>बचपन की शरारतों की याद दिलाता एक अफ़लातून गीत… Kitab, Gulzar, Masterji

>हिन्दी फ़िल्मों में बाल मानसिकता और बच्चों की समस्याओं से सम्बन्धित फ़िल्में कम ही बनी हैं। बूट पॉलिश से लेकर मासूम और मिस्टर इंडिया से होते हुए फ़िलहाल बच्चों की फ़िल्म के नाम पर कूड़ा ही परोसा जा रहा है जो बच्चों के मन की बात समझने की बजाय उन्हें “समय से पहले बड़ा करने” में समय व्यर्थ कर रहे हैं। बाल मन को समझने, उनके मुख से निकलने वाले शब्दों को पकड़ने और नये अर्थ गढ़ने में सबसे माहिर हैं सदाबहार गीतकार गुलज़ार साहब। “लकड़ी की काठी, काठी पे घोड़ा, घोड़े की दुम पे जो मारा हथौड़ा” तो अपने आप में एक “लीजेण्ड” गाना है ही, इसी के साथ “जंगल-जंगल बात चली है पता चला है, चड्डी पहन के फ़ूल खिला है…” जैसे गीत भी गुलज़ार की पकड़ को दर्शाते हैं। हालांकि हिन्दी फ़िल्मों में विशुद्ध बालगीत कम ही लिखे गये हैं, फ़िर भी मेरी पसन्द का एक गीत यहाँ पेश कर रहा हूँ… आगे पढ़ने के लिये क्लिक करें… गीतों की महफ़िल पर…(http://mahaphil.blogspot.com/)

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>मिट्टी की सौंधी खुशबू वाले मेरे पसन्दीदा गीत (भाग-2)

>दिन भर की थकान उतारने के लिये, दुनियादारी के झंझटों से मुक्त होकर, गाँव की चौपाल पर रात के वक्त, मुक्त कण्ठ से जो गीत गाये जाते हैं उनमें से यह एक है। जी करता है कि बस चार-छः “सहज-सीधे” दोस्तों की महफ़िल सजी हुई हो, कहीं से एक ढोलकी मिल जाये और यह गीत कम से कम 20 बार गाया जाये तब जाकर कहीं आत्मा तृप्त हो… ऐसा अदभुत गीत है यह… गीत के बारे में विस्तार से पढ़िये, सुनिये और देखिये सागर भाई की महफ़िल में… यहाँ चटका लगायें…

>मिट्टी की सौंधी खुशबू वाले मेरे पसन्दीदा कुछ गीत… (भाग-1)

>Film Mother India, Mehboob, Nargis and Sunil Dutt

हिन्दी फ़िल्मों ने हमें हजारों मधुर गीत दिये हैं जिन्हें सुन-सुनकर हम बड़े हुए, इन्होंने हमारी भावनाओं पर राज किया है। हर मौके, माहौल और त्यौहार के लिये हमारी फ़िल्मों में गीत उपलब्ध हैं। इधर पिछले कुछ वर्षों में देखने में आया है कि हमारी फ़िल्मों से “गाँव” नाम की अवधारणा गायब होती जा रही है। गाँव की “थीम” या “स्टोरी” पर आधारित फ़िल्में मल्टीप्लेक्स के कारण कम होते-होते लगभग लुप्त ही हो गई है। फ़िल्म निर्माता और निर्देशक भी फ़िल्म की लागत तत्काल वसूलने और भरपूर मुनाफ़ा कमाने के चक्कर में फ़िल्मों में गाँवों को पूरी तरह से नकारते जा रहे हैं। फ़िल्मों में गाँवों को दर्शाया भी जाता है तो बेहद “डिजाइनर” तरीके से और कई बार भौण्डे तरीके से भी। इस बात पर लम्बी बहस की जा सकती है कि फ़िल्मों का असर समाज पर पड़ता है या समाज का असर फ़िल्मों पर, क्योंकि एक तरफ़ जहाँ वास्तविकता में भी अब आज के गाँव वे पुराने जमाने के गाँव नहीं रहे, जहाँ लोग निश्छल भाव रखते थे, भोले-भाले और सीधे-सादे होते थे। “पंचायती राज की एक प्रमुख देन” के रूप में अब आधुनिक जमाने के गाँव और गाँव के लोग विद्वेष, झगड़े, राजनीति और जातिवाद से पूरी तरह से ग्रसित हो चुके हैं। वहीं दूसरी तरफ़ कुछ “आधुनिक” कहे जाने वाले फ़िल्मकारों की मानसिकता के कारण ऐसी फ़िल्में बन रही हैं जिनमें भारत या भारत का समाज कहीं दिखाई नहीं देता। कोई बता सकता है कि “धूल का फ़ूल” के समय अथवा “दाग” फ़िल्म के समय तक भी “बिनब्याही माँ” की अवधारणा समाज में कितनी आ पाई थी? लेकिन उस वक्त उसे फ़िल्मों में दिखाकर समाज में एक “ट्रेण्ड” बनाया गया, ठीक वही मानसिकता आज “दोस्ताना” नाम की फ़िल्म में भी दिखाई देती है, कोई बता सकता है कि भारत जैसे समाज में “समलैंगिकता” अभी किस स्तर पर है? लेकिन “आधुनिकता”(?) के नाम पर यह अत्याचार भी सरेआम किया जा रहा है। जबकि असल में समलैंगिकता या तो एक “मानसिक बीमारी” है या फ़िर “नपुंसकता का ही एक रूप”। बहरहाल विषयान्तर न हो इसलिये “सिनेमा का असर समाज पर या समाज का असर फ़िल्मों पर” वाली बहस फ़िर कभी…
लेख का बाकी हिस्सा पढ़ने और इस गीत को सुनने/देखने के लिये इस लिंक पर क्लिक करें…

>लता, जयदेव और बालकवि बैरागी का एक और मधुर गीत…

>A Beautiful Song of Lata Mangeshkar, Jaidev and Balkavi Bairagi

राजस्थान के बारे में कहा जाता है कि इसके कई-कई रंग हैं, यह सुबह को अलग दिखता है, शाम को अलग और रात में और अलग। राजस्थान के चटखीले रंगों, किलों और हवेलियों को हिन्दी फ़िल्मों में कई बार सुन्दर चित्रित किया गया है, चाहे जेपी दत्ता की गुलामी, बँटवारा या बॉर्डर हो, यश चोपड़ा की लम्हे हो या सुनील दत्त की रेशमा और शेरा हो…

यहाँ फ़िल्म रेशमा और शेरा का एक गीत पेश करता हूँ, प्रस्तुत गीत रेडियो पर अमूमन बहुत कम ही सुनने में आता है, इस फ़िल्म का गीत “तू चन्दा मैं चाँदनी…” ही अधिकतर सुनने में आता है, जबकि यह गीत भी उतना ही मधुर और हिन्दी कविता से भरा हुआ है, लेकिन पता नहीं क्यों इसकी फ़रमाईश नहीं आती। गीत के बोल हैं “एक मीठी सी चुभन, एक ठंडी सी अगन…” लिखा है बालकवि बैरागी ने और संगीत दिया है जयदेव ने। इस गीत में सुनील दत्त ने राजस्थान के जिस हवेलीनुमा मन्दिर का चित्रण किया है, वह तो अपने-आप में बेजोड़ है ही, उस पर वहीदा रहमान का मासूम अभिनय और “सिचुएशन” के मुताबिक लिखे गये (और फ़िर भी दिल को छू लेने वाले) बेहतरीन शब्द इसकी सुन्दरता में चार चाँद लगा देते हैं। पहले आप इस गीत को ऑडियो रूप में सुनिये… फ़िर आगे की बात करते हैं…

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एक मीठी सी चुभन, एक ठंडी सी अगन
मैं आज पवन में पाऊँ, आज पवन में पाऊँ…
एक मीठी सी चुभन…
मन ही मन मैं नाच रही हूँ…. मन ही मन मुसकाऊँ…
क्योंकि मीठी-मीठी सी चुभन… ठंडी-ठंडी सी अगन…

1) जाग उठा है प्यार, झूमे सब संसार
अंगड़ाई लेते हैं सपने, धर के रूप हजार
नाच उठा है प्यार, आज मेरा आज मेरा झूम रहा संसार
मन का आँगन जो सूना था… आई है उसमें बहार
कंगना… पायल… कंगनवा खनके पायल छमके,
लट उलझी सुलझाऊँ, शरमाऊँ, मुसकाऊँ
क्योंकि एक मीठी-मीठी सी अगन…

2) ऐ मेरे भगवान, इतना कर अहसान
ये रसवन्ती हवा कहीं ना, बन जाये तूफ़ान
प्यार मेरा नादान, मन भी है अन्जान
जल ना जाये बैर अगन में जीवन के वरदान
धीरज भागे, चिन्ता जागे, मन ही मन घबराऊँ, घबराऊँ, घबराऊँ…

यह गीत प्यार की आगोश में पूरी तरह से भीगी हुई एक युवती के मन की दास्तान है। बालकवि के फ़ूलों से नाज़ुक बोल इसे एक नई ऊँचाई देते हैं। शुरुआत से ही यह गीत आपको भीतर से जकड़ने लगता है, जिसने भी एक खास उम्र में “प्यार” नाम के इस खूबसूरत अहसास को जिया है वह “एक मीठी सी चुभन, एक ठंडी सी अगन” जैसे शब्दों को शिद्दत से महसूस कर सकता है, वही व्यक्ति “रसवन्ती हवा” का मतलब भी समझ सकता है। फ़िल्म की “सिचुएशन” में बँधे होने के बावजूद एक गीतकार कैसे सुन्दर कविता कर लेता है यह इसका एक उदाहरण है। गीत के दूसरे अंतरे में नायिका (जो कि अपने दुश्मन कबीले के सरदार के बेटे के साथ प्रेम करती है) अपने भविष्य को लेकर बुरी तरह आशंकित है और वह भगवान से प्रार्थना करती है कि “ये रसवन्ती हवा कहीं ना बन जाये तूफ़ान…”। हालांकि बालकवि अधिक से अधिक हिन्दी शब्दों का प्रयोग करते हैं, लेकिन दूसरे अंतरे में “अहसान” शब्द का उपयोग शायद उन्होंने अगली पंक्तियों में आने वाले “तूफ़ान”, “अन्जान” और “वरदान” से तुकबन्दी मिलाने के लिये किया होगा, यह गीत पूरी तरह से गीतकार का ही है।

लता मंगेशकर तो खैर हमेशा की तरह गीत की आत्मा में उतरकर गाती ही हैं, संगीतकार जयदेव ने भी इसमें कमाल किया है। फ़िल्म इंडस्ट्री में दो संगीतकार “रवि” और “जयदेव” हमेशा “अंडर-रेटेड” और “अंडर-एस्टीमेटेड” (इस स्थान पर उपयुक्त हिन्दी शब्द नहीं मिल रहा) ही रहे, जबकि दोनों ही बेहद प्रतिभाशाली हैं। जयदेव हमेशा कम से कम वाद्य यन्त्रों के प्रयोग के लिये जाने जाते रहे हैं। इस गीत में भी उन्होंने संतूर, जलतरंग और बाँसुरी का शानदार उपयोग किया है। गीत बेहद उतार-चढ़ाव भरा है और लता मंगेशकर ने इसके साथ पूरा न्याय किया है, खासकर “मन ही मन मुस…काऊँ” वाली लाईन में “मुस” शब्द के बाद एक सेकण्ड का विराम तो आपको उड़ाकर ले जाता है। इसी प्रकार सिनेमेटोग्राफ़र एस रामचन्द्र ने भी राजस्थान की इस लोकेशन को कैमरे से कविता की तरह दर्शकों के सामने पेश किया है चाहे वह उस हवेलीनुमा मन्दिर की भव्यता हो या पत्थरों की जाली की नक्काशी हो, वहीदा रहमान के अभिनय के साथ दोनों एकाकार हो जाते हैं और आपको अनायास ही रेगिस्तान के रंग-बिरंगे मंज़र में ले जाते हैं। इस गीत का खूबसूरत वीडियो भी देखें… आप सोचते रह जायेंगे कि हिन्दी फ़िल्मों में कितने कविता और शायरीनुमा एक से बढ़कर एक गीत हैं, जो कम सुनने में आते हैं… लेकिन हंस भी तो कभी-कभार दिखाई देते हैं, कौए तो हमेशा मौजूद रहते हैं…

इस गीत के गीतकार के बारे में मन में थोड़ा संशय था, नेट पर सर्च करने से पता चला कि कहीं-कहीं इस गीत के गीतकार का नाम “उद्धव कुमार” बताया गया है। फ़िर “महफ़िल” के सागर भाई नाहर जी से चर्चा की, उन्हें भी कुछ संशय हुआ, फ़िर क्या किया जाये? तब बालकवि बैरागी जी के छोटे भ्राता श्री विष्णु बैरागी जी (ब्लॉग एकोहम) से इस सम्बन्ध में चर्चा हुई और उन्होंने कन्फ़र्म किया कि इस गीत के गीतकार उनके और हमारे सबके प्रिय “दादा बालकवि बैरागी” ही हैं, तब यह लेख सम्पूर्ण हो सका… इन दोनों ही सज्जनों का आभार…अस्तु… अन्त भला तो सब भला… इस मधुर गीत के लिये हम सभी संगीतप्रेमी बालकवि जी, जयदेव जी और स्वर साम्राज्ञी के ॠणी रहेंगे… (जिन सज्जन को इस गीत की शूटिंग लोकेशन की एकदम सही जानकारी हो वे बतायें, उनका भी अग्रिम आभार)

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>यह लता मंगेशकर की नहीं, एक बेटी की आवाज़ है…

>Lata Mangeshkar Dinanath Mangeshkar Ashirwad
लता मंगेशकर का जन्मदिन हाल ही में मनाया गया। लता मंगेशकर जैसी दिव्य शक्ति के बारे में कुछ लिखने के लिये बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। उन पर और उनके बारे में इतना कुछ लिखा जा चुका है कि अब शब्दकोष भी फ़ीके पड़ जाते हैं और उपमायें खुद बौनी लगती हैं। व्यस्तता की वजह से उस पावन अवसर पर कई प्रियजनों के आग्रह के बावजूद कुछ नहीं लिख पाया, लेकिन देवी की आराधना के लिये अष्टमी का दिन ही क्यों, लता पर कभी भी, कुछ भी लिखा जा सकता है। साथ ही लता मंगेशकर के गीतों में से कुछ अच्छे गीत छाँटना ठीक उसी प्रकार है जैसे किसी छोटे बच्चे को खिलौने की दुकान में से एक-दो खिलौने चुनने को कहा जाये।

फ़िर भी कई-कई-कई पसन्दीदा गीतों में से एक गीत के बारे में यहाँ कुछ कहने की गुस्ताखी कर रहा हूँ। गीत है फ़िल्म “आशीर्वाद” का, लिखा है गुलज़ार जी ने तथा धुन बनाई है वसन्त देसाई ने। गीत के बोल हैं “एक था बचपन…एक था बचपन…”, यह गीत राग गुजरी तोड़ी पर आधारित है और इसे सुमिता सान्याल पर फ़िल्माया गया है। पहले आप गीत सुनिये, उसकी आत्मा और गुलज़ार के बोलों को महसूस कीजिये फ़िर आगे की बात करते हैं…

http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://sureshchip.lifelogger.com/media/audio0/852854_utaemuqypj_conv.flv&autoStart=false

यू-ट्यूब पर यह गीत इस लिंक पर उपलब्ध है…

इस गीत को ध्यान से सुनिये, वैसे तो लता ने सभी गीत उनकी रूह के भीतर उतर कर गाये हैं, लेकिन इस गीत को सुनते वक्त साफ़ महसूस होता है कि यह गीत लता मंगेशकर उनके बचपन की यादों में बसे पिता यानी कि दीनानाथ मंगेशकर को लक्षित करके गा रही हों… उल्लेखनीय है कि दीनानाथ मंगेशकर की पुत्री के रूप में उन्हें वैसे ही ईश्वरीय आशीर्वाद प्राप्त हुआ था। दीनानाथ मंगेशकर 1930 में मराठी रंगमंच के बेताज बादशाह थे। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि उस वक्त के सोलह हजार रुपये महीने आज क्या कीमत रखते होंगे? जी हाँ उस वक्त दीनानाथ जी की मासिक आय 16000 रुपये थी, भेंट-उपहार-पुरस्कार वगैरह अलग से। उनका कहना था कि यदि ऊपरवाले की मेहरबानी ऐसे ही जारी रही तो एक दिन मैं पूरा गोआ खरीद लूँगा। उच्च कोटि के गायक कलाकार दीनानाथ मंगेशकर और उनकी भव्य नाटक कम्पनी ने समूचे महाराष्ट्र में धूम मचा रखी थी। वक्त ने पलटा खाया, दीनानाथ जी नाटक छोड़कर फ़िल्म बनाने के लिये कूद पड़े और उसमें उन्होंने जो घाटे पर घाटा सहन किया वह उन्हें भीतर तक तोड़ देने वाला साबित हुआ। मात्र 42 वर्ष की आयु में सन् 1942 में उच्च रक्तदाब की वजह से उनका निधन हो गया। उस वक्त लता सिर्फ़ 13 वर्ष की थीं और उन्हें रेडियो पर गाने के अवसर मिलने लगे थे, उन पर पूरे परिवार (माँ, तीन बहनें और एक भाई) की जिम्मेदारी आन पड़ी थी, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और देवप्रदत्त प्रतिभा के साथ उन्होंने पुनः शून्य से संघर्ष शुरु किया और “भारत रत्न” के उच्च स्तर तक पहुँचीं।

मृत्युशैया पर पड़े दीनानाथ जी ने रेडियो पर लता की आवाज़ सुनकर कहा था कि “अब मैं चैन से अन्तिम साँस ले सकता हूँ…” लता के सिर पर हाथ फ़ेरते हुए उन्होंने कहा था कि “मैंने अपने जीवन में बहुत धन कमाया और गंवाया भी, लेकिन मैं तुम लोगों के लिये कुछ भी छोड़कर नहीं जा रहा, सिवाय मेरी धुनों, एक तानपूरे और ढेरों आशीर्वाद के अलावा…तुम एक दिन बहुत नाम कमाओगी…”। लता मंगेशकर ने उनके सपनों को पूरा किया और आजीवन अविवाहित रहते हुए परिवार की जिम्मेदारी उठाई। यह गीत सुनते वक्त एक पुत्री का अपने पिता पर प्रेम झलकता है, साथ ही उस महान पिता की जुदाई की टीस भी शिद्दत से उभरती है, जो सुनने वाले के हृदय को भेदकर रख देती है… यह एक जेनेटिक तथ्य है कि बेटियाँ पिता को अधिक प्यारी होती हैं, जबकि बेटे माँ के दुलारे होते हैं। गीत के तीसरे अन्तरे में जब लता पुकारती हैं “मेरे होंठों पर उनकी आवाज़ भी है…” तो लगता है कि वाकई दीनानाथ जी का दिया हुआ आशीर्वाद हम जैसे अकिंचन लोगों को भीतर तक तृप्त करने के लिये ही था।

फ़िल्म इंडस्ट्री ने कई कलाकारों को कम उम्र में दुनिया छोड़ते देखा है, जिनकी कमी आज भी खलती है जैसे गुरुदत्त, संजीव कुमार, स्मिता पाटिल आदि… मास्टर दीनानाथ भी ऐसी ही एक दिव्य आत्मा थे, एक तरह से यह गीत पूरी तरह से उन्हीं को समर्पित है… गुलज़ार – जो कि “इस मोड़ से जाते हैं कुछ सुस्त कदम रस्ते, कुछ तेज कदम राहें…” या फ़िर “हमने देखी हैं उन आँखों की महकती खुशबू…” जैसे अजब-गजब बोल लिखते हैं उन्होंने भी इस गीत में सीधे-सादे शब्दों का उपयोग किया है, गीत की जान है वसन्त देसाई की धुन, लेकिन समूचे गीत पर लता-दीनानाथ की छाया प्रतिध्वनित होती है। यह भी एक संयोग है कि फ़िल्म में सुमिता सान्याल को यह गीत गायिका के रूप में रेडियो पर गाते दिखाया गया है।

आज लता मंगेशकर हीरों की अंगूठियाँ और हार पहनती हैं, लन्दन और न्यूयॉर्क में छुट्टियाँ बिताती हैं, पुणे में दीनानाथ मंगेशकर के नाम से विशाल अस्पताल है, और मुम्बई में एक सर्वसुविधायुक्त ऑडिटोरियम, हालांकि इससे दस गुना वैभव तो उन्हें बचपन में ही सुलभ था, और यदि दीनानाथ जी का अल्पायु में निधन न हुआ होता तो??? लेकिन वक्त के आगे किसी की कब चली है, मात्र 13 वर्ष की खेलने-कूदने की कमसिन आयु में लता मंगेशकर पर जो वज्रपात हुआ होगा, फ़िर जो भीषण संघर्ष उन्होंने किया होगा उसकी तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते। पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते स्वयं अविवाहित रहना भी तो त्याग की एक पराकाष्ठा है… इस गीत में लता का खोया हुआ बचपन और पिता से बिछुड़ने का दर्द साफ़ झलकता है। दुनिया में फ़ैले दुःख-दर्द, अन्याय, शोषण, अत्याचार को देखकर कभी-कभी ऐसा लगता है कि “ईश्वर” नाम की कोई सत्ता नहीं होती, परन्तु लता मंगेशकर की आवाज़ सुनकर फ़िर महसूस होता है कि नहीं… नहीं… ईश्वर ने अपने कुछ अंश धरती पर बिखेरे हुए हैं, जिनमें से एक है लता मंगेशकर…

गीत के बोल इस प्रकार हैं…

एक तथा बचपन, एक था बचपन
बचपन के एक बाबूजी थे, अच्छे-सच्चे बाबूजी थे
दोनों का सुन्दर था बन्धन…
एक था बचपन…

1) टहनी पर चढ़के जब फ़ूल बुलाते थे
हाथ उचके तो टहनी तक ना जाते थे
बचपन के नन्हें दो हाथ उठाकर वो
फ़ूलों से हाथ मिलाते थे…
एक था बचपन… एक था बचपन

2) चलते-चलते, चलते-चलते जाने कब इन राहों में
बाबूजी बस गये बचपन की बाहों में
मुठ्ठी में बन्द हैं वो सूखे फ़ूल अभी
खुशबू है सीने की चाहों में…
एक था बचपन… एक था बचपन

3) होठों पर उनकी आवाज भी है
मेरे होंठों पर उनकी आवाज भी है
साँसों में सौंपा विश्वास भी है
जाने किस मोड़ पे कब मिल जायेंगे वो
पूछेंगे बचपन का अहसास भी है…
एक था बचपन, एक था बचपन…
छोटा सा नन्हा सा बचपन…

एक और बात गौर करने वाली है कि अब “बाबूजी” शब्द भी लगभग गुम चुका है। वक्त के साथ “बाबूजी” से पिताजी हुए, पिताजी से पापा हुए, पापा से “डैड” हो गये और अब तो बाबूजी को सरेआम धमकाया जाता है कि “बाबूजी जरा धीरे चलो, बिजली खड़ी, यहाँ बिजली खड़ी, नैनों में चिंगारियाँ, गोरा बदन शोलों की लड़ी…” बस और क्या कहूँ, मैंने पहले ही कहा कि “वक्त के आगे सभी बेबस हैं…”।
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चलते-चलते दो लाईन – अक्सर सोचता हूँ कि इस प्रकार के और लेख लिखूँ, लेकिन “सेकुलर” और “कांग्रेस” नाम के शब्द सुनते ही तलुवे का खून मस्तक में पहुँच जाता है और मैं फ़िर से अपनी “सामाजिक जिम्मेदारी” निभाने निकल पड़ता हूँ…

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>रेडियो की यादें (भाग-2) (विविध भारती और टीवी उदघोषकों के बारे में)

>All India Radio Vividh Bharti Doordarshan
1982 के एशियाड के समय भारत में रंगीन टीवी का उदय हुआ, हालांकि लगभग 1990 तक कलर टीवी भी एक “लग्जरी आयटम” हुआ करता था (अवमूल्यन की पराकाष्ठा देखिये कि अब कलर टीवी चुनाव घोषणा पत्रों में मुफ़्त में बाँटे जाने लगे हैं)। “सुदर्शन चेहरे वाले” कई उदघोषक रेडियो से टीवी की ओर मुड़ गये, कुछ टीवी नाटकों / धारावाहिकों में काम करने लगे थे। उन दिनों चूंकि टीवी नया-नया आया था, तो उसका काफ़ी “क्रेज” था और उस दौर में रेडियो से मेरा नाता थोड़ा कम हो गया था, फ़िर भी उदघोषकों के अल्फ़ाज़, अदायगी और उच्चारण की ओर मेरा ध्यान बराबर रहता था। अन्तर सिर्फ़ इतना आया था कि टीवी के कारण मुखड़े का दर्शन भी होने लगा था इसलिये शम्मी नारंग, सरला माहेश्वरी, जेवी रमण, सरिता सेठी आदि हमारे लिये उन दिनों आकर्षण का केन्द्र थे। सरला माहेश्वरी को न्यूज पढ़ते देखने के लिये कई बार आधे-आधे घंटे यूँ ही बकवास सा “चित्रहार” देखते बैठे रहते थे। वैसे मैंने तो मुम्बई में बचपन में स्मिता पाटील और स्मिता तलवलकर को भी टीवी पर समाचार पढ़ते देखा था और अचंभित हुआ था, लेकिन “हरीश भिमानी” की बात ही कुछ और थी, महाभारत के “समय” तो वे काफ़ी बाद में बने, उससे पहले कई-कई बार उन्हें सुनना बेहद सुकून देता था। टीवी के आने से उदघोषकों का चेहरा-मोहरा दर्शनीय होना अपने-आप में एक शर्त थी, उस वक्त भी तबस्सुम जी अपने पूरे शबाब और ज़लाल के साथ पर्दे पर नमूदार होती थीं और बाकी सबकी छुट्टी कर देती थीं। रेडियो के लिये उन दिनों मंदी के दिन थे ऐसा मैं मानता हूँ। फ़िर से कालचक्र घूमा, टीवी की दुनिया में ज़ीटीवी नाम के पहले निजी चैनल का प्रवेश हुआ और मानो धीरे-धीरे उदघोषकों की शुद्धता नष्ट होने लगी। लगभग उन्हीं दिनों आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरु हुआ था, अंग्रेजी लहजे के उच्चारण और अंग्रेजी शब्दों की भरमार (बल्कि हमला) लिये हुए नये-नवेले उदघोषकों का आगाज़ हुआ, और जिस तेजी से फ़ूहड़ता और घटियापन का प्रसार हुआ उससे संगीतप्रेमी और रेडियोप्रेमी पुनः रेडियो की ओर लौटने लगे। उदारीकरण का असर (अच्छा और बुरा दोनो) रेडियो पर भी पड़ना लाजिमी था, कई प्रायवेट रेडियो चैनल आये, कई योजनायें और भिन्न-भिन्न तरीके के कार्यक्रम लेकर आये, लेकिन एक मुख्य बात से ये तमाम रेडियो चैनल दूर रहे, वह थी “भारतीयता की सुगन्ध”। और इसी मोड़ पर आकर श्रोताओं के बीच “विविध भारती” ने अपनी पकड़, जो कुछ समय के लिये ढीली पड़ गई थी, पुनः मजबूत कर ली।

विविध भारती, जो कि अपने नाम के अनुरूप ही विविधता लिये हुए है, आज की तारीख में अधिकतर लोगों का पसन्दीदा चैनल है। लोगबाग कुछ समय के लिये दूसरे “कांदा-भिंडी” टाइप के निजी रेडियो चैनल सुनते हैं, लेकिन वे सुकून और शांति के लिये वापस विविध भारती पर लौटकर आते हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे कि हॉट-डॉग खाने वाले एकाध-दो दिन वह खा सकते हैं, लेकिन पेट भरने और मन की शांति के लिये उन्हें दाल-रोटीनुमा, घरेलू, अपनी सी लगने वाली, विविध भारती पर वापस आना ही पड़ेगा। मेरे अनुसार गत पचास वर्षों में विविध भारती ने अभूतपूर्व और उल्लेखनीय तरक्की की है, जाहिर है कि इसे सरकारी मदद मिलती रही है, और इसे चैनल चलाने के लिये “कमाने” के अजूबे तरीके नहीं आजमाना पड़े, लेकिन फ़िर भी सरकारी होने के बावजूद इसकी कार्यसंस्कृति में उत्कृष्टता का पुट बरकरार ही रहा, और आज भी है।

विविध भारती के मुम्बई केन्द्र से प्रसारित होने वाले लगभग सभी कार्यक्रम उत्तम हैं और उससे ज्यादा उत्तम हैं यहाँ के उदघोषकों की टीम। मुझे कौतूहल है कि इतने सारे प्रतिभाशाली और एक से बढ़कर एक उदघोषक एक ही छत के नीचे हैं। कमल शर्मा, अमरकान्त दुबे, यूनुस खान, अशोक सोनावणे, राजेन्द्र त्रिपाठी, महेन्द्र मोदी… इसी प्रकार महिलाओं में रेणु बंसल, निम्मी मिश्रा, ममता सिंह, आदि। लगभग सभी का हिन्दी उच्चारण एकदम स्पष्ट, आवाज खनकदार, प्रस्तुति शानदार, फ़िल्मों सम्बन्धी ज्ञान भी उच्च स्तर का, यही तो खूबियाँ होना चाहिये उदघोषक में!!! आवाज, उच्चारण और प्रस्तुति की दृष्टि से मेरी व्यक्तिगत पसन्द का क्रम इस प्रकार है – (1) कमल शर्मा, (2) अमरकान्त दुबे और (3) यूनुस खान तथा महिलाओं में – (1) रेणु बंसल, (2) निम्मी मिश्रा (3) ममता सिंह। इस लिस्ट में मैंने लोकेन्द्र शर्मा जी को शामिल नहीं किया है, क्योंकि वे शायद रिटायर हो चुके हैं, वरना उनका स्थान पहला होता। महिला उदघोषकों में सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं रेणु बंसल, फ़ोन-इन कार्यक्रम में जब वे “ऐस्स्स्स्सा…” शब्द बोलती हैं तब बड़ा अच्छा लगता है, इसी प्रकार श्रोताओं द्वारा फ़ोन पर “मैं अपने मित्रों का नाम ले लूँ” पूछते ही निम्मी मिश्रा प्यार से “लीजिये नाआआआआ…” कहती हैं तो दिल उछल जाता है। ममता सिंह जी, अनजाने ही सही, अपना विशिष्ट “उत्तरप्रदेशी लहजा” छुपा नहीं पातीं। मुझे इस बात का गर्व है कि कई उदघोषकों का सम्बन्ध मध्यप्रदेश से रहा है, और अपने “कानसेन” अनुभव से मेरा यह मत बना है कि एक अच्छा उदघोषक बनने के लिये एक तो संस्कृत और उर्दू का उच्चारण जितना स्पष्ट हो सके, करने का अभ्यास करना चाहिये (हिन्दी का अपने-आप हो जायेगा) और हर हिन्दी उदघोषक को कम से कम पाँच-सात साल मध्यप्रदेश में पोस्टिंग देना चाहिये। मेरे एक और अभिन्न मित्र हैं इन्दौर के “संजय पटेल”, बेहतरीन आवाज, उच्चारण, प्रस्तुति, और मंच संचालन के लिये लगने वाला “इनोवेशन” उनमें जबरदस्त है। मेरा अब तक का सबसे खराब अनुभव “कमलेश पाठक” नाम की महिला उदघोषिका को सुनने का रहा है, लगता ही नहीं कि वे विविध भारती जैसे प्रतिष्ठित “घराने” में पदस्थ हैं, इसी प्रकार बीच में कुछ दिनों पहले “जॉयदीप मुखर्जी” नाम के एक अनाउंसर आये थे जिन्होंने शायद विविध भारती को निजी चैनल समझ लिया था, ऐसा कुछ तरीका था उनका कार्यक्रम पेश करने का। बहरहाल, आलोचना के लिये एक पोस्ट अलग से बाद में लिखूंगा…

व्यवसायगत मजबूरियों के कारण आजकल अन्य रेडियो चैनल या टीवी देखना कम हो गया है, लेकिन जिस “नेल्को” रेडियो का मैने जिक्र किया था, वह कार्यस्थल पर एक ऊँचे स्थान पर रखा हुआ है, जहाँ मेरा भी हाथ नहीं पहुँचता। उस रेडियो में विविध भारती सेट करके रख दिया है, सुबह बोर्ड से बटन चालू करता हूँ और रात को घर जाते समय ही बन्द करता हूँ। ब्लॉग जगत में नहीं आया होता तो यूनुस भाई से भी परिचय नहीं होता, उनकी आवाज का फ़ैन तो हूँ ही, अब उनका “मुखड़ा” भी देख लिया और उनसे चैटिंग भी कर ली, और क्या चाहिये मुझ जैसे एक आम-गुमनाम लेकिन कट्टर रेडियो श्रोता को? किस्मत ने चाहा तो शायद कभी “कालजयी हीरो” अर्थात अमीन सायानी साहब से भी मुलाकात हो जाये…

पाठकों को इस लेख में कई प्रसिद्ध नाम छूटे हुए महसूस होंगे जैसे पं विनोद शर्मा, ब्रजभूषण साहनी, कब्बन मिर्जा, महाजन साहब जैसे कई-कई अच्छे उदघोषक हैं, लेकिन मैंने सिर्फ़ उनका ही उल्लेख किया है, जिनको मैंने ज्यादा सुना है। राजनीति और सामाजिक बुराइयों पर लेख लिखते-लिखते मैंने सोचा कि कुछ “हट-के” लिखा जाये (“टेस्ट चेंज” करने के लिये), आशा है कि पाठकों को पसन्द आया होगा…

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>रेडियो से जुड़ी मेरी यादें और विभिन्न उदघोषक (भाग-1)

>All India Radio Announcers Pronunciation
“रेडियो” का नाम आते ही एक रोमांटिक सा अहसास मन पर तारी हो जाता है, रेडियो से मेरे जुड़ाव की याद मुझे बहुत दूर यानी बचपन तक ले जाती है। आज भी मुझे अच्छी तरह से याद है कि सन 1975 में जब हमारा परिवार सीधी (मप्र में रीवा/चुरहट से आगे स्थित) में रहता था और मैं शायद छठवीं-सातवीं में पढ़ता था। घर पर एक विशाल सा रेडियो था बुश बैरन (Bush Baron) का, आठ बैंड का, चिकनी लकड़ी के कैबिनेट वाला, वाल्व वाला। उस जमाने में ट्रांजिस्टर नहीं आये थे, वाल्व के रेडियो आते थे, जिन्हें चालू करने के बाद लगभग 2-3 मिनट रुकना पड़ता था वाल्व गरम होने के लिये। उन रेडियो के लिये लायसेंस भी एक जमाने में हुआ करते थे, उस रेडियो में एक एंटीना लगाना पड़ता था। वह एंटीना यानी तांबे की जालीनुमा एक बड़ी सी पट्टी होती थी जिसे कमरे के एक छोर से दूसरे छोर पर बाँधा जाता था। उस जमाने में इस प्रकार का रेडियो भी हरेक के यहाँ नहीं होता था और “खास चीज़” माना जाता था, और जैसा साऊंड मैने उस रेडियो का सुना हुआ है, आज तक किसी रेडियो का नहीं सुना। बहरहाल, उस रेडियो पर हमारी माताजी सुबह छः बजे मराठी भक्ति गीत सुनने के लिये रेडियो सांगली, रेडियो परभणी और रेडियो औरंगाबाद लगा लेती थीं, जी हाँ सैकड़ों किलोमीटर दूर भी, ऐसा उस रेडियो और एंटीना का पुण्य-प्रताप था, सो रेडियो से आशिकाना बचपन में ही शुरु हो गया था।

सीधी में उन दिनों घर के आसपास घने जंगल हुआ करते थे, सुबह रेडियो की आवाज से ही उठते थे और रेडियो की आवाज सुनते हुए ही नींद आती थी। उन दिनों मनोरंजन का घरेलू साधन और कुछ था भी नहीं, हम लोग रात 8.45 पर सोने चले जाते थे, (आजकल के बच्चे रात 12 बजे भी नहीं सोते), उस समय आकाशवाणी से रात्रिकालीन मुख्य समाचार आते थे, और श्री देवकीनन्दन पांडेय की गरजदार और स्पष्ट उच्चारण वाली आवाज “ये आकाशवाणी है, अब आप देवकीनन्दन पांडे से समाचार सुनिये…” सुनते हुए हमें सोना ही पड़ता था, क्योंकि सुबह पढ़ाई के लिये उठना होता था और पिताजी वह न्यूज अवश्य सुनते थे तथा उसके बाद रेडियो अगली सुबह तक बन्द हो जाता था। देवकीनन्दन पांडे की आवाज का वह असर मुझ पर आज तक बाकी है, यहाँ तक कि जब उनके साहबजादे सुधीर पांडे रेडियो/फ़िल्मों/टीवी पर आने लगे तब भी मैं उनमें उनके पिता की आवाज खोजता था। रेडियो सांगली और परभणी ने बचपन के मन पर जो संगीत के संस्कार दिये और देवकीनन्दन पांडे के स्पष्ट उच्चारणों का जो गहरा असर हुआ, उसी के कारण आज मैं कम से कम इतना कहने की स्थिति में हूँ कि भले ही मैं तानसेन नहीं, लेकिन “कानसेन” अवश्य हूँ। विभिन्न उदघोषकों और गायकों की आवाज सुनकर “कान” इतने मजबूत हो गये हैं कि अब किसी भी किस्म की उच्चारण गलती आसानी से पचती नहीं, न ही घटिया किस्म का कोई गाना। अस्तु…

जब थोड़े और बड़े हुए और चूंकि पिताजी की ट्रांसफ़र वाली नौकरी थी, तब हम अम्बिकापुर (सरगुजा छत्तीसगढ़) और छिन्दवाड़ा में कुछ वर्षों तक रहे। उस समय तक घर में “मरफ़ी” का एक टू-इन-वन तथा “नेल्को” कम्पनी का एक ट्रांजिस्टर आ चुका था (और शायद ही लोग विश्वास करेंगे कि नेल्को का वह ट्रांजिस्टर -1981 मॉडल आज भी चालू कंडीशन में है और उसे मैं दिन भर सुनता हूँ, और मेरी दुकान पर आने वाले ग्राहक उसकी साउंड क्वालिटी से रश्क करते हैं, उन दिनों ट्रांजिस्टर में FM बैंड नहीं आता था, इसलिये इसमें मैंने FM की एक विशेष “प्लेट” लगवाई हुई है, जो कि बाहर लटकती रहती है क्योंकि ट्रांजिस्टर के अन्दर उसे फ़िट करने की जगह नहीं है)। बहरहाल, मरफ़ी के टू-इन-वन में तो काफ़ी झंझटें थी, कैसेट लगाओ, उसे बार-बार पलटो, उसका हेड बीच-बीच में साफ़ करते रहो ताकि आवाज अच्छी मिले, इसलिये मुझे आज भी ट्रांजिस्टर ही पसन्द है, कभी भी, कहीं भी गोद में उठा ले जाओ, मनचाहे गाने पाने के लिये स्टेशन बदलते रहो, बहुत मजा आता है। उन दिनों चूंकि स्कूल-कॉलेज तथा खेलकूद, क्रिकेट में समय ज्यादा गुजरता था, इसलिये रेडियो सुनने का समय कम मिलता था।

शायद मैं इस बात में कोई अतिश्योक्ति नहीं कर रहा हूँ कि मेरी उम्र के उस समय के लोगों में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं होगा जिसने रेडियो सीलोन से प्रसारित होने वाला “बिनाका गीतमाला” और अमीन सायानी की जादुई आवाज न सुनी होगी। जिस प्रकार एक समय रामायण के समय ट्रेनें तक रुक जाती थीं, लगभग उसी प्रकार एक समय बिनाका गीतमाला के लिये लोग अपने जरूरी से जरूरी काम टाल देते थे। हम लोग भोजन करने के समय में फ़ेरबदल कर लेते थे, लेकिन बुधवार को बिनाका सुने बिना चैन नहीं आता था। जब अमीन सायानी “भाइयों और बहनों” से शुरुआत करते थे तो एक समाँ बंध जाता था, यहाँ तक कि हम लोग उनकी “सुफ़ैद” (जी हाँ अमीन साहब कई बार सफ़ेद को सुफ़ैद दाँत कहते थे) शब्द की नकल करने की कोशिश भी करते थे। रेडियो सीलोन ने अमीन सायानी और तबस्सुम जैसे महान उदघोषकों को सुनने का मौका दिया। तबस्सुम की चुलबुली आवाज आज भी जस की तस है, मुझे बेहद आश्चर्य होता है कि आखिर ये कैसे होता है? उन दिनों ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस का दोपहर साढ़े तीन बजे आने वाला फ़रमाइशी कार्यक्रम हम अवश्य सुनते थे। “ये ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस है, पेश-ए-खिदमत है आपकी पसन्द के फ़रमाइशी नगमें…”, जिस नफ़ासत और अदब से उर्दू शब्दों को पिरोकर “अज़रा कुरैशी” नाम की एक उदघोषिका बोलती थीं ऐसा लगता था मानो मीनाकुमारी खुद माइक पर आन खड़ी हुई हैं।

“क्रिकेट और फ़िल्मों ने मेरी जिन्दगी को बरबाद किया है”, ऐसा मेरे पिताजी कहते हैं… तो भला क्रिकेट और कमेंट्री से मैं दूर कैसे रह सकता था। इस क्षेत्र की बात की जाये तो मेरी पसन्द हैं जसदेव सिंह, नरोत्तम पुरी और सुशील दोषी। तीनों की इस विधा पर जबरदस्त पकड़ है। खेल और आँकड़ों का गहरा ज्ञान, कई बार जल्दी-जल्दी बोलने के बावजूद श्रोता तक साफ़ और सही उच्चारण में आवाज पहुँचाने की कला तथा श्रोताओं का ध्यान बराबर अपनी तरफ़ बनाये रखने में कामयाबी, ये सभी गुण इनमें हैं। फ़िलहाल इतना ही…

अगले भाग में विविध भारती और टीवी के कुछ उदघोषकों पर मेरे विचार (भाग-2 में जारी………)

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>तैयार हो जाइये सलमान के छिछोरेपन को झेलने के लिये

>Salman Khan, Sony Set Max, Reality Show
एक “प्रोमो” से हाल ही में पाला पड़ा और मेरे ज्ञान में वृद्धि हुई कि मल्लिका शेरावत के “मर्द संस्करण”, ऐश्वर्या राय जैसी सुन्दरी को सरेआम चाँटा जमाने / गरियाने वाले, स्वाद और शौक के लिये काले हिरण का शिकार करने फ़िर विश्नोईयों द्वारा अदालत में नाक रगड़ दिये जाने के बावजूद दाँत निपोरने वाले, विजय माल्या के “प्रोडक्ट” की शान रखते हुए फ़ुटपाथ पर “कीड़े-मकोड़ों” को कुचलने वाले, यानी की तमाम-तमाम गुणों से भरपूर, महान व्यक्तित्व वाले “सुपरस्टार” (जी हाँ प्रोमो में उन्हें सुपरस्टार ही कहा जा रहा था), एक टीवी कार्यक्रम पेश करने जा रहे हैं। अमूमन (केबीसी का पहला भाग देखने के बाद से) मैं शाहरुख, सलमान या और किसी के इस प्रकार के करोड़ों रुपये खैरात में बाँटने वाले कार्यक्रम नहीं देखता, लेकिन यदि किसी अन्य कार्यक्रम के बीच में “ट्रेलर” या “प्रोमो” नाम की बला मेरा गला पकड़ ले तो मैं क्या कर सकता हूँ। जाहिर है कि जब इतने “सद्गगुणी” कलाकार कार्यक्रम पेश करने वाले हैं तो उसकी जमकर “चिल्लाचोट” की जायेगी, कसीदे काढ़े जायेंगे। प्रोमो से ही पता चला कि ये महाशय “दस का दम” नाम का कोई “Percentage” (प्रतिशत) वाला खेल भारत के लोगों और लुगाइयों को खिलाने जा रहे हैं (जबकि भारतवासी पहले ही Percentage के खेल में माहिर हैं)।

जिस प्रकार चावल की बोरी से एक मुठ्ठी चावल की खुशबू से ही उसकी क्वालिटी के बारे में पता चल जाता है, उसी प्रकार पहले ही प्रोमो को देखकर लगा कि यह कार्यक्रम मानसिक दिवालियेपन की इन्तेहा साबित होगा। नमूना देखिये – सलमान पूछ रहे हैं कि “कितने प्रतिशत भारतीय अपनी सुहागरात सोते-सोते ही बिताते हैं?” अब महिला (जो कि इस बेहूदा सवाल पर या तो खी-खी करके हँसेगी, या फ़िर शरमाने का नाटक करेगी) को इस सवाल का जवाब बताना है। प्रोमो का अगला दृश्य है – “एक महिला (या लड़की) सलमान के सामने घुटने टेक कर उससे प्रेम की भीख माँग रही है”, अगले दृश्य में दर्शकों की फ़रमाइश पर (ऐसा कहने का रिवाज है) सलमान एक फ़ूहड़ सा डांस करके दिखा रहे हैं, साथ देने के लिये एक प्रतियोगी को भी उन्होंने नाच में शामिल किया हुआ है, और उस “भरतनाट्यम” में वे एक गमछानुमा वस्त्र लेकर दोनो टाँगों के बीच से कमर के नीचे का हिस्सा पोंछते नजर आते हैं… आया न मजा भाइयों (शायद आपने भी यह प्रोमो देखा होगा)।

आजकल कोई भी टीवी कार्यक्रम हिट करवाने के लिये कोई न कोई विवाद पैदा करना जरूरी है, या फ़िर उस प्रोग्राम में नंगई और छिछोरापन भरा जाये, या फ़िर जजों के बीच तथा जज और प्रतियोगियों के बीच गालीगलौज करवाई जाये, फ़िर पैसा देकर उसका प्रचार अखबारों में करवाया जाये, ताकि कुछ मूर्ख लोग भी ऐसे कार्यक्रम देखने के लिये पहुँचें। प्रोमो में “सुहागरात” वाला सवाल तो एक बानगी भर था ताकि चालीस पार के अधेड़ सलमान पर “मर-मिटने वाली”(?) बालायें कार्यक्रम के प्रति ज्यादा आकर्षित हों। लगभग यही चोंचला शाहरुख खान अपने कार्यक्रम “क्या आप पाँचवी पास से तेज हैं?” में अपना चुके हैं, जहाँ वे अधिकतर महिलाओं को ही प्रतियोगी चुनते हैं, फ़िर पहले उन महिलाओं के शरीर पर यहाँ-वहाँ-जहाँ-तहाँ हाथ फ़ेरते हैं, ठुमके लगाते हैं या फ़िर अपमानित करके बाहर भेजते हैं। अमिताभ बच्चन कैसे भी हों, कम से कम केबीसी में उन्होंने कभी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया (चाहे उनके फ़ैन्स ने अपनी मर्यादा को त्याग दिया हो), ये एक बड़ा अंतर है जो अमिताभ और शाहरुख/सलमान जैसों के संस्कारों में स्पष्ट दिखता है।

हो सकता है कि सलमान अगले एपिसोड में पूछें कि “बताइये भारत में कितने प्रतिशत लोग अंडरवियर पहनते हैं?” सही जवाब आपको दिलायेगा एक करोड़ रुपये…। या अगला सवाल “भारत में कितने प्रतिशत लड़कियाँ लड़कों के साथ भागने की इच्छुक हैं?” एक अंतहीन सिलसिला चलेगा बकवास सवालों का, नया विवाद पैदा करने के लिये इन सवालों में “धार्मिक” सवालों को भी जोड़ा जा सकता है। जिस प्रकार मूर्खता की कोई सीमा नहीं होती, शायद छिछोरेपन की भी कोई सीमा नहीं होती। मजे की बात यह होगी कि इस कार्यक्रम में अधिकतर सवाल अधकचरे या गैरजिम्मेदारी वाले ही पूछे जायेंगे, हमें इंतजार रहेगा जब सलमान पूछें कि “भारत में सड़कों के डामर में कितने प्रतिशत का कमीशन चलता है?”, या “बिजली चोरी का सर्वाधिक प्रतिशत “इस” राज्य में है, बताइये कितना?”, अथवा “प्राइमरी स्कूलों का प्रतिशत ज्यादा है या शराब की दुकानों का?” जाहिर है कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला… जवाबों के प्रतिशत खुद ही कार्यक्रम निर्माताओं द्वारा तय किये जायेंगे, ऐसा कोई “रेफ़रेंस” नहीं दिया जायेगा कि “प्रतिशत” का यह आँकड़ा ये लोग कहाँ से उठाकर लाये।

तो बस बुद्धू बक्से को निहारते जाइये, जब शाहरुख मैदान में हैं तो सलमान क्यों पीछे रहें? साथ ही बजरंग दल वालों को भी बोल दीजियेगा कि तैयार रहें उन्हें काम मिलने ही वाला है…

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>किशोर कुमार जैसी प्रतिभा वाले "सचिन"…

>Sachin Pilgaonkar Marathi Films Actor
असल में सचिन का पूरा नाम कई लोग नहीं जानते हैं। उन्हें सिर्फ़ “सचिन” के नाम से जाना जाता रहा है। इसलिये शीर्षक में नाम पढ़कर कई पाठक चौंके होंगे, ये शायद “सचिन” नाम का कुछ जादू है। सचिन तेंडुलकर, सचिन पिलगाँवकर, सचिन खेड़ेकर, सचिन पायलट… बहुत सारे सचिन हैं, हालांकि सचिन तेंडुलकर इन सभी पर अकेले ही भारी पड़ते हैं (वे हैं भी), लेकिन इस लेख में बात हो रही है सचिन पिलगाँवकर की। हिन्दी फ़िल्मों के स्टार और मराठी फ़िल्मों के सुपर स्टार… जी हाँ, ये हैं मासूम चेहरे वाले, सदाबहार दिखाई देने वाले, हमारे-आपके सिर्फ़ “सचिन”।

जब भी मासूम चेहरे की बात होती है, तब सबसे पहले नाम आता है तबस्सुम का और सचिन का, बाकी जुगल हंसराज और शाहिद कपूर आदि सब बाद में आते हैं। जितनी और जैसी प्रतिभा किशोर कुमार में थी, लगभग उतनी ही प्रतिभा या यूँ कहें कि कलाकारी के विविध आयामों के धनी हैं सचिन पिलगाँवकर। अभिनेता, निर्माता, निर्देशक, गायक, नृत्य निर्देशक, सम्पादक, टीवी सीरियल निर्माता… क्या-क्या नहीं करते हैं ये। (पहले भी मैंने मराठी के दो दिग्गज कलाकारों दादा कोंडके और निळु फ़ुले पर आलेख लिखे हैं, सचिन भी उन्हीं की श्रेणी में आते हैं)

17 अगस्त 1957 को मुम्बई (Mumbai) में एक सारस्वत ब्राह्मण परिवार में जन्में सचिन की परवरिश एक आम मराठी मध्यमवर्गीय परिवार की तरह ही हुई। बचपन से ही उनके मोहक चेहरे के कारण उन्हें फ़िल्मों में काम मिलने लगा था। चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर उनकी पहली फ़िल्म है “एक और सुहागन”, लेकिन उन्हें असली प्रसिद्धि मिली फ़िल्म “ब्रह्मचारी” से, जिसमें उन्होंने शम्मी कपूर के साथ काम किया और उसके बाद “ज्वेल थीफ़” से जिसमें उन्होंने वैजयन्तीमाला के छोटे भाई का रोल बखूबी निभाया।

“स्वीट सिक्सटीन” की उम्र में पहुँचते ही, उन्हें राजश्री प्रोडक्शन की “गीत गाता चल” में किशोरवय हीरो की भूमिका मिली, जिसमें उनकी हीरोइन थीं सारिका। इस जोड़ी ने फ़िर लगातार कुछ फ़िल्मों में काम किया। यूँ तो सचिन ने कई हिट फ़िल्मों में काम किया, लेकिन उल्लेखनीय फ़िल्मों के तौर पर कही जा सकती है “अँखियों के झरोखे से”, “बालिका वधू”, “अवतार”, “घर एक मन्दिर”, “कॉलेज गर्ल”, “नदिया के पार” आदि। जैसे ही उनकी उम्र थोड़ी बढ़ी (लेकिन चेहरे पर वही मासूमियत बरकरार थी), उन्होंने मैदान न छोड़ते हुए चरित्र भूमिकायें निभाना शुरु कर दिया। “शोले”, “त्रिशूल”, “सत्ते पे सत्ता” आदि में वे दिखाई दिये।

1990 के दशक के शुरुआत में जब टीवी ने पैर पसारना शुरु किया तब वे इस विधा की ओर मुड़े और एक सुपरहिट कॉमेडी शो “तू-तू-मैं-मैं” निर्देशित किया, जिसमें मुख्य भूमिका में थीं उनकी पत्नी सुप्रिया और मराठी रंगमंच और हिन्दी फ़िल्मों की “ग्लैमरस” माँ रीमा लागू। उनका एक और निर्माण था “हद कर दी”। एक अच्छे गायक और संगीतप्रेमी होने के कारण (मराठी हैं, तो होंगे ही) उन्होंने स्टार टीवी पर एक हिट कार्यक्रम “चलती का नाम अंताक्षरी” भी संचालित किया। उम्र के पचासवें वर्ष में उन्होंने एक चुनौती के रूप में स्टार टीवी के नृत्य कार्यक्रम “नच बलिये” (Nach Baliye) में अपनी पत्नी के साथ भाग लिया। सभी प्रतियोगियों में ये जोड़ी सबसे अधिक उम्र की थी। इन्होंने भी सोचा नहीं था कि वे इतने आगे जायेंगे, इसलिये हरेक एपिसोड को ये अपना अन्तिम नृत्य मानकर करते रहे और अन्त में जीत इन्हीं की हुई और इस जोड़ी को इनाम के तौर पर चालीस लाख रुपये मिले। उम्र के इस पड़ाव पर एक डांस के शो में युवाओं को पछाड़कर जीतना वाकई अदभुत है। 2007 में जी टीवी मराठी पर इन्होंने एक शो शुरु किया है, जिसमें ये जज भी बने हैं, नाम है “एका पेक्षा एक” (एक से बढ़कर एक)। इसमें सचिन महाराष्ट्र की युवा नृत्य प्रतिभाओं को खोज रहे हैं। इनके बेदाग, चमकदार और विवादरहित करियर में सिर्फ़ एक बार अप्रिय स्थिति बनी थी, जब इनकी गोद ली हुई पुत्री करिश्मा ने इन पर गलतफ़हमी में कुछ आरोप लगाये थे, हालांकि बाद में मामला सुलझ गया था… वैसे इनकी खुद की एक पुत्री श्रिया है, जो अभी अठारह वर्ष की है।

इससे बरसों पहले अस्सी के दशक में सचिन ने कई मराठी फ़िल्मों का निर्देशन किया, जिनमें प्रमुख हैं “माई-बाप”, “नवरी मिळे नवरयाला” (इस फ़िल्म के दौरान ही सुप्रिया से उनका इश्क हुआ और शादी हुई), “माझा पती करोड़पती”, “गम्मत-जम्मत” आदि। मराठी के सशक्त अभिनेता अशोक सराफ़ और स्वर्गीय लक्ष्मीकान्त बेर्डे से उनकी खूब दोस्ती जमती है। बच्चों से उनका प्रेम जगजाहिर है, इसीलिये वे स्टार टीवी के बच्चों के एक डांस शो में फ़रीदा जलाल के साथ जज बने हुए हैं। उनकी हिन्दी और उर्दू उच्चारण एकदम शुद्ध हैं, और कोई कह नहीं सकता कि उसमें मराठी “टच” है (जैसा कि सदाशिव अमरापुरकर के उच्चारण में साफ़ झलकता है)। सचिन अपने शुद्ध उच्चारण का पूरा श्रेय स्वर्गीय मीनाकुमारी (Meena Kumari) को देते हैं, जिनके यहाँ वे बचपन में लगातार मिठाई खाने जाते थे और मीनाकुमारी उन्हें पुत्रवत स्नेह प्रदान करती थीं, उनका उर्दू तलफ़्फ़ुज ठीक करती थीं और हिन्दी से उर्दू के तर्जुमें करके देती थीं। नदिया के पार में उनका भोजपुरी का साफ़ उच्चारण इसका सबूत है।

मेहनत, लगन और उत्साह से सतत काम में लगे रहने वाले इस हँसमुख, विनम्र और महान कलाकार को मेरे जैसे एक छोटे से सिनेमाप्रेमी का सलाम…

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>गर्भावस्था के दो सुन्दर, सपनीले, मधुर गीत….

>हिन्दी फ़िल्मों ने हमें कई-कई अविस्मरणीय गीत दिये हैं। फ़िल्म संगीतप्रेमी सोते-जागते, उठते-बैठते इन गीतों को गुनगुनाते रहते हैं। हमारे महान गीतकारों और फ़िल्मकारों ने जीवन के हरेक मौके, अवसर और उत्सव के लिये गीत लिखे हैं और खूब लिखे हैं। जन्म, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रेम, विवाह, बिदाई, बच्चे, बुढापा, मौत… सभी-सभी के लिये गीत हमें मिल जायेंगे। जो दो गीत मैंने आज चुने हैं, वे जीवन के एक विशेष कालखंड अर्थात गर्भावस्था और मातृत्व प्राप्त करने के बीच का स्वप्निल समय। जैसे मातृत्व स्त्रियों के लिये जीवन का सबसे महत्वपूर्ण क्षण होता है, ठीक वैसे ही पुरुषों के लिये पितृत्व भी एक गौरवशाली क्षण होता है। हालांकि माँ बनने के दौरान और प्रसूति के बाद स्त्री का योगदान तो अतुलनीय होता ही है, लेकिन इस भागमभाग में लोग “बाप” को भूल जाते हैं, दवाईयों के लिये भागदौड़ करता, रक्त की बोतलों की जुगाड़ में लगा बदहवास सा, बेचैनी से अस्पताल के बरामदे में टहलता बाप लोग अक्सर नजर-अंदाज कर जाते हैं, और वह भी “मर्द” होने के नाते अपनी व्यथा किसी से कहता नहीं। बहरहाल… प्रस्तुत दोनों गीत गर्भावस्था के उस सपनीले दौर के हैं, जब पति-पत्नी सपने देखने में मगन होते हैं, और यह दौर लगभग हरेक के जीवन में आता है, जब वह अपने होने वाले बच्चे के लिये न जाने क्या-क्या सोचा करता है। यह गीत खास इसीलिये हैं कि इनमें माता-पिता दोनों की भावनाओं को बराबरी से व्यक्त किया गया है। पहला गीत है फ़िल्म “मन-मन्दिर” का, जो सन १९७१ में आई थी, लिखा है राजेन्द्र कृष्ण ने और संगीत दिया है लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने, गीत गाया है मुकेश और लता मंगेशकर ने…. गीत के बोल हैं “ऐ मेरी आँखों के पहले सपने…”, गीत क्या है, चार पंक्तियों की मधुर कविता है, ध्यान से सुनें तो दो लाईन लता के लिये और दो लाईन मुकेश के लिये, बस… इतने में ही लक्ष्मी-प्यारे ने पूरा गीत बाँध दिया है-

लता – ऐ मेरी आँखों के पहले सपने, रंगीन सपने मासूम सपने
पलकों का पलना झुलाऊँ तुझे, गा-गा के लोरी सुलाऊँ तुझे…
(१) एक-एक पल गिनूँ, उस घड़ी के लिये
जिसकी उम्मीद में हर कोई माँ जिये (२)
ऐ मेरी आँखों के पहले सपने….

इस अंतरे के बाद मुकेश कमान संभाल लेते हैं, ठीक वैसे ही जैसे कोई दौड़ के दौरान अपने ‘पार्टनर’ को हौले से “बेटन” थमाता है…

ऐ मेरी आँखों के पहले सपने…
(२) मैं अभी से तेरी सुन रहा हूँ सदा,
दूर जैसे कहीं साज हो बज रहा (२)
फ़िर दोनों गाते हैं
ऐ मेरी आँखों के पहले सपने, रंगीन सपने मासूम सपने
पलकों का पलना झुलाऊँ तुझे, गा-गा के लोरी सुलाऊँ तुझे…

एक विशिष्ट भावना में छोड़ जाता है यह मधुर गीत आपको….. इसे सुनने के लिये आप नीचे दिये विजेट में “प्ले” पर चटकायें…

http://res0.esnips.com/escentral/images/widgets/flash/chello.swf
AYE MERI AANKHON K…

दूसरा गीत भी कालजयी है, लिखा है कवि नीरज ने, धुन बनाई है सचिन देव बर्मन ने, गाया है किशोर कुमार और लता मंगेशकर ने, फ़िल्म है तेरे-मेरे सपने और बोल हैं, “जीवन की बगिया महकेगी, लहकेगी, चहकेगी…”। पूरा गीत पति-पत्नी के आपसी सामंजस्य, उनके सपनों, आने वाले बच्चे के बारे में उनकी कल्पनाओं में डूबा हुआ है। इस गीत में सचिन दा और नीरज ने मिलकर अनोखा संसार रचा है। इस गीत के बोल इस प्रकार हैं –

जीवन की बगिया महकेगी, लहकेगी, चहकेगी
खुशियों की कलियाँ, झूमेंगी, झूलेंगी, फ़ूलेंगी
जीवन की बगिया….
वो मेरा होगा, वो सपना तेरा होगा
मिलजुल के माँगा, वो तेरा-मेरा होगा
जब-जब वो मुस्कुरायेगा, अपना सवेरा होगा
थोड़ा हमारा, थोड़ा तुम्हारा, आयेगा बचपन फ़िर से हमारा….
जीवन की बगिया…
हम और बँधेंगे, हम तुम कुछ और बँधेंगे
होगा कोई बीच तो हम तुम और बँधेंगे
बाँधेगा धागा कच्चा, हम तुम तब और बँधेंगे
थोड़ा हमारा, थोड़ा तुम्हारा, आयेगा बचपन फ़िर से हमारा….
जीवन की बगिया…
मेरा राजदुलारा, वो जीवन प्राण हमारा
फ़ूलेगा एक फ़ूल, खिलेगा प्यार हमारा
दिन का वो सूरज होगा, रातों का चाँद सितारा…
थोड़ा हमारा, थोड़ा तुम्हारा, आयेगा बचपन फ़िर से हमारा….
जीवन की बगिया…

जैसे पहले गीत में एक पंक्ति “एक-एक पल गिनूँ उस घड़ी के लिये, जिसकी उम्मीद में हर कोई माँ जिये” है वैसे ही इस गीत में “हम और बँधेंगे, हम-तुम कुछ और बँधेंगे, बाँधेगा धागा कच्चा… होगा कोई बीच तो हम तुम और बँधेंगे..” ये पंक्तियाँ कितने गूढ़ार्थ लिये हुए है, क्या खूब शब्द हैं। यही है हमारे पुराने फ़िल्मी गीतों का जादू… एक बार दिल लगाकर ध्यान से सुन लिया तो फ़िर व्यक्ति दूसरी दुनिया में खो जाता है। इस गीत को नीचे दिये विजेट में प्ले करके भी सुन सकते हैं, और यदि तेजगति इंटरनेट के मालिक हैं तो “यू-ट्यूब” पर इसका बेहतरीन वीडियो भी देख सकते हैं, जिसमें देव आनन्द और मुमताज एक शोख लेकिन परिपक्व अन्दाज में दिखाई देंगे। आनन्द लीजिये, मुझे उम्मीद है कि हमारे कुँवारे पाठक भी इसका भरपूर रसास्वादन करेंगे, क्योंकि कल नहीं तो परसों उन्हें भी इस क्षण से गुज़रना ही होगा। यही तो जीवन है….

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Jeevan Ki Bagia Ma…

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