>रौशनी

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दूर कही से आती हुई एक किरण दिखती हे
अनजाने टेड़े मेड़े रास्तो पे मंजिल दिखती हे
वो जहान दिखता हे जहाँ  खुशिया मिलती हे
वो  बाग़ दिखता हे जहाँ कलिया खिलती हे

रौशनी ही रौशनी हे
आँखें भी हँसती हे
तूफ़ान आ सकता हे
पर ये नहीं डरती हे

तारे भी गाते हे साथ साथ
और पंछी भी करने लगे हे बात
हवां भी बहती हे साथ साथ
और राहे बन रही अपने आप

रौशनी ही रौशनी हे
और एक  खुशी की हँसी हे
कुछ हल्का डर सा भी हे
पर ये ना रुकी हे

http://twitter.com/arpitgoliya

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>हवा कितनी बदल गयी हे

हवा कितनी बदल गयी हे
कड़वाहट जीवन में घुल गयी हे 
मुस्कराहट में भी अथाह कुटिलता छिपी हे 

टेडी मंदी हे ये राहे जो लगती सीधी हे 

लगे पड़े हे लोग यहाँ वहा भागे

चाहते निकलना किसी और से आगे 
खुशिया अपनों की ही नहीं देख पाते

औरो की तोह क्या करे फिर बाते 
चैन नहीं हे , नींद नहीं हे

और इंसानों की किसे पड़ी हे 
बस नीयत और सीयत बदल गयी हे 
दिखने में तो इंसान अब भी वही हे 
कागजो के लिए बिक रहा हे इंसान 
सब आँखे मीचे हे जल रहा जहान
अच्छाई अत्यंत कठिन हे

स्वार्थ विद्यमान हे सच जटिल हे 
जान की कीमत नहीं हे

ईमान की इज्ज़त गयी हे 
आँखें आंसू को तरस गयी हे

हवा कितनी बदल गयी हे

http://twitter.com/arpitgoliya

>एक राह भली

>

आँख खुली 
अँधेरा छा गया
राह मिली
मन घबरा गया
सतपथ  पर चला
कांटा पैरो में लगा
अच्छाई के लिए बढ़ा
सुना बहुत बुरा – भला
सोचा क्यूँ नींद खुली ?
वो अनजानी राह थी भली
ठंडी सी हवा चली
गगन में चमकी बिजली
धरा बरसने लगी
लों ज्वाला बनने लगी
ऐसा लगा जैसे
कोई कह रहा हो
यही राह सही
इंसान तोह कोई नहीं
पर आवाज़ आई एक नयी
फूल खिलने लगे
कांटे हटने लगे
मुस्कुराहते मिली
वाह! कैसी राह हें ये भली