>इनके हाथों में ये तलवार, ये भाले क्यूं हैं !

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आज सुबह मेल देखने बैठा तो एक शुभचिंतक  का पत्र  था…उनकी पीड़ा और चिंता बहुत ही जायज़ लगी….बात ब्लॉग्गिंग में बढ़ रही गुटबंदी की थी….हालांकि यह कोई नयी बात नहीं है..जब ब्लॉग नहीं थे उस समय भी यह गुट मौजूद थे…मैंने देखा बहुत से अच्छे लोगों की ऊर्जा इस गुटबंदी ने बर्बाद कर दी..बहुत से अच्छे   अच्छे  प्रोजेक्ट इसकी भेंट चढ़  गए….पर यह विकृति कभी भी पूरी तरह से खत्म नहीं हुयी…जिन कलमकारों ने समाज के बटवारे को रोकना था,   फूट को समाप्त करना था…गुटबंदिओं  को उखाड़ फेंकना  था…वही आपस में बंट  गए..उनके ही अलग अलग गुट बन गए…अपनी अपनी पत्रिकाएँ  और अपने अपने अखबार बन गए…लेखकों  का संगठन बना तो उसके भी गुट बन गए…सरकार और समाज के साथ टक्कर लेने वाले लोग एक दुसरे के सामने खड़े होकर लगे एक दुसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने…इस हालत ने बहुत सी और बुरायीओं  को भी जन्म दिया… फिलहाल मुझे याद आ रही है विनय दुब्बे की एक नज़म…जिसे मैंने एक पंजाबी पत्रिका में पढ़ा था…प्रस्तुत है उस नज़म का एक  अंश…..
मैं जब भी कविता लिखता हूँ
तो भूख को भूख लिखता हूँ,
विचार या विचारधारा नहीं लिखता……
……..
विचार या विचारधारा के सम्बन्ध में 
मुख्य सचिव प्रगतिशील  लेखक  संघ,
मुख्य सचिव जनवादी लेखक  संघ से बात करो…
मैं तो कविता लिखता हूँ….  
मैंने उस समय भी यही कहा था कि विचारों से स्वतंत्र रहने का विचार भी अपने आप में बुरा नहीं….पर उलझन और दुविधा के समय विचारधारा ही काम देती है…दरअसल फूट डालो और राज करो की नीति अब बहुत पुरानी हो चुकी है….इस नीति को सभी  नहीं तो बहुत से लोग पहचान  भी गए  हैं…अब आ चुकी है….कन्फ़ूज़ एंड रूल की नयी नीति……उल्झायो  और राज करो…..दुःख की बात है कि बहुत से कलमकार भी इस का शिकार ही चुके हैं..और उलझते जा रहे हैं…उन्हें सब कुछ ठीक या सब कुछ गलत लगता है…..जबकि ऐसा होता नहीं पर फिर भीर  दुविधा और उलझन बढ़  गयी है. ऐसी हालत में विचार या विचारधारा ही मार्गदर्शन  करती है.  पर
देखना यह होगा कि वे लोग खुद सीधे-सीधे किसी विचार या विचारधारा से प्रभावित हो रहे हैं या फिर नारेबाजी करने वाले किसी दल या गुट के  प्रभाव  में आ रहे  हैं….अगर किसी दल का प्रभाव है तो कम से कम यह ज़रूर देख लें कि उस दल के नेताओं की  अपनी निजी जिंदगी भी उस विचारधारा के अनुरूप ही है या फिर  वे कहते कुछ और है करते  कुछ और…
साहित्य  में बंगाल का अपना  अलग ही स्थान रहा है.  उस भूमि पर विचारों की कमी तो कभी भी नहीं रही…न ही जोश, मेहनत, लगन और इमानदारी की पर कहानी बहुत दुखद है इस बंगाल की..आनदमार्ग  के संस्थापक श्री श्री आनंद मूर्ती उर्फ़ पी आर सरकार के मुताबक एक दिन जो बंगाली दो बंगालों को  एक करने के लिए सारी शक्ति जुटाकर लडाई में कूद पढ़े थे  उसी बंगाली ने बंगाल को फिर से दो टुकड़े करने के लिए १९४७ के साल में अंग्रेजों के यहाँ दरबार किया था.  साल 1912  में जब दोनों बंगाल एक हो गए तब भी बंगालिओं ने सोचा वह लडाई में जयी हुए और और जब 1947  में बंगाल फिर से दो टुकड़े हुआ तब भी बंगालिओं ने सोचा वह जयी हुआ. इतिहास का यह कैसा वियोगान्त  नाटक (ट्रेजेडी) है…गौरतलब है कि वर्ष 1912 में दोनों बंगाल जब एक हुए तब बंगालिस्तान के अनेक अंश बंगाल से बाहर रख लिए गए थे..क्यों..? …..यह इतिहास ही बोल सकेगा…..यह कहानी काफी लम्बी है…..हम बात कर रहे ब्लॉग्गिंग में भी दाखिल हो चुकी गुटबंदी इतियाद की…
……आखिर में मुझे याद आ रहे हैं जनाब जावेद अख्तर  और उनकी एक नज़म :
लोग इन मुर्दा खुदाओं को सम्भाले क्यूं हैं !
फ़िक्र पे जंग है क्यूं,  ज़हन पे ताले क्यूं हैं !
धर्म तो आया था दुनिया में मोहब्बत के लिए..!
इनके हाथों में ये तलवार, ये भाले क्यूं हैं !               
बांटते फिरते हैं नफ़रत जो ज़माने भर में,
ऐसे इंसान तेरे चाहने वाले क्यूं हैं !
आँख रोशन हुयी सूरज की किरण से लेकिन,
ज़हन में अब भी अँधेरे के ये जले क्यूं है !
    कुल मिलकर अब यह आशा की जानी चाहिए कि हालत में सुधार होगा…नहीं तो इसका फायदा कोई तीसरा ही उठाएगा……..                                                          –रैक्टर कथूरिया

>सामयिक विमर्श सम्मान के लिए आलेख 8 नवम्बर तक हमें मेल करें

>                                                                 सामयिक विमर्श सम्मान

                              जनोक्ति परिवार की ओर से हर महीने सम-सामयिक विषयों पर 
               मौलिक लेखन करने वालों को प्रोत्साहित करने हेतु सम्मान देने का निर्णय लिया गया है . 
   सामयिक विमर्श सम्मान के लिए अपने आलेख 8 नवम्बर तक हमें मेल  करें .सर्वोत्तम  तीन आलेखों 
                                               को सम्मान हेतु चयनित किया जायेगा . 
                                     सम्मान राशि : 250 रूपये , 200 रूपये , 125 रूपये
सौजन्य  : जनोक्ति परिवार
मेल : janokti@gmail.com
पता: एच -56 ,शकरपुर
        दिल्ली -110092

>फ़िर भी देश ,काल और लोक की इनकी अपनी समझ है

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बहुत दिनों बाद आज कई चिट्ठों को खंगाल कर कुछ पठनीय अंश यहाँ प्रकाशित कर रहा हूँ .कहते हैं न  “जिन खोजा तिन पाइयाँ ” . अक्सर गप्पबाजी में  सुनते है ,आजकल कुछ अच्छा और सार्थक लिखा नहीं जा रहा पर ऐसा नहीं है . खोजिये तो जनाब ! परन्तु यह भी है एक आम पाठक के पास इतना समय कहाँ है कि खोज सके . इसलिए ऐसी चर्चाओं का आना जरुरी है जो कुछ अच्छे पठनीय सामग्री का संकलन एक पोस्ट में पेश करे . अच्छा और सार्थक लिखने वाले बहुत हैं ऐसे लोग भले हीं महीने में तीन-चार पोस्ट करते हों , इनकी लेखनी किसी खास खांचे में फिट नहीं बैठती हो , लम्बा और बहुत खोजपूर्ण नहीं हो , फ़िर भी देश ,काल और  लोक की इनकी अपनी समझ है और तरह-तरह के लोगों को पढ़कर हर दिन एक नया नज़रिया मिलता है तो अब पढ़ते रहिये हमारे साथ ………
मुलायम की राजनीति और कल्याण के करवटों का भेद खोल रहे हैं  खरे साहब :
“आने वाले समय में भाजपा अगर उमाश्री भारती, कल्याण सिंह और राजवीर को गले लगा ले तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वर्तमान राजनीति को देखकर तो यही कहा जा सकता है, कि सब कुछ संभव है राजनीति में। आखिर राजनीति की एक लाईन की परिभाषा : “जिस नीति से राज हासिल हो, वही राजनीति है“ जो ठहरी। “

२०१२  के विध्वंश  के पीछे के अर्थशास्त्र  को  शैलेन्द्र से जानिये  बेहद कम शब्दों में   :
” 21 दिसंबर 2012 के दिन जो होगा वो होगा ..लेकिन इतना तय है की आज से कुछ सालों बाद किसी मैनेजमेंट संस्थान के छात्रों को फिल्म 2012 के शानदार प्रमोशन कैंपेन के बारे में पढ़ाया जा रहा होगा और उसमें उस अफवाह की भी जिक्र होगा जिसे सच साबित करने के लिए कुछ वैज्ञानिक भी जी जान से लगे हुए हैं ..और हो सकता है जल्द ही बालीवुड का कोई निर्माता बिल्कुल इसी कथानक की कोई फिल्म लेकर आए क्योंकि बाजार के महौल का फायदा हर चतुर व्यापारी उठाना चाहता है “
 धरती के स्वर्ग की यात्रा का मज़ा और सजा दोनों बता रहे हैं अय्यर जी :
रशीद ने मुझसे पूछा अच्छी कश्मीरी चाय कुछ आगे मिलेगी आप बोलो तो रुक सकते हैं” “हां-हां क्यों नहीं मैने कहा, कुछ ही आगे एक गाँव आया, सड़क किनारे एक छोटा सा ठीया था. गाड़ी से उतरते ही एक मीठी और भीनी भीनी सी खुशबू से सामना हुआ. चाय और टोस्ट वाकई बहुत अच्छे थे. हम मज़ा ले ही रहे थे,  तभी एक जीप के ब्रेकों के चीखने की आवाज़ आयी दो लोग तेजी से उतर कर आये और हम तक पहुंच कर कहा अनंतनाग के पास हमला हुआ हैं, आप लोग अगली खबर मिलते तक रुकेंगे तो ठीक रहेगा…..
अपनी जागरूकता और उसके परिणामों से कुछ सन्देश दे रही हैं कविता वर्मा  :

सभी के बच्चे घूम कर गिरते पड़ते जा रहे हैं सिर्फ़ मेरा ही नागरिकबोध जाग पड़ा पहुँच गयी एक दिन सरपंच के पास साड़ी समस्या सुनाने। बड़ा भला आदमी है सरपंच भी तुंरत मुझे कुर्सी दी चाय मंगवाई पुरी बात ध्यान से सुनी और तुंरत मुरम के डम्पर वाले को फ़ोन किया .कालोनी वाले को भी फ़ोन पर कहा भिया सड़क खोल दो लोगों को तकलीफ होती है .मैडम दो तीन दिन में आपका काम हो जाएगा यदि न हो तो मुझे बताना। दसियों बार धन्यवाद दिया उन्हें, कितना भला आदमी है अब तो रोड खुल ही जायेगी” 

गिरते सामाजिक मूल्यों  में  माँ-बाप की बढ़ती परेशानी  से रूबरू करवा रहे हैं  अनिल शर्मा  :
आजकल भारत देश में वर्द्धाआश्रमों की बाढ़  सी आई हुई है , जयादातर बच्चे अपने माता पिता को आश्रमों में छोड़ रहे है . जो बच्चे अपने माता पिता को अपनी निजता में दखल मानते है . उनकी बीमारी,नाकारापन  ,चिडचिडापन और हर बात में टोका टोकी को बर्दाश्त न कर पाने की सूरत में इनको आश्रमों में छोडा आना ही उचित समझते है , इससे उन माता पिताओं पर क्या गुजरती होगी जो अपने बच्चो से बड़ी बड़ी आशाये लगाये हुए होते है , मेरा भी एक मित्र अखलेश इसी तरह का है जिसने अपने माता पिता को आश्रम में भेज दिया है  और खुद  अपनी पत्नी और तीन बच्चो के साथ एक बढ़िया बंगले में रहता है , भगवान  का इतना बड़ा भगत है की जहा भी मंदिर दिखे वहा दर्शन करना और देवी देवताओ के कार्यो के लिए धन लुटा उसकी आदत में शुमार है ,यानि भगवान जहाँ है सब कुछ वहां है “ 

>ब्लॉगप्रहरी की चयन प्रक्रिया शुरू हो गयी है.

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ब्लॉगप्रहरी की चयन प्रक्रिया शुरू हो गयी है. आपसे आग्रह है कि आप वोट देकर ब्लॉगप्रहरी के चयन में भागीदार बनें.
वोट देने के लिए ब्लॉगप्रहरी के मुख्य पृष्ठ पर उपलब्ध वोट बटन का उपयोग करें. आपको अगर लगता है कि हमने भूलवश किसी नाम को शामिल नहीं किया तो आप वह नाम हमें सूझा सकते हैं. ब्लॉगप्रहरी की निजी टीम कुछ इस प्रकार है .( देखें )
सुझाव हेतु मेल करें : admin@blogprahari.com

>ब्‍लॉगप्रहरी : नेक ब्‍लॉग को अनेक तक ले जाने वाला सारथि (एग्रीगेटर)

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जब विचारों को किसी वाद या विचारधारा का प्रश्रय लेकर ही समाज में स्वीकृति मिलने का प्रचलन बन जाए तब व्यक्तित्व का निर्माण संभव नही. आज यही कारण है कि भारत या तमाम विश्व में पिछले ५० वर्षो में कोई अनुकरणीय और प्रभावी हस्ताक्षर का उद्भव नही हुआ. वाद के तमगे में जकड़ी मानसिकता अपना स्वतंत्र विकास नही कर सकती और न ही सर्वसमाज का हित सोच सकती है.

मानवीय प्रकृति में मनुष्य की संवेदना तभी जागृत होती है जब पीड़ा का अहसास प्रत्यक्ष रूप से हो.जीभ को दाँतों के होने का अहसास तभी बेहतर होता है ,जब दांतो में दर्द हो. शायद यही वजह रही कि औपनिवेशिक समाज ने बड़े विचारको और क्रांति को जन्म दिया. आज के नियति और नीति निर्धारक इस बात को बखूबी समझते है . अब किसी भी पीड़ा का भान समाज को नही होने दिया जाता ताकि क्रांति न उपजे. क्रांति के बीज को परखने और दिग्भ्रमित करने के उद्देश्य से सत्‍ता प्रायोजित धरना प्रदर्शन का छद्म खेल द्वारा हमारे आक्रोश को खोखले नारों की गूंज में दबा देने की साजिश कारगर साबित हुई है. कई जंतर मंतर जैसे कई सेफ्टी-वाल्व को स्थापित कर बुद्धिजीवी वर्ग जो क्रांति के बीज समाज में बोया करते थे, उनको बाँझ बना दिया गया है.इतिहास साक्षी है कि कलम और क्रांति में चोली दामन का साथ है. अब कलम को बाज़ार का सारथि बना दिया गया. ऐसे में किसी क्रांति की भूमिका कौन लिखेगा? तथाकथित कलम के वाहक बाज़ार की महफिलों में राते रंगीन कर रहे है

 
.बाज़ार के बिस्तर पर स्खलित ज्ञान कभी क्रांति का जनक नही हो सकता.

तो अब जबकि बाज़ार के चंगुल से मुक्त अभिव्यक्ति का मंच ब्लॉगिंग के रूप में समानांतर विकल्प बन कर उभरा है तो हमारी जिम्मेदारी है कि छोटी लकीरों के बरक्स कई बड़ी रेखाए खींची जाएं. बाज़ारमुक्त और वादमुक्त हो समाजहित से राष्ट्रहित की ओर प्रवाहमान लेखन समय की मांग है.ब्लॉग जगत में जब प्रहार ज्यादा होने लगे और सृजन की प्रक्रिया धीमी हो जाने लगे, तब यह भान हो जाना चाहि‍ये कि वक्त एक बड़े बदलाव का है। वर्तमान समय में ब्लॉगिंग का गि‍रता स्तर, इसके शुभागमन के समय अनुमानित लक्ष्यों से बहुत दूर धकेलने वाला है। इस दिशा में एक सार्थक पहल हुई है, और उस प्रयास की संज्ञा ” ब्लॉगप्रहरी” देना सर्वथा प्रेरणात्मक है।
ब्लॉगप्रहरी का उद्देश्य ब्लॉग जगत के दिन प्रतिदिन बढ़ते जा रहे विसंगतियों से अलग एक आदर्श ब्लॉग मंच मुहैया कराना है। स्वरूप से एक एग्रीगेटर होने के बावज़ूद इसकी कार्य-प्रणाली विस्तृत और नियंत्रित होगी।
(हमें ब्लॉगप्रहरी को एक एग्रीगेटर के रूप में नहीं बल्कि‍ विचार-विमर्श और ब्लॉगिंग के एक सार्थक प्लेटफार्म के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। आपसे निवेदन है कि आप इसका मूल्यांकन किसी एग्रीगेटर से तुलना कर के न करें!)
जैसा कि नाम मात्र से स्पष्ट है, इसका एकमात्र लक्ष्य ब्लॉग जगत में एक आदर्श ब्लागिंग के मापदंड की स्थापना करना और ब्लागिंग जैसे सशक्त, अभिव्यक्ति के हथियार को धारदार बनाये रखना है।

क्या है योजना!

(1) ब्लॉगप्रहरी एक अत्यन्त आधुनिक और नियंत्रित ब्लॉग एग्रीगेटर होगा। यहां पर चुनिन्दा ब्लॉग और लेखकों के लेख ही प्रकाशित होंगे, जिसका निर्धारण 15 सदस्यीय ब्लॉगप्रहरी की टीम करेगी। वह टीम आप ब्लॉगरों के सुझाव पर आधारित एक परिभाषित व्यवस्था होगी। सर्व-सामान्य के लिये यह केवल पठन और प्रतिक्रिया देने तक सीमित रहेगा। हां, हम लगातार नये ब्लॉग शामिल करते रहेंगे और अनुचित सामग्री के प्रकाशन और अमर्यादित भाषा प्रयोग जैसे अन्य निर्धारकों के आधार पर सदस्यता समाप्त करना, अस्थायी प्रतिबंध जैसे तमाम औजार मौजूद रहेंगे। यह एक नि:शुल्क जनहित योजना है, और इसका एकमात्र ध्येय
ब्लॉग को वैकल्पिक मीडिया के स्वरूप में स्थापित करना है।

ऐसे मापदंड रखने के कारण क्या थे ?

हमारे पास मौजूद अन्य एग्रीगेटर सभी प्रविष्टियों को एक जगह दिखाते हैं। अब एक पाठक को यह चुनना मुश्किल होता है कि क्या पठनीय है और क्या नहीं। आजकल अनावश्यक विषयों पर मतांध लेख, व्यक्तिगत आक्षेप, आरोप-प्रत्यारोप, अमर्यादित भाषाशैली का प्रयोग कर अपने पोस्ट पर पाठक बुलाने की परंपरा विद्यमान है। इस बीच कई बार सुसंस्कृत लेख भी नहीं पढ़े जाते और एग्रीगेटर के पहले पृष्ठ पर से उपस्थिति खत्म होते हीं उनका सार्वजनिक स्वरूप समाप्त हो जाता है।
क्यूं अलग है ब्लॉगप्रहरी: यहां प्रविष्टियों का संकलन और प्रकाशन वर्गीकृत होगा और एजेक्स (एजेक्स आधुनिकतम वेब डिजायनिंग तकनीक है, इसपर आधारित व्यव्स्था में वेबसाइट क हर हिस्सा इतना हल्का और जल्द खुलने वाला हो जाता है, कि युजर को किसी भी तरह इन्तजार नही करना पड़ता। एक सामान्य उदाहरण आप याहूटैब में पाते है। यह पूरी साइट एजेक्स पर बनी है। तमाम हिस्से अपने आप मे स्वतंत्र है और आप अपनी पसन्दानुसार साइट के सजा सकते है।) पर आधारित व्यवस्‍था उनको लम्बे समय तक दिखाने में सक्षम है। आपके सामने मुख्य पृष्ठ पर 400 से ज्यादा चिट्ठे दिखाए जा सकते हैं।
महत्वपूर्ण और विशेष चिट्ठों को फ़ीचर पोस्ट कैटेगरी के अंतर्गत दिखाया जायेगा, जिसकी संख्या नियंत्रित है। यह आटोमेटेड स्लाइड इन चिट्ठों को विशेष समय तक चला कर उनकी पठनीयता और प्रासंगिकता बनाए रखेगा। ब्लॉगप्रहरी ने मुख्य पृष्ठ पर किसी भी चिट्ठों के पसंद-नापसंद करने जैसा औजार उपलब्‍ध कराना उचित नही समझा है
ताकि आप पूर्वाग्रह से ग्रसित हो उनकी ओर न चले जायें और हालिया प्रकरण (ब्लॉगवाणी पर विवाद) इस पाठक-लेखक की इस मानसिकता को दर्शाता है) ब्लॉगवाणी की सेवा निश्चित तौर पर ब्लॉगजगत के लिए बड़ा ऋण है और अनैतिक तरीके अपनाकर कुछ लोग अपनी तुच्छता का उदाहरण छोड़ जाते हैं।
(2) ब्लॉगप्रहरी पर किसी भी प्रकाशित सामग्री को आप वहीं पढ़ सकते हैं ( या उस लेखक के निजी ब्लॉग पर जा सकते हैं)। शीर्षक पर क्लिक करते हीं, वह पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए वहीं खुल जायेगी और आप अपनी प्रतिक्रिया भी वहीं दर्ज कर सकते हैं। आपको लिंक फालो कर उस व्यक्ति विशेष की साइट पर जाने की आवश्यकता नहीं है।

इसके पीछे कारण क्या थे?

लिंक फालो कर आप लगभग 2-3 मिनट में उस लेख तक पहुचते हैं और आपका समय तब सार्थक होता है ,जब आपको कुछ अच्छा पढ़ने को मिले। पर बात जो ज्यादा घातक है कि जिस तरह टी.आर.पी. ने मुख्यधारा की मीडिया का बेड़ा गर्क कर रखा है, उसी तरह रैंकिग विजेट, ट्रैफिक स्टैट्स काउन्टरों ने ब्लॉगरों की मानसिकता पर गहरा और पथभ्रमित करने का प्रभाव डाला है। सामान्यत: सनसनीखेज शीर्षक देकर कुछ चिट्ठाकार अपनी पीठ स्टेट्स काउन्टर से थपथपा रहे हैं। सर्वविदित है कि ऐसे चोंचले अपनाकर आप अस्थायी लोकप्रियता तो हासिल कर सकते हैं, पर आपकी वास्‍तविक पहचान में आपकी कलम की धार और निष्पक्षता ही सर्वोपरि होनी चाहिए।

क्यूं अलग है ब्लॉगप्रहरी ?

ब्लॉगप्रहरी पर पोस्ट खुलने की सुविधा होने के कारण आप पोस्ट वहीं पढ़ पाएंगे, और कोई कलमतोड़ू
लेखक इस मंच का उपयोग पाठक बुलाने के लिए नहीं कर पायेगा।
(3) यहां पर प्रकाशित पोस्ट पर पर 15 ब्लॉगप्रहरियों की नज़र होगी। आप स्‍वयं अपनी पोस्ट के प्रति उत्‍तरदायी होंगे और किसी भी तथ्य या प्रसंग का उल्लेख करने पर आपको उसकी मौलिकता और सच्चाई का पता होना चाहिए। किसी प्रहरी द्वारा किसी पहलू पर संबधित तथ्य का स्त्रोत मांगे जाने पर आपको उसको सामने रखना होगा। अगर आप अपने तथ्य के प्रति ईमानदार नहीं पाए गये तो आपको सार्वजनिक माफी मांगनी पड़ेगी।
साफ शब्दों में कहें तो वह शेर तो आपने सुना ही होगा :
आपका मंच है आपको रोका किसने, अपने पोखर को समन्दर कहिए…वाला फंडा नहीं चल पायेगा।
इससे आपकी और पूरे ब्लॉग जगत की विश्‍वसनीयता बढ़ेगी और आपकी लेखनी भी जवाबदेह होने के कारण अधिक पैनी होगी।
(4)विशेष प्रहरी के तौर पर कई गणमान्य और वरिष्ठतम साहित्यिक, पत्रकार और बुद्धिजीवी शामिल होंगे जो यदा-कदा अपने शामिल होने का अहसास आपको कराते रहेंगे और आपको अहसास नहीं होने देंगे कि‍ आपने उनकी प्रोफाइल लगा कर गलत फैसला लिया है। ऐसी अनेक नेक सहमति मिल चुकी हैं और मिल रही हैं। :)
इसके फायदे :—-इससे ब्लॉगजगत को हम वैकल्पिक मीडिया के रूप में स्थापित कर पाएंगे। यह स्पष्ट है कि
अगर कोई विशेष व्यक्तित्व शायद ही हम ब्लागरों को पढ़ने की हिम्मत जुटा पाता है, और अगर ब्लागर भी सामान्य कद का हो, तो उसके पास जाने का कोई विकल्प नहीं। अगर वह किसी एग्रीगेटर पर जाता है, तो जीवन में ब्लॉग पढ़ने की ग़लती वह दोबारा नहीं करना चाहेगा, क्योंकि संभवत: एक सौ पोस्ट के बाद एक पोस्ट पठनीय होती है। पर ब्लॉगप्रहरी विशिष्ट एग्रीगेटर है जो एक लेखक को पाठक के तौर पर Filtered posts,
monitered exposure and guaranteed readership देता है।
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हम खुद को ऐसे किसी भी तरह की परिभाषा स्थापित करने में नहीं उलझाना चाहेंगे कि अच्छा या बुरा ब्लॉगर कौन है या उसके क्या परिमाण हैं। पर यह तो तय है कि कुछ अच्छे ब्लॉगर हैं जो सर्वमान्य हैं। ऐसे ही ब्लॉगरों को साथ लेकर एक सुनहरे सपने को गति देने का यह प्रयास है।
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और क्या विशेष है ? ब्लॉगप्रहरी में—–

(1) प्रतिदिन एक प्रविष्टि या चर्चाघर का निष्कर्ष सभी राष्टीय समाचार पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादकों के पास स-नाम भेज दी जायेगी। और उनसे यह अपेक्षा होगी कि वह इनको विशेष स्थान दे कर प्रकाशित करें। इस सम्बन्ध में बड़ी सफलता मिली है और भविष्य में और पत्र- पत्रिकाएं हमसे जुड़ जायेंगी।
(2) ऑनलाईन रेडियो परिचर्चा का आयोजन पाक्षिक अन्तराल पर किया जायेगा। जिसके लिये स्टूडियो
का निर्माण हो गया है। भविष्य मे ब्लॉगप्रहरी हर रोज ब्लॉग समाचार वाचन की भी योजना पर अमल करेगा।
(3)एक परिवार की तरह ब्लॉगप्रहरी की टीम ब्लॉगजगत को वैकल्पिक मीडिया के रूप में स्थापित कर
दिशाहीन और दिग्‍भ्रमित मुख्यधारा के सामने एक आदर्श के रूप मे स्थापित करने के लिए वचनबद्ध हैं।

   ( 4) प्रत्येक ब्लॉग लेखक के  लिए एक अलग पन्ना उसके व्यकतित्व परिचय के लिए दिया जाएगा. जिससे बेनामी ब्लॉगर और छद्म नाम से
गलत बात करने वालो को दरकिनार किया जा सके .

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Mail us at:—————
admin@blogprahari.com
Or contact : +91-9313294888 ।
कृपया इस पोस्ट को अपने ब्लॉग पर लगाएं ।
अपने फ़ालोवर और लेखकों (अगर आपका ब्लॉग सामुदायिक है) तथा अन्य ब्लॉग मित्रों के मध्य इसी रूप में भेज दें। उनसे यह आग्रह करें कि वह अपने ब्लॉग पर यह पोस्ट लगाने के साथ इसे आगे भेज दें। यह क्रम बना रहे ताकि सब आगाह हो जाएं…”अब आ गया है…ब्लॉगप्रहरी’!!!!

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इस कोड को अपने ब्लाग/साईट पर लगा एक आदर्श ब्लागर बनने की ओर बढ़े:

http://blogprahari.com“>width=”180″ alt=”The VOice of Hindi Blogs” src=”http://www.blogprahari.com/wp-content/uploads/2009/10/logo42.pngheight=”80″/>

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लम्बाई और चौड़ाई का निर्धारण अपने सुविधानुसार स्वय कर सकते हैं। उपर लाल रंग से दिखाया गया है।
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सम्पादकीय समूह , ब्लॉगप्रहरी

>बाज़ार के बिस्तर पर स्खलित ज्ञान कभी क्रांति का जनक नहीं हो सकता.: जनोक्ति

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आज एक दुनिया देखी हमने, जहां अभिव्यक्ति विकृति की संस्कृति में ढल रही है .हिंदी समाज की विडंबना हीं कहिये , सामाजिक सरोकारों पर मूत्र त्याग कर व्यक्तिगत स्वार्थों में लिप्त हो लेखन  कर्म को वेश्यावृत्ति से भी बदतर बना दिया गया है .अंतरजाल में शीघ्रता से फ़ैल रहे हिंदी पाठक कुंठित दिखते हैं . मौजूदा समय में धार्मिक कुप्रचार ,निजी दोषारोपण,अमर्यादित भाषा ,तथ्य और तर्क विहीन लेखन यत्र तत्र बिखरे पड़े हैं .

जब विचारों को किसी वाद या विचारधारा का प्रश्रय लेकर  ही समाज में स्वीकृति  मिलने का प्रचलन बन जाए तब  व्यक्तित्व का निर्माण संभव नही. आज यही कारण है कि  भारत या तमाम विश्व में पिछले ५० वर्षो में कोई अनुकरणीय और प्रभावी हस्ताक्षर का उद्भव नही हुआ. वाद के तमगे  में जकड़ी मानसिकता अपना स्वतंत्र विकास नही कर सकती और न ही सर्वसमाज का हित सोच सकती है.

 मानवीय प्रकृति में मनुष्य की संवेदना तभी जागृत होती है जब पीड़ा का अहसास प्रत्यक्ष रूप से हो.जीभ को दाँतों के होने का अहसास तभी बेहतर होता है ,जब दातो में दर्द हो. शायद यही वजह रही कि  औपनिवेशिक समाज ने बड़े विचारको और क्रांति को जन्म दिया. आज के नियति और नीति निर्धारक इस बात को बखूबी समझते है . अब किसी भी पीड़ा का भान समाज को नही होने दिया जाता ताकि क्रांति न उपजे. क्रांति के बीज को परखने और दिग्भ्रमित करने के उद्देश्य से सता प्रायोजित धरना प्रदर्शन का छद्म  खेल द्वारा हमारे आक्रोश को खोखले नारों की गूंज में दबा देने की साजिश कारगर साबित हुई है.  कई जंतर मंतर जैसे कई सेफ्टी-वाल्व को स्थापित कर बुद्धिजीवी वर्ग जो क्रांति के बीज समाज में बोया करते थे, उनको बाँझ बना दिया गया है.इतिहास साक्षी है कि कलम और क्रांति में चोली दामन का साथ है. अब कलम को बाज़ार का सारथि बना दिया गया. ऐसे में किसी क्रांति की भूमिका कौन लिखेगा? तथाकथित  कलम के वाहक बाज़ार की महफिलों में राते रंगीन कर रहे है.बाज़ार के बिस्तर पर स्खलित  ज्ञान कभी क्रांति का जनक नही हो सकता.

तो अब जबकि  बाज़ार के चंगुल से मुक्त अभिव्यक्ति का मन्च ब्लागिंग के रूप में सामानांतर विकल्प बन कर उभरा है तो हमारी जिम्मेदारी है कि छोटी लकीरों के बरक्स कई बड़ी रेखाए खिची जाएं. बाज़ारमुक्त और वादमुक्त हो समाजहित से राष्ट्रहित कि ओर प्रवाहमान लेखन समय की मांग है.

>धार्मिक लपेटा-लपेटी पर लिखे माइक्रोपोस्ट को पढ़िये परन्तु मानियेगा नहीं

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सभी ब्लॉगर भाई और बहन से एक आग्रह करना चाहता हूँ . वर्तमान में हिंदी ब्लोगिंग लोकतंत्र  के पांचवे खम्भे  के तौर पर देखा जाने लगा  है . एक ऐसा मन्च बन गया है जहाँ लोग अपनी इच्छानुसार सूचना तंत्र का उपयोग कर रहे हैं . मुख्यधारा की मीडिया में हड़कंप मचा है जिसे बाहर से छुपाने की कोशिश की जा रही है . मंत्री से लेकर अफसर लोग भी यहाँ अपनी बात रख रहे हैं .सरकारी तनर पर दबाव डालने का काम हो अथवा लोगों को सुचना के अधिकार , बिजली चोरी , शिक्षा का अधिकार , अदालत आदी के प्रति जागरूकता हेतु कई ब्लॉग पर मुहीम जारी है .  आम लोगों तक पहुँचने का सशक्त माध्यम बन गया है . वह दिन दूर नहीं जब सुचना क्रांति के बढ़ते कदमों से हर घर में ब्लॉग पढ़ा जायेगा सोचिये तब मुख्यधारा की मीडिया का क्या होगा ? लेकिन अफ़सोस तब होता है जब कुछ पागल और धर्मांध लोग यहाँ इसे कूड़ा दान समझ कर अपने मानसिक मॉल-मूत्र का विसर्जन करते  हैं . और घोर निराशा होती है जब कुछ अच्छे और अनुभव वाले  लेखक इनको नज़रअंदाज करने के बजाय कुकर्मियो के कृत्य से दुखी होकर उनके नाम से पोस्ट पर पोस्ट ठेल रहे हैं  . ऐसे में उनका ही प्रचार हो रहा है . कृपा कर अब सभी लोग इस दो पागल धर्मभिरुओं के ऊपर लिखना बंद करें सब ठीक हो जायेगा . मुद्दों की कमी नहीं है हम खुद कहते हैं धर्म पर इस तरह अनर्गल बहस बंद हो परन्तु दूसरे ही दिन इसी बहस में कूद पड़ते हैं ! क्या हमारे दिन इतने फ़िर गये हैं कि किसी कट्टरपंथी के नाम से पोस्ट लगनी पड़े . मैंने अपने दिल की बात कह दी आशा है आप आग्रह को ठुकरायेंगे नहीं .
आप क्यों भूल जाते हैं कि जब कोई इन्हें पढ़ेगा ही नहीं तो ये कैसी भी धार्मिक, घटिया, असहिष्णुता या सांप्रदायिक बातें कर लें कोई फ़र्क नहीं पड़ता है. टिप्पणी में मोडरेशन का अधिकार प्रयोग करें, उसके लिये मोडरेशन लागू करने की जरुरत नहीं जहाँ धार्मिक विज्ञापनबाजी देखो वहीं उसका उपयोग करें . और मैंने एक और तरीका निकाला है उक्त पागल सांड की अपशब्दों वाली टिप्पणी मुझे भी मिली थी तब मैंने उस पर कोई पोस्ट ना लिखकर एक लम्बा पोस्ट उसे मेल कर दिया . मैंने तो जाना छोड़ दिया है ऐसी गलियों में जहाँ धर्म के नाम पर इंसानियत  बिकती  है . आप सभी समझदार हैं . देश दुनिया में क्या यही विषय रह गया है विमर्श के लिए . हम यहाँ उलझे हैं उधर कुछ लोग जो कल तक आतंकवाद का परोक्ष  रूप से समर्थन करते थे आज नक्सलवाद का कर रहे हैं और उन्हें जबाव देने वाला कोई नहीं है . तो वक़्त रहते चेतिए नहीं तो इस उभरते हुए जनमंच का कबाडा हो जायेगा .