>नवगीत: करो बुवाई… –संजीव ‘सलिल’

>नवगीत:
करो बुवाई…

खेत गोड़कर
करो बुवाई…
*
ऊसर-बंजर जमीन कड़ी है.
मँहगाई जी-जाल बड़ी है.
सच मुश्किल की आई घड़ी है.
नहीं पीर की कोई जडी है.
अब कोशिश की
हो पहुनाई.
खेत गोड़कर
करो बुवाई…
*
उगा खरपतवार कंटीला.
महका महुआ मदिर नशीला.
हुआ भोथरा कोशिश-कीला.
श्रम से कर धरती को गीला.
मिलकर गले
हँसो सब भाई.
खेत गोड़कर
करो बुवाई…
*
मत अपनी धरती को भूलो.
जड़ें जमीन हों तो नभ छूलो.
स्नेह-‘सलिल’ ले-देकर फूलो.
पेंगें भर-भर झूला झूलो.
घर-घर चैती
पड़े सुनाई.
खेत गोड़कर
करो बुवाई…
*
Acharya Sanjiv Salil

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>नवगीत: करना होगा…. –संजीव ‘सलिल’

>नवगीत:
करना होगा…

हमको कुछ तो
करना होगा…
***
देखे दोष,
दिखाए भी हैं.
लांछन लगे,
लगाये भी है.
गिरे-उठे
भरमाये भी हैं.
खुद से खुद
शरमाये भी हैं..
परिवर्तन-पथ
वरना होगा.
हमको कुछ तो
करना होगा…
***
दीपक तले
पले अँधियारा.
किन्तु न तम की
हो पौ बारा.
डूब-डूबकर
उगता सूरज.
मिट-मिट फिर
होता उजियारा.
जीना है तो
मरना होगा.
हमको कुछ तो
करना होगा…
***
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>गीतिका: कद छोटा परछाईं बड़ी है… —आचार्य संजीव ‘सलिल’

>गीतिका

संजीव ‘सलिल’

कद छोटा परछाईं बड़ी है.
कैसी मुश्किल आई घड़ी है.

चोर कर रहे पहरेदारी
सच में सच रुसवाई बड़ी है..

बीवी बैठी कोष सम्हाले
खाली हाथों माई खड़ी है..

खुद पर खर्च रहे हैं लाखों
भिक्षुक हेतु न पाई पडी है..

‘सलिल’ सांस-सरहद पर चुप्पी
मौत शीश पर आई-अड़ी है..

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>गीतिका: बिना नाव पतवार हुए हैं. – आचार्य संजीव ‘सलिल’

>बिना नाव पतवार हुए हैं.
क्यों गुलाब के खार हुए हैं.

दर्शन बिन बेज़ार बहुत थे.
कर दर्शन बेज़ार हुए हैं.

तेवर बिन लिख रहे तेवरी.
जल बिन भाटा-ज्वार हुए हैं.

माली लूट रहे बगिया को-
जनप्रतिनिधि बटमार हुए हैं.

कल तक थे मनुहार मृदुल जो,
बिना बात तकरार हुए हैं.

सहकर चोट, मौन मुस्काते,
हम सितार के तार हुए हैं.

महानगर की हवा विषैली.
विघटित घर-परिवार हुए हैं.

सुधर न पाई है पगडण्डी,
अनगिन मगर सुधार हुए हैं.

समय-शिला पर कोशिश बादल,
‘सलिल’ अमिय की धार हुए हैं.

* * * * *

>गीतिका: भुज पाशों में कसता क्या है? –संजीव ‘सलिल

>गीतिका

संजीव ‘सलिल’

भुज पाशों में कसता क्या है?
अंतर्मन में बसता क्या है?

जितना चाहा फेंक निकालूँ
उतना भीतर धँसता क्या है?

ऊपर से तो ठीक-ठाक है
भीतर-भीतर रिसता क्या है?

दिल ही दिल में रो लेता है.
फिर होठों से हँसता क्या है?

दाने हुए नसीब न जिनको
उनके घर में पिसता क्या है?

‘सलिल’ न पाई खलिश अगर तो
क्यों है मौन?, सिसकता क्या है?

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>मुक्तक / चौपदे आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

>मुक्तक / चौपदे

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
संजिव्सलिल.ब्लागस्पाट.कॉम / संजिव्सलिल.ब्लॉग.सीओ.इन
सलिल.संजीव@जीमेल.com

साहित्य की आराधना आनंद ही आनंद है.
काव्य-रस की साधना आनंद ही आनंद है.
‘सलिल’ सा बहते रहो, सच की शिला को फोड़कर.
रहे सुन्दर भावना आनंद ही आनंद है.

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ll नव शक संवत, आदिशक्ति का, करिए शत-शत वन्दन ll
ll श्रम-सीकर का भारत भू को, करिए अर्पित चन्दन ll
ll नेह नर्मदा अवगाहन कर, सत-शिव-सुन्दर ध्यायें ll
ll सत-चित-आनंद श्वास-श्वास जी, स्वर्ग धरा पर लायें ll
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दिल को दिल ने जब पुकारा, दिल तड़प कर रह गया.
दिल को दिल का था सहारा, दिल न कुछ कह कह गया.
दिल ने दिल पर रखा पत्थर, दिल से आँखे फेर लीं-
दिल ने दिल से दिल लगाया, दिल्लगी दिल सह गया.

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कर न बेगाना मुझे तू, रुसवा ख़ुद हो जाएगा.
जिस्म में से जाँ गयी तो बाकी क्या रह जाएगा?
बन समंदर तभी तो दुनिया को कुछ दे पायेगा-
पत्थरों पर ‘सलिल’ गिरकर व्यर्थ ही बह जाएगा.
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कौन किसी का है दुनिया में. आना-जाना खाली हाथ.
इस दरवाजे पर मय्यत है उस दरवाजे पर बारात.
सुख-दुःख धूप-छाँव दोनों में साज और सुर मौन न हो-
दिल से दिल तक जो जा पाये ‘सलिल’ वही सच्चे नगमात.

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>नव गीत: रंगों का नव पर्व –संजीव ‘सलिल’

>रंगों का नव पर्व बसंती

सतरंगा आया.

सद्भावों के जंगल गायब

पर्वत पछताया…

*

आशा पंछी को खोजे से

ठौर नहीं मिलती.

महानगर में शिव-पूजन को

बौर नहीं मिलती.

चकित अपर्णा देख, अपर्णा

है भू की काया.

सद्भावों के जंगल गायब

पर्वत पछताया…

*

कागा-कोयल का अंतर अब

जाने कैसे कौन?

चित्र किताबों में देखें,

बोली अनुमानें मौन.

भजन भुला कर डिस्को-गाना

मंदिर में गाया.

सद्भावों के जंगल गायब

पर्वत पछताया…

*

है अबीर से उन्हें एलर्जी,

रंगों से है बैर.

गले न लगते, हग करते हैं

मना जान की खैर.

जड़ विहीन जड़-जीवन लखकर

‘सलिल’ मुस्कुराया.

सद्भावों के जंगल गायब

पर्वत पछताया…

*

>गीत: वसुधा को पाती -संजीव ‘सलिल’

>सूरज ने भेजी है
वसुधा को पाती,
संदेसा लाई है
धूप गुनगुनाती…

आदम को समझा
इंसान बन सके
किसी नैन में बसे
मधु गान बन सके
हाथ में ले हाथ
सुबह सुना दे प्रभाती…

उषा की विमलता
निज आत्मा में धार
दुपहरी प्रखरता पर
जान सके वार
संध्या हो आशा के
दीप टिमटिमाती…

निशा से नवेली
स्वप्नावली उधार
मांग श्वास संगिनी से
आस दे संवार
दिवाली अमावस के
दीप हो जलाती…

आशा की किरण
करे मौन अर्चना
त्यागे पुरुषार्थ स्वार्थ
करे प्रार्थना
सुषमा-शालीनता हों
संग मुस्कुराती…

पावस में पुश्पाये
वंदना विनीता
सावन में साधना
गुंजाये दिव्य गीता
कल्पना ले अल्पना
हो नर्मदा बहाती…

********************

>नवगीत / भजन: जाग जुलाहे! –संजीव ‘सलिल’

>नवगीत / भजन:

संजीव ‘सलिल’

जाग जुलाहे!
भोर हो गयी…
***

आशा-पंछी चहक रहा है.
सुमन सुरभि ले महक रहा है..
समय बीतते समय न लगता.
कदम रोक, क्यों बहक रहा है?
संयम पहरेदार सो रहा-
सुविधा चतुरा चोर हो गयी.

जाग जुलाहे!
भोर हो गयी…
***

साँसों का चरखा तक-धिन-धिन.
आसों का धागा बुन पल-छिन..
ताना-बाना, कथनी-करनी-
बना नमूना खाने गिन-गिन.
ज्यों की त्यों उजली चादर ले-
मन पतंग, तन डोर हो गयी.

जाग जुलाहे!
भोर हो गयी…
***

रीते हाथों देख रहा जग.
अदना मुझको लेख रहा जग..
मन का मालिक, रब का चाकर.
शून्य भले अव्रेख रहा जग..
उषा उमंगों की लाली संग-
संध्या कज्जल-कोर हो गयी.

जाग जुलाहे!
भोर हो गयी
***
दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

>बासंती दोहा ग़ज़ल –संजीव ‘सलिल’

>बासंती दोहा ग़ज़ल

संजीव ‘सलिल’

स्वागत में ऋतुराज के, पुष्पित हैं कचनार.

किंशुक कुसुम विहंस रहे या दहके अंगार..

पर्ण-पर्ण पर छा गया, मादक रूप निखार.

पवन खो रहा होश है, लख वनश्री श्रृंगार..

महुआ महका देखकर, बहका-चहका प्यार.

मधुशाला में बिन पिए’ सर पर नशा सवार..

नहीं निशाना चूकती, पञ्च शरों की मार.

पनघट-पनघट हो रहा, इंगित का व्यापार..

नैन मिले लड़ झुक उठे, करने को इंकार.

देख नैन में बिम्ब निज, कर बैठे इकरार..

मैं तुम यह वह ही नहीं, बौराया संसार.

ऋतु बसंत में मन करे, मिल में गले, खुमार..

ढोलक टिमकी मंजीरा, करें ठुमक इसरार.

तकरारों को भूलकर, नाचो गाओ यार..

घर आँगन तन धो लिया, सचमुच रूप निखार.

अपने मन का मेल भी, हँसकर ‘सलिल’ बुहार..

बासंती दोहा ग़ज़ल, मन्मथ की मनुहार.

सूरत-सीरत रख ‘सलिल’, निएमल-विमल सँवार..

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दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

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