>मकबूल फ़िदा हुसैन को ठेंगा

>

मकबूल फिदा हुसैनः चित्रकार या हुस्नप्रेमी!

मकबूल फिदा हुसैन को मैंने न कभी चित्रकार माना, न ही चित्रकार की हैसियत से उन्हें देखने की कोशिश की। हुसैन साहब मुझे चित्रकार कम ‘बेकार’ ज्यादा लगते हैं। हुसैन साहब के पास बेकार की बातों को कहने-सोचने का वक्त काफी है और दिमाग भी। हुसैन साहब के प्रेमी उनकी बेकार की बातों और कथ्य को प्रगतिशिलता की मिसाल कहते-बताते हैं। उनकी नजर में हुसैन साहब सिर्फ चित्रकार ही नहीं, बल्कि ‘चित्रकारी के भगवान’ हैं। हुसैन साहब को भगवान मानकर कहीं-कहीं पूजा भी जाता है। तथाकथित प्रगतिशील जमात उनकी शान में उनकी हैसियत से कहीं ज्यादा ‘कसीदे’ पढ़ती व गढ़ती है। हुसैन साहब की आड़ी-तिरछी लकीरों को वे मार्डन या प्रोग्रेसिव आर्ट कहते-बताते हैं। वे उनकी आड़ी-तिरछी लकीरों पर इस कदर फिदा हैं कि अपना दिल तक उन्हें निकालकर दे सकते हैं, अगर वे कहें।

खैर, मैं कला की न कोई बहुत बड़ी जानकार हूं, न ही कला मेरा विषय रहा है। परंतु कला के प्रति रूचि और संवेदना को रखते हुए तस्वीरों के अच्छे-बुरे पक्ष को समझ तो सकती ही हूं। पता नहीं क्यों, हुसैन साहब की चित्रकला में मुझे न कला नजर आती है न संवेदना न ही कोई संदेश। आड़ी-तिरछी लकीरों के बीच रंगे-पूते चित्र पता नहीं किस आधुनिक कला को दर्शाते हैं, ये या तो हुसैन साहब जाने या उनके अंध-प्रेमी।
बहरहाल, मुद्दे पर आती हूं। हुसैन साहब कला से ज्यादा हुस्न के दीवाने रहते हैं। कमसीन शरीर उन्हें अच्छा लगता है। कहना चाहिए, दीवानगी की हद तक अच्छा लगता है। कभी किसी जमाने में वे माधुरी दीक्षित के अन्यन प्रेमी हुआ करते थे। उन्हें, दरअसल, माधुरी से नहीं उनके ‘कमसीन हुस्न’ से प्यार था। हुसैन साहब ने माधुरी की कई पेंटिंगस बनाईं। जब पेंटिंगस से दिल न भरा, तो उन्होंने उनके साथ एक ‘असफल फिल्म’ भी बना डाली। उस फिल्म को मैंने भी देखा था, पर अफसोस फिल्म के अंत तक समझ नहीं पाई कि हुसैन साहब दर्शकों को आखिर कहना, दिखाना या समझाना क्या चाहते हैं?
समय गुजरा। माधुरी की शादी हुई। उनका हुस्न भी थोड़ा ढला। देखते-देखते हुसैन साहब के दिलो-दिमाग से माधुरी की तस्वीर उतरने लगी और नई-नई तस्वीरें वहां जगह पाने लगीं। हुसैन साहब करते भी क्या तमाम पुरुषों की तरह उन्होंने भी पुरुष-दिमाग ही पाया है।
सुना है कि अब उनकी रंगीन दुनिया में एक और नई हुस्नवाली आ गई है। नाम है, अमृता राव। जी हां, ‘विवाह’ और ‘वेल्कम टू सज्जनपुर’ वाली अमृता राव। फिदा हुसैन अमृता राव पर फिदा हैं। वे उनके साथ ईद मनाना चाहते हैं और ‘वेल्कम टू सज्जनपुर’ भी देखना चाहते हैं। अमृता के हुस्न की तारीफ में हुसैन कहते हैं, ‘अमृता तो खुदा की बनाई हुई परफेक्ट पेंटिग हैं। उनकी बाडी लैंग्वेज इस कदर खूबसूरत है कि उसे बस कैनवस पर ही कैपचर किया जा सकता है।’ हुसैन साहब, जहां तक मुझे ध्यान पड़ता है, कुछ ऐसी ही बातें आपने माधुरी दीक्षित को देखकर भी कही थीं। यानी आप नए-नए हुस्न को देखकर अपनी कला के मापदंड़ों में रदो-बदल करते रहते हैं, मुबारक हो।
हुसैन साहब शायद इतनी प्रसिद्धि कभी नहीं पा पाते, अगर उन्होंने उन विवादास्पद चित्रों को न बनाया होता। भोंड़े चित्रों को बनाकर उन्हें ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ कहना प्रगतिशीलों और खुद हुसैन साहब को गंवारा हो सकता है, लेकिन मैं उसे न कला मानती हूं, न ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। मेरा एक सवाल है प्रगतिशीलों से कि क्या हुसैन साहब को इतनी ही ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ अपने धर्म के ईश्वर के स्कैच को बनाने के लिए मिल या दी जा सकती है?
चलो मान लेते हैं, हुसैन साहब के वे चित्र ‘कला की अभिव्यक्ति’ थे परंतु उस अभिव्यक्ति में कितनी कला या क्या संदेश छिपा था, जरा यह भी तो बताने का कष्ट करें।
आगे चलकर जब सांप्रदायिक विवाद खड़ा हुआ, तब हुसैन साहब चुपचाप यहां से खिसक लिए। उनमें तो तसलीमा नसरीन जैसा हौसला भी नहीं था कि यहां आकर एक दफा अपने विरोधियों से रू-ब-रू होते। लेकिन तसलीमा ने ऐसा किया। उसकी सजा भी उन्हें मिली। मगर वे हारी नहीं। अरे, हुसैन साहब तो मर्द हैं, तसलीमा तो फिर भी औरत हैं। कोई कुछ कहे या माने, मगर मेरी निगाह में तसलीमा का कद हुसैन साहब से कहीं ज्यादा बड़ा और सम्मानीय है और हमेशा ही रहेगा।
साभार :http://anuja916.blogspot.com/2008/09/blog-post_28.html

>वैसे लोग जो उत्तेजित होते हैं माँ का स्तन देखकर

>


मैं एक अच्छा हिन्दू हूँ
खजुराहो और कोणार्क के बारे में मैं कुछ भी नहीं जानता
कामसूत्र को मैंने हाथ से छुआ तक नही
दुर्गा और सरस्वती को नंगे रूप में देखूं तो
मुझे स्वप्न दोष की परेशानी होगी
हमारे देवी -देवताओं के जननेद्रिय नहीं होते
जो भी थे उन्हें हमने काशी और कामख्या में प्रतिष्ठित किया

कबीर के राम को हमने अयोध्या में बंदी बनाया
गाँधी के राम को हमने गाँधी के जन्मस्थान में ही जला दिया ।
आत्मा को बेचकर इस गेरुए झंडे को खरीदने के बाद
और किसी भी रंग को देखूं तो मैं आग बबूला हो जाऊँगा ।
मेरी पतलून के नीचे छुरी है ।
सर चूमने के लिए नहीं काट-काट कर नीचे गिराने के लिए ॥

रचनाकार : के ० सच्चिदानंदन (अनुवाद : एम०एस विश्वभरण )

साभार : नया ज्ञानोदय , अप्रैल ०९ ////

पाठकों के लिए बड़ी मेहनत से वर्तमान साहित्य की दुनिया में छाये विषयों में से एक संघ के बहाने “हिंदू गाली गान “ की परम्परा के इस उत्कृष्ट कविता को पेश कर रहा हूँ । कविता के रंगे गए पंक्तियों को पढ़े उसके भावों को समझें फ़िर अपनी टिप्पणी जरुर दें । कवि की कल्पनाशीलता खुशवंत जी जैसे उच्च कोटि के वयोवृद्ध साहित्यकार से मिलती-जुलती है जिनकी हर बात घुटने से ऊपर और कमर के बीच ख़त्म हो जाती है । हो सकता है ऐसे लोग अपनी सगी माँ के बारे में भी ऐसा ही ख्याल रखते होंगे । एक बड़ी गलती है इस कवि की जो अभिव्यक्ति के नाम पर भावनाएं भड़काने के आरोप सिद्ध हो सकने वाली कविता लिखते हैं । आदमी अपनी माँ को नंगा देख भी ले तब भी स्वप्नदोष की बात मानवीय गुणों से परे और ओछी है । भारतीय समाज कभी भी किसी के धार्मिक भावनाओ पर चोट का अधिकार नही देता है ऐसे में ये पंक्तियाँ निश्चित ही उनके नाजायज होने की चुगली करता है । अगर हम बात करे हुसैन की जिन्होंने हिंदुत्व की भावनाओं को आहत करने के लिए हिंदू देवी देवताओं का संभोगरत चित्र बनाकर अपनी खोखली मानसिकता का परिचय दिया था । वहीँ ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इन महाशय के पैदाइश में भी जनाब हुसैन की मेहनत हो क्योंकि हमारे क्षेत्र में एक कहावत बड़ा ही मशहूर है कि “बेटा कितना भी आगे क्यों न चला जाए उसमें अपने पिता का मानसिक गुण थोड़ा बहुत जरुर रहता है ।” और अगर हम दोनों के मानसिक स्तर की बात करें तो ये हुसैन से भी कही ज्यादा पतित नजर आते है । अन्तर केवल इतना है कि हुसैन ने माध्यम चित्र को बनाया और इस महाशय ने शब्दों को ।

>मुम्बईया नीली फिल्मों को ऑस्कर जरुर मिलना चाहिए

>

पिछले दिनों परीक्षाओं में व्यस्त होने के कारण अख़बार ढंग से पढ़ पाना संभव नही हो पता रहा । आज पुराने जनसत्ता के अंको को पलट रहा था तो राज किशोर और के ० विक्रम सिंह के बीच मकबूल फ़िदा हुसैन की विवादित पेंटिग को लेकर चल रही बहस पर नजर टिक गई । महीनोंसे सुप्त पड़े मुद्दे को इस बहस ने एक बार फ़िर सेकुलरों के लिए मसाला तैयार कर दिया है । अब फ़िर तीन -चार महीने तक इस मुद्दे पर कलम घसीटी हो सकती है । मैं तो यही मानता हूँ ऐसे मुद्दों को जितनी कम तूल दी जाए बेहतर होगा । हुसैन की कुछ पेंटिंग्स मैंने भी देखी हैं जिसे के ० विक्रम सिंह , राजेन्द्र यादव , अरुंधती राय आदि सेकुलर लोग कला का उत्कृष्ट नमूना बताते हुए उसकी तुलना खजुराहो की नायाब कला कृतियों से करते हैं । पिछले वर्ष एक मुस्लिम बहुल विश्विद्यालय के समारोह में राजेंद्र यादव ने माँ सरस्वती वाली विवादित पेंटिंग का अर्थ समझाते हुए कहा था – ” पेंटिंग में सरस्वती जो विद्या का प्रतीक हैं उसके साथ एक राक्षस नुमा व्यक्ति को संभोगरत दिखाया है अर्थात सरस्वती यानि विद्या या शिक्षा का सम्भोग आज बाजार कर रहा है । ” और इस तरह उस चित्र की कितनी साफगोई से बचा ले गए राजेंद्र यादव जी । वहीँ पर मैंने उनसे पूछा था -“महोदय क्या यह चित्र संभोगरत होने के बजायकिसी और थीम से नही बनाई जा सकती थी ? जैसा आपने अर्थ स्पष्ट किया उस आधार पर कई तरीके हो सकते थे यह दिखने के लिए मसलन राक्षस माँ सरस्वती यानि शिक्षा की साडी खिंच रहा होता आदि- आदि । और अगर नग्नता हीं कलासौन्दर्य की कसौटी है तो मुम्बईया नीली फिल्मों को जरुर आस्कर मिलना चाहिए ! ” दरअसल ये अकेले इनकी समस्या नही है। आज कलाकार से ज्यादा समीक्षक हो गए हैं जो अनाप शनाप अर्थ निकल कर किसी भी कलाकृति अथवा रचना की व्याख्या कर देते हैं , जबकि व्याख्या का अधिकार को दर्शक का होना चाहिए । कला समीक्षकों को लक्ष्य कर बनाई गई एक शोर्ट फ़िल्म देखी थी ।” फ़िल्म में एक बेहद कंगाल आदमी रहता है जिसकी झोपडी के पास अमीरों के फार्म हॉउस हैं । उन्ही फार्म हाउसों में से एक में रहने वाली एक बेहद खुबसूरत महिला से वो प्रेम करता है । अपनी गरीबी की हालत समझते हुए वो कुछ भी बोलने में संकोच करता है । हर रोज साहस करता है पर कुछ कह नही पाता। औरों से नजरें बचा कर उसे कनखियों से देखना यही उसका कम रहता है । एक दिन वह काफी दुखी था । वो अपनी महबूबा को एक उपहार देकर दिल की बात बताना चाहता है । लेकिन उसके पास देने के लिए कुछ भी नही । अपनी फटेहाली से नाराज और व्यथित होकर वो उपहार की तलाश में जंगल की और चलता है । जंगल में थोडी दूर जाने पर उसे सुखा हुआ मानव मल (विष्ठा ) दिकाई देता है जिसे वो उठा कर ले आता है और सीसे की एक बर्तन में डाल कर उस महिला को दे आता है । महिला उसे अपने टेबल पर सजा कर रख देती है । इन बातो से बेखर महिला समझती है ये कोई नायाब चीज है । शाम को एक पार्टी होती है महिला के घर पर लोग-बाग़ उस चीज को देख कर आकर्षित होते हैं और पूछते हैं क्या है । वो नही बता पति पर कहती है मुझे उस झोपडे में रहने वाले ने उपहार में दी है । अब इन कला पारखियों की दृष्टि तो देखिये मानव के सूखे मल में इन्हे एक उत्कृष्ट कलाकृति नजर आती है । इनका पागलपन इस कदर होता है की उस व्यक्ति को धुंध कर उससे इसी तरह के और उपहारों की मांग की जाती है । तो कोई उस व्यक्ति के साथ हिस्सेदारी में इसका व्यापार करना चाहता है । हालत ये हो जाती है किलोगों को सच्चाई बताने से डरने कि वजह से उस व्यक्ति को ८-१० लोग भाड़े पर रखना पड़ता है जो इस उपहार का उत्पादन कर सकें । “ मेरा ख्याल है पर इस कहानी से के ० विक्रम और राजेंद्र यादव सरीखे व्याख्या करने वाले समीक्षकों की असलियत समझ में आ गई होगी ।