प्रिये प्राणेश्वरी, हृदयेश्वरी – शुद्ध हिन्दी गाना

हिन्दी फ़िल्मों में अक्सर गीतों को लिखते समय या उनके चित्रीकरण के समय कोई जरूरी नहीं है कि उनका आपस में कोई तालमेल हो ही…हिन्दी फ़िल्मी गीतों के इतिहास को देखें तो हिन्दी के शब्दों का अधिकतम प्रयोग करने वाले गीतकार कम ही हुए हैं, जैसे भरत व्यास, प्रदीप आदि । यह लगभग परम्परा का ही रूप ले चुका है कि उर्दू शब्दों का उपयोग तो गीतों में होगा ही (आजकल तो अंग्रेजी के शब्दों के बिना हिन्दी गीत नहीं बन पा रहे गीतकारों से) इसलिये यह गीत कुछ “अलग हट के” बनता है, क्योंकि इस गीत में शुद्ध हिन्दी शब्दों का खूबसूरती का प्रयोग किया गया है, और कई लोगों को जानकर आश्चर्य होगा कि गीत लिखा है वर्मा मलिक साहब ने (इन्हीं वर्मा मलिक साहब ने शादियों में बजने वाला कालजयी गीत “आज मेरे यार की शादी है” भी लिखा है, इनका दुर्भाग्य यह रहा कि इन्हें अधिकतर “बी” और “सी” ग्रेड की फ़िल्में ही मिलीं जिन्हें फ़िल्मी भाषा में “सुपरहिट” कहा जाता है, वैसी नहीं), गीत को धुनों में बाँधा है कल्याणजी-आनन्दजी ने, फ़िल्म है “हम तुम और वो” (१९७१) तथा गीत को बडे़ मजे लेकर गाया है किशोर दा ने । फ़िल्म में यह गीत फ़िल्माया गया है विनोद खन्ना और भारती पर (दक्षिण की हीरोइन – कुंवारा बाप, मस्ताना, पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण आदि हिन्दी फ़िल्मों में ये दिखाई दी हैं) । मुझे हमेशा लगता है कि यह गीत वर्मा मलिक ने काफ़ी पहले लिख लिया होगा एक कविता के रूप में, लेकिन फ़िल्म की सिचुएशन को देखते हुए शायद कल्याणजी भाई को गीत के रूप में दिया होगा… फ़िल्म में विनोद खन्ना हिन्दी अध्यापक के रोल में भारती से प्रणय निवेदन करते हैं, इसलिये इस गीत को थोडा़ मजाहिया अन्दाज में फ़िल्माया गया है, बीच-बीच में कल्याणजी-आनन्दजी ने जो “बीट्स” दिये हैं, वे दक्षिण के “मृदंगम” का अहसास कराते हैं, लेकिन यदि हम शब्दों पर गौर करें तो पाते हैं कि यह तो एक विलक्षण कविता है.. जिसे गीत का रूप दिया गया है… कई शब्द ऐसे हैं जो अब लगभग सुनाई देना तो दूर “दिखाई” देना भी बन्द हो गये हैं, जैसे चक्षु (आँखें), कुंतल (बालों की लट), श्यामल (काला), अधर (होंठ), भ्रमर (भंवरा), याचक (माँगने वाला), व्यथित (परेशान)… तात्पर्य यह कि कोई-कोई उम्दा शब्दों वाला गीत कई बार अनदेखा रह जाता है…या फ़िल्म में उसके चित्रीकरण से उस गीत के बारे में विशेष धारणा बन जाती है, या फ़िर फ़िल्म के पिट जाने पर लगभग गुमनामी में खो जाते हैं, ऐसे कई गीत हैं…
बहरहाल पहले आप गीत (या कविता) पढिये, इसका तीसरा अन्तरा अधिकतर सुनने में नहीं आता, और मैं भी प्रयास करके दो ही अन्तरे आपको सुनवा सकूँगा..

प्रिये… प्रिये…
प्रिये प्राणेश्वरी.. हृदयेश्वरी, यदि आप हमें आदेश करें तो
प्रेम का हम श्रीगणेश करें… यदि आप हमें आदेश करें तो
प्रेम का हम श्रीगणेश करें…
(१) ये चक्षु तेरे चंचल-चंचल, ये चक्षु तेरे चंचल-चंचल
ये कुंतल भी श्यामल-श्यामल…
ये अधर धरे जीवन ज्वाला, ये रूप चन्द्र शीतल-शीतल
ओ कामिनी… ओ कामिनी मन में प्रवेश करें
यदि आप आदेश करें तो प्रेम का हम श्रीगणेश करें…
(२) हम भ्रमर नहीं इस यौवन के
हम याचक हैं मन उपवन के..
हम भाव पुष्प कर दें अर्पण
स्वीकार करो सपने मन के…
मन मोहिनी… मन मोहिनी, मन में प्रवेश करें…
यदि आप हमें आदेश करें …
(३) हों संचित पुण्यों की आशा
सुन व्यथित हृदय की मृदुभाषा
सर्वस्व समर्पण कर दें हम
करो पूर्ण हमारी अभिलाषा..
गज गामिनी… गजगामिनी दूर क्लेश करें..
यदि आप हमें आदेश करें तो प्रेम का श्रीगणेश करें…

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प्रिये प्राणेश्वरी, हृदयेश्वरी – शुद्ध हिन्दी गाना

हिन्दी फ़िल्मों में अक्सर गीतों को लिखते समय या उनके चित्रीकरण के समय कोई जरूरी नहीं है कि उनका आपस में कोई तालमेल हो ही…हिन्दी फ़िल्मी गीतों के इतिहास को देखें तो हिन्दी के शब्दों का अधिकतम प्रयोग करने वाले गीतकार कम ही हुए हैं, जैसे भरत व्यास, प्रदीप आदि । यह लगभग परम्परा का ही रूप ले चुका है कि उर्दू शब्दों का उपयोग तो गीतों में होगा ही (आजकल तो अंग्रेजी के शब्दों के बिना हिन्दी गीत नहीं बन पा रहे गीतकारों से) इसलिये यह गीत कुछ “अलग हट के” बनता है, क्योंकि इस गीत में शुद्ध हिन्दी शब्दों का खूबसूरती का प्रयोग किया गया है, और कई लोगों को जानकर आश्चर्य होगा कि गीत लिखा है वर्मा मलिक साहब ने (इन्हीं वर्मा मलिक साहब ने शादियों में बजने वाला कालजयी गीत “आज मेरे यार की शादी है” भी लिखा है, इनका दुर्भाग्य यह रहा कि इन्हें अधिकतर “बी” और “सी” ग्रेड की फ़िल्में ही मिलीं जिन्हें फ़िल्मी भाषा में “सुपरहिट” कहा जाता है, वैसी नहीं), गीत को धुनों में बाँधा है कल्याणजी-आनन्दजी ने, फ़िल्म है “हम तुम और वो” (१९७१) तथा गीत को बडे़ मजे लेकर गाया है किशोर दा ने । फ़िल्म में यह गीत फ़िल्माया गया है विनोद खन्ना और भारती पर (दक्षिण की हीरोइन – कुंवारा बाप, मस्ताना, पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण आदि हिन्दी फ़िल्मों में ये दिखाई दी हैं) । मुझे हमेशा लगता है कि यह गीत वर्मा मलिक ने काफ़ी पहले लिख लिया होगा एक कविता के रूप में, लेकिन फ़िल्म की सिचुएशन को देखते हुए शायद कल्याणजी भाई को गीत के रूप में दिया होगा… फ़िल्म में विनोद खन्ना हिन्दी अध्यापक के रोल में भारती से प्रणय निवेदन करते हैं, इसलिये इस गीत को थोडा़ मजाहिया अन्दाज में फ़िल्माया गया है, बीच-बीच में कल्याणजी-आनन्दजी ने जो “बीट्स” दिये हैं, वे दक्षिण के “मृदंगम” का अहसास कराते हैं, लेकिन यदि हम शब्दों पर गौर करें तो पाते हैं कि यह तो एक विलक्षण कविता है.. जिसे गीत का रूप दिया गया है… कई शब्द ऐसे हैं जो अब लगभग सुनाई देना तो दूर “दिखाई” देना भी बन्द हो गये हैं, जैसे चक्षु (आँखें), कुंतल (बालों की लट), श्यामल (काला), अधर (होंठ), भ्रमर (भंवरा), याचक (माँगने वाला), व्यथित (परेशान)… तात्पर्य यह कि कोई-कोई उम्दा शब्दों वाला गीत कई बार अनदेखा रह जाता है…या फ़िल्म में उसके चित्रीकरण से उस गीत के बारे में विशेष धारणा बन जाती है, या फ़िर फ़िल्म के पिट जाने पर लगभग गुमनामी में खो जाते हैं, ऐसे कई गीत हैं…
बहरहाल पहले आप गीत (या कविता) पढिये, इसका तीसरा अन्तरा अधिकतर सुनने में नहीं आता, और मैं भी प्रयास करके दो ही अन्तरे आपको सुनवा सकूँगा..

प्रिये… प्रिये…
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बहरहाल पहले आप गीत (या कविता) पढिये, इसका तीसरा अन्तरा अधिकतर सुनने में नहीं आता, और मैं भी प्रयास करके दो ही अन्तरे आपको सुनवा सकूँगा..

प्रिये… प्रिये…
प्रिये प्राणेश्वरी.. हृदयेश्वरी, यदि आप हमें आदेश करें तो
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(१) ये चक्षु तेरे चंचल-चंचल, ये चक्षु तेरे चंचल-चंचल
ये कुंतल भी श्यामल-श्यामल…
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बरसात पर एक कालजयी गाना

देश के कुछ हिस्सों में बारिश ने अपनी खुश-आमदीद दर्ज करवा दी है, और कुछ में सौंधी खुशबुओं ने समाँ बाँधना शुरु कर दिया है । बरसात के मौसम पर हिन्दी फ़िल्मों मे दर्जनों गीत हैं, बारिश तो मानो गीतकारों के लिये एक “पार्टी” की तरह होती है, एक से बढकर एक गीत लिखे गये बरसात पर, लेकिन जब भी झूम कर बारिश होती है, यह गीत सबसे पहले जुबाँ पर आता है । गाया है सुमन कल्याणपूर और कमल बारोट ने, लिखा है साहिर साहब ने और तर्ज बनाई है रोशन ने, फ़िल्म का नाम है बरसात की रात । इस गीत का प्रारम्भ म्यूजिक के जिस टुकडे़ से होता है, बरसों तक वह धुन विविध भारती के संगीत सरिता की “सिग्नेचर ट्यून” रही । गीत कुछ इस प्रकार है –

गरजत बरसत सावन आयो रे..
गरजत बरसत सावन आयो रे..
लायो ना संग में हमरे बिछडे बलमवा
सखी का करुँ हाय..
गरजत बरसत…

(१) रिमझिम-रिमझिम मेघा बरसे
रिमझिम रिमझिम मेघा बरसे
बरसे, मेघा…
रिमझिम-रिमझिम मेघा बरसे
तरसे जियरवा मीन समान
पड गई पी की लाल चुनरिया
पिया नहीं आये
गरजत बरसत सावन आयो रे…

(२) पल-पल छिन-छिन पवन झकोरे (३ बार)
लागे तन पर तीर समान, तीर समान
सखी लागे तन पर तीर समान
नैनन ढले तो भीगी सजरिया
अगन लगाये…
गरजत-बरसत सावन आयो रे…
लायो ना संग में हमरे बिछडे बलमवा
सखी का करुँ हाय… गरजत-बरसत..

इस प्रकार हमें भिगोता हुआ यह गीत रागों के साथ समाप्त हो जाता है… फ़िर सुनने वाले को इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि यह किस राग पर आधारित है, क्योंकि बारिश में अगर संगीत का साथ है तो फ़िर मन वैसे ही मोर हो जाता है । इस गीत में साहिर ने दो सहेलियों की आपसी छेड़छाड़, उनके प्रेमियों का बरसात में ना आना और उसके कारण उनके तड़पने का सुन्दर वर्णन किया है.. “पवन झकोरे तन पर तीर समान लगते हैं” और “रिमझिम-रिमझिम मेघा बरसने में जिया मीन समान तडपे” एक कोमल लेकिन मन को तृप्त करने वाली शब्द रचना है, और संगीत के तो क्या कहने… रौशन साहब मानो बरसती बूँदों का अपनी धुन और साजों से एक माहौल रच देते हैं और श्रोता सुनते-सुनते स्वतः को बाहर बरामदे में भीगता हुआ पाता है.. । इस गीत में कमल बारोट की आवाज है, जिन्होंने एकल गीत कम ही गाये हैं, लेकिन युगल में लता, आशा, सुमन, महेन्द्र कपूर और रफ़ी आदि के साथ काफ़ी गीत गाये हैं । इनका एक और उल्लेखनीय गीत है पारसमणि फ़िल्म का “हँसता हुआ नूरानी चेहरा..”, उनकी आवाज एक विशिष्ट प्रकार की ध्वनि लिये हुए है, जो कम ही सुनने में आती है…। इसी प्रकार सुमन कल्याणपूर को एक बार लता का विकल्प कहा गया था, उन्होंने गीत भी वैसे ही गाये हैं और कहीं-कहीं तो सुमन को सुनकर लता का आभास भी होता है, जैसे “अजहुँ ना आये बालमा, सावन बीता जाये” अथवा “जूही की कली मेरी लाड़ली” जैसे गीतों में… । बहरहाल… इस गीत को यहाँ क्लिक करके सुनिये और भीगने का आनन्द लीजिये…
(प्रस्तुत चित्र एक दुर्लभ चित्र है जिसमें तलत महमूद, रफ़ी, किशोर, मुकेश, जी.एम.दुर्रानी, मीना कपूर, गीता दत्त, कमल बारोट, मुबारक बेगम इत्यादि दिखाई दे रहे हैं – चित्र http://www.talatmahmood.net से लिया गया है)

बरसात पर एक कालजयी गाना

देश के कुछ हिस्सों में बारिश ने अपनी खुश-आमदीद दर्ज करवा दी है, और कुछ में सौंधी खुशबुओं ने समाँ बाँधना शुरु कर दिया है । बरसात के मौसम पर हिन्दी फ़िल्मों मे दर्जनों गीत हैं, बारिश तो मानो गीतकारों के लिये एक “पार्टी” की तरह होती है, एक से बढकर एक गीत लिखे गये बरसात पर, लेकिन जब भी झूम कर बारिश होती है, यह गीत सबसे पहले जुबाँ पर आता है । गाया है सुमन कल्याणपूर और कमल बारोट ने, लिखा है साहिर साहब ने और तर्ज बनाई है रोशन ने, फ़िल्म का नाम है बरसात की रात । इस गीत का प्रारम्भ म्यूजिक के जिस टुकडे़ से होता है, बरसों तक वह धुन विविध भारती के संगीत सरिता की “सिग्नेचर ट्यून” रही । गीत कुछ इस प्रकार है –

गरजत बरसत सावन आयो रे..
गरजत बरसत सावन आयो रे..
लायो ना संग में हमरे बिछडे बलमवा
सखी का करुँ हाय..
गरजत बरसत…

(१) रिमझिम-रिमझिम मेघा बरसे
रिमझिम रिमझिम मेघा बरसे
बरसे, मेघा…
रिमझिम-रिमझिम मेघा बरसे
तरसे जियरवा मीन समान
पड गई पी की लाल चुनरिया
पिया नहीं आये
गरजत बरसत सावन आयो रे…

(२) पल-पल छिन-छिन पवन झकोरे (३ बार)
लागे तन पर तीर समान, तीर समान
सखी लागे तन पर तीर समान
नैनन ढले तो भीगी सजरिया
अगन लगाये…
गरजत-बरसत सावन आयो रे…
लायो ना संग में हमरे बिछडे बलमवा
सखी का करुँ हाय… गरजत-बरसत..

इस प्रकार हमें भिगोता हुआ यह गीत रागों के साथ समाप्त हो जाता है… फ़िर सुनने वाले को इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि यह किस राग पर आधारित है, क्योंकि बारिश में अगर संगीत का साथ है तो फ़िर मन वैसे ही मोर हो जाता है । इस गीत में साहिर ने दो सहेलियों की आपसी छेड़छाड़, उनके प्रेमियों का बरसात में ना आना और उसके कारण उनके तड़पने का सुन्दर वर्णन किया है.. “पवन झकोरे तन पर तीर समान लगते हैं” और “रिमझिम-रिमझिम मेघा बरसने में जिया मीन समान तडपे” एक कोमल लेकिन मन को तृप्त करने वाली शब्द रचना है, और संगीत के तो क्या कहने… रौशन साहब मानो बरसती बूँदों का अपनी धुन और साजों से एक माहौल रच देते हैं और श्रोता सुनते-सुनते स्वतः को बाहर बरामदे में भीगता हुआ पाता है.. । इस गीत में कमल बारोट की आवाज है, जिन्होंने एकल गीत कम ही गाये हैं, लेकिन युगल में लता, आशा, सुमन, महेन्द्र कपूर और रफ़ी आदि के साथ काफ़ी गीत गाये हैं । इनका एक और उल्लेखनीय गीत है पारसमणि फ़िल्म का “हँसता हुआ नूरानी चेहरा..”, उनकी आवाज एक विशिष्ट प्रकार की ध्वनि लिये हुए है, जो कम ही सुनने में आती है…। इसी प्रकार सुमन कल्याणपूर को एक बार लता का विकल्प कहा गया था, उन्होंने गीत भी वैसे ही गाये हैं और कहीं-कहीं तो सुमन को सुनकर लता का आभास भी होता है, जैसे “अजहुँ ना आये बालमा, सावन बीता जाये” अथवा “जूही की कली मेरी लाड़ली” जैसे गीतों में… । बहरहाल… इस गीत को यहाँ क्लिक करके सुनिये और भीगने का आनन्द लीजिये…
(प्रस्तुत चित्र एक दुर्लभ चित्र है जिसमें तलत महमूद, रफ़ी, किशोर, मुकेश, जी.एम.दुर्रानी, मीना कपूर, गीता दत्त, कमल बारोट, मुबारक बेगम इत्यादि दिखाई दे रहे हैं – चित्र http://www.talatmahmood.net से लिया गया है)

>बरसात पर एक कालजयी गाना

>देश के कुछ हिस्सों में बारिश ने अपनी खुश-आमदीद दर्ज करवा दी है, और कुछ में सौंधी खुशबुओं ने समाँ बाँधना शुरु कर दिया है । बरसात के मौसम पर हिन्दी फ़िल्मों मे दर्जनों गीत हैं, बारिश तो मानो गीतकारों के लिये एक “पार्टी” की तरह होती है, एक से बढकर एक गीत लिखे गये बरसात पर, लेकिन जब भी झूम कर बारिश होती है, यह गीत सबसे पहले जुबाँ पर आता है । गाया है सुमन कल्याणपूर और कमल बारोट ने, लिखा है साहिर साहब ने और तर्ज बनाई है रोशन ने, फ़िल्म का नाम है बरसात की रात । इस गीत का प्रारम्भ म्यूजिक के जिस टुकडे़ से होता है, बरसों तक वह धुन विविध भारती के संगीत सरिता की “सिग्नेचर ट्यून” रही । गीत कुछ इस प्रकार है –

गरजत बरसत सावन आयो रे..
गरजत बरसत सावन आयो रे..
लायो ना संग में हमरे बिछडे बलमवा
सखी का करुँ हाय..
गरजत बरसत…

(१) रिमझिम-रिमझिम मेघा बरसे
रिमझिम रिमझिम मेघा बरसे
बरसे, मेघा…
रिमझिम-रिमझिम मेघा बरसे
तरसे जियरवा मीन समान
पड गई पी की लाल चुनरिया
पिया नहीं आये
गरजत बरसत सावन आयो रे…

(२) पल-पल छिन-छिन पवन झकोरे (३ बार)
लागे तन पर तीर समान, तीर समान
सखी लागे तन पर तीर समान
नैनन ढले तो भीगी सजरिया
अगन लगाये…
गरजत-बरसत सावन आयो रे…
लायो ना संग में हमरे बिछडे बलमवा
सखी का करुँ हाय… गरजत-बरसत..

इस प्रकार हमें भिगोता हुआ यह गीत रागों के साथ समाप्त हो जाता है… फ़िर सुनने वाले को इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि यह किस राग पर आधारित है, क्योंकि बारिश में अगर संगीत का साथ है तो फ़िर मन वैसे ही मोर हो जाता है । इस गीत में साहिर ने दो सहेलियों की आपसी छेड़छाड़, उनके प्रेमियों का बरसात में ना आना और उसके कारण उनके तड़पने का सुन्दर वर्णन किया है.. “पवन झकोरे तन पर तीर समान लगते हैं” और “रिमझिम-रिमझिम मेघा बरसने में जिया मीन समान तडपे” एक कोमल लेकिन मन को तृप्त करने वाली शब्द रचना है, और संगीत के तो क्या कहने… रौशन साहब मानो बरसती बूँदों का अपनी धुन और साजों से एक माहौल रच देते हैं और श्रोता सुनते-सुनते स्वतः को बाहर बरामदे में भीगता हुआ पाता है.. । इस गीत में कमल बारोट की आवाज है, जिन्होंने एकल गीत कम ही गाये हैं, लेकिन युगल में लता, आशा, सुमन, महेन्द्र कपूर और रफ़ी आदि के साथ काफ़ी गीत गाये हैं । इनका एक और उल्लेखनीय गीत है पारसमणि फ़िल्म का “हँसता हुआ नूरानी चेहरा..”, उनकी आवाज एक विशिष्ट प्रकार की ध्वनि लिये हुए है, जो कम ही सुनने में आती है…। इसी प्रकार सुमन कल्याणपूर को एक बार लता का विकल्प कहा गया था, उन्होंने गीत भी वैसे ही गाये हैं और कहीं-कहीं तो सुमन को सुनकर लता का आभास भी होता है, जैसे “अजहुँ ना आये बालमा, सावन बीता जाये” अथवा “जूही की कली मेरी लाड़ली” जैसे गीतों में… । बहरहाल… इस गीत को यहाँ क्लिक करके सुनिये और भीगने का आनन्द लीजिये…
(प्रस्तुत चित्र एक दुर्लभ चित्र है जिसमें तलत महमूद, रफ़ी, किशोर, मुकेश, जी.एम.दुर्रानी, मीना कपूर, गीता दत्त, कमल बारोट, मुबारक बेगम इत्यादि दिखाई दे रहे हैं – चित्र http://www.talatmahmood.net से लिया गया है)

एक फ़ुसफ़ुसाता सा मधुर गीत…

यह गीत कुछ अलग हट कर है, क्योंकि इस गीत में संवादों की अधिकता तो है ही, लेकिन संगीत भी बहुत ही मद्धिम है और संवादों के अलावा जो गीत के बोल हैं वे भी लगभग बोलचाल के अन्दाज में ही हैं । यह गीत इतने धीमे स्वरों में गाया गया है कि आश्चर्य होता है कि इतने नीचे सुरों में भी रफ़ी साहब इतने सुरीले और मधुर कैसे हो सकते हैं (यही तो रफ़ी-लता की महानता है)। यह गीत एक तो कम बजता है और जब भी बजता है तो बहुत ध्यान से सुनना पडता है…। गीत लिखा है कैफ़ी आजमी ने, संगीत है मदनमोहन साहब का और फ़िल्म है “हीर-रांझा” (राजकुमार-प्रिया राजवंश वाली)। उल्लेखनीय है कि फ़िल्म हीर-रांझा ही आधुनिक भारत (आजादी के बाद) की सम्भवतः एकमात्र फ़िल्म है जिसमे पूरी फ़िल्म के संवाद पद्य शैली में हैं, अर्थात तुकबन्दी में । गीत कुछ इस प्रकार से है –

रफ़ी – मेरी दुनिया में तुम आईं
क्या-क्या अपने साथ लिये
तन की चांदी, मन का सोना
सपनों वाली रात लिये…
तनहा-तनहा, खोया-खोया,
दिल में दिल की बात लिये
कब से यूँ ही फ़िरता था मैं
अरमाँ की बारात लिये..
(संवाद शुरु होते हैं – )
राजकुमार – अंधेरे का इशारा समझो, आज दिया दिल का जलाना होगा
प्रिया – तुम बडे़ वो हो मुझे जाने दो
राजकुमार – जा सकोगी
प्रिया – मुझे जाना होगा
राजकुमार – आज की रात तो दिल तोडो़ ना..
अब लता की आवाज शुरु होती है ..
ढलका आँचल फ़ैला काजल
आँखों मे ये रात लिये
कैसे जाऊँ सखियों में अब
तेरी ये सौगात लिये..
रफ़ी – मेरी दुनिया में तुम आईं..
लता – सीने की ये धडकन सुन ले ना कोई
हाय-हाय अब देखे ना कोई

रफ़ी – ना जाओ, न जाओ..
लता – हटो, हटो डर लगता है
रफ़ी – सुनो, सुनो.
लता – डर लगता है
रफ़ी – दिल में कितनी कलियाँ महकीं
कैसे कैसे फ़ूल खिले
नाजुक-नाजुक मीठे मीठे होठों की खैरात लिये
मेरी दुनिया में तुम आईं…

लता – चाँद से कैसे आँख मिलाऊँ..
रफ़ी – बाँहों में आओ तुमको बताऊँ..
लता – बस भी करो
रफ़ी – अब ना डरो, रात है ये अपनी
लता – पायल छनके, कंगना खनके, बदली जाये चाँदनी
मंजिल-मंजिल चलना होगा, हाथों में ये हाथ लिये
रफ़ी – मेरी दुनिया में तुम आईं…
और हौले से गीत समाप्त हो जाता है…
कैफ़ी आजमी ने छुप-छुप कर मिलने वाले प्रेमी जोडे़ की स्वाभाविक बातचीत को एक रोमांटिक गीत का स्वरूप दिया, पूरे गीत में एक व्याकुल प्रेमी और जमाने से डरी हुई और लाज से सिमटी प्रेमिका के दिल की आवाज हमें सुनाई देती है… हम पुरानी यादों में खो जाते हैं, और मदनमोहन साहब ने भी उतने ही मादक अन्दाज की लय और धुन तैयार की है…
यह गीत यहाँ क्लिक करके सुना जा सकता है…

>एक फ़ुसफ़ुसाता सा मधुर गीत…

>यह गीत कुछ अलग हट कर है, क्योंकि इस गीत में संवादों की अधिकता तो है ही, लेकिन संगीत भी बहुत ही मद्धिम है और संवादों के अलावा जो गीत के बोल हैं वे भी लगभग बोलचाल के अन्दाज में ही हैं । यह गीत इतने धीमे स्वरों में गाया गया है कि आश्चर्य होता है कि इतने नीचे सुरों में भी रफ़ी साहब इतने सुरीले और मधुर कैसे हो सकते हैं (यही तो रफ़ी-लता की महानता है)। यह गीत एक तो कम बजता है और जब भी बजता है तो बहुत ध्यान से सुनना पडता है…। गीत लिखा है कैफ़ी आजमी ने, संगीत है मदनमोहन साहब का और फ़िल्म है “हीर-रांझा” (राजकुमार-प्रिया राजवंश वाली)। उल्लेखनीय है कि फ़िल्म हीर-रांझा ही आधुनिक भारत (आजादी के बाद) की सम्भवतः एकमात्र फ़िल्म है जिसमे पूरी फ़िल्म के संवाद पद्य शैली में हैं, अर्थात तुकबन्दी में । गीत कुछ इस प्रकार से है –

रफ़ी – मेरी दुनिया में तुम आईं
क्या-क्या अपने साथ लिये
तन की चांदी, मन का सोना
सपनों वाली रात लिये…
तनहा-तनहा, खोया-खोया,
दिल में दिल की बात लिये
कब से यूँ ही फ़िरता था मैं
अरमाँ की बारात लिये..
(संवाद शुरु होते हैं – )
राजकुमार – अंधेरे का इशारा समझो, आज दिया दिल का जलाना होगा
प्रिया – तुम बडे़ वो हो मुझे जाने दो
राजकुमार – जा सकोगी
प्रिया – मुझे जाना होगा
राजकुमार – आज की रात तो दिल तोडो़ ना..
अब लता की आवाज शुरु होती है ..
ढलका आँचल फ़ैला काजल
आँखों मे ये रात लिये
कैसे जाऊँ सखियों में अब
तेरी ये सौगात लिये..
रफ़ी – मेरी दुनिया में तुम आईं..
लता – सीने की ये धडकन सुन ले ना कोई
हाय-हाय अब देखे ना कोई

रफ़ी – ना जाओ, न जाओ..
लता – हटो, हटो डर लगता है
रफ़ी – सुनो, सुनो.
लता – डर लगता है
रफ़ी – दिल में कितनी कलियाँ महकीं
कैसे कैसे फ़ूल खिले
नाजुक-नाजुक मीठे मीठे होठों की खैरात लिये
मेरी दुनिया में तुम आईं…

लता – चाँद से कैसे आँख मिलाऊँ..
रफ़ी – बाँहों में आओ तुमको बताऊँ..
लता – बस भी करो
रफ़ी – अब ना डरो, रात है ये अपनी
लता – पायल छनके, कंगना खनके, बदली जाये चाँदनी
मंजिल-मंजिल चलना होगा, हाथों में ये हाथ लिये
रफ़ी – मेरी दुनिया में तुम आईं…
और हौले से गीत समाप्त हो जाता है…
कैफ़ी आजमी ने छुप-छुप कर मिलने वाले प्रेमी जोडे़ की स्वाभाविक बातचीत को एक रोमांटिक गीत का स्वरूप दिया, पूरे गीत में एक व्याकुल प्रेमी और जमाने से डरी हुई और लाज से सिमटी प्रेमिका के दिल की आवाज हमें सुनाई देती है… हम पुरानी यादों में खो जाते हैं, और मदनमोहन साहब ने भी उतने ही मादक अन्दाज की लय और धुन तैयार की है…
यह गीत यहाँ क्लिक करके सुना जा सकता है…

येसुदास के दो मधुर गीत

दक्षिण भारत के एक और महान गायक डॉ. के.जे.येसुदास के दो अनमोल गीत यहाँ पेश कर रहा हूँ ।
पहला गीत है फ़िल्म “आलाप” का – बोल हैं “कोई गाता मैं सो जाता…”, गीत लिखा है हरिवंशराय बच्चन ने, संगीत है जयदेव का । यह एक बेहतरीन गीत है और जयदेव जो कि कम से कम वाद्यों का प्रयोग करते हैं, इस गीत में भी उन्होंने कमाल किया है । प्रस्तुत दोनों गीत यदि रात के अँधेरे में अकेले में सुने जायें तो मेरा दावा है कि अनिद्रा के रोगी को भी नींद आ जायेगी । अन्तरों के बीच में जयदेव कम वाद्यों के कारण गायक की पूरी रेंज का उपयोग कर लेते हैं और येसुदास की पवित्र सी लगने वाली आवाज गजब ढाती है…सबसे बडे़ बच्चन साहब के शब्द तो खैर बढिया हैं ही, फ़िल्म में आज के बडे़ बच्चन साहब की अदाकारी भी उम्दा है (जैसी कि हृषिकेश मुखर्जी की फ़िल्मों में हमेशा वे करते रहे हैं चाहे वह नमकहराम हो, चुपके-चुपके हो या मिली हो) । इस फ़िल्म में उन्होंने एक संघर्षशील संगीतकार की भूमिका बखूबी निभाई है । गीत इस प्रकार है –

कोई गाता मैं सो जाता….

(१) संस्रिति के विस्तृत सागर में
सपनों की नौका के अन्दर,
दुख-सुख की लहरों में उठ गिर
बहता जाता, मैं सो जाता ….
(२) आँखों में लेकर प्यार अमर
आशीष हथेली में भरकर
कोई मेरा सिर गोदी में रख
सहलाता, मैं सो जाता….
(३) मेरे जीवन का कारा जल
मेरे जीवन का हालाहल
कोई अपने स्वर में मृदुमय कर
दोहराता, मैं सो जाता….
कोई गाता मैं सो जाता…

इस गीत को यहाँ क्लिक करके सुना जा सकता है ।

येसुदास ने हिन्दी फ़िल्मों में कम ही गाया है, हिन्दी फ़िल्म उद्योग उनकी असीमित प्रतिभा का उपयोग नहीं कर सका यह बडे़ खेद की बात है, एसपी बालासुब्रमण्यम को तो भी कई मौके मिले और उन्होंने भी खूब गाया, लेकिन शास्त्रीय़ संगीत की गहरी समझ रखने वाले येसुदास और सुरेश वाडकर का हिन्दी फ़िल्मों और गीतों को अधिक लाभ नहीं मिल पाया, इसका कारण शायद यह हो सकता है कि इन दोनों की आवाजें एक विशिष्ट प्रकार की है (जैसे कि भूपेन्द्र की भी है), इसलिये हिन्दी फ़िल्मों के “मुँछमुण्डे” और “बनियान-ब्रिगेड” के हीरो (?) पर उनकी आवाज फ़िट नहीं बैठती । कारण जो भी हो येसुदास और सुरेश वाडकर के गीतों से श्रोताओं को वंचित होना पडा है । बहरहाल….
दूसरा गीत भी उतना ही प्रभावशाली है – फ़िल्म है “सदमा”, गीत लिखा है गुलजार ने और संगीत दिया है दक्षिण की एक और जबरदस्त प्रतिभा इलैया राजा ने (इनका उम्दा संगीत तो छोडिये, हो सकता है कि इनका नाम भी कई हिन्दीभाषियों ने नहीं सुना होगा)। इसका फ़िल्मांकन भी बहुत बढिया है, फ़िल्म में श्रीदेवी सारा श्रेय लूट ले गई हैं, जबकि कमल हासन ने भी मनोभावों के द्वन्द्व को बेहतरीन तरीके से पेश किया है… गीत इस प्रकार है –

सुरमई अँखियों में नन्हा-मुन्ना एक सपना दे जा रे
निन्दिया के उडते पाखी रे
अँखियों मे आ जा साथी रे
रारी रारी ओ रारी रुम, रारी रारी ओ रारी रुम..

(१) अच्छा सा कोई सपना दे जा
मुझको कोई अपना दे जा
अन्जाना सा मगर कुछ पहचाना सा
हल्का-फ़ुल्का शबनमी, रेशम से भी रेशमी..
सुरमई अँखियों में नन्हा-मुन्ना एक सपना दे जा रे …..
(२) रात के रथ पर जाने वाले
नींद का रस बरसाने वाले
इतना कर दे, के मेरी आँखें भर दे
आँखों में बसता रहे, सपना ये हँसता रहे…

सुरमई अँखियों में नन्हा-मुन्ना एक सपना दे जा रे ….
निन्दिया के उडते पाखी रे
अँखियों मे आ जा साथी रे
रारी रारी ओ रारी रुम, रारी रारी ओ रारी रुम..

यह गीत यहाँ क्लिक करके सुना जा सकता है ।

इस गीत में जब येसुदास “रारी रारी ओ रारी रुम…” गाते हैं और साथ में “टिंग” की जो मधुर ध्वनि आती है, मानो ऐसा लगता है कि कोई मासूम बच्चे को झूला झुला रहा है । “धीरे से आ जा री अँखियन में..” की टक्कर में इस लोरी को रखा जा सकता है । वैसे भी आजकल फ़िल्मों में लोरियाँ लुप्तप्राय हो चली हैं, इसी बहाने इन दो मधुर गीतों को सुनकर हम अपनी प्यास बुझा लें ।

>येसुदास के दो मधुर गीत

>दक्षिण भारत के एक और महान गायक डॉ. के.जे.येसुदास के दो अनमोल गीत यहाँ पेश कर रहा हूँ ।
पहला गीत है फ़िल्म “आलाप” का – बोल हैं “कोई गाता मैं सो जाता…”, गीत लिखा है हरिवंशराय बच्चन ने, संगीत है जयदेव का । यह एक बेहतरीन गीत है और जयदेव जो कि कम से कम वाद्यों का प्रयोग करते हैं, इस गीत में भी उन्होंने कमाल किया है । प्रस्तुत दोनों गीत यदि रात के अँधेरे में अकेले में सुने जायें तो मेरा दावा है कि अनिद्रा के रोगी को भी नींद आ जायेगी । अन्तरों के बीच में जयदेव कम वाद्यों के कारण गायक की पूरी रेंज का उपयोग कर लेते हैं और येसुदास की पवित्र सी लगने वाली आवाज गजब ढाती है…सबसे बडे़ बच्चन साहब के शब्द तो खैर बढिया हैं ही, फ़िल्म में आज के बडे़ बच्चन साहब की अदाकारी भी उम्दा है (जैसी कि हृषिकेश मुखर्जी की फ़िल्मों में हमेशा वे करते रहे हैं चाहे वह नमकहराम हो, चुपके-चुपके हो या मिली हो) । इस फ़िल्म में उन्होंने एक संघर्षशील संगीतकार की भूमिका बखूबी निभाई है । गीत इस प्रकार है –

कोई गाता मैं सो जाता….

(१) संस्रिति के विस्तृत सागर में
सपनों की नौका के अन्दर,
दुख-सुख की लहरों में उठ गिर
बहता जाता, मैं सो जाता ….
(२) आँखों में लेकर प्यार अमर
आशीष हथेली में भरकर
कोई मेरा सिर गोदी में रख
सहलाता, मैं सो जाता….
(३) मेरे जीवन का कारा जल
मेरे जीवन का हालाहल
कोई अपने स्वर में मृदुमय कर
दोहराता, मैं सो जाता….
कोई गाता मैं सो जाता…

इस गीत को यहाँ क्लिक करके सुना जा सकता है ।

येसुदास ने हिन्दी फ़िल्मों में कम ही गाया है, हिन्दी फ़िल्म उद्योग उनकी असीमित प्रतिभा का उपयोग नहीं कर सका यह बडे़ खेद की बात है, एसपी बालासुब्रमण्यम को तो भी कई मौके मिले और उन्होंने भी खूब गाया, लेकिन शास्त्रीय़ संगीत की गहरी समझ रखने वाले येसुदास और सुरेश वाडकर का हिन्दी फ़िल्मों और गीतों को अधिक लाभ नहीं मिल पाया, इसका कारण शायद यह हो सकता है कि इन दोनों की आवाजें एक विशिष्ट प्रकार की है (जैसे कि भूपेन्द्र की भी है), इसलिये हिन्दी फ़िल्मों के “मुँछमुण्डे” और “बनियान-ब्रिगेड” के हीरो (?) पर उनकी आवाज फ़िट नहीं बैठती । कारण जो भी हो येसुदास और सुरेश वाडकर के गीतों से श्रोताओं को वंचित होना पडा है । बहरहाल….
दूसरा गीत भी उतना ही प्रभावशाली है – फ़िल्म है “सदमा”, गीत लिखा है गुलजार ने और संगीत दिया है दक्षिण की एक और जबरदस्त प्रतिभा इलैया राजा ने (इनका उम्दा संगीत तो छोडिये, हो सकता है कि इनका नाम भी कई हिन्दीभाषियों ने नहीं सुना होगा)। इसका फ़िल्मांकन भी बहुत बढिया है, फ़िल्म में श्रीदेवी सारा श्रेय लूट ले गई हैं, जबकि कमल हासन ने भी मनोभावों के द्वन्द्व को बेहतरीन तरीके से पेश किया है… गीत इस प्रकार है –

सुरमई अँखियों में नन्हा-मुन्ना एक सपना दे जा रे
निन्दिया के उडते पाखी रे
अँखियों मे आ जा साथी रे
रारी रारी ओ रारी रुम, रारी रारी ओ रारी रुम..

(१) अच्छा सा कोई सपना दे जा
मुझको कोई अपना दे जा
अन्जाना सा मगर कुछ पहचाना सा
हल्का-फ़ुल्का शबनमी, रेशम से भी रेशमी..
सुरमई अँखियों में नन्हा-मुन्ना एक सपना दे जा रे …..
(२) रात के रथ पर जाने वाले
नींद का रस बरसाने वाले
इतना कर दे, के मेरी आँखें भर दे
आँखों में बसता रहे, सपना ये हँसता रहे…

सुरमई अँखियों में नन्हा-मुन्ना एक सपना दे जा रे ….
निन्दिया के उडते पाखी रे
अँखियों मे आ जा साथी रे
रारी रारी ओ रारी रुम, रारी रारी ओ रारी रुम..

यह गीत यहाँ क्लिक करके सुना जा सकता है ।

इस गीत में जब येसुदास “रारी रारी ओ रारी रुम…” गाते हैं और साथ में “टिंग” की जो मधुर ध्वनि आती है, मानो ऐसा लगता है कि कोई मासूम बच्चे को झूला झुला रहा है । “धीरे से आ जा री अँखियन में..” की टक्कर में इस लोरी को रखा जा सकता है । वैसे भी आजकल फ़िल्मों में लोरियाँ लुप्तप्राय हो चली हैं, इसी बहाने इन दो मधुर गीतों को सुनकर हम अपनी प्यास बुझा लें ।

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