>जनोक्ति परिवार की ओर से हार्दिक शुभकामनायें

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प्रकाश पर्व “दीपावली” के इस पुनीत अवसर पर आप सभी पाठकों और साथी चिट्ठाकारों को जनोक्ति परिवार की ओर से हार्दिक शुभकामनायें । श्री और यश से आपका जीवन भरा रहे ।

>ब्‍लॉगप्रहरी : नेक ब्‍लॉग को अनेक तक ले जाने वाला सारथि (एग्रीगेटर)

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जब विचारों को किसी वाद या विचारधारा का प्रश्रय लेकर ही समाज में स्वीकृति मिलने का प्रचलन बन जाए तब व्यक्तित्व का निर्माण संभव नही. आज यही कारण है कि भारत या तमाम विश्व में पिछले ५० वर्षो में कोई अनुकरणीय और प्रभावी हस्ताक्षर का उद्भव नही हुआ. वाद के तमगे में जकड़ी मानसिकता अपना स्वतंत्र विकास नही कर सकती और न ही सर्वसमाज का हित सोच सकती है.

मानवीय प्रकृति में मनुष्य की संवेदना तभी जागृत होती है जब पीड़ा का अहसास प्रत्यक्ष रूप से हो.जीभ को दाँतों के होने का अहसास तभी बेहतर होता है ,जब दांतो में दर्द हो. शायद यही वजह रही कि औपनिवेशिक समाज ने बड़े विचारको और क्रांति को जन्म दिया. आज के नियति और नीति निर्धारक इस बात को बखूबी समझते है . अब किसी भी पीड़ा का भान समाज को नही होने दिया जाता ताकि क्रांति न उपजे. क्रांति के बीज को परखने और दिग्भ्रमित करने के उद्देश्य से सत्‍ता प्रायोजित धरना प्रदर्शन का छद्म खेल द्वारा हमारे आक्रोश को खोखले नारों की गूंज में दबा देने की साजिश कारगर साबित हुई है. कई जंतर मंतर जैसे कई सेफ्टी-वाल्व को स्थापित कर बुद्धिजीवी वर्ग जो क्रांति के बीज समाज में बोया करते थे, उनको बाँझ बना दिया गया है.इतिहास साक्षी है कि कलम और क्रांति में चोली दामन का साथ है. अब कलम को बाज़ार का सारथि बना दिया गया. ऐसे में किसी क्रांति की भूमिका कौन लिखेगा? तथाकथित कलम के वाहक बाज़ार की महफिलों में राते रंगीन कर रहे है

 
.बाज़ार के बिस्तर पर स्खलित ज्ञान कभी क्रांति का जनक नही हो सकता.

तो अब जबकि बाज़ार के चंगुल से मुक्त अभिव्यक्ति का मंच ब्लॉगिंग के रूप में समानांतर विकल्प बन कर उभरा है तो हमारी जिम्मेदारी है कि छोटी लकीरों के बरक्स कई बड़ी रेखाए खींची जाएं. बाज़ारमुक्त और वादमुक्त हो समाजहित से राष्ट्रहित की ओर प्रवाहमान लेखन समय की मांग है.ब्लॉग जगत में जब प्रहार ज्यादा होने लगे और सृजन की प्रक्रिया धीमी हो जाने लगे, तब यह भान हो जाना चाहि‍ये कि वक्त एक बड़े बदलाव का है। वर्तमान समय में ब्लॉगिंग का गि‍रता स्तर, इसके शुभागमन के समय अनुमानित लक्ष्यों से बहुत दूर धकेलने वाला है। इस दिशा में एक सार्थक पहल हुई है, और उस प्रयास की संज्ञा ” ब्लॉगप्रहरी” देना सर्वथा प्रेरणात्मक है।
ब्लॉगप्रहरी का उद्देश्य ब्लॉग जगत के दिन प्रतिदिन बढ़ते जा रहे विसंगतियों से अलग एक आदर्श ब्लॉग मंच मुहैया कराना है। स्वरूप से एक एग्रीगेटर होने के बावज़ूद इसकी कार्य-प्रणाली विस्तृत और नियंत्रित होगी।
(हमें ब्लॉगप्रहरी को एक एग्रीगेटर के रूप में नहीं बल्कि‍ विचार-विमर्श और ब्लॉगिंग के एक सार्थक प्लेटफार्म के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। आपसे निवेदन है कि आप इसका मूल्यांकन किसी एग्रीगेटर से तुलना कर के न करें!)
जैसा कि नाम मात्र से स्पष्ट है, इसका एकमात्र लक्ष्य ब्लॉग जगत में एक आदर्श ब्लागिंग के मापदंड की स्थापना करना और ब्लागिंग जैसे सशक्त, अभिव्यक्ति के हथियार को धारदार बनाये रखना है।

क्या है योजना!

(1) ब्लॉगप्रहरी एक अत्यन्त आधुनिक और नियंत्रित ब्लॉग एग्रीगेटर होगा। यहां पर चुनिन्दा ब्लॉग और लेखकों के लेख ही प्रकाशित होंगे, जिसका निर्धारण 15 सदस्यीय ब्लॉगप्रहरी की टीम करेगी। वह टीम आप ब्लॉगरों के सुझाव पर आधारित एक परिभाषित व्यवस्था होगी। सर्व-सामान्य के लिये यह केवल पठन और प्रतिक्रिया देने तक सीमित रहेगा। हां, हम लगातार नये ब्लॉग शामिल करते रहेंगे और अनुचित सामग्री के प्रकाशन और अमर्यादित भाषा प्रयोग जैसे अन्य निर्धारकों के आधार पर सदस्यता समाप्त करना, अस्थायी प्रतिबंध जैसे तमाम औजार मौजूद रहेंगे। यह एक नि:शुल्क जनहित योजना है, और इसका एकमात्र ध्येय
ब्लॉग को वैकल्पिक मीडिया के स्वरूप में स्थापित करना है।

ऐसे मापदंड रखने के कारण क्या थे ?

हमारे पास मौजूद अन्य एग्रीगेटर सभी प्रविष्टियों को एक जगह दिखाते हैं। अब एक पाठक को यह चुनना मुश्किल होता है कि क्या पठनीय है और क्या नहीं। आजकल अनावश्यक विषयों पर मतांध लेख, व्यक्तिगत आक्षेप, आरोप-प्रत्यारोप, अमर्यादित भाषाशैली का प्रयोग कर अपने पोस्ट पर पाठक बुलाने की परंपरा विद्यमान है। इस बीच कई बार सुसंस्कृत लेख भी नहीं पढ़े जाते और एग्रीगेटर के पहले पृष्ठ पर से उपस्थिति खत्म होते हीं उनका सार्वजनिक स्वरूप समाप्त हो जाता है।
क्यूं अलग है ब्लॉगप्रहरी: यहां प्रविष्टियों का संकलन और प्रकाशन वर्गीकृत होगा और एजेक्स (एजेक्स आधुनिकतम वेब डिजायनिंग तकनीक है, इसपर आधारित व्यव्स्था में वेबसाइट क हर हिस्सा इतना हल्का और जल्द खुलने वाला हो जाता है, कि युजर को किसी भी तरह इन्तजार नही करना पड़ता। एक सामान्य उदाहरण आप याहूटैब में पाते है। यह पूरी साइट एजेक्स पर बनी है। तमाम हिस्से अपने आप मे स्वतंत्र है और आप अपनी पसन्दानुसार साइट के सजा सकते है।) पर आधारित व्यवस्‍था उनको लम्बे समय तक दिखाने में सक्षम है। आपके सामने मुख्य पृष्ठ पर 400 से ज्यादा चिट्ठे दिखाए जा सकते हैं।
महत्वपूर्ण और विशेष चिट्ठों को फ़ीचर पोस्ट कैटेगरी के अंतर्गत दिखाया जायेगा, जिसकी संख्या नियंत्रित है। यह आटोमेटेड स्लाइड इन चिट्ठों को विशेष समय तक चला कर उनकी पठनीयता और प्रासंगिकता बनाए रखेगा। ब्लॉगप्रहरी ने मुख्य पृष्ठ पर किसी भी चिट्ठों के पसंद-नापसंद करने जैसा औजार उपलब्‍ध कराना उचित नही समझा है
ताकि आप पूर्वाग्रह से ग्रसित हो उनकी ओर न चले जायें और हालिया प्रकरण (ब्लॉगवाणी पर विवाद) इस पाठक-लेखक की इस मानसिकता को दर्शाता है) ब्लॉगवाणी की सेवा निश्चित तौर पर ब्लॉगजगत के लिए बड़ा ऋण है और अनैतिक तरीके अपनाकर कुछ लोग अपनी तुच्छता का उदाहरण छोड़ जाते हैं।
(2) ब्लॉगप्रहरी पर किसी भी प्रकाशित सामग्री को आप वहीं पढ़ सकते हैं ( या उस लेखक के निजी ब्लॉग पर जा सकते हैं)। शीर्षक पर क्लिक करते हीं, वह पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए वहीं खुल जायेगी और आप अपनी प्रतिक्रिया भी वहीं दर्ज कर सकते हैं। आपको लिंक फालो कर उस व्यक्ति विशेष की साइट पर जाने की आवश्यकता नहीं है।

इसके पीछे कारण क्या थे?

लिंक फालो कर आप लगभग 2-3 मिनट में उस लेख तक पहुचते हैं और आपका समय तब सार्थक होता है ,जब आपको कुछ अच्छा पढ़ने को मिले। पर बात जो ज्यादा घातक है कि जिस तरह टी.आर.पी. ने मुख्यधारा की मीडिया का बेड़ा गर्क कर रखा है, उसी तरह रैंकिग विजेट, ट्रैफिक स्टैट्स काउन्टरों ने ब्लॉगरों की मानसिकता पर गहरा और पथभ्रमित करने का प्रभाव डाला है। सामान्यत: सनसनीखेज शीर्षक देकर कुछ चिट्ठाकार अपनी पीठ स्टेट्स काउन्टर से थपथपा रहे हैं। सर्वविदित है कि ऐसे चोंचले अपनाकर आप अस्थायी लोकप्रियता तो हासिल कर सकते हैं, पर आपकी वास्‍तविक पहचान में आपकी कलम की धार और निष्पक्षता ही सर्वोपरि होनी चाहिए।

क्यूं अलग है ब्लॉगप्रहरी ?

ब्लॉगप्रहरी पर पोस्ट खुलने की सुविधा होने के कारण आप पोस्ट वहीं पढ़ पाएंगे, और कोई कलमतोड़ू
लेखक इस मंच का उपयोग पाठक बुलाने के लिए नहीं कर पायेगा।
(3) यहां पर प्रकाशित पोस्ट पर पर 15 ब्लॉगप्रहरियों की नज़र होगी। आप स्‍वयं अपनी पोस्ट के प्रति उत्‍तरदायी होंगे और किसी भी तथ्य या प्रसंग का उल्लेख करने पर आपको उसकी मौलिकता और सच्चाई का पता होना चाहिए। किसी प्रहरी द्वारा किसी पहलू पर संबधित तथ्य का स्त्रोत मांगे जाने पर आपको उसको सामने रखना होगा। अगर आप अपने तथ्य के प्रति ईमानदार नहीं पाए गये तो आपको सार्वजनिक माफी मांगनी पड़ेगी।
साफ शब्दों में कहें तो वह शेर तो आपने सुना ही होगा :
आपका मंच है आपको रोका किसने, अपने पोखर को समन्दर कहिए…वाला फंडा नहीं चल पायेगा।
इससे आपकी और पूरे ब्लॉग जगत की विश्‍वसनीयता बढ़ेगी और आपकी लेखनी भी जवाबदेह होने के कारण अधिक पैनी होगी।
(4)विशेष प्रहरी के तौर पर कई गणमान्य और वरिष्ठतम साहित्यिक, पत्रकार और बुद्धिजीवी शामिल होंगे जो यदा-कदा अपने शामिल होने का अहसास आपको कराते रहेंगे और आपको अहसास नहीं होने देंगे कि‍ आपने उनकी प्रोफाइल लगा कर गलत फैसला लिया है। ऐसी अनेक नेक सहमति मिल चुकी हैं और मिल रही हैं। :)
इसके फायदे :—-इससे ब्लॉगजगत को हम वैकल्पिक मीडिया के रूप में स्थापित कर पाएंगे। यह स्पष्ट है कि
अगर कोई विशेष व्यक्तित्व शायद ही हम ब्लागरों को पढ़ने की हिम्मत जुटा पाता है, और अगर ब्लागर भी सामान्य कद का हो, तो उसके पास जाने का कोई विकल्प नहीं। अगर वह किसी एग्रीगेटर पर जाता है, तो जीवन में ब्लॉग पढ़ने की ग़लती वह दोबारा नहीं करना चाहेगा, क्योंकि संभवत: एक सौ पोस्ट के बाद एक पोस्ट पठनीय होती है। पर ब्लॉगप्रहरी विशिष्ट एग्रीगेटर है जो एक लेखक को पाठक के तौर पर Filtered posts,
monitered exposure and guaranteed readership देता है।
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हम खुद को ऐसे किसी भी तरह की परिभाषा स्थापित करने में नहीं उलझाना चाहेंगे कि अच्छा या बुरा ब्लॉगर कौन है या उसके क्या परिमाण हैं। पर यह तो तय है कि कुछ अच्छे ब्लॉगर हैं जो सर्वमान्य हैं। ऐसे ही ब्लॉगरों को साथ लेकर एक सुनहरे सपने को गति देने का यह प्रयास है।
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और क्या विशेष है ? ब्लॉगप्रहरी में—–

(1) प्रतिदिन एक प्रविष्टि या चर्चाघर का निष्कर्ष सभी राष्टीय समाचार पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादकों के पास स-नाम भेज दी जायेगी। और उनसे यह अपेक्षा होगी कि वह इनको विशेष स्थान दे कर प्रकाशित करें। इस सम्बन्ध में बड़ी सफलता मिली है और भविष्य में और पत्र- पत्रिकाएं हमसे जुड़ जायेंगी।
(2) ऑनलाईन रेडियो परिचर्चा का आयोजन पाक्षिक अन्तराल पर किया जायेगा। जिसके लिये स्टूडियो
का निर्माण हो गया है। भविष्य मे ब्लॉगप्रहरी हर रोज ब्लॉग समाचार वाचन की भी योजना पर अमल करेगा।
(3)एक परिवार की तरह ब्लॉगप्रहरी की टीम ब्लॉगजगत को वैकल्पिक मीडिया के रूप में स्थापित कर
दिशाहीन और दिग्‍भ्रमित मुख्यधारा के सामने एक आदर्श के रूप मे स्थापित करने के लिए वचनबद्ध हैं।

   ( 4) प्रत्येक ब्लॉग लेखक के  लिए एक अलग पन्ना उसके व्यकतित्व परिचय के लिए दिया जाएगा. जिससे बेनामी ब्लॉगर और छद्म नाम से
गलत बात करने वालो को दरकिनार किया जा सके .

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Mail us at:—————
admin@blogprahari.com
Or contact : +91-9313294888 ।
कृपया इस पोस्ट को अपने ब्लॉग पर लगाएं ।
अपने फ़ालोवर और लेखकों (अगर आपका ब्लॉग सामुदायिक है) तथा अन्य ब्लॉग मित्रों के मध्य इसी रूप में भेज दें। उनसे यह आग्रह करें कि वह अपने ब्लॉग पर यह पोस्ट लगाने के साथ इसे आगे भेज दें। यह क्रम बना रहे ताकि सब आगाह हो जाएं…”अब आ गया है…ब्लॉगप्रहरी’!!!!

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इस कोड को अपने ब्लाग/साईट पर लगा एक आदर्श ब्लागर बनने की ओर बढ़े:

http://blogprahari.com“>width=”180″ alt=”The VOice of Hindi Blogs” src=”http://www.blogprahari.com/wp-content/uploads/2009/10/logo42.pngheight=”80″/>

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लम्बाई और चौड़ाई का निर्धारण अपने सुविधानुसार स्वय कर सकते हैं। उपर लाल रंग से दिखाया गया है।
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सम्पादकीय समूह , ब्लॉगप्रहरी

>बाज़ार के बिस्तर पर स्खलित ज्ञान कभी क्रांति का जनक नहीं हो सकता.: जनोक्ति

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आज एक दुनिया देखी हमने, जहां अभिव्यक्ति विकृति की संस्कृति में ढल रही है .हिंदी समाज की विडंबना हीं कहिये , सामाजिक सरोकारों पर मूत्र त्याग कर व्यक्तिगत स्वार्थों में लिप्त हो लेखन  कर्म को वेश्यावृत्ति से भी बदतर बना दिया गया है .अंतरजाल में शीघ्रता से फ़ैल रहे हिंदी पाठक कुंठित दिखते हैं . मौजूदा समय में धार्मिक कुप्रचार ,निजी दोषारोपण,अमर्यादित भाषा ,तथ्य और तर्क विहीन लेखन यत्र तत्र बिखरे पड़े हैं .

जब विचारों को किसी वाद या विचारधारा का प्रश्रय लेकर  ही समाज में स्वीकृति  मिलने का प्रचलन बन जाए तब  व्यक्तित्व का निर्माण संभव नही. आज यही कारण है कि  भारत या तमाम विश्व में पिछले ५० वर्षो में कोई अनुकरणीय और प्रभावी हस्ताक्षर का उद्भव नही हुआ. वाद के तमगे  में जकड़ी मानसिकता अपना स्वतंत्र विकास नही कर सकती और न ही सर्वसमाज का हित सोच सकती है.

 मानवीय प्रकृति में मनुष्य की संवेदना तभी जागृत होती है जब पीड़ा का अहसास प्रत्यक्ष रूप से हो.जीभ को दाँतों के होने का अहसास तभी बेहतर होता है ,जब दातो में दर्द हो. शायद यही वजह रही कि  औपनिवेशिक समाज ने बड़े विचारको और क्रांति को जन्म दिया. आज के नियति और नीति निर्धारक इस बात को बखूबी समझते है . अब किसी भी पीड़ा का भान समाज को नही होने दिया जाता ताकि क्रांति न उपजे. क्रांति के बीज को परखने और दिग्भ्रमित करने के उद्देश्य से सता प्रायोजित धरना प्रदर्शन का छद्म  खेल द्वारा हमारे आक्रोश को खोखले नारों की गूंज में दबा देने की साजिश कारगर साबित हुई है.  कई जंतर मंतर जैसे कई सेफ्टी-वाल्व को स्थापित कर बुद्धिजीवी वर्ग जो क्रांति के बीज समाज में बोया करते थे, उनको बाँझ बना दिया गया है.इतिहास साक्षी है कि कलम और क्रांति में चोली दामन का साथ है. अब कलम को बाज़ार का सारथि बना दिया गया. ऐसे में किसी क्रांति की भूमिका कौन लिखेगा? तथाकथित  कलम के वाहक बाज़ार की महफिलों में राते रंगीन कर रहे है.बाज़ार के बिस्तर पर स्खलित  ज्ञान कभी क्रांति का जनक नही हो सकता.

तो अब जबकि  बाज़ार के चंगुल से मुक्त अभिव्यक्ति का मन्च ब्लागिंग के रूप में सामानांतर विकल्प बन कर उभरा है तो हमारी जिम्मेदारी है कि छोटी लकीरों के बरक्स कई बड़ी रेखाए खिची जाएं. बाज़ारमुक्त और वादमुक्त हो समाजहित से राष्ट्रहित कि ओर प्रवाहमान लेखन समय की मांग है.

>धार्मिक लपेटा-लपेटी पर लिखे माइक्रोपोस्ट को पढ़िये परन्तु मानियेगा नहीं

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सभी ब्लॉगर भाई और बहन से एक आग्रह करना चाहता हूँ . वर्तमान में हिंदी ब्लोगिंग लोकतंत्र  के पांचवे खम्भे  के तौर पर देखा जाने लगा  है . एक ऐसा मन्च बन गया है जहाँ लोग अपनी इच्छानुसार सूचना तंत्र का उपयोग कर रहे हैं . मुख्यधारा की मीडिया में हड़कंप मचा है जिसे बाहर से छुपाने की कोशिश की जा रही है . मंत्री से लेकर अफसर लोग भी यहाँ अपनी बात रख रहे हैं .सरकारी तनर पर दबाव डालने का काम हो अथवा लोगों को सुचना के अधिकार , बिजली चोरी , शिक्षा का अधिकार , अदालत आदी के प्रति जागरूकता हेतु कई ब्लॉग पर मुहीम जारी है .  आम लोगों तक पहुँचने का सशक्त माध्यम बन गया है . वह दिन दूर नहीं जब सुचना क्रांति के बढ़ते कदमों से हर घर में ब्लॉग पढ़ा जायेगा सोचिये तब मुख्यधारा की मीडिया का क्या होगा ? लेकिन अफ़सोस तब होता है जब कुछ पागल और धर्मांध लोग यहाँ इसे कूड़ा दान समझ कर अपने मानसिक मॉल-मूत्र का विसर्जन करते  हैं . और घोर निराशा होती है जब कुछ अच्छे और अनुभव वाले  लेखक इनको नज़रअंदाज करने के बजाय कुकर्मियो के कृत्य से दुखी होकर उनके नाम से पोस्ट पर पोस्ट ठेल रहे हैं  . ऐसे में उनका ही प्रचार हो रहा है . कृपा कर अब सभी लोग इस दो पागल धर्मभिरुओं के ऊपर लिखना बंद करें सब ठीक हो जायेगा . मुद्दों की कमी नहीं है हम खुद कहते हैं धर्म पर इस तरह अनर्गल बहस बंद हो परन्तु दूसरे ही दिन इसी बहस में कूद पड़ते हैं ! क्या हमारे दिन इतने फ़िर गये हैं कि किसी कट्टरपंथी के नाम से पोस्ट लगनी पड़े . मैंने अपने दिल की बात कह दी आशा है आप आग्रह को ठुकरायेंगे नहीं .
आप क्यों भूल जाते हैं कि जब कोई इन्हें पढ़ेगा ही नहीं तो ये कैसी भी धार्मिक, घटिया, असहिष्णुता या सांप्रदायिक बातें कर लें कोई फ़र्क नहीं पड़ता है. टिप्पणी में मोडरेशन का अधिकार प्रयोग करें, उसके लिये मोडरेशन लागू करने की जरुरत नहीं जहाँ धार्मिक विज्ञापनबाजी देखो वहीं उसका उपयोग करें . और मैंने एक और तरीका निकाला है उक्त पागल सांड की अपशब्दों वाली टिप्पणी मुझे भी मिली थी तब मैंने उस पर कोई पोस्ट ना लिखकर एक लम्बा पोस्ट उसे मेल कर दिया . मैंने तो जाना छोड़ दिया है ऐसी गलियों में जहाँ धर्म के नाम पर इंसानियत  बिकती  है . आप सभी समझदार हैं . देश दुनिया में क्या यही विषय रह गया है विमर्श के लिए . हम यहाँ उलझे हैं उधर कुछ लोग जो कल तक आतंकवाद का परोक्ष  रूप से समर्थन करते थे आज नक्सलवाद का कर रहे हैं और उन्हें जबाव देने वाला कोई नहीं है . तो वक़्त रहते चेतिए नहीं तो इस उभरते हुए जनमंच का कबाडा हो जायेगा .

>नक्सलियों के समर्थन में आये बौद्धिक चिट्ठाकार को जबाव जब बन्दूक थाम ली तब याचना कैसी ?

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वाह री बौद्धिकता ! जब से नक्सलियों / माओवादियों के सफाए के लिए वायु सेना की तैयारी से जुड़ी रपट और चिदंबरम का बयान मीडिया में उछाला गया है तभी से कुछ हिंदी चिट्ठों के स्वनामधन्य बौद्धिक लेखक  इसे  सत्ता का दमनकारी चरित्र  और वर्तमान हालात को आपातकाल से भी बदतर बता रहे हैं . हिंदी के लेखकों को माओवादियों /नक्सलवादी/ उग्रवादी (तथाकथित क्रांतिकारी ) के मानवाधिकारों की रक्षा में खड़े होने का आह्वान किया जा रहा है .यही वो लोग हैं जो अक्सर आतंकवादियों के पक्ष में भी चिल्लाने से नहीं चूकते और दिल्ली के बौद्धिक वेश्यावृत्ति के गलियारों में इन्हें सम्मानपूर्वक एक आदर्श पत्रकार ,  लेखक,आलोचक , बुद्धिजीवी ,समाजसेवी पुकारा जाता है . इसी टोली के कुछ लोग जो कल तक साहित्य की दुनिया के सामंतों के बिस्तर गर्म करने के लिए सारे इन्तजाम देखा करते थे ,आज बस्तर के जंगलों में समाजसेवा का स्वांग रचा रहे हैं ! मानवता की रक्षा के नाम पर पाशविक कृत्यों को अंजाम देने वाले इन वादियों ( नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद/ उग्रवाद …) के वाद को मानसिक खुराक पहुंचाने वाले ऐसे लोग सेकुलर ,प्रगतिशील , और ना जाने कितने उपाधियों से लैश होते हैं . जबकि प्रगति के बजाय इनके एक -एक काम विध्वंश के साक्षी होते हैं .
                                                                              मानवता के खिलाफ जारी तमाम हिंसक संघर्षों को राज्य की विफलता से जनता में उपजे असंतोष का नतीजा बताने की जिम्मेदारी लिए घूमने वाले इन बौद्धिक लोगों को भला कौन समझाए ? ये तो अपनी ही धुन में जिद्दी बने बैठे हैं ! क्या इन्हें नहीं पता कि जिस भारतीय लोकतंत्र की दुहाई दे रहे हैं वहां की सरकार बहुमत ने चुनी है . पहले की तरह चुनावों में भ्रष्टाचार भी नहीं होता है . कुल मिला कर जनता की सरकार है . क्या सर्वहारा / धर्म /सम्प्रदाय /क्षेत्र  आदि के नाम पर हिंसक संघर्ष जायज है ? और जो लोग बौद्धिकता का दावा करते हुए हिंसा का समर्थन करते हैं अथवा उसे किसी घटना का पर्याय बताते हैं वो सही है ? अकसर आप सुनते होंगे , कभी कोई ब्लास्ट हुआ तो  दिल्ली में बैठे लोकतंत्र के नाजायज औलादों द्वारा कहा जाता है कि यह तो फलाने दंगे का , नरसंहार का , विवादित स्थल तोड़े जाने का नतीजा है . कहीं पर सामूहिक रूप से नक्सल हिंसा में आम जन की मौत हो जाए तब भी बचाव में आवाज आती है कि यह सरकार द्वारा उपेक्षित,पूंजीवादियों द्वारा सताए लोगों का विरोध है . लेकिन इस बात को नहीं देखते कि ऐसे हिंसक हमलों में कौन मारा जाता है ? क्या देश और समाज को चलाने वाले नीति निर्धारक या पूंजीवादी  मारे जाते हैं ? नहीं , यहाँ भी आम नागरिक ही शिकार होता है . क्या आम आदमी हीं तो माओवादी है कहने से काम चल जायेगा ?काम नहीं चलेगा , अब जबाव देना होगा इनको कि क्या बिहार के खगरिया में मारे गये सोलह निर्दोष किसान , झारखण्ड में मारा गया पुलिस अधिकारी , असाम में मारे गये लोग आम आदमी नहीं थे ? क्या हिंसक हमलों में मृत इन नागरिकों का कोई  मानव अधिकार / संवैधानिक अधिकार नहीं था ? परन्तु , अफजल और कोबाड़ जैसे नरभक्षियों के प्रति सहानुभूति का प्रदर्शन करने वाले इन कलम के दलालों को लाल ,पीले ,हरे, चश्मे से वास्तविकता नज़र नहीं आती है . 
                                                            नक्सली हिंसा को प्रत्युत्तर देने से खफा होकर मानसिक समर्थन करने वाले ऐसे ही एक ब्लॉग पर एक औसत बुद्धि वाले (क्योंकि साहब इनके कथन से इन्हें बौद्धिक तो नहीं माना जा सकता ! ) इंसान  khattu_mitthu ने कहा भारत जैसे लोकतंत्र में !!!  भारत कैसा लोकतंत्र है ? जिसमें चाहे जो बंदूक उठाले ! और जब बंदूक उठाली है तो याचना कैसी !होना तो यह चाहिये कि माओवादी, नक्सलवादी अपने बुद्धिजीवी समर्थकों को अधिकृत करें और वे बुद्धिजीवी सरकार के पास जायें कि हम रखेंगें माओवादी, नक्सलवादियों का पक्ष हमसे बात कीजिये, हम अदालतों में रखेंगे उनका पक्ष। साथ में माओवादियों, नक्सलवादियों को यह भी समझायेंगे कि जब गोली चलायें तो निशाना केवल उसी को बनायें जो वास्तव में उनकी हालत या दुखों के लिये जिम्मेदार है, उनको नहीं जो उन्हीं जैसे मजलूम हैं। जिन हाथों में नीति निर्माण नहीं है, बजट नहीं है, क्षमता नहीं है उन्हीं का लूट-काट करने से स्थितियां नहीं बदलेंगी। सरकार तो शायद इनसे बात कर भी ले लेकिन माओवादी, नक्सलवादी क्या इन्हें अधिकृत करते हैं?बुद्धिजीवी के लिये तो यह दुकान चलाने का स्कोप भर है।  आपको उनसे है वफ़ा की उम्मीद ,जो नहीं जानते वफ़ा क्या है !”
                                                                                फिलवक्त , बुद्धिजीवी लोगों के हाथों में लाल ,हरा, भगवा,नीला, झंडा न होकर सफ़ेद झंडे की आवश्यकता है क्योंकि सफ़ेद सच और अहिंसा का प्रतीक है  . और एक ऐसा रंग भी जिसपर जरुरत के हिसाब से विभिन्न रंगों को चढाया जा सकता है . नहीं तो सरकार की हुंकार साफ़ है . बहुत हो गयी याचना अब रण होगा . हर हिंसक वाद का जबाव देने की जरुरत आन पड़ी है . अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब श्रीलंका सरकार ने  संसार की सबसे सुगठित आतंकी संगठन लिट्टे को निबटाया था . 

>स्वच्छता का ढिंढोरा पीटने वाले धर्मभीरु को एक सच्चे भारतीय का जबाव

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“स्वच्छ हिन्दुस्तान की नेम प्लेट ” शीर्षक नाम से यह कविता एक ब्लॉग पर मिली ।

स्वच्छता का दम भरते हो

ज़रा बताओ फिर क्यों

एक पिता की दो संतान

अगर दो माँ से हैं

तो आपस मे कैसे

और क्यों विवाह

करती हैं

मौन ना रहो

कहो की हम यहाँ

इस हिन्दुस्तान मे

इसीलिये रहते हैं

क्युकी हम यहाँ

सुरक्षित हैं

संरक्षित हैं

कानून यहाँ के

एक होते हुए भी

हमारी तरफ ही

झुके हुए हैं

कहीं और जायगे

तो कैसे इतना

प्रचार प्रसार कर पायेगे

बस हिन्दुस्तान मे ही ये होता हैं

सलीम को यहाँ सलीम भाई

नारज़गी मे भी कोई सुरेश कहता हैं

तुम भाई हो हमारे तो भाई बन कर रहो

हम रामायण पढे

तुम कुरान पढो

ताकि हम तुम कहीं ऊपर जाए

तो राम और अल्लाह से

नज़र तो मिला पाये

ऐसा ना हो की

पैगम्बर की बात फैलाते फैलाते

तुम उनकी शिक्षा ही भूल जाओ

हम को हमारी संस्कृति ने यही समझया हैं

जो घर आता हैं

चार दिन रहे तो मेहमान होता हैं

और रुक ही जाए

तो घर का ही कहलाता हैं

घर के हो तो घर के बन कर रहो

हम तुम से रामायण नहीं पढ़वाते हैं

तुम हम से कुरान मत पढ़वाओ

धार्मिक ग्रन्थ हैं दोनों

पर अगर किताब समझ कर पढ़ सके

कुछ तुम सीख सको

कुछ हम सीख सके

तो घर अपने आप साफ़ रहेगा

और स्वच्छ हिन्दुस्तान नेम प्लेट की

उस घर को कोई जरुरत नहीं होगी ।

>ब्लोगवाणी के बंद पर इतना मातम क्यों

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ब्लोगवाणी के बंद पर इतना मातम क्यों छाया है ? खबरदार, मेरा उसके बंद होने सम्बंधित विवाद से कोई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है . क्यों हम हिंदी वाले जो है उसी में संतुष्ट रहते हैं .  “थोड़ा और विश करो” की चाहत हमारे दिल में क्यूँ नहीं पलती ? हिंदी चिट्ठों के इस बड़े साम्राज्य में मात्र दो सक्रीय प्रतिनिधि यानि एग्रीगेटर ब्लोगवाणी और चिट्ठाजगत  ! उसमें एक बंद हो गया तो जैसे सबकी बोलती बंद . अरे कुछ लोगों ने आरोप लगाया तो बंद ! इतने कमजोर थे तो बंद होना ही था . वैसे भी क्या फायदा रह गया था ब्लोगवाणी को इस रूप में चलाने का ? अब इतने लोकप्रिय डोमेन पर कुछ नए कांसेप्ट के साथ उतरा जायेगा ! खैर अन्दर की बात जो भी है भगवान् जाने ! पर क्या ब्लोगवाणी का जाना इतनी बड़ी क्षति है जो लोग मातम में पोस्ट पर पोस्ट धकेल रहे हैं ? एक एग्रीगेटर के बंद होने से हिंदी चिट्ठों की हालत ख़राब हो जाए तो ऐसे चिट्ठे लिखने से पहले सोचना चाहिए . क्यों हम आत्म निर्भर होना नहीं चाहते ? क्यों नहीं हिंदी में १०-२० बड़ी साईट हो जो संकलक  का काम करे ? क्या हिंदी चिट्ठों को  इस ओर नहीं सोचना चाहिए ? कुछ लोग कह रहे हैं कि यह किसी नए एग्रीगटर की साजिश है . साजिश हो या न हो , क्या किसी और एग्रीगेटर से हिंदी जगत का भला नहीं हो सकता ? या हिंदी की समृद्धि के लिए दर्जनों एग्रीगेटर खुल जाने चाहिए ?  इन सारे सवालों के बीच मुझे लगता है ब्लॉग जगत को मौका मिला है समुन्दर में तैरने का और रोने-धोने में यह मौका गंवाना नहीं चाहिए . हर एक चिट्ठे को अपने भरोसे पाठकों तक पहुँचने का हुनर भी तो मालूम हो ! और जो बंधू ऐसा नहीं चाहते तो उनके लिए भी अच्छा होगा रोना बंद करें और अन्य विकल्प को तलाशें क्योंकि साहब यहाँ सब अपनी दूकान चला रहे हैं कोई सेवा नहीं हो रही . भले ही दूकान से आठ आने की कमी न हो अरबों रूपये का मानसिक सुख तो मिल रहा है . मैंने एक विकल्प कुछ दिन पाहिले हीं खोज लिया था आप भी जा सकते हैं .

>किसी की पोस्ट को बगैर पढ़े टिपियाने लगता है तब बौद्धिकता पर प्रश्न खड़े होते हैं

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पिछली पोस्ट में उधृत हिंदी भाषा पर चल रहे बहस में कड़ियाँ जुड़ती जा रही है और दो अलग-अलग सोच के मध्य संवाद भी बढ़ता जा रहा है . कितना सुन्दर  है जब विरोधी विचारों को सम्मान और  धैर्यपूर्वक सुनकर अपने मन के उदगार व्यक्त किये जा रहे हैं  ! किसी प्रकार की विशिष्टता नहीं रखने वाले आम लोगों को भी स्थिरता से दूसरों को सुनने और उन पर सोच समझ कर अपनी प्रतिक्रिया जताने की आदत होनी चाहिए . पर साहब यहाँ तो हम और आप खास बने बैठे हैं , लेकिन यही खास जब किसी की पोस्ट को बगैर पढ़े टिपियाने लगता है तब बौद्धिकता पर प्रश्न खड़े होते हैं . संवाद की जगह विवाद पैदा करता है तब बौद्धिकता पर प्रश्न खड़े होते हैं . तर्कपूर्ण उत्तर के बजाय गाली-गलौज पर उतर आता है तब बौद्धिकता वेश्यावृत्ति से भी गिरी हुई मालूम होती है . ध्यान रहे यह बौद्धिकता केवल उनकी है जो ऐसा करते हैं . तो साहब फर्जीबाड़े  से निकलिए और दुनिया देखिये कुछ सीखिए . ………….. पेश है हिंदी भाषा गूगल ग्रुप पर चल रहे बहस की अगली कड़ी ………..
” प्रिय दिनेश सरोज जी ,
आपने मेरे शब्दों को सम्मान दिया उसके लिए धन्यवाद ,
एक बात की ओर आपका ध्यान चाहूँगा कि जो लोग समाज सेवा या किसी की सेवा का कार्य नहीं करते तो क्या उनसे इस बात की आशा कर सकते हैं कि वे देश सेवा की भावना या देशवासी होने का भाव व्यक्त कर सकते हैं ? या वे कहते कुछ और हैं और करते कुछ और ?
आपने कुछ उधाहरण दिए तो वे ठीक हैं पर अगर बहुत सारे में कुछ नाम इस बात को सही बताने के लिए हैं तो क्या उचित है ? क्या इस से आप यह कह कर अपने आप को संतुष्ट करते है कि मैंने सबको खुश कर दिया ??
रही बात मेरी तो मैंने कहा है कि मैंने सभी जाति के स्टूडेंट्स को गाइड किया और करता भी रहा पर जबमैंने देखा कि वे लोग अध्यन के प्रति गंभीर न हो कर अन्य कार्यों में ज्यादा धयान देतें है तो मेरी जगह आप होते तो क्या करते ? इसलिय अ़ब मैं उन्हें कहता हूँ कि उन्हें यहीं अध्यन करना ठीक होगा, क्यांकि यहाँ उन्हें परेशानी नहीं होगी, और अपने धर्म कि दुहाई दे कर पास भी हो जायेंगे और उसके बाद बैंक से लोन ले कर गबन भी कर जायेंगे, तो कोई रोक भी नहीं सकेगा या अपने अल्पसंख्यक होने की दुहाई दे कहीं भी कब्जा करके आराम से जीवन बिता सकते हो …ये भारत है हम विरोध नहीं करते भले हमारा कोई भी विरोध करें हम बुरा नहीं मानते.. यही तो हमारी संस्कृति है न …
वैसे भी मैं इस बात को सही नहीं मानता कि मेरे कारण दुसरे देश के लोगों को परेशानी हो ? हमे तो आदत है परेशानी में रहने की. हम व्यवस्था में रहने के आदी नहीं है तो हमे हक़ नहीं कि हम दुसरे देश की व्यवस्था को डिस्टर्ब करें ?
वैसे मैं संतुष्ट हूँ कि मैं जो काम कर रहा हूँ वो अपने देश के लिय कर रहा हूँ क्योकि भारतीय स्टूडेंट्स विदेशों से न केवल अध्यन करके वापस आयेंगे बल्कि पार्ट टाइम कार्य  करके पैसा भी कमाएंगे यानि वे वहां कि अच्छी बातें अच्छी तकनीक भी जानेंगे साथ ही विदेशी करेंसी भी साथ ले कर आयेंगे जो हमारे देश को मजबूत बनाएगी . साथ ही वे हिन्दू वादी भी बनेगे क्योकि वहां जाने से महसूस होता है कि हिन्दू होना और गर्व से अपने आप को हिन्दुस्तानी कहना कितना अच्छा लगता है . यहाँ तो अपने आप को गर्व से हिन्दू कहना कट्टर्तारवादी घोषित करता है , और हम घिर जातें है सम्प्रदाइक ए़कता, सर्व धर्म सम्भाव टाइप की बिना मतलब की बातों से ,
वैसे आपके पेज में न्यूज़ पेपर के माध्यम से बताया गया है कि कैसे मुसलमानों से नमाज के समय रोड ब्लोक कर दिया था ? और हाँ ताजमहल मुसलमानों की दरगाह या मस्जिद नहीं है वो विश्व के सात अजूबों में एक ईमारत है तो वो किसी धर्म विशेष की नहीं है कि कोई एक वहां नमाज करे च्चाहे एक बार ही क्यों ? मुझे आपकी यह तरफदारी पसंद नहीं आये एय्सा लगा जैसे एक नेता वोट मागने के लिए कुछ लोगों की तरफदारी कर रहा हो ?
मेरी समझ में नहीं आता कि इतना भी क्या नरम होना कि अपने देश के गर्व को भी भूल जाएँ ? अपनी अस्मिता , अपनी धरोहर को अपने देश की न समझ कर दूसरों को दे दें ? क्या एय्सा करना किसी भी देश के नागरिक को शोभा देता है ?
हमारे देश में दंगों की शुरुआत कौन करता है हिन्दू या मुस्लमान? नकली करेंसी चलाने वालों, रोड के किनारे नकली सी डी बेचने वालों में सबसे ज्यादा किस जाति के लोग हैं कभी आपने देखा है ? इतना सब होने के बाद भी आप कहते हैं हमे उनका आदर करना चाइए? हम खुद जब खुल कर विरोध नहीं कर सकते तो कह देतें हैं कि सरकार या प्रशासन विरोध करे ? क्या एक भारतीय होने के नाते हमारा कर्त्तव्य नहीं है कि पहले हम विरोध करें और प्रशासन का धयान खींचे?
आपको एक जानकारी देना चाहूँगा कि वेस्ट बंगाल, उत्तर प्रदेश , बिहार , जमू कश्मीर  में जो मुस्लमान रहते हैं वे बांग्लादेश या पाकिस्तान से गैरकानूनी रूप से आने वालों को अपने घरों में ठहरातें हैं उनका नकली राशन कार्ड वोटर कार्ड बन्वातें हैं और फिर वे लोग मिल कर देश में घूम घूम कर अपराध करते है और यहाँ रहने वाले मुस्लमान अपने आप को बेगुनाह बताते हैं ? बताइए इस को आप क्या कहेंगे ? देश भक्ति ? और ये सब वे लोग इसलिए कर पातें हैं क्योंकि उन्हें पता है कि हिन्दू विरोध तो करते नहीं हैं खुल कर चलो इस कमजोरी का लाभ उठातें है और इस देश को अन्दर से खोखला  बनातें है ?

जय हिंद
आपका ही
मोहन भया mohan bhaya

माननीय मोहनजी,

मैं आपके कहे इन तर्कों से पूर्णतया सहमत हूँ, हर भारतीय को भारतीयता का सम्मान एवं आदर सहित पालन करना ही चाहिए…. जो नहीं करते वो यकीनन भारतीय कहलाने के योग्य नहीं ही हैं….

और रही बार रेलगाडी में सफ़र की तो मुंबई के लोकल ट्रेन में आप हम हिन्दुओं को हर त्यौहार बड़ी ही सिद्धत से मानते पाएंगे, बिल्कुल वैसे ही जैसा की कोई अपने घर में या दफ्तर में मनाता है| रही बात पटाखे फोड़ने की तो आप समझ सकते हैं की हम ऐसा कम से कम ट्रेन में तो नहीं ही कर सकते हैं!  पर हाँ हम लोकल ट्रेन में भी होली में रंग गुलाल से जरुर खुशियाँ मानते है| नवरात्रि में दुर्गा पूजा भी करते है…… और हर रोज सुबह दफ्तर जाते समय या शाम को घर लौटते समय लोकल ट्रेन में भजन-कीर्तन करना आम बात है|  क्योंकि हम लोकल ट्रेन को अपनी जिंदगी का एक अहम् हिस्सा मानते है| क्या प्राचीनतम मंदिर पुरातत्व महत्व के नहीं है…… जरुर हैं….  और हम उनमें रोजाना पूजा-पाठ भी करते है…… तो यदि वर्ष में एक या दो बार ताजमहल में नमाज़ अदा कर दी तो एतराज क्यों…….? और यदि यह गैर कानूनी हो तो सरकार से गुजारिश है की वह कार्यवाही  करें………

ये हमारी संस्कृति की उदारता एवं बड़प्पन ही है की हम किसी संस्कृति पर आक्रमण नहीं करते और हमें इस संस्कृति पर गर्व होना चाहिए …. हमारी संस्कृति हमें सभी का सम्मान एवं आदर करना सिखाती है और यदि हम-आप या कोई और इसे हमारी कायरता और कमजोरी समझता है तो नादान है…. लेकिन अगर आप इतिहास देखें तो हम पर भाहरी लोगों ने इसीलिए राज करनें में सफलता पाई क्योंकि तत्कालीन राजा-राजवाडे और शासक आपसी रंजिस और मनमुटाव के चलते उनका मुकाबला एकजुटता से नहीं किया था कुछ तो बदले की भावना से बाहरी ताकत से मिल कर उनका साथ भी दिया….. खैर ये तो इतिहास हो चुका है ….. और ये भी सर्वविदित है की आज भी कुछ ऐसे लोग है जो बाहरी लोगों के बहकावे में या किसी मनमुटाव एवं हीनभावना के तहत आकर बाहरी लोगों को शय देते हैं और उनके इशारे पर देश विरोधी कृत्य को अंजाम देते है……

और मैं आपके बता दूं की यदि कुछ स्वार्थी राजनीतिज्ञ और कट्टरपंथ धर्मगुरु हम लोगों को एकदूसरे के खिलाफ भड़काना और बरगलाना बंद करदें तो भारत देश में भी असीम शांति और भाईचारा बना रह सकेगा, पर यही हमारी बदकिस्मती है की ऐसा तब नहीं हो पायेगा जब तक हर एक नागरिक समझदार एवं जागरुक नहीं हो जाता|

और ये कहावत भी है की जहां चार बर्तन होंगे वहां आवाजें तो होंगी ही…..| और वही हो रहा है….. हमें चाहिए की सभी बर्तनों को करीने से सजाये ना की आपस में टकराने दें…. पर यह क्रांति कौन लाये…………..? क्या आप और हम नहीं ला सकते………….? जरूर ला सकते हैं यदि हर एक नागरिक सजग एवं जागरुक हो और जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद एवं धर्मान्धता से ऊपर उठ कर सोचे तो……..!!!
सप्रेम,
जय हिंद …..

दिनेश   Dinesh R Saroj <dineshrsaroj@gmail.com>


>केवल पछतावे और निंदा से ब्लॉगजगत का कोई भला नहीं होगा

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आजकल वेबसाइट बनाने में व्यस्त हूँ जिस वजह से लिखने का मूड और समय दोनों का समन्वय नहीं हो पाता है . आज कुछ नए चिट्ठों की सूची प्राप्त हुई . उन चिट्ठों को पढ़कर लिखने का मन हुआ तो सोचा क्यों न नवागंतुकों की प्रशंसा हीं की जाए .अभी -अभी हिंदी दिवस का मातम ख़त्म हुआ है . ब्लॉग / चिट्ठा -जगत का विस्तार हो रहा है  ,उनका स्तर घट गया है  , बेकार के विवाद छाये हैं ,छपास रोग है ब्लॉग लेखन , चिट्ठा लेखन साहित्य नहीं है ,ये प्रचार माध्यम बन गये हैं , साहित्य चुराकर चेपा जा रहा है , इस्लाम हीं क्यों ? , मांसाहार जायज क्यों है ?, हमने पैसे कमाए , चिट्ठों को लोकप्रिय बनायें ,  ब्लॉग्गिंग के नियम -कायदे होने चाहिए , ब्लॉगजगत को पहरेदार की जरुरत है आदि तमाम मुद्दों पर पिछले दिनों खूब लिखा गया .लेखकों ने खूब टीआरपी बटोरी .अधिकाँश बेकार की चर्चा में कुछ जरुरत की चीजें भी परोसी गयी जिसे आप लोगों ने भी देखा और महसूस किया होगा . वो कुछ चीजें हमारे काम की और हमें प्रेरणा देती हैं .एक ब्लॉगर ने लिखा था कि सिमटते हिंदी ब्लॉग जगत का विस्तार हो रहा है . उनका “सिमटना ” कई अर्थों में था . मसलन, ब्लॉग तो खूब बढ़ रहे हैं परन्तु उनमें से बहुत कम लोग सक्रीय हो पाते हैं , हिंदी में लिखने वाले विदेशी लेखकों की संख्या उचित अनुपात में नहीं बढ़ रही है ,लोग उलजुलूल लिखते हैं स्तरीय और पठनीय सामग्री कम हो रही है  इत्यादि .लेकिन उन बंधुवर को एक पक्ष हीं दिखाई दे रहा है . केवल पछतावे और निंदा से ब्लॉगजगत का कोई भला नहीं होगा . हम आत्मविवेचना करें कि क्या सचमुच हम पूरे ब्लॉगजगत को पढ़ते हैं ? विभिन्न एग्रीगेटर पर जाकर रोज -रोज कुछेक ब्लॉग को पढ़कर फैसला सुनाना क्या उनके लिए ज्यादती नहीं जो मुख्यधारा की पत्रकारिता से व्यथित हो यहाँ पहुंचे हैं कि कुछ अच्छा होगा और वो ऐसा कर भी रहे हैं . लेकिन इस लोकमंच को भी आप-हम जैसे ठेकेदारों ने वैसा बनाने की कोशिश की है . एक बात को हमने देखा है  कि अच्छा लिखने वाले किसी ब्लॉग अथवा समाचारपत्र के मोहताज नहीं हैं .उनकी चर्चा किसी अखबार या ब्लॉग के कॉलम /स्तम्भ  में हो या न हो फर्क नहीं पड़ता .अगर ध्यान दिया जाए तो वो भी गलत हैं . मात्र आदर्शों को जीकर मकसद पूरा नहीं हो सकता ! व्यावहारिक तौर पर देखें तो बहुसंख्यक ब्लॉगर चिट्ठाचर्चा या समाचारपत्रों के स्तम्भ में खुद का नाम आने पर गर्वान्वित होते हैं . उन जगहो से प्रमाणित लोगों की प्रतिष्ठा मानी जाती है . फ़िर क्यों न ऐसा मंच भी हो जो बगैर पक्षपात के सही तथ्यों के आधार पर ऐसी सुविधा उपलब्ध करवाए ? हमें खुद से कोई न कोई मानक तय करना होगा अगर हम खुद को सामानांतर मीडिया मानते हैं . खैर , ये चर्चा आगे जारी रहेगी तब तक हमारे इस छोटे से मंच से कुछ नए ब्लॉग की आवाज आप तक पहुंचाई जा रही है : –

 योगेन्द्र बता रहे हैं विडियो को सीखने का माध्यम  बनाने से क्या फायदा है और उनका यह ब्लॉग प्रोग्रामिंग की भाषा सिखाने के लिए बनाया गया है .तो पढ़िये उनकी पहली पोस्ट : ” अभी तक हम-आप सभी किताबों से सीखते आये हैं| सही भी है, किताबों से अच्छा कोई सिखा भी नहीं सकता और किताबों जैसा कोई मित्र हो भी नहीं सकता| आज तक हमने-आपने जो कुछ भी सीखा किताबों से ही सीखा पर जब बात कंप्यूटर सीखने की हो तो सिर्फ किताबें काम नहीं आतीं क्यूंकि कंप्यूटर में आप कुछ सीखना चाहते हैं तो Practically ही सीख सकते हैं| उसके लिए कोचिंग का सहारा लिया जाता है जहाँ पर Teacher हमें कंप्यूटर पर काम कर के दिखता है और हम सीखते हैं| यानि की एक बात पूरी तरह साफ़ है की कंप्यूटर को हम लोग सिर्फ पढ़ कर नहीं सीख सकते बल्कि उसको देख कर सीख सकते हैं|  ”   

एक अन्य ब्लॉगर  बीबीसीBBC हिंदी के लेखों पर टिका टिप्पणियां करने में जुटे हैं . इस तरह के प्रयास होते रहे तो विश्लेषण पढने वालों को मज़े की सामग्री मिलती रहेगी .ऐसे लोगों की कमी नहीं जो ख़बरों-लेखों पर गहरे से विमर्श पसंद करते हैं . तो पढ़िये : ” कोई उन बातों पर ध्यान नहीं दे रहा है जो इन ख़बरों से उभर कर आती हैं और जो हमारे गणमान्य पत्रकार लिख नहीं रहे या लिखना नहीं चाहते | पहली बात : जो व्यक्ति अपने पैसों से तीन महीने तक पाँच सितारा होटल में रह सकता है वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है | वह उन ०.०१ % भारतियों में से है जिनके जन्मे अथवा अजन्मे पोतें-पोतियों को भरण-पोषण के लिए कभी काम करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी | जाहिर है कि वे विमान के पहले दर्जे से ही यात्रा करने के आदी है | उनके लिए विमान का साधारण दर्जा ‘मवेशी क्लास’ ही है | अगर उनके मुंह से गलती से यह सच निकल ही गया तो उसके लिए इतना बवाल मचाने की क्या आवश्यकता है |”

जेकेके नाम से एक बंधू सामाजिक मीडिया अनुकूलन (SMO) के फंडे बता रहे हैं .इस तरह नित्य नयी-नयी जानकारी देने वाले कई ब्लॉगर बंधू लेखन कर रहे हैं .आप भी खोजिये उन्हें पढ़िये और अपना ज्ञान बढाइये .हाँ संकोच न करियेगा कि बड़ा ब्लॉगर है या छोटा ? फिलहाल ये पढ़िये : ” सामाजिक मीडिया अनुकूलन कई वायरल विपणन के लिए एक तकनीक है जहाँ मुँह के शब्द दोस्तों या परिवार लेकिन सामाजिक बुकमार्क करने, वीडियो और फ़ोटो साझा वेबसाइट में नेटवर्किंग के प्रयोग के माध्यम से के माध्यम से नहीं बनाया है के रूप में जुड़े तरीकों में है. में ऐसे ही एक तरह से ब्लॉगों के साथ सगाई की blogosphere और विशेष ब्लॉग खोज इंजन में आरएसएस के प्रयोग के माध्यम से सामग्री बाँटने से ही प्राप्त होता है.”

आनंद सौरभ को देखिये नोटों पर छपे गाँधी की चाहत में परेशान हैं . बाकि  का माल तो उनकी पोस्ट पर जाने से हीं मिलेगा . देखिये तो अन्दर क्या है : ” गाँधी का जिन्न अब कहाँ से टपक पड़ा ……..जब बापू का सत्य , अहिंसा का कोई मतलब नहीं तो फिर सादगी क्यूँ ?सोनिया और राहुल बाबा आप गाँधी उपनाम छोड़ डालिए…बापू तो केमिकल लोचा की तरह गाहे बगाहे आ जाते है ……न आप के नाम में गाँधी होगा न आम लोगो को गाँधी की याद आएगी…..हमसे लोग कभी पूछते है क्या …..कभी शिकायत करते है क्या .”
  
                             आगे जब भी मौका मिलेगा नए चिट्ठों की चर्चा होगी . माफ़ करेंगे समयाभाव के कारण कोई स्थाई अंतराल पर नहीं लिख पा रहा हूँ परन्तु कोशिश होगी कि पाक्षिक चर्चा होती रहे . आशा है आप सभी का सहयोग मिलेगा .
                                                                        

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