फ़िल्मी मौत : क्या सीन है !

हिन्दी फ़िल्मों से हम प्यार करते हैं वे कैसी भी हों, हम देखते हैं, तारीफ़ करते हैं, आलोचना करते हैं लेकिन देखना नहीं छोडते, इसी को तो प्यार कहते हैं । हमारी हिन्दी फ़िल्मों में मौत को जितना “ग्लैमराईज” किया गया है उतना शायद और कहीं नहीं किया गया होगा । यदि हीरो को कैन्सर है, तो फ़िर क्या कहने, वह तो ऐसे मरेगा कि सबकी मरने की इच्छा होने लगे और यदि उसे गोली लगी है (वैसे ऐसा कम ही होता है, क्योंकि हीरो कम से कम चार-छः गोलियाँ तो पिपरमेंट की गोली की तरह झेल जाता है, वो हाथ पर गोली रोक लेता है, पीठ या पैर में गोली लगने पर और तेज दौडने लगता है), खैर… यदि गोली खाकर मरना है तो वह अपनी माँ, महबूबा, दोस्त, जोकरनुमा कॉमेडियन, सदैव लेटलतीफ़ पुलिस आदि सबको एकत्रित करने के बाद ही मरता है । जितनी देर तक वो हिचकियाँ खा-खाकर अपने डॉयलॉग बोलता है और बाकी लोग मूर्खों की तरह उसका मुँह देखते रहते हैं, उतनी देर में तो उसे गौहाटी से मुम्बई के लीलावती तक पहुँचाया जा सकता है । हीरो गोली खाकर, कैन्सर से, कभी-कभार एक्सीडेंट में मरता तो है, लेकिन फ़िर उसकी जगह जुडवाँ-तिडवाँ भाई ले लेता है, यानी कैसे भी हो “फ़ुटेज” मैं ही खाऊँगा ! साला..कोई हीरो आज तक सीढी से गिरकर या प्लेग से नहीं मरा ।
चलो किसी तरह हीरो मरा या उसका कोई लगुआ-भगुआ मरा (हवा में फ़डफ़डाता दीपक अब बुझा कि तब बुझा..बच्चा भी समझने लगा है कि दीपक बुझा है मतलब बुढ्ढा चटकने वाला है…) फ़िर बारी आती है “चिता” की और अंतिम संस्कार की । उज्जैन में रहते हुए इतने बरस हो गये, लोग-बाग दूर-दूर से यहाँ अंतिम संस्कार करवाने आते हैं, आज तक सैकडों चितायें देखी हैं, लेकिन फ़िल्मों जैसी चिता… ना.. ना.. कभी नहीं देखी, क्या “सेक्सी” चिता होती है । बिलकुल एक जैसी लकडियाँ, एक जैसी जमी हुई, खासी संख्या में और एकदम गोल-गोल, “वाह” करने और तड़ से जा लेटने का मन करता है… फ़िर हीरो एक बढिया सी मशाल से चिता जलाता है, और माँ-बहन-भाई-दोस्त या किसी और की कसम जरूर खाता है, और इतनी जोर से चीखकर कसम खाता है कि लगता है कहीं मुर्दा चिता से उठकर न भाग खडा हो…। यदि चिता हीरोईन की है, और वो भी सुहागन, फ़िर तो क्या कहने । चिता पर लेटी हीरोईन ऐसी लगती है मानो “स्टीम बाथ” लेने को लेटी हो और वह भी फ़ुल मेक-अप के साथ । हीरो उससे कितना भी लिपट-लिपट कर चिल्लाये, मजाल है कि विग का एक बाल भी इधर-उधर हो जाये, या “आई-ब्रो” बिगड़ जाये, चिता पूरी जलने तक मेक-अप वैसा का वैसा । शवयात्रा के बाद बारी आती है उठावने या शोकसभा की । हीरो-हीरोईन से लेकर दो सौ रुपये रोज वाले एक्स्ट्रा के कपडे भी एकदम झकाझक सफ़ेद..ऐसा लगता है कि ड्रेस-कोड बन गया हो कि यदि कोई रंगीन कपडे पहनकर आया तो उसे शवयात्रा में घुसने नहीं दिया जायेगा । तो साथियों आइये कसम खायें कि जब भी हमारी चिता जले ऐसी फ़िल्मी स्टाईल में जले, कि लोग देख-देखकर जलें । जोर से बोलो…हिन्दी फ़िल्मों का जयकारा…

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फ़िल्मी मौत : क्या सीन है !

हिन्दी फ़िल्मों से हम प्यार करते हैं वे कैसी भी हों, हम देखते हैं, तारीफ़ करते हैं, आलोचना करते हैं लेकिन देखना नहीं छोडते, इसी को तो प्यार कहते हैं । हमारी हिन्दी फ़िल्मों में मौत को जितना “ग्लैमराईज” किया गया है उतना शायद और कहीं नहीं किया गया होगा । यदि हीरो को कैन्सर है, तो फ़िर क्या कहने, वह तो ऐसे मरेगा कि सबकी मरने की इच्छा होने लगे और यदि उसे गोली लगी है (वैसे ऐसा कम ही होता है, क्योंकि हीरो कम से कम चार-छः गोलियाँ तो पिपरमेंट की गोली की तरह झेल जाता है, वो हाथ पर गोली रोक लेता है, पीठ या पैर में गोली लगने पर और तेज दौडने लगता है), खैर… यदि गोली खाकर मरना है तो वह अपनी माँ, महबूबा, दोस्त, जोकरनुमा कॉमेडियन, सदैव लेटलतीफ़ पुलिस आदि सबको एकत्रित करने के बाद ही मरता है । जितनी देर तक वो हिचकियाँ खा-खाकर अपने डॉयलॉग बोलता है और बाकी लोग मूर्खों की तरह उसका मुँह देखते रहते हैं, उतनी देर में तो उसे गौहाटी से मुम्बई के लीलावती तक पहुँचाया जा सकता है । हीरो गोली खाकर, कैन्सर से, कभी-कभार एक्सीडेंट में मरता तो है, लेकिन फ़िर उसकी जगह जुडवाँ-तिडवाँ भाई ले लेता है, यानी कैसे भी हो “फ़ुटेज” मैं ही खाऊँगा ! साला..कोई हीरो आज तक सीढी से गिरकर या प्लेग से नहीं मरा ।

चलो किसी तरह हीरो मरा या उसका कोई लगुआ-भगुआ मरा (हवा में फ़डफ़डाता दीपक अब बुझा कि तब बुझा..बच्चा भी समझने लगा है कि दीपक बुझा है मतलब बुढ्ढा चटकने वाला है…) फ़िर बारी आती है “चिता” की और अंतिम संस्कार की । उज्जैन में रहते हुए इतने बरस हो गये, लोग-बाग दूर-दूर से यहाँ अंतिम संस्कार करवाने आते हैं, आज तक सैकडों चितायें देखी हैं, लेकिन फ़िल्मों जैसी चिता… ना.. ना.. कभी नहीं देखी, क्या “सेक्सी” चिता होती है । बिलकुल एक जैसी लकडियाँ, एक जैसी जमी हुई, खासी संख्या में और एकदम गोल-गोल, “वाह” करने और तड़ से जा लेटने का मन करता है… फ़िर हीरो एक बढिया सी मशाल से चिता जलाता है, और माँ-बहन-भाई-दोस्त या किसी और की कसम जरूर खाता है, और इतनी जोर से चीखकर कसम खाता है कि लगता है कहीं मुर्दा चिता से उठकर न भाग खडा हो…।

यदि चिता हीरोईन की है, और वो भी सुहागन, फ़िर तो क्या कहने । चिता पर लेटी हीरोईन ऐसी लगती है मानो “स्टीम बाथ” लेने को लेटी हो और वह भी फ़ुल मेक-अप के साथ । हीरो उससे कितना भी लिपट-लिपट कर चिल्लाये, मजाल है कि विग का एक बाल भी इधर-उधर हो जाये, या “आई-ब्रो” बिगड़ जाये, चिता पूरी जलने तक मेक-अप वैसा का वैसा । शवयात्रा के बाद बारी आती है उठावने या शोकसभा की । हीरो-हीरोईन से लेकर दो सौ रुपये रोज वाले एक्स्ट्रा के कपडे भी एकदम झकाझक सफ़ेद..ऐसा लगता है कि ड्रेस-कोड बन गया हो कि यदि कोई रंगीन कपडे पहनकर आया तो उसे शवयात्रा में घुसने नहीं दिया जायेगा । तो साथियों आइये कसम खायें कि जब भी हमारी चिता जले ऐसी फ़िल्मी स्टाईल में जले, कि लोग देख-देखकर जलें । जोर से बोलो…हिन्दी फ़िल्मों का जयकारा…

हिन्दी फ़िल्म निर्देशकों की कल्पनाशीलता

भारत में फ़िल्में आम जनजीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं । आम आदमी आज भी फ़िल्मों के आकर्षण में इतना बँधा हुआ है कि कई बार वह दिखाये जाने वाले दृश्यों को असली समझ लेता है, खासकर यह स्थिति किशोरवय एवं युवा वर्ग के दर्शकों के साथ ज्यादा आती है । एक बार महानायक अमिताभ बच्चन ने एक मुलाकात में कहा भी था कि “फ़िल्म माध्यम खासकर मसाला और मारधाड़ वाली फ़िल्में ‘मेक बिलीव’ का अनुपम उदाहरण होती हैं” अर्थात जो दिखाया जा रहा है दर्शक उस पर विश्वास करें, चाहे वह “किडीकाँप” अमिताभ द्वारा दस-बीस गुण्डों की पिटाई हो, या शाहरुख खान द्वारा मानेक ईरानी, पुनीत इस्सर या महेश आनन्द जैसे बॉडी बिल्डरों की धुँआधार धुलाई का, या हीरो द्वारा चूँ…….की आवाज के साथ जमीन से सीधे दूसरी मंजिल तक की छलांग हो, या घोडे दौडाकर ट्रेन को पकडना हो, तात्पर्य यह कि जो भी दिखाया जाये दर्शक उसे झेल जाये और उफ़ तक ना करे उसे कहते हैं मेक बिलीव । लेकिन हमारी हिन्दी फ़िल्मों के निर्देशकों की कल्पनाशीलता का कोई मुकाबला नहीं कर सकता, चाहे वे स्टीवन स्पीलबर्ग हों जिन्होंने मात्र कल्पना से डायनासोर दिखाकर लोगों से करोडों रुपये झटक लिये,या फ़िर ऑर्नोल्ड महोदय हों जो टर्मिनेटर श्रंखला की बदौलत ही कैलीफ़ोर्निया के गवर्नर बन गये, या फ़िर जैकी चैन और ब्रूस ली की फ़िल्में हों जिसमें वे दोनो बन्दर की तरह कूदते हुए जाने क्या-क्या करतब दिखाते फ़िरते हैं, लेकिन फ़िर भी वे हमारे हिन्दी हीरो का मुकाबला नहीं कर सकते….जरा एक उदाहरण देखिये… फ़िल्म हीरालाल-पन्नालाल में हमारे गरीबों के अमिताभ यानी मिथुन दा एक पहाडी से लटक रहे हैं, खाई में अब गिरे कि तब गिरे, तभी वहाँ एक शेर आ जाता है, और… नहीं..नहीं आप गलत सोचने लगे…मिथुन दा को खाता नहीं है, बल्कि अपना एक पंजा बढाकर मिथुन दा को वापस ऊपर जमीन पर न सिर्फ़ खीच लेता है, बल्कि दोनों पंजे जोडकर नमस्कार भी करता है (बैकग्राऊँड में माँ शेरों वाली का भजन जो चल रहा होता है)… यह सीन देखकर मैं धन्य-धन्य हो गया, हिन्दी फ़िल्मों में मेरी आस्था ऐसे चिपक गई जैसे फ़ेविकोल का मजबूत जोड हो… तभी मैने तय कर लिया था कि मैं भी कुछ धाँसू सीन लिखूँगा, ऐसे सीन जो आज तक विश्व सिनेमा ने कभी देखे नहीं होंगे ना सोचे होंगे… तो पेश हैं हमारी महान हिन्दी फ़िल्मों के भविष्य में आने वाले कुछ दृश्य….
(१) फ़िल्म ‘नरसिम्हा’ में हमारा पंजाबी पुत्तर सनी देओल खंभा फ़ाडकर बाहर निकल आता है, यह बात तो बहुत पुरानी हो गई है, आने वाली फ़िल्म में एक दृष्य ऐसा होगा… सनी देओल विलेन के अड्डे पर भीषण मारधाड करता है, तभी वहाँ रखे खाली खोकों में विस्फ़ोट होने लगते हैं (यह ना पूछना कि हमेशा विलेन के अड्डे पर सैकडों खाली खोके क्यों रखे रहते हैं)… उन विस्फ़ोटों से सारी इमारत भरभराकर ढहने लगती है, तभी सनी देओल उस इमारत का बीच का एक पिलर दाँये हाथ से पकडकर खडा हो जाता है और गिरती इमारत को थाम लेता है । तभी वहाँ उसकी माँ आ जाती है (फ़िल्म का अन्त आने पर माँ-बाप जरूर आते हैं), उसके हाथ में पंजाब के गेहूँ से बनी रोटी है और वह बे…….टा करते हुए उससे गले मिलने की जिद करती है.. अब सनी देओल क्या करेगा ? जी हाँ आप सोच भी नहीं सकते, वह अपना हाथ उस पिलर से हटाकर पिलर को अपनी पीठ पर टिका लेता है और दोनों गले मिलते हैं, और सनी भाई रोटी के साथ गाँव की कसम खाना नहीं भूलता…. है ना आँसू लाने वाला धाँसू सीन…. अब अगला सीन..
(२) एक फ़िल्म में हमारे अक्षय भाई को ब्रेन ट्यूमर हो जाता है, डॉक्टर ने भी हाथ ऊँचे कर दिये हैं (जैसा कि वह हर फ़िल्म में करता है – “अब इनकी जिन्दगी ऊपर वाले के हाथ में है, इन्हें दवा की नहीं दुआ की जरूरत है” दुआ भी हीरोईन की या माँ की हो और जोर-जोर से घँटियाँ बजाते हुए हो तो और भी जल्दी ठीक होंगे), खैर, फ़िर भी अक्षय क्लाईमैक्स तक किसी तरह जिन्दा रहते हैं । सारी पट्टियाँ और सलाईन तोडते हुए “अक्की” जब विलेन के अड्डे पर लडने पहुँचते हैं तो उन्हें एक गोली कनपटी में लगती है… और भगवान का चमत्कार देखिये…कि वह गोली अक्षय कुमार का ब्रेन ट्यूमर अपने साथ लेकर दूसरे कान से निकल जाती है, और सभी लोग खुशी-खुशी साथ रहने लगते हैं… जय हो…
(३) आने वाली एक फ़िल्म में मिथुन दा दो गुन्डों से अकेले लड रहे होते हैं (चाहते तो दस से भी लड सकते थे) और उस वक्त उनके पास रिवाल्वर में सिर्फ़ एक गोली बची होती है, अब मिथुन दा क्या करें.. क्या ना करें वाली पोजीशन में आ जाते हैं, परन्तु आप अपने दिमाग की पाव भाजी न बनायें, क्योंकि मिथुन दा अपने एक हाथ में चाकू पकडकर उसकी धार पर वो एकमात्र गोली चलाते हैं, उस गोली के दो टुकडे हो जाते हैं और दोनों गुण्डों को जा लगती है और दोनो ढेर हो जाते हैं (मिथुन दा उवाच… अपुन का नाम है हीरा, अपुन ने सबको चीरा… क्या !)
(४) ऐसे ही एक बार पहलवान (?) आमिर खान की महबूबा को विलेन अगवा करके एफ़िल टावर की छत पर बाँध देता है और आमिर से मिसाईल खरीदी के पेपर माँगता है । आमिर भाई तत्काल एक हेलिकॉप्टर पर सवार होकर (जो एक्स्क्लूसिवली आमिर भाई के लिये ही खाली खडा होता है) एफ़िल टावर पर उडने लगते हैं, उस हेलीकॉप्टर में से सीढी लगी रस्सी से आमिर झूलते जाते हैं… झूलते जाते हैं (इसे दस बार पढा जाये, तभी झूलने का पूरा मजा आयेगा) फ़िर एक हुक लगी रस्सी आमिर फ़ेंकते हैं और… आप क्या सोच रहे हैं… वे हीरोईन को कष्ट देंगे… नहीं… आमिर भाई खुद उस रस्सी पर चलकर एफ़िल टावर की छत पर कूदते हैं, तब तक विलेन देखता रहता है और हेलिकॉप्टर टावर से एक बकरी की तरह बाँध दिया जाता है… तभी धाँय…धाँय… विलेन की गोली से हेलीकॉप्टर उड जाता है… आमिर भाई हीरोईन को बाँहों मे उठाकर एफ़िल टावर से कूदता है… सीधे कुतुबमीनार पर (यह पूछने का टाईम नहीं होता कि एफ़िल टावर और कुतुबमीनार पास-पास कैसे, क्योंकि तुरन्त अगला स्विटजरलैण्ड का सीन आ जाता है)… ऐसे आमिर भाई हीरोईन को भगा ले जाते हैं… सीधे गाना गाने के लिये….
(५) दक्षिण के अमिताभ यानी रजनीकान्त (इस टिप्पणी के लिये रजनीकान्त और अमिताभ दोनों के प्रशंसक मुझे मारेंगे) को एक बार एक विलेन को मारना बहुत जरूरी हो जाता है, वैसी कसम जो उन्होंने खाई हुई थी…लेकिन विलेन एक बहुत ही ऊँची दीवार के उस पार खडा होता है, जहाँ रजनीकान्त हीरो वाली छलाँग लगाकर भी नहीं पहुँच सकते… यहाँ पर रजनीकान्त की कल्पना काम आती है… रजनी बाबू तत्काल दो पिस्तौलें निकालते हैं, एक पिस्तौल को वे ताकत से ऊपर उछालते हैं, जैसे ही वह पिस्तौल दीवार से कुछ ऊपर पहुँचती है, रजनी दूसरी पिस्तौल से पहली पिस्तौल के ट्रिगर पर गोली दागते हैं, जिससे पहली पिस्तौल से गोली चल जाती है, और दीवार के उस पार खडा विलेन जो कि इस चमत्कार को आँखे फ़ाडे देख रहा होता है, मारा जाता है….
(६) एक फ़िल्म के क्लाईमैक्स में संजू बाबा के पास गोलियाँ खतम हो जाती हैं.. अब संजू बाबा क्या करें, विलेन पीछा कर रहा होता है.. संजू बाबा अपनी पुरानी एके ४७ (वही सलेम की दी हुई) निकालते हैं , विलेन भी एके ५६ निकालता है और गोलियों की बरसात कर देता है…(आगे पढकर सिर ना धुनियेगा…) लेकिन संजू बाबा तत्काल अपनी राईफ़ल की मैगजीन खोलते हैं, आने वाली सारी गोलियों को वे उसमें झेलते-भरते जाते हैं, फ़िर पूरी भर जाने के बाद उसे वापस लगाकर अपनी एक४७ से विलेन का खात्मा कर देते हैं….(जब अग्निपथ में बिग बी, गोलियाँ हथेली पर झेल सकते हैं तो संजू बाबा मैगजीन में क्यों नही ?)
ये तो सिर्फ़ कुछेक दृश्य ही बताये हैं, ऐसे अनेकों आईडिया हमारी फ़िल्मों के निर्देशकों के दिमाग में हैं, फ़िर भी पता नहीं क्यों लोग अंग्रेजी फ़िल्मों के पीछे भागते रहते हैं । वैसे तो ऊपर दिये गये सीन खासतौर पर हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री के लिये हैं, लेकिन ये आईडियाज यदि कोई अंग्रेजी निर्देशक अपनी फ़िल्म में लेना चाहे, तो वह हमारा कॉपीराईट शुल्क चुकाकर ले सकता है…. या फ़िर अपनी तरफ़ से थोडी और मगजमारी करके “रीमिक्स” कर ले (सभ्य भाषा में चोरी को रीमिक्स कहते हैं)… फ़िर हम उसका कुछ नहीं बिगाड सकते हैं, क्योंकि रीमिक्स भी हमारी ही देन है….