के अप्राकृतिक यौन सम्बन्धों की आस में लगे रहते हैं।

>केवल धारा 377 हीं नज़र आता है आपको

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समलैंगिकता को अपराधमुक्त किए जाने को लेकर वाद-विवाद का दौर शुरू हो चुका है । अख़बारों , समाचार चैनलों , इन्टरनेट जैसे संचार के जनमाध्यमों (जो अब व्यापार मध्यम हो चुके हैं ) से लेकर अंतर्व्यक्ति स्तर पर भी हर ओर गे -गे -गे का शोर बढ़ता जा रहा है । कई नामचीन हस्तियां इस फैसले के समर्थन में है तो कई विरोध में । समर्थको का कहना है -“ये एक ऐतिहासिक फ़ैसला है । अंग्रेजी शासन में लॉर्ड मैकाले द्वारा सन १८६० बनाये गए इस कानून को रद्द कर हमें एक और गुलामी से मुक्ति मिली । स्वतंत्र भारत में नागरिक स्वतंत्रता का सबसे बड़ा फ़ैसला है । ” अभी फिलहाल समलैंगिकता के इस मुद्दे पर बहस का इरादा तो नही है । हाँ समयाभाव में भी एक महत्पूर्ण सवाल उठाना चाहूँगा और जिसका जबाव आप सभी को सोचना चाहिए । भारतवर्ष की शिक्षा पद्धति आज भी मैकाले के सिद्धांतों के अनुरूप चलाई जा रही है । हमारा पाठ्यक्रम पुरी तरह से अंग्रेजो की भारत-तोड़क शिक्षा पद्धति पर आधारित है जो हमें अपनी जड़ों से दूर करता जा रहा है । शिक्षा जिससे किसी भी व्यक्ति का , व्यक्ति से समाज का और समाज से देश का निर्माण होता है । वो शिक्षा आज भी मैकाले की जी हुजूरी कर रहा है पर आप में से किसी ने इस बात पर कभी नही सोचा ! अंग्रेजों के बनाये कानून “इंडियन पैनल कोड ” को बदलने की कोई जरुरत नही समझी ! केवल धारा ३७७ ही नजर आता है आपको ! अरे , इस फैसले में भारतीयता को ढूंढ़ पाना नामुमकिन है । गुलामी से दूर होने के बजाय हमें मानसिक गुलामी की एक और कानूनी जंजीर से बाँध दिया गया है ।

>भारत में ही भारतीयो पर हो रहे नस्ली हमलो का जिम्मेवार कौन?

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चंद वर्षो पहले इंग्लैंड के छोटे परदे पर दिखाए गए रियलिटी शो बिग ब्रदर में भारतीय अभनेत्री शिल्पा शेट्टी के साथ हुए नस्लभेदी बर्ताव ने जहँ देश के आत्म सम्मान को ठेस पहुचाया। वही सभ्य समाज का चोल ओढे इंग्लैंड वासियो का असली चेहरा पुरे विश्व के सामने दिखाई दिया। इसके बाद जो दिखा पुरी दुनिया ने देखा की किस प्रकार भारत की अश्वेत कलाकार शिल्पा शेट्टी ने अपने जीत का परचम लहराया। हालाँकि इस मामले ने भी काफी तुल पकड़ा । दोनों देशों के रिश्तों में भी काफी खटास आने लगी थी। परन्तु समय के साथ और नस्लभेद का व्यवहार करने वाली महिला अभिनेत्री जेड़ गूडी ने शिल्पा शेट्टी से माफ़ी मांगकर इसे दबा दिया।
आज कुछ इसी प्रकार का नस्लभेद ऑस्ट्रेलियाइ जनता द्वारा एशियाई मूल खासतौर से भारतीयो के खिलाफ हुए हमले से जग जाहीर हो रहा है। वहाँ पर रहने वाले छात्रों और काम करने वाले लोगो के साथ नस्लीय टिप्न्निया आम हो चुकी है। हालत इतने गंभीर हो चुके है कि स्थानीय लोगो द्वारा भारतीय छात्रों पर जानलेवा हमले किए जा रहे है। सिडनी में पिछले एक महीने में छात्रों के साथ मारपीट के कम से कम २० से ज्यादा घटनाएं सामने आई है। वही महिलाओ एवं छात्राओं के साथ यौन दुराचार बढ़ने लगा है। आलम यह है कि कई छात्र सिडनी से पलायन करने लगे है। कईयों ने तो डर से ऑस्ट्रेलिया छोड़कर भारत लौट आए है। इन्ही वजहों से आहत बीग बी ने ऑस्ट्रेलिया द्वारा दिए जा रहे डॉक्टरेट कि उपाधि लेने से इंकार कर दिया। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इसके लिए केवल ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसे देश जिम्मेदार है। या कही न कही, किसी न किसी रूप से हम भी इसके लिए जिम्मेवार दिखाई देते है। यह सोचने का विषय है। और यह मान लेना कि भारत इस मामले में पाक साफ़ है तो यह भी संसय ही होगा। क्योंकि ऐसा भारतियो के साथ ही क्यो होता है अफ्रीकन या अन्य एशियाई मूल के लोगो के साथ क्यों नही। इसपर शायद ही कोई विचार करता होगा। आख़िर हम्मे ऐसा क्या है और हमने ऐसा क्या किया है। जिसकी वजह से इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे सभ्य सामाजिक देशवासी इस तरह का घृणित कार्य करने लगे है। लेकिन इसे जानने के लिए सबसे पहले हमें अपनी संरचना और अपने अन्दर ही झाँकने कि जरुरत है।
उदाहरण के लिए भारत में ही क्षेत्रवाद कि समस्या भी किसी नस्लभेद से कम नही है। जिस प्रकार क्षेत्रवाद में एक खास क्षेत्र के लोगो को निशाना बनाया जाता है। उसी प्रकार नस्लभेद में भी एक खास देश मतलब भारत के साथ ही दुर्व्यवहार किया जाता है। इसका कारन जहाँ तक मुझे लगता है, वह है सबसे बड़ी बीमारी बेरोजगारी। जिसका एक मात्र कारन है अनियंत्रित जनसँख्या वृद्धि। जैसे उत्तर भारतियो खासतौर से बिहार और उत्तरप्रदेश के लोगो के आर्थिक पिछडेपन के कारन अन्य शहरों में पलायन होने के कारन दिखाई देता है। और जिन-जिन शहरों में उनकी तादाद बढ़ने के कारन वहां मौजूद लोगो में बेरोजगारी और अन्य प्रकार कि समस्याओं में इजाफा होने लगता है, ऐसे में उस क्षेत्र के लोगो द्वारा अपनी आजीविका कि सुरक्षा के लिए उनका विरोध करना आम दिखाई देने लगता है। जैसे किसी जंगल में अन्य जंगल से कोई भूखा शेर आ जाए तो उसे उस जंगल के शेरो का कोप भजन होना पड़ता है। क्योंकि यह उस क्षेत्र के शेरो का आजीविका खतरे में दिखाई पड़ने लगता है। कुछ इसी प्रकार का हमला महाराष्ट्र, आसाम एवं अन्य कुछ छोटे शहरों में दिखाई दिया था। जहाँ लोगो ने अपनी आजीविका बचाने के लिए उत्तर्भार्तियो पर हमला किया। जबकि हम क्षेत्रवासी से पहले देशवासी है। और क्षेत्र धर्म से बड़ा देश धर्म होता है। महाराष्ट्र और आसाम जैसे राज्यों में इसका उग्र रूप दिखाई दिया, जबकि अन्य प्रान्तों में यह घटना छिटपुट ही रहा।
कुछ राजनेताओं ने इस मुद्दे को भुनाकर अपना वोट बैंक कैश किया और राजसत्ता का केवल सुख भोगा लेकिन इसके हल के लिए किसी ने विचार नही किया। आज हमारे देश कि जनसँख्या १ अरब ३० करोड़ से भी अधिक है। और इसके बढ़ने कि क्रमवार श्रृंखला बरक़रार है। अगर हम भारत और ऑस्ट्रेलिया में क्षेत्रफल कि तुलना करे तो हम उनके मुकाबले कई गुना छोटे होंगे। वही आबादी कि तुलना में हम उनसे सैकडों गुना आगे है। यहाँ तक कि हर वर्ष हम ऑस्ट्रेलिया कि जनसँख्या से भी अधिक कि आबादी उत्पन्न कर देते है। यही वजह है कि हम चाह कर भी १०० फीसदी शिक्षित नही हो पाते है। भारत कि बढती गुणात्मक जनसँख्या ने न केवल क्षेत्रवाद और नस्लवाद जैसे तत्वों को बढाया है बल्कि अन्य कई समस्याएँ भी अपना जाल फैलाने लगी है। जातिवाद, सम्प्रदायवाद, भासवाद, भ्रस्ताचार, दुर्घटनाए, क्राइम, अमीर-गरीब कि खाई, अशिक्षा, प्रदुषण, जलवायु परिवर्तन, जंगल और जंगली जन्तुओ पक्षिओं पर भी इसका खासा असर देखने को मील रहा है। घुश देने कि प्रवृति , आजीविका के लिए अपराधीकरण जैसी अन्य कई समस्याए भी हालिया दस बीस वर्षों में बढती ही जा रही है।
हमारे देश के नेता विकाश के बड़े-बड़े दावे करते है। लेकिन सच्चाई यह है कि विकाश केवल कुछ शहरों का ही हुआ है, वह भी जनसँख्या के अनुपात में बेहद कम। आज छात्र और कामकाजी लोग देश से पलायन कर रहे है तो केवल काम कि तलाश में/अच्छी जिंदगी पाने के लिए लेकिन उन्हें मिलता क्या है, नस्लभेद, क्षेत्रवाद। अगर वाकई देश का विकास सरकार चाहती है तो उसे इसके लिए विकास के साथ साथ जनसँख्या नियंत्रण पर भी खासा जोर देकर सोचना होगा। भले ही हमारा देश लोकतान्त्रिक हो लेकिन आज जरुरत है देश में चीन कि तरह अलोकतांत्रिक विधि से कड़े कानून लाकर ”हम दो हमारे दो” पर सख्त रवैया अपनाने की। और ऐसे राजनेताओं को विशेष रूप से हितायत देने और उन्हें शक्तिहीन करने कि जरुरत है जो विकास कम मुस्लिम तुस्टीकरण और जातिवाद के आधार पर राजनितिक गोतिया सकने और सत्ता पर काबिज होकर मलाई खाने कि आदत डाले हुए है।
आज देश को सख्त सिपहसलार कि जरुरत है। पर शायद जनता ऐसा नही चाहती, उसे तो मुंगेरी लाल के सपने देखने कि आदत सी हो गई है। दिल्ली-एनसीआर कि विकास को देखकर ही उनकी आँखे चौंधियाने लगी है। लेकिन देशवासियो और इस सरकार को आने वाले खतरे का तनिक भी अंदाजा नही है जो आने वाले ५० वर्षों में दिखाई देगा। जब लोग एक दुसरे को मरकर अपना जीवन सुरक्षित मानेंगे। इसलिए अब भी वक्त है जनता जगे और आने वाले समय के बारे में ज्यादा से ज्यादा सोचे कि सिमित क्षेत्र में असीमित जनसँख्या का दबाव क्या भारत जैसा छोटा देश सह पाएगा। या इसके दबाव में आकर एक ऐसा भूचाल पैदा करेगा कि दुनिया कल के मुख में समां जाएगी। तब सब लोगो को समझ आएगा कि सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग के बाद कलयुग का भी अंत होना सुनिश्चित है।

>कल का "सम्भोग" आज "सेक्स" है

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समय चक्र परिवर्तित हुआ है , जिस वज़ह से अनेक पुरानी परम्पराएँ टूटती नज़र आ रही है। कल का सम्भोग आज सेक्स का रूप ले चुका है। सेक्स केवल बंद कमरों के भीतर बिछावन तक सीमित न हो कर शिक्षा मंदिरों(डीपी एस दिल्ली की घटना याद होगी ) से होते हुए कार्य स्थली (कॉल सेंटरों की कहानी भी आप तक पहुँच गई होगी) तक विस्तार ले चुका है। पाश्चात्य का अनुकरण किसी और क्षेत्र में तो नहीं परन्तु सेक्स और भ्रष्टाचार के मामले में जम कर हुआ है। कुछ लोग इसे मेट्रो शहरों में सीमित बताते हैं जबकि ये मसला भी महानगरीय उच्च -मध्य वर्गो (अर्थात विकासशील इंडिया )से निकल कर देहातों में मध्य- निम्न वर्गो (गरीब भारत जिसे अमेरिकाऔर यूरोप वाले रियल इंडिया कहते हैं)तक फ़ैल चुका है । ऐसा भी नहीं है कि यह सब अचानक हो गया । किसी भी सामाजिक परिवर्तन / बदलाव के पीछे कई छोटी -बड़ी ,साधारण से साधारण घटनाएँ सालों से भूमिका बना रहे होते हैं । यहाँ में जिस बदलाव की बात कर रहा हूँ वो यूँ ही नहीं हुआ उसके पीछे सूचनातंत्र की महती भूमिका रही है । हालाँकि सूचना क्रांति ने हमें काफी सुख-सुविधाएं मुहैया करायी लेकिन भारतीय समाज को उससे बहुत बड़ा घाटा हुआ है। विज्ञान का ये वरदान हमारी संस्कृति के लिए अभिशाप ही साबित हुआ । चलिए अतीत में बहुत दूर न जाकर स्वतंत्र भारत को लेकर आगे बढ़ते हैं। हम बात कर रहें हैं सेक्स के सामाजिक सन्दर्भों की । अवैध संबंधो को अब तक भारत में सामाजिक मान्यता नहीं मिली है बावजूद इसके व्यक्तिगत स्वतंत्रता की छतरी लगाये अनैतिकता से बचने की कोशिश जारी है। आज कदम -कदम पर आधुनिकता के नाम पर सामाजिक दायरे ,सदियों से चली आ रही परम्पराए तोड़ी जा रही हैं। मुझे पता है आप कहेंगे कि परम्पराएँ टूटनी ही चाहिए । ठीक हैं मैं भी कहता हूँ, हाँ पर वो परम्पराएँ ग़लत होनी चाहिए । ध्यान रहे कभी प्रथाएं नहीं टूटी बल्कि कुप्रथाएं तोड़ी गई हैंऔर इसे बदलाव नहीं क्रांति /आन्दोलन कहा गया। उदाहरण के लिए समय-समय पर हुए समाज और धर्म सुधार आंदोलनों को समझनेका प्रयास करें तो बात स्पष्ट हो जायेगी । वर्तमान समय में युवा वर्ग मानसिक तौर पर उत्तर आधुनिक है या बनना चाहता है। आज का प्रगतिशील युवा अक्सर परम्पराओं को रूढ़ी कहना ज्यादा पसंद करता है । और इसको तोड़ कर ख़ुद को विकास की दिशा में अग्रसर समझता है। यहाँ हमें परम्पराओं तथा रुढियों में अन्तर करना सीखना होगा।
परिवार ,समाज, विद्यालय ,कार्यस्थल अर्थात स्थान (देश) , विभिन्न् परिस्थितिवश और काल (समय) के आधार पर ही सेक्स का स्वरुप और इसकी नैतिकता /अनैतिकता को परिभाषित किया जा सकता है। ये तो चिरंतन सत्य है कि कोई भी चीज देश ,काल, परिस्थितिओं पर टिका होता है। जिस बात को आज मान्यता देने अथवा दिलाने की मांग चल रही है या यूँ कहें कि कुछ हद तक मजबूरीवश स्वीकार भी किया जा रहा है, वह नई तो नहीं है पर स्वरुप बदल गया है। समलैंगिक सेक्स पहले भी होता रहा है। किशोरावस्था में सेक्सुअल शारीरिक बदलावों से उत्पन्न उत्सुकता की वज़ह से एक्के -दुक्के लोग ऐसा करते थे । आज की तरह तब कोई लेस्बियन /गे समाज नही था । समाज की नजर में ये तब बुरी बात थी बहुत हद तक आज भी है । पर कहीं न कहीं आज ये सब फैशन बनता जा रहा है । समलैंगिक होना अप्राकृतिक है यह सब जानते -बुझते हैं। भला एक पुरूष -पुरूष के साथ ,एक स्त्री-स्त्री के साथ पुरा जीवन कैसे गुजर सकती है ? उनके मध्य वो भावनात्मक जुडाव कैसे आ सकता है जो दो विपरीत लिंगों के प्रति एक स्त्री-पुरूष के मध्य होता है। इस बात को विज्ञान भी मानता है । प्रकृति ने नर-नारी की रचना ही इस प्रकार की है दोनों का सम्बन्ध अन्योन्याश्रित है।
पश्छिम में ऐसा -वैसा कुछ भी होना आम बात है क्योंकि हमारा जीवन दर्शन और उनका जीवन दर्शन बिल्कुल ही विपरीत है ,जैसे उत्तरी व दक्षिणी ध्रुव । वहां सेक्स एक जरुरत है । इंसान भावशून्यता में जीता है । ज्यादा सेज्यादा भौतिक सुखों की प्राप्ति ही जीवन का लक्ष्य है । ऐसे में पाश्चात्य के जीवनशैली के बीजको भारत भूमि (विपरीत काल -देश और परिस्थिति)में उगाकर फसल काटने की बात सोचना कहाँ की बुद्धिमानी है। आज समलैंगिकता के समर्थक लोगों से वंश वृद्धि की भी बात नही कही जा सकती , ये टेस्ट ट्यूब बेबी का जमाना है भाई । वंश बढ़ने का उपाय तो कर लिया प्रगतिशील मानवों ने लेकिन निकट का फायदा देखने से पूर्व दूर का नुक्सान नही सोच पाया । *क्या माँ-बाप एक टेस्ट ट्यूब बेबी से उतना प्यार कर पाएंगे जो प्राकृतिक रूप से उत्पन्न बच्चे से स्वतः हो जाता है ? *क्या वो बच्चा अपने माँ-बाप, परिवार , पड़ोस आदि के प्रति वफादार होगा ? नहीं बिल्कुल नहीं। यहाँ भी प्रकृति पर विजय पाने का परिणाम बुरा ही होगा। उस दिन की कल्पना कीजिये जब हर घर में टेस्ट ट्यूब बेबी होगा । तब परिवार -समाज चीजें इतिहास की किताबों में दफ़न हो जाएँगी । इस दिशा में मानव के कदम डगमगाते -डगमगाते ही सही पर बढ़ जरुर रहे है।

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