>भोजपुरी हाइकु संजीव वर्मा ‘सलिल’

>भोजपुरी  हाइकु
संजीव वर्मा ‘सलिल’
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पावन भूमि
भारत देसवा के
प्रेरण-स्रोत.
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भुला दिहिल
बटोहिया गीत के
हम कृतघ्न.
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देश-उत्थान?
आपन अवदान?
खुद से पूछ.
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अंगरेजी के
गुलामी के जंजीर
साँच साबित.
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सुख के धूप
सँग-सँग मिलल
दुःख के छाँव.
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नेह अबीर
जे के मस्तक पर
वही अमीर.
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अँखिया खोली
हो गइल अंजोर
माथे बिंदिया.
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भोर चिरैया
कानन में मिसरी
घोल गइल.
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काहे उदास?
हिम्मत मत हार
करल प्रयास.
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दिव्यनर्मदा.ब्लॉगस्पोट.कॉम

>दोहा का रंग भोजपुरी के संग: संजीव वर्मा ‘सलिल’

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दोहा का रंग भोजपुरी के संग:

संजीव वर्मा ‘सलिल’

सोना दहल अगनि में, जैसे होल सुवर्ण.
भाव बिम्ब कल्पना छुअल, आखर भयल सुपर्ण..
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सरस सरल जब-जब भयल, ‘सलिल’ भाव-अनुरक्ति.
तब-तब पाठक गणकहल, इहै काव्य अभिव्यक्ति..
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पीर पिये अउ प्यार दे, इहै सृजन के रीत.
अंतर से अंतर भयल, दूर- कहल तब गीत..
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निर्मल मन में रमत हे, सदा शारदा मात.
शब्द-शक्ति वरदान दे, वरदानी विख्यात..
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मन ऐसन हहरल रहन, जइसन नदिया धार.
गले लगल दूरी मितल, तोडल लाज पहार..
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कुल्हि कहानी काल्ह के, गइल जवानी साँच.
प्रेम-पत्रिका बिसरि के, क्षेम-पत्रिका बाँच..
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जतने जाला ज़िन्दगी, ओतने ही अभिमान.
तन संइथाला जेतने, मन होइल बलवान..
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चोटिल नागिन के ‘सलिल’, ज़हरीली फुंकार.
बूढ बाघ घायल भयल, बच- लुक-छिप दे मार..
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नेह-छोह राखब ‘सलिल’, धन-बल केकर मीत.
राउर मन से मन मिलल, साँस-साँस संगीत..
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दिव्यनर्मदा.ब्लॉगस्पोट.कॉम