>नक्सलियों के समर्थन में आये बौद्धिक चिट्ठाकार को जबाव जब बन्दूक थाम ली तब याचना कैसी ?

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वाह री बौद्धिकता ! जब से नक्सलियों / माओवादियों के सफाए के लिए वायु सेना की तैयारी से जुड़ी रपट और चिदंबरम का बयान मीडिया में उछाला गया है तभी से कुछ हिंदी चिट्ठों के स्वनामधन्य बौद्धिक लेखक  इसे  सत्ता का दमनकारी चरित्र  और वर्तमान हालात को आपातकाल से भी बदतर बता रहे हैं . हिंदी के लेखकों को माओवादियों /नक्सलवादी/ उग्रवादी (तथाकथित क्रांतिकारी ) के मानवाधिकारों की रक्षा में खड़े होने का आह्वान किया जा रहा है .यही वो लोग हैं जो अक्सर आतंकवादियों के पक्ष में भी चिल्लाने से नहीं चूकते और दिल्ली के बौद्धिक वेश्यावृत्ति के गलियारों में इन्हें सम्मानपूर्वक एक आदर्श पत्रकार ,  लेखक,आलोचक , बुद्धिजीवी ,समाजसेवी पुकारा जाता है . इसी टोली के कुछ लोग जो कल तक साहित्य की दुनिया के सामंतों के बिस्तर गर्म करने के लिए सारे इन्तजाम देखा करते थे ,आज बस्तर के जंगलों में समाजसेवा का स्वांग रचा रहे हैं ! मानवता की रक्षा के नाम पर पाशविक कृत्यों को अंजाम देने वाले इन वादियों ( नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद/ उग्रवाद …) के वाद को मानसिक खुराक पहुंचाने वाले ऐसे लोग सेकुलर ,प्रगतिशील , और ना जाने कितने उपाधियों से लैश होते हैं . जबकि प्रगति के बजाय इनके एक -एक काम विध्वंश के साक्षी होते हैं .
                                                                              मानवता के खिलाफ जारी तमाम हिंसक संघर्षों को राज्य की विफलता से जनता में उपजे असंतोष का नतीजा बताने की जिम्मेदारी लिए घूमने वाले इन बौद्धिक लोगों को भला कौन समझाए ? ये तो अपनी ही धुन में जिद्दी बने बैठे हैं ! क्या इन्हें नहीं पता कि जिस भारतीय लोकतंत्र की दुहाई दे रहे हैं वहां की सरकार बहुमत ने चुनी है . पहले की तरह चुनावों में भ्रष्टाचार भी नहीं होता है . कुल मिला कर जनता की सरकार है . क्या सर्वहारा / धर्म /सम्प्रदाय /क्षेत्र  आदि के नाम पर हिंसक संघर्ष जायज है ? और जो लोग बौद्धिकता का दावा करते हुए हिंसा का समर्थन करते हैं अथवा उसे किसी घटना का पर्याय बताते हैं वो सही है ? अकसर आप सुनते होंगे , कभी कोई ब्लास्ट हुआ तो  दिल्ली में बैठे लोकतंत्र के नाजायज औलादों द्वारा कहा जाता है कि यह तो फलाने दंगे का , नरसंहार का , विवादित स्थल तोड़े जाने का नतीजा है . कहीं पर सामूहिक रूप से नक्सल हिंसा में आम जन की मौत हो जाए तब भी बचाव में आवाज आती है कि यह सरकार द्वारा उपेक्षित,पूंजीवादियों द्वारा सताए लोगों का विरोध है . लेकिन इस बात को नहीं देखते कि ऐसे हिंसक हमलों में कौन मारा जाता है ? क्या देश और समाज को चलाने वाले नीति निर्धारक या पूंजीवादी  मारे जाते हैं ? नहीं , यहाँ भी आम नागरिक ही शिकार होता है . क्या आम आदमी हीं तो माओवादी है कहने से काम चल जायेगा ?काम नहीं चलेगा , अब जबाव देना होगा इनको कि क्या बिहार के खगरिया में मारे गये सोलह निर्दोष किसान , झारखण्ड में मारा गया पुलिस अधिकारी , असाम में मारे गये लोग आम आदमी नहीं थे ? क्या हिंसक हमलों में मृत इन नागरिकों का कोई  मानव अधिकार / संवैधानिक अधिकार नहीं था ? परन्तु , अफजल और कोबाड़ जैसे नरभक्षियों के प्रति सहानुभूति का प्रदर्शन करने वाले इन कलम के दलालों को लाल ,पीले ,हरे, चश्मे से वास्तविकता नज़र नहीं आती है . 
                                                            नक्सली हिंसा को प्रत्युत्तर देने से खफा होकर मानसिक समर्थन करने वाले ऐसे ही एक ब्लॉग पर एक औसत बुद्धि वाले (क्योंकि साहब इनके कथन से इन्हें बौद्धिक तो नहीं माना जा सकता ! ) इंसान  khattu_mitthu ने कहा भारत जैसे लोकतंत्र में !!!  भारत कैसा लोकतंत्र है ? जिसमें चाहे जो बंदूक उठाले ! और जब बंदूक उठाली है तो याचना कैसी !होना तो यह चाहिये कि माओवादी, नक्सलवादी अपने बुद्धिजीवी समर्थकों को अधिकृत करें और वे बुद्धिजीवी सरकार के पास जायें कि हम रखेंगें माओवादी, नक्सलवादियों का पक्ष हमसे बात कीजिये, हम अदालतों में रखेंगे उनका पक्ष। साथ में माओवादियों, नक्सलवादियों को यह भी समझायेंगे कि जब गोली चलायें तो निशाना केवल उसी को बनायें जो वास्तव में उनकी हालत या दुखों के लिये जिम्मेदार है, उनको नहीं जो उन्हीं जैसे मजलूम हैं। जिन हाथों में नीति निर्माण नहीं है, बजट नहीं है, क्षमता नहीं है उन्हीं का लूट-काट करने से स्थितियां नहीं बदलेंगी। सरकार तो शायद इनसे बात कर भी ले लेकिन माओवादी, नक्सलवादी क्या इन्हें अधिकृत करते हैं?बुद्धिजीवी के लिये तो यह दुकान चलाने का स्कोप भर है।  आपको उनसे है वफ़ा की उम्मीद ,जो नहीं जानते वफ़ा क्या है !”
                                                                                फिलवक्त , बुद्धिजीवी लोगों के हाथों में लाल ,हरा, भगवा,नीला, झंडा न होकर सफ़ेद झंडे की आवश्यकता है क्योंकि सफ़ेद सच और अहिंसा का प्रतीक है  . और एक ऐसा रंग भी जिसपर जरुरत के हिसाब से विभिन्न रंगों को चढाया जा सकता है . नहीं तो सरकार की हुंकार साफ़ है . बहुत हो गयी याचना अब रण होगा . हर हिंसक वाद का जबाव देने की जरुरत आन पड़ी है . अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब श्रीलंका सरकार ने  संसार की सबसे सुगठित आतंकी संगठन लिट्टे को निबटाया था . 
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>डा. श्याम गुप्त केी ्गज़ल

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अपनी मर्ज़ी से चलने का सभी को हक है।
कपडे पहनें,उतारें,न पहनेसभी को हक है।


फ़िर तो औरों की भी मर्ज़ी है,कोई हक है,
छेडें, कपडे फ़ाडेंया लूटें,सभी को हक है।

और सत्ता जो कानून बनाती है सभी,
वो मानें, न मानें,तोडें, सभी को हक है।

औरों के हक की न हद पार करे कोई,
बस वहीं तक तो मर्ज़ी है,सभी को हक हैं।

अपने-अपने दायित्व निभायें जो पहले,
अपने हक मांगने का उन्हीं को तो हक है।

सत्ता के धर्म केनियम व सामाज़िक बंधन,
ही तो बताते हैं,क्या-क्या सभी के हक हैं।

देश का,दीन का,समाज़ का भी है हक तुझ पर,
उसकी नज़रों को झुकाने का न किसी को हक है।

सिर्फ़ हक की ही बात न करे कोई ’श्याम,
अपने दायित्व निभायें, मिलता तभी तो हक है