>एक लक्ष्य बना लें कि आपकी मुद्दों पर आधारित पोस्ट ब्लोगवाणी पर सर्वाधिक पढ़ी जाए

>जनोक्ति ब्लॉग के सभी साथी लेखकों को पाठकों को नमस्कार !
काफी दिनों की खोजबीन के बाद अंततः “जनोक्ति ब्लॉग” के लिए यह थीम मिला है और काफी संतोषजनक है . एक बार पुनः ब्लॉग-जगत पर अपनी सक्रियता बढाने की दिशा में कोशिश कर रहा हूँ . अध्ययन की वजह से समय का अभाव और बचे-खुचे समय में जनोक्ति.कॉम को प्रतिस्थापित करने का प्रयास दोनों ही कारण से इस मंच पर आना कम हो गया था . एक बात तो है डोट. कॉम पर भले चले जाइए पर ब्लॉग का अपना मज़ा है  . बहुत सारी आज़ादी है यहाँ . ब्लॉग-जगत लगातार विवादों में फंसा हुआ है . हर जगह ब्लोगवाणी के हॉट , ज्यादा पढ़े गये, और प्रतिक्रिया प्राप्त पोस्टों की चर्चा है जो निरर्थक होने के बावजूद छाये हुए हैं . पर कोई बात नहीं सैकड़ों ब्लॉगर रोजाना ना सही , साप्ताहिक या पाक्षिक ही सही अच्छे और सरोकारों वाले आलेख लिखते हैं . अगर आपको उनके ब्लॉग तक पहुंचना है तो चिट्ठाजगत से रोजाना जुड़ने वाले ब्लोग्स की सूची प्राप्त करने के लिए सबस्क्राइब करें . उनमें से कई ब्लॉग आपको स्तरीय और वैचारिक रूप से पठनीय होते हैं . ऐसे ही ब्लोग्स की चर्चा जनोक्ति ब्लॉग पर पहले भी की जाती रही है , हालाँकि वह अनियमित ही रहा लेकिन अब इसे नये तरीके से शुरू किया जायेगा . आपको भी यदि सामाजिक – सांस्कृतिक और राजनीतिक मुद्दों पर आधारित अच्छी पोस्ट मिले तो उसके बारे में अवश्य बताएं और लिंक सहित उसकी चर्चा इस मंच पर करें . क्योंकि अब पाठक उब चुके हैं हिंदी ब्लॉगजगत से जहाँ ४०-६० % पोस्ट केवल ब्लॉग और ब्लॉगर के आपसी टकराव के बारे में ही लिखी जाती है और बाकी ३०-३५ प्रतिशत धार्मिक उन्माद फ़ैलाने वाले मुद्दों पर , इसीलिए जनोक्ति के सभी लेखक साथियों से आग्रह है कि आप सरोकारी लेखों को नियमित रूप से लिखें और अधिक-से -अधिक प्रचारित-प्रसारित करें . एक लक्ष्य बना लें कि  आपकी मुद्दों पर आधारित पोस्ट ब्लोगवाणी पर सर्वाधिक पढ़ी जाए .

विशेष इस शुभकार्य के लिए शुभकामनाएं !

जयराम “विप्लव ” { मोडरेटर : जनोक्ति ब्लॉग ” }

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>अगर आप भी ब्लोगिंग में संगठन बनाने की बात से असहमत हैं तो अपने -अपने ब्लॉग पर एक विरोध का पोस्ट जरुर लिखें !

>अभी -अभी ” गप-शप का कोना ” पर प्रभात जी की पोस्ट देखी तो वाकई चिंता हुई . खबर चिंताजनक है कि ब्लॉगजगत को भी मठाधीशों की जरुरत संगठनात्मक रूप में होने लगी है !गौर करने लायक बात यह है कि यहाँ मठाधीश तो पहले से मौजूद रहे हैं लेकिन अब संगठन बना कर अपनी बातें दूसरों पर थोपा जायेगा . अब तक अभिव्यक्ति के इस स्वतंत्र समझे जाने वाले मंच को भी लोग अपनी लॉबिंग का केंद्र बनाने लगे हैं ऐसा अब तो जरुर महसूस होने लगा है . यहाँ भी उन्हीं लोगों की चलेगी जो अपनी गोटियाँ फिट कर पाएंगे और नये आने वालों को साहित्य की दुनिया की तरह हीं पुराने खिलाडियों की चमचागिरी करनी पड़ सकती है .आगे चल कर ऐसा भी हो सकता है कई एक संगठन बन जाए तब कुछ लिखने से पूर्व उनकी ओर लोगों को ताकना पड़ेगा कि किसकी क्या प्रतिक्रिया होगी . पोस्ट से ज्यादा चिंता उस पर आने वाली प्रतिक्रिया की होगी . प्रभात जी की पोस्ट पर एक सज्जन ने लिखा है क्या हम यहाँ राजपूत ब्लॉगर महासभा, ब्राहमण ब्लॉगर समिति, चिकित्सासेवी ब्लॉगर समूह देखना पसँद करेंगे ? कभी नहीं, क्योंकि हम अभिव्यक्ति और मत-विमर्श से इतर राजनीति या गुटनीति करने नहीं आये हैं ।”    जो मार्के की बात है . पूरे बहस में ब्लोगिंग के व्यक्तिगत और सामूहिक होने को लेकर कई प्रश्न उठते हैं . व्यक्तिगत ब्लॉग से हमने भी शुरुआत की थी जिसे बाद में सामूहिक कर दिया गया लेकिन कसी संगठन या खास विचार के नाम पर नहीं बल्कि यहाँ पर लगभग हर तरह के लोग मौजूद हैं और यदि विचारों पर अंकुश लगा कर एक ओर प्रवाहमान किया जाए तो हमारी समझ में इस विधा का दुरूपयोग हीं होगा .और किसी तरह के संगठन  बनने की स्थिति में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि वह किसी न किसी खास विचारधारा की ओर अपना झुकाव रखेगा  और  ना चाहते हुए भी जुड़ने वाले लोगों पर एक प्रकार का दबाव बनेगा . अब तक के तरह -तरह संगठनों को देख कर और उनमें काम करके इतना तो कह हीं सकता हूँ आरम्भ बहुत बढ़िया होता है बाद में सारी चीजें वैसी हीं हो जाती है . बेहतर है ब्लोगिंग को बांधने के बजाय स्वच्छंद रहने दिया  जाए साहब , नहीं  तो फ़िर  मीडिया हीं अच्छी है . यहाँ लोग इसीलिए आते हैं कि उन्हें उनकी बात रखने में कोई रोक नहीं सकता . अगर आप भी ब्लोगिंग में संगठन बनाने की बात से असहमत हैं तो अपने -अपने ब्लॉग पर एक विरोध का पोस्ट जरुर लिखें !

>पुस्तक मेले पर चला बुलडोजर और ब्लॉग-जगत में व्यापक विरोध

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प्रिय पाठकों ! 
नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के संग एक बेहद दुखद घटना का जिक्र कर रहा हूँ . शायद आपको पता भी होगा कि नागपुर में आयोजित राष्ट्रीय पुस्तक मेले पर निगम का जो बुलडोजर चलाया गया वह  साहित्य -प्रेमियों के छाती से गुजरा है . महज नियमों की आड़ में एन ओ सी का बहाना  बना कर निगम के अधिकारीयों ने मेले को तहस नहस कर दिया वो भी तब जब मामला न्यायालय में लंबित रहा हो तो क्या कहा जायेगा ? क्या यह लाखों पुस्तक प्रेमियों समेत भारतीय न्यायपालिका की अवमानना नहीं है . वैसे यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि अफसरशाही का न्यायपालिका से विरोध हो लेकिन बात पुस्तक मेले की है . वहां कोई जुआ खाना या पब तो नहीं चल रहा था . और अगर होता भी तो पूरी उम्मीद की जनि चाहिए कि उनको एन ओ सी मिल गयी होती . अरे इस  देश में बहुत कुछ गैर क़ानूनी है . बहुत सारी बिल्डिंगें बगैर एनओसी की शान से खड़ी है जबकि उनमें कई कभी भी गिर सकती है तब ऐसे अधिकारियों की आँखें कहाँ रहती है ? इनकी नींद जनहित में क्यों नहीं खुलती ? जब भी कुछ करेंगे जनता के खिलाफ और समाज के विरुद्ध ही होगा ? अपने झूठे मान के नाम पर जनता के पैसों पर लगाई गयी पुस्तक मेले का सत्यनाश कर दिया . बात इस साल की ही नहीं बल्कि आने वाले कई सालों तक इस घटना की छाप पुस्तक मेले पर पड़ेगी . हो सकता है आने वाले समय में ऐसा कोई आयोजन हो ही न . एक ओर सरकारी संस्थानों द्वारा पाठकों को प्रोत्साहित करने के लिए लाखों रूपये खर्च किये जाते हैं दूसरी तरफ नागपुर में प्रशासनिक अधिकारियों की इस घटना ने शर्मसार कर दिया है . इस घटना का ब्लॉग-जगत में व्यापक विरोध होना चाहिए . अगर आपको लगता है कि कुछ अनुचित हुआ है तो कृपया अपनी आपत्ति यहाँ दर्ज कराएँ .

>इनके हाथों में ये तलवार, ये भाले क्यूं हैं !

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आज सुबह मेल देखने बैठा तो एक शुभचिंतक  का पत्र  था…उनकी पीड़ा और चिंता बहुत ही जायज़ लगी….बात ब्लॉग्गिंग में बढ़ रही गुटबंदी की थी….हालांकि यह कोई नयी बात नहीं है..जब ब्लॉग नहीं थे उस समय भी यह गुट मौजूद थे…मैंने देखा बहुत से अच्छे लोगों की ऊर्जा इस गुटबंदी ने बर्बाद कर दी..बहुत से अच्छे   अच्छे  प्रोजेक्ट इसकी भेंट चढ़  गए….पर यह विकृति कभी भी पूरी तरह से खत्म नहीं हुयी…जिन कलमकारों ने समाज के बटवारे को रोकना था,   फूट को समाप्त करना था…गुटबंदिओं  को उखाड़ फेंकना  था…वही आपस में बंट  गए..उनके ही अलग अलग गुट बन गए…अपनी अपनी पत्रिकाएँ  और अपने अपने अखबार बन गए…लेखकों  का संगठन बना तो उसके भी गुट बन गए…सरकार और समाज के साथ टक्कर लेने वाले लोग एक दुसरे के सामने खड़े होकर लगे एक दुसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने…इस हालत ने बहुत सी और बुरायीओं  को भी जन्म दिया… फिलहाल मुझे याद आ रही है विनय दुब्बे की एक नज़म…जिसे मैंने एक पंजाबी पत्रिका में पढ़ा था…प्रस्तुत है उस नज़म का एक  अंश…..
मैं जब भी कविता लिखता हूँ
तो भूख को भूख लिखता हूँ,
विचार या विचारधारा नहीं लिखता……
……..
विचार या विचारधारा के सम्बन्ध में 
मुख्य सचिव प्रगतिशील  लेखक  संघ,
मुख्य सचिव जनवादी लेखक  संघ से बात करो…
मैं तो कविता लिखता हूँ….  
मैंने उस समय भी यही कहा था कि विचारों से स्वतंत्र रहने का विचार भी अपने आप में बुरा नहीं….पर उलझन और दुविधा के समय विचारधारा ही काम देती है…दरअसल फूट डालो और राज करो की नीति अब बहुत पुरानी हो चुकी है….इस नीति को सभी  नहीं तो बहुत से लोग पहचान  भी गए  हैं…अब आ चुकी है….कन्फ़ूज़ एंड रूल की नयी नीति……उल्झायो  और राज करो…..दुःख की बात है कि बहुत से कलमकार भी इस का शिकार ही चुके हैं..और उलझते जा रहे हैं…उन्हें सब कुछ ठीक या सब कुछ गलत लगता है…..जबकि ऐसा होता नहीं पर फिर भीर  दुविधा और उलझन बढ़  गयी है. ऐसी हालत में विचार या विचारधारा ही मार्गदर्शन  करती है.  पर
देखना यह होगा कि वे लोग खुद सीधे-सीधे किसी विचार या विचारधारा से प्रभावित हो रहे हैं या फिर नारेबाजी करने वाले किसी दल या गुट के  प्रभाव  में आ रहे  हैं….अगर किसी दल का प्रभाव है तो कम से कम यह ज़रूर देख लें कि उस दल के नेताओं की  अपनी निजी जिंदगी भी उस विचारधारा के अनुरूप ही है या फिर  वे कहते कुछ और है करते  कुछ और…
साहित्य  में बंगाल का अपना  अलग ही स्थान रहा है.  उस भूमि पर विचारों की कमी तो कभी भी नहीं रही…न ही जोश, मेहनत, लगन और इमानदारी की पर कहानी बहुत दुखद है इस बंगाल की..आनदमार्ग  के संस्थापक श्री श्री आनंद मूर्ती उर्फ़ पी आर सरकार के मुताबक एक दिन जो बंगाली दो बंगालों को  एक करने के लिए सारी शक्ति जुटाकर लडाई में कूद पढ़े थे  उसी बंगाली ने बंगाल को फिर से दो टुकड़े करने के लिए १९४७ के साल में अंग्रेजों के यहाँ दरबार किया था.  साल 1912  में जब दोनों बंगाल एक हो गए तब भी बंगालिओं ने सोचा वह लडाई में जयी हुए और और जब 1947  में बंगाल फिर से दो टुकड़े हुआ तब भी बंगालिओं ने सोचा वह जयी हुआ. इतिहास का यह कैसा वियोगान्त  नाटक (ट्रेजेडी) है…गौरतलब है कि वर्ष 1912 में दोनों बंगाल जब एक हुए तब बंगालिस्तान के अनेक अंश बंगाल से बाहर रख लिए गए थे..क्यों..? …..यह इतिहास ही बोल सकेगा…..यह कहानी काफी लम्बी है…..हम बात कर रहे ब्लॉग्गिंग में भी दाखिल हो चुकी गुटबंदी इतियाद की…
……आखिर में मुझे याद आ रहे हैं जनाब जावेद अख्तर  और उनकी एक नज़म :
लोग इन मुर्दा खुदाओं को सम्भाले क्यूं हैं !
फ़िक्र पे जंग है क्यूं,  ज़हन पे ताले क्यूं हैं !
धर्म तो आया था दुनिया में मोहब्बत के लिए..!
इनके हाथों में ये तलवार, ये भाले क्यूं हैं !               
बांटते फिरते हैं नफ़रत जो ज़माने भर में,
ऐसे इंसान तेरे चाहने वाले क्यूं हैं !
आँख रोशन हुयी सूरज की किरण से लेकिन,
ज़हन में अब भी अँधेरे के ये जले क्यूं है !
    कुल मिलकर अब यह आशा की जानी चाहिए कि हालत में सुधार होगा…नहीं तो इसका फायदा कोई तीसरा ही उठाएगा……..                                                          –रैक्टर कथूरिया

>सामयिक विमर्श सम्मान के लिए आलेख 8 नवम्बर तक हमें मेल करें

>                                                                 सामयिक विमर्श सम्मान

                              जनोक्ति परिवार की ओर से हर महीने सम-सामयिक विषयों पर 
               मौलिक लेखन करने वालों को प्रोत्साहित करने हेतु सम्मान देने का निर्णय लिया गया है . 
   सामयिक विमर्श सम्मान के लिए अपने आलेख 8 नवम्बर तक हमें मेल  करें .सर्वोत्तम  तीन आलेखों 
                                               को सम्मान हेतु चयनित किया जायेगा . 
                                     सम्मान राशि : 250 रूपये , 200 रूपये , 125 रूपये
सौजन्य  : जनोक्ति परिवार
मेल : janokti@gmail.com
पता: एच -56 ,शकरपुर
        दिल्ली -110092

>फ़िर भी देश ,काल और लोक की इनकी अपनी समझ है

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बहुत दिनों बाद आज कई चिट्ठों को खंगाल कर कुछ पठनीय अंश यहाँ प्रकाशित कर रहा हूँ .कहते हैं न  “जिन खोजा तिन पाइयाँ ” . अक्सर गप्पबाजी में  सुनते है ,आजकल कुछ अच्छा और सार्थक लिखा नहीं जा रहा पर ऐसा नहीं है . खोजिये तो जनाब ! परन्तु यह भी है एक आम पाठक के पास इतना समय कहाँ है कि खोज सके . इसलिए ऐसी चर्चाओं का आना जरुरी है जो कुछ अच्छे पठनीय सामग्री का संकलन एक पोस्ट में पेश करे . अच्छा और सार्थक लिखने वाले बहुत हैं ऐसे लोग भले हीं महीने में तीन-चार पोस्ट करते हों , इनकी लेखनी किसी खास खांचे में फिट नहीं बैठती हो , लम्बा और बहुत खोजपूर्ण नहीं हो , फ़िर भी देश ,काल और  लोक की इनकी अपनी समझ है और तरह-तरह के लोगों को पढ़कर हर दिन एक नया नज़रिया मिलता है तो अब पढ़ते रहिये हमारे साथ ………
मुलायम की राजनीति और कल्याण के करवटों का भेद खोल रहे हैं  खरे साहब :
“आने वाले समय में भाजपा अगर उमाश्री भारती, कल्याण सिंह और राजवीर को गले लगा ले तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वर्तमान राजनीति को देखकर तो यही कहा जा सकता है, कि सब कुछ संभव है राजनीति में। आखिर राजनीति की एक लाईन की परिभाषा : “जिस नीति से राज हासिल हो, वही राजनीति है“ जो ठहरी। “

२०१२  के विध्वंश  के पीछे के अर्थशास्त्र  को  शैलेन्द्र से जानिये  बेहद कम शब्दों में   :
” 21 दिसंबर 2012 के दिन जो होगा वो होगा ..लेकिन इतना तय है की आज से कुछ सालों बाद किसी मैनेजमेंट संस्थान के छात्रों को फिल्म 2012 के शानदार प्रमोशन कैंपेन के बारे में पढ़ाया जा रहा होगा और उसमें उस अफवाह की भी जिक्र होगा जिसे सच साबित करने के लिए कुछ वैज्ञानिक भी जी जान से लगे हुए हैं ..और हो सकता है जल्द ही बालीवुड का कोई निर्माता बिल्कुल इसी कथानक की कोई फिल्म लेकर आए क्योंकि बाजार के महौल का फायदा हर चतुर व्यापारी उठाना चाहता है “
 धरती के स्वर्ग की यात्रा का मज़ा और सजा दोनों बता रहे हैं अय्यर जी :
रशीद ने मुझसे पूछा अच्छी कश्मीरी चाय कुछ आगे मिलेगी आप बोलो तो रुक सकते हैं” “हां-हां क्यों नहीं मैने कहा, कुछ ही आगे एक गाँव आया, सड़क किनारे एक छोटा सा ठीया था. गाड़ी से उतरते ही एक मीठी और भीनी भीनी सी खुशबू से सामना हुआ. चाय और टोस्ट वाकई बहुत अच्छे थे. हम मज़ा ले ही रहे थे,  तभी एक जीप के ब्रेकों के चीखने की आवाज़ आयी दो लोग तेजी से उतर कर आये और हम तक पहुंच कर कहा अनंतनाग के पास हमला हुआ हैं, आप लोग अगली खबर मिलते तक रुकेंगे तो ठीक रहेगा…..
अपनी जागरूकता और उसके परिणामों से कुछ सन्देश दे रही हैं कविता वर्मा  :

सभी के बच्चे घूम कर गिरते पड़ते जा रहे हैं सिर्फ़ मेरा ही नागरिकबोध जाग पड़ा पहुँच गयी एक दिन सरपंच के पास साड़ी समस्या सुनाने। बड़ा भला आदमी है सरपंच भी तुंरत मुझे कुर्सी दी चाय मंगवाई पुरी बात ध्यान से सुनी और तुंरत मुरम के डम्पर वाले को फ़ोन किया .कालोनी वाले को भी फ़ोन पर कहा भिया सड़क खोल दो लोगों को तकलीफ होती है .मैडम दो तीन दिन में आपका काम हो जाएगा यदि न हो तो मुझे बताना। दसियों बार धन्यवाद दिया उन्हें, कितना भला आदमी है अब तो रोड खुल ही जायेगी” 

गिरते सामाजिक मूल्यों  में  माँ-बाप की बढ़ती परेशानी  से रूबरू करवा रहे हैं  अनिल शर्मा  :
आजकल भारत देश में वर्द्धाआश्रमों की बाढ़  सी आई हुई है , जयादातर बच्चे अपने माता पिता को आश्रमों में छोड़ रहे है . जो बच्चे अपने माता पिता को अपनी निजता में दखल मानते है . उनकी बीमारी,नाकारापन  ,चिडचिडापन और हर बात में टोका टोकी को बर्दाश्त न कर पाने की सूरत में इनको आश्रमों में छोडा आना ही उचित समझते है , इससे उन माता पिताओं पर क्या गुजरती होगी जो अपने बच्चो से बड़ी बड़ी आशाये लगाये हुए होते है , मेरा भी एक मित्र अखलेश इसी तरह का है जिसने अपने माता पिता को आश्रम में भेज दिया है  और खुद  अपनी पत्नी और तीन बच्चो के साथ एक बढ़िया बंगले में रहता है , भगवान  का इतना बड़ा भगत है की जहा भी मंदिर दिखे वहा दर्शन करना और देवी देवताओ के कार्यो के लिए धन लुटा उसकी आदत में शुमार है ,यानि भगवान जहाँ है सब कुछ वहां है “ 

>गूगल गणराज्य में प्रभाष जी के नायकत्व को चुनौती देने वाले तब भी पिछड़ गये थे

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प्रभाष जी के निधन से अब तक ब्लॉग जगत उनके शोक में संतप्त दिख रहा है . हर कोई अपने हिसाब से उन्हें याद कर रहे है . कुछ अखबारों की आलोचना में भी लगे हैं कि उनने प्रभाष जी के निधन को एकाध कॉलम में जगह देना  उचित नहीं समझा . अक्सर यही देखा है मैंने, मरने के बाद दिवंगत इंसान के प्रति लोगों की सहानुभूति बहुत बढ़ जाती है . आज ब्लॉग जगत में जो सहानुभूति की लहर चल रही है उस पर मुझे हंसी आ रही है . खास कर उनलोगों पर जो महीने भर पहले प्रभाष जोशी जी को अपने मनपसंद गालियों ,संघी -ब्राह्मणवादी-रुढिवादी  आदि , से संबोधित करते हुए उनपर कीचड़ उछल रहा थे , आज उन्हीं के ब्लॉग पर जोशी जी की प्रशंसा में गीत गाये जा रहे है ! या तो जोशी जी की पत्रकारिता को संकुचित वाद /विचार का ठप्पा लगाने पर आमादा ये मूढ़ तब गलत थे या आज गलत है ?  हाँ ,कुछ लोग ऐसे भी थे जो तब भी प्रभाष जी के साथ थे और आज भी है भले हीं उन्हें प्रभाष जी का लठेत कहा गया . गूगल गणराज्य में प्रभाष जी के नायकत्व को चुनौती देने वाले तब भी पिछड़ गये थे और अब तो बाल भी बांका नहीं कर सकते ! जो लोग गूगल सर्च का हवाला दे कर उनके नायकत्व को समाप्त बता रहे थे वो भूल रहे थे कि तब भी प्रभाष जी समर्थन में लिखा मेरा हीं आलेख पहला रिजल्ट था . प्रभाष जी दुनिया में सशरीर नहीं है तो क्या हुआ पत्रकारिता जगत में उनका नायकत्व हमेशा रहेगा  !

>स्वर्गीय प्रभाष जोशी जी को सच्चे दिल से नमन करें

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आधुनिक हिन्दी पत्रकारिता के भीष्म प्रभाष जोशी के निधन से देश को गहरी क्षति पहुंची है .आइये ,पत्रकारिता के शिखर -पुरुष स्वर्गीय प्रभाष जोशी जी को सच्चे दिल से नमन करें और उनको श्रद्धांजलि देने के लिए यह प्रण करें कि आजीवन सच्ची और लोकहितकारी पत्रकारिता करेंगे .

शोकसंतप्त : जनोक्ति परिवार

>ब्लॉगप्रहरी की चयन प्रक्रिया शुरू हो गयी है.

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ब्लॉगप्रहरी की चयन प्रक्रिया शुरू हो गयी है. आपसे आग्रह है कि आप वोट देकर ब्लॉगप्रहरी के चयन में भागीदार बनें.
वोट देने के लिए ब्लॉगप्रहरी के मुख्य पृष्ठ पर उपलब्ध वोट बटन का उपयोग करें. आपको अगर लगता है कि हमने भूलवश किसी नाम को शामिल नहीं किया तो आप वह नाम हमें सूझा सकते हैं. ब्लॉगप्रहरी की निजी टीम कुछ इस प्रकार है .( देखें )
सुझाव हेतु मेल करें : admin@blogprahari.com

>BLOGVANI के शीर्षक को देखिये वहां क्या लिखा है ?

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आज blogvani पर गया तो एक नई बात दिमाग में आई . आपने कभी इस बात पर गौर किया हो शायद ! यूँ तो हिंदी फॉन्ट के झमेले से वार्तानिक त्रुटियां हिंदी ब्लॉगजगत में सर्वत्र विराजमान हैं परन्तु वेबसाइट के शीर्षक में गलत लिखा जाना अथवा उसे लोगों द्वारा गलत पढ़ा जाना हास्यास्पद है . हिंदी -हिंदी का रट्टा मारने वाले हम लोग कब सुधरेंगे ? आप blogvani के शीर्षक को देखिये वहां लिखा है “ब्लागवाणी “ और हम बोलते हैं “ब्लॉगवाणी ” तो आखिर कौन गलत है ? हम बोलने में गलती करते हैं या वहां पर गलत लिखा गया है ? इस मसले पर आपकी राय क्या है ,इससे हमें अवगत कराएँ . और एक आग्रह है कि इसे किसी तरह का विरोध ना समझा जाए .

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