>धर्म की दुकानों से कब तक आँख फेरेंगे , कुछ तो शर्म करो !

>शर्म आती है ?

किसे ? 
अरे , हमें और किसको ! 
अब पूछिए क्यों ? इसलिए कि हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहाँ बड़ी आसानी से योग ,अध्यात्म ,भजन-कीर्तन के नाम पर कोई भी दाढ़ी-बालों वाला नकलची ,ढोंगी ,मक्कार भगवान् के समक्ष पूजा जाने लगता है . हिन्दू समाज के लिए वर्तमान समय धार्मिक और आध्यात्मिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है . ऐसा कहने के एक नहीं अनेक कारण है .और तत्काल उदाहरण भी सामने हैं बस गिनते चलिए और अपने आस-पास भी खोजिये कई मिल जायेंगे ! दिल्ली में चमत्कारी बाबा ६ लड़कियों के साथ सेक्स रेकेट में पकड़ा गया . आसाराम बापू के आश्रम में यौन शोषण और बच्चों के खरीद-फरोख्त की बात कई दफे सामने आई है .कुम्भ मेले में शंकराचार्यों के बीच असली-नकली को लेकर लड़ाई जारी है . दक्षिण के एक बाबा नित्यानंद  को दो अभिनेत्रियों  के साथ मजे लुटते हुए एक सीडी बरामद हुई है . डेरा सच्चा सौदा के बाबा राम रहीम पर हत्या का आरोप लगा है . यह तो कुछ हाई प्रोफाइल बाबाओं के हालिया किस्से हैं ! अनुमानतः दस लाख से अधिक बाबाओं के इस देश में कितने ऐसे हैं और कितने सच्चे यह कहना बगैर किसी सर्वेक्षण के गलत होगा ! बात केवल बाबाओं के सेक्स रेकेट ,किडनी रेकेट ,आदि में लिप्त होने तक नहीं रह जाती है . बात है कि हम कैसे समाज में जी रहे हैं जहाँ उपदेशक /गुरु /संत कहलाने वाले ,भगवान् के तौर पर पूजे जाने वाले लोग इतने गिर गये हैं . मंदिरों मठों को आपसी वर्चस्व और निजी स्वार्थपूर्ति का साधन बना दिया है . बिहार के सुल्तानगंज स्थित अजगैवी मठ का किस्सा याद होगा आपको जहाँ का महंथ मठ की जायदाद बेच कर पकड़े जाने पर शिष्या के संग कमरे में बंद हो गया था . अरे ,इनसे अच्छा तो प्राचीन देवदासी परम्परा थी जिसमें छिप-छिपाकर कदाचार नहीं होता था . इनकी तरह भक्तों को ब्रह्मचारी का उपदेश देकर खुद मज़े तो नहीं लुटते थे . जो भी होता था उसमें समाज की इच्छा शामिल थी और कम से कम सबको मालूम तो जरुर होता था . ” ऊपर से फीट -फाट अन्दर से मोकामा घाट ” ऐसी बात तो कतई नहीं थी. 
आज पत्रकारिता , समाजसेवा , राजनीति आदि के तर्ज पर धर्म -अध्यात्म मिशन से प्रोफेशन बन चुका है लेकिन बाबागिरी  नाम के इस प्रोफेशन में ईमानदारी की कोई गुंजाईश नहीं बची है .लोगों ने इसे भी धंधा बनाया , चलो अच्छी बात है , लेकिन धंधे का पहला वसूल; पेशे के चरित्र को बचाए रखना , को हीं गायब कर दिया ! किसी फिल्म का संवाद याद आ रहा है कि ‘ बेईमानी का काम भी हम ईमानदारी से करते हैं ‘ . कई सवाल आपके मन भी तैर रहे होंगे ! जैसे , यह सब अचानक से अभी क्यों सामने आ रहा है ? पहले ऐसा नहीं था ? ये सब कब से शुरू हुआ ? आदि-आदि . ऐसा नहीं कहा जा सकता कि पहले ऐसा नहीं था लेकिन इतना जरुर है कि अब जबकि बाबागिरी नाम का एक नया धंधा बाजार में आया है तब तादाद बढ़ गयी है .निजी शिक्षण संस्थानों की तरह धार्मिक-आध्यात्मिक -ज्योतिष वगैरह ,वगैरह की संस्थाओं की बाढ़ आ गयी है . और इस पूरे हादसे मे सूचना क्रांति की उपज इलेक्ट्रोनिक मीडिया और इंटरनेट ने सबसे अहम् भूमिका निभाई है . एक बार खुद से आंकलन करके देखिये तो पता चलेगा कि टीवी पर सामाजिक सरोकारों से जुडे विषयों से दुगुने -तिगुने समय में इन धंधेबाजों को दिखाया जाता है और इन्टरनेट पर समाजोपयोगी वेबसाइट के मुकाबले ज्योतिष -अध्यात्म -धर्म के नाम पर चल रही दुकानें सौ गुना अधिक संख्या में है .सुना है कि बीबीसी हिंदी की साईट से अधिक पाठक शनिधाम .कॉम पर जाते हैं ! हिन्दुओं का असंख्य धन राशि मंदिर -मठ रूपी दुकानों के महंथों और कुकुरमुत्ते की तरह फैले बाबाओं के पास बेकार पड़ा है और जो धन मात्र कुछ लोगों की ऐय्याशी में झोका जाता है . सबको मालूम है राम जी ,दुर्गा माँ ,शिव जी या साईं बाबा को पैसों का कोई काम नहीं है .अरे जिसके दर पे हम खुद भीख मांगने जाते है उनको कुछ देकर बड़ी चीज की उम्मीद रखना उनके ही विरुद्ध है .  

बहरहाल , हिन्दू धर्म के हित में सोचने वाले तमाम बुद्धिजीवों से आग्रह है कि आप खुद सोचिये , प्रमाणित रूप से ज्ञात संसार के सबसे प्राचीनतम धर्म -संस्कृति की इस दयनीय दशा पर रोना नहीं आता ? रोइए मत ! कुछ करिए . सबसे पहले खुद पर शर्म करिए कि हम लोग ऐसे समाज में जी रहे हैं और जब शर्म का अहसास होगा और लगेगा कि सच में कुछ गलत हो रहा है तब कहीं जाकर इस लड़ाई का आगाज होगा . यह आग्रह उन सभी के लिए है जो इंटरनेट पर हिन्दू धर्म को लेकर संघर्ष कर रहे हैं या ऐसा दावा करते हैं .हम शुतुरमुर्ग नहीं बन सकतेहैं . अपनी गर्दनें रेत में नहीं छुपा सकते हैं . सदियों से जागृत समाज का वंशज होने का दायित्व हमारे सर पर है उसे हम छोड़ कर आत्मप्रशंसा में डूबे रहेंगे ? नहीं , तो फ़िर क्या करेंगे इस पर गंभीरता से चिंतन करना होगा . धर्म-संसद जैसी संस्थाओं को जागृत करने की दिशा में प्रयास जरुरी है क्योंकि जब तक पथप्रदर्शक नहीं होगा पथानुगामी क्या करेंगे ! हमें अपने घर का कचड़ा स्वयं हीं साफ़ करना होगा . एक जागरण की शुरुआत करनी होगी  जिसमें हिन्दू जनता के धन के इस बेजा उपयोग को रोका जाए और इसका इस्तेमाल हिन्दू धर्म की समृद्धि { जैसे हिन्दू धर्म से जुड़े रिसर्च कार्यों , असहाय हिन्दुओं को रोटी कपडा मकान व शिक्षा देने तथा अशोक महान के तर्ज पर हिन्दू धर्म के विश्वव्यापी प्रचार} का काम किया जाए .

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>अगर आप भी ब्लोगिंग में संगठन बनाने की बात से असहमत हैं तो अपने -अपने ब्लॉग पर एक विरोध का पोस्ट जरुर लिखें !

>अभी -अभी ” गप-शप का कोना ” पर प्रभात जी की पोस्ट देखी तो वाकई चिंता हुई . खबर चिंताजनक है कि ब्लॉगजगत को भी मठाधीशों की जरुरत संगठनात्मक रूप में होने लगी है !गौर करने लायक बात यह है कि यहाँ मठाधीश तो पहले से मौजूद रहे हैं लेकिन अब संगठन बना कर अपनी बातें दूसरों पर थोपा जायेगा . अब तक अभिव्यक्ति के इस स्वतंत्र समझे जाने वाले मंच को भी लोग अपनी लॉबिंग का केंद्र बनाने लगे हैं ऐसा अब तो जरुर महसूस होने लगा है . यहाँ भी उन्हीं लोगों की चलेगी जो अपनी गोटियाँ फिट कर पाएंगे और नये आने वालों को साहित्य की दुनिया की तरह हीं पुराने खिलाडियों की चमचागिरी करनी पड़ सकती है .आगे चल कर ऐसा भी हो सकता है कई एक संगठन बन जाए तब कुछ लिखने से पूर्व उनकी ओर लोगों को ताकना पड़ेगा कि किसकी क्या प्रतिक्रिया होगी . पोस्ट से ज्यादा चिंता उस पर आने वाली प्रतिक्रिया की होगी . प्रभात जी की पोस्ट पर एक सज्जन ने लिखा है क्या हम यहाँ राजपूत ब्लॉगर महासभा, ब्राहमण ब्लॉगर समिति, चिकित्सासेवी ब्लॉगर समूह देखना पसँद करेंगे ? कभी नहीं, क्योंकि हम अभिव्यक्ति और मत-विमर्श से इतर राजनीति या गुटनीति करने नहीं आये हैं ।”    जो मार्के की बात है . पूरे बहस में ब्लोगिंग के व्यक्तिगत और सामूहिक होने को लेकर कई प्रश्न उठते हैं . व्यक्तिगत ब्लॉग से हमने भी शुरुआत की थी जिसे बाद में सामूहिक कर दिया गया लेकिन कसी संगठन या खास विचार के नाम पर नहीं बल्कि यहाँ पर लगभग हर तरह के लोग मौजूद हैं और यदि विचारों पर अंकुश लगा कर एक ओर प्रवाहमान किया जाए तो हमारी समझ में इस विधा का दुरूपयोग हीं होगा .और किसी तरह के संगठन  बनने की स्थिति में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि वह किसी न किसी खास विचारधारा की ओर अपना झुकाव रखेगा  और  ना चाहते हुए भी जुड़ने वाले लोगों पर एक प्रकार का दबाव बनेगा . अब तक के तरह -तरह संगठनों को देख कर और उनमें काम करके इतना तो कह हीं सकता हूँ आरम्भ बहुत बढ़िया होता है बाद में सारी चीजें वैसी हीं हो जाती है . बेहतर है ब्लोगिंग को बांधने के बजाय स्वच्छंद रहने दिया  जाए साहब , नहीं  तो फ़िर  मीडिया हीं अच्छी है . यहाँ लोग इसीलिए आते हैं कि उन्हें उनकी बात रखने में कोई रोक नहीं सकता . अगर आप भी ब्लोगिंग में संगठन बनाने की बात से असहमत हैं तो अपने -अपने ब्लॉग पर एक विरोध का पोस्ट जरुर लिखें !

>प्रभाष जोशी से मेरी जान-पहचान

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प्रभाष जोशी से मेरी जान-पहचान पुरानी ना सही पर तीन बरसों में कार्यक्रमों के दौरान हुई कुछ एक मुलाकातों का असर गहरा जरुर है . दिल्ली जैसे महानगर में प्रभाष जी का ठेठपन मेरे जैसे कितने गंवई इंसानों को उनके करीब चुम्बक की भांति खींच लाता था .जनसत्ता हो या तहलका उनके आलेखों को पढ़कर और यदा-कदा टेलीविजन के कार्यक्रमों में उनको सुनकर खुद को उनसे जुडा हुआ पाता था .”प्रभाष जोशी ” यह नाम पहली बार दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश हेतु साक्षात्कार के दौरान सुधीश पचौरी के मुख से सुना था .उन्हीं दिनों हिन्दी विभाग जामिया में दाखिला लिया तो जनसत्ता पढने की लत लगी और यहीं से शुरू हुआ प्रभाष जोशी और हमारा संबंध जो तक़रीबन एकतरफा होते हुए भी सीमाओं से परे था .एक पाठक की हैसियत से  देशकाल को लेकर जो समसामयिक सवाल  मन में कौंधते, उनका उत्तर ‘कागद कारे’ में उनको पढ़कर मिल जाया करता . इस अनोखे संवाद ने धीरे-धीरे जोशी जी को मेरे हर रविवार का साथी बना दिया था .जहाँ दिन भर जनसत्ता हाथ में लेकर उनके आलेख में मीनमेख ढूँढना मेरा काम था .ऐसा इसलिए की मुझे उनसे जलन होती थी आखिर हर कोई उनका नाम क्यूँ लेता है .मन हीं मन उनसे लम्बी बहस होती और उसी बहस से अपने विचारों की धार भी बनाता . लगभग ढाई बरस तक कागद कारे पढ़ते हुए उनकी साफगोई और वादनिरपेक्षता ने मुझे भी उनका प्रशंसक -समर्थक बना दिया था .हालाँकि आप मुझे उनका अंधभक्त नहीं कह सकते क्योंकि मेरा मानना है – ‘किसी विचारधारा या व्यक्ति के विचारों को अनुसरित करने और खुद को उसमें बाँध लेने से स्वयं का विकास  और नए विचारों का मार्ग स्वतः अवरुद्ध हो जाता है .’
प्रभाष जोशी को कुछ लोग गांधीवादी तो कोई समाजवादी और कुछ लोग तो ब्राह्मणवादी ,रुढिवादी पत्रकार बताते हैं . परन्तु मैं उन्हें सिर्फ और सिर्फ एक पत्रकार जानता और मानता हूँ . एक पत्रकार को पत्रकार हीं रहने दिया जाए तो बहुत है ! प्रभाष जी सच लिखते थे और उनके सच को पढ़कर ,सुनकर उन्हें कभी वामपंथी,कभी समाजवादी ,कभी रुढिवादी ,कभी ब्राह्मणवादी तो कभी संघी भी मान लिया जाता रहा है . अभी दो महीने भी नहीं बीते जब रविवार में छपे उनके एक साक्षात्कार को लेकर उन्हें ब्राह्मणवादी और संघी कहा गया { ब्राह्मणवादी या संघी होना गलत है या सही अथवा अपमानजनक यह अलग सवाल है } .हिन्दी चिट्ठाकारी के एक गुट ने उनके खिलाफ बेसिर -पैर का अभियान चलाने की कोशिश की थी .जोशी जी के नाम पत्रकारिता की दूकान चलाने वाले शायद भूल गये कि प्रभाष जोशी को किसी भी वाद से नहीं जोड़ा जा सकता है .क्योंकि प्रभाष जी की नज़रों में नंदीग्राम और गुजरात में बहाया गया खून एक था .उनके लिए सत्ता मद में चूर इंदिरा गाँधी और बुद्धदेव भट्टाचार्य में कोई भेदभाव नहीं था . उनके शब्द बाण किसी की व्यक्तिगत आलोचना में नहीं बल्कि शोषण और अन्य के खिलाफ शोषितों के हक में चला करते थे . क्या ऐसे किसी पत्रकार को किसी भी वाद से जोड़ना उचित है ? पत्रकार शब्द और उसके मायने स्वयं में परिपूर्ण हैं इसलिए यह सोचने की जरुरत  है कि किसी पत्रकार बोला जाए और किसे नहीं ? जोशी जी अनुकरणीय क्यों है और उन्हें पत्रकार क्यों माना जाए ? इन दो सवालों के जबाव उनके जीवनकर्म में समाहित हैं . प्रभाष जी बंद कमरे में कलम घिसने वाले पत्रकार नहीं होकर एक एक्टिविस्ट / कार्यकर्त्ता थे ,जो गाँव ,शहर ,जंगल की खाक छानते हुए सामाजिक विषमताओं का अध्ययन कर ना केवल समाज को खबर देते थे अपितु उसे दूर करने का हर संभव प्रयास भी उनकी बेमिसाल पत्रकारिता का हीं एक हिस्सा  था .
आज प्रभाष जी इस दुनिया को त्याग कर अनंत यात्रा पर जा चुके हैं . उनके निधन पर शोक प्रकट करने वाले लोगों  व अखबारों और ब्लॉग पर स्मृति लेख के जरिये संवेदना जताने वालों ने उनके आगे आखिरी शब्द लगा कर इस बात को उभारने की भरसक कोशिश की है कि अब कोई प्रभाष जोशी जैसा नहीं बनना चाहता है .अब कोई उनकी समृद्ध पत्रकारीय विरासत का दामन थामने को तैयार नहीं है .लेकिन क्या सच इतना अंधकारमय है ? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता ! कई नौजवान पत्रकार और पत्रकारिता के सैकड़ों छात्र उनकी इस विरासत से जुड़ने का ख्वाब पाल रहे हैं . ये वही लोग हैं जिनके बीच प्रभाष जी किसी न किसी कार्यक्रम में अक्सर आते और आगे बढ़ने की प्रेरणा देते रहे हैं . 

>गूगल गणराज्य में प्रभाष जी के नायकत्व को चुनौती देने वाले तब भी पिछड़ गये थे

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प्रभाष जी के निधन से अब तक ब्लॉग जगत उनके शोक में संतप्त दिख रहा है . हर कोई अपने हिसाब से उन्हें याद कर रहे है . कुछ अखबारों की आलोचना में भी लगे हैं कि उनने प्रभाष जी के निधन को एकाध कॉलम में जगह देना  उचित नहीं समझा . अक्सर यही देखा है मैंने, मरने के बाद दिवंगत इंसान के प्रति लोगों की सहानुभूति बहुत बढ़ जाती है . आज ब्लॉग जगत में जो सहानुभूति की लहर चल रही है उस पर मुझे हंसी आ रही है . खास कर उनलोगों पर जो महीने भर पहले प्रभाष जोशी जी को अपने मनपसंद गालियों ,संघी -ब्राह्मणवादी-रुढिवादी  आदि , से संबोधित करते हुए उनपर कीचड़ उछल रहा थे , आज उन्हीं के ब्लॉग पर जोशी जी की प्रशंसा में गीत गाये जा रहे है ! या तो जोशी जी की पत्रकारिता को संकुचित वाद /विचार का ठप्पा लगाने पर आमादा ये मूढ़ तब गलत थे या आज गलत है ?  हाँ ,कुछ लोग ऐसे भी थे जो तब भी प्रभाष जी के साथ थे और आज भी है भले हीं उन्हें प्रभाष जी का लठेत कहा गया . गूगल गणराज्य में प्रभाष जी के नायकत्व को चुनौती देने वाले तब भी पिछड़ गये थे और अब तो बाल भी बांका नहीं कर सकते ! जो लोग गूगल सर्च का हवाला दे कर उनके नायकत्व को समाप्त बता रहे थे वो भूल रहे थे कि तब भी प्रभाष जी समर्थन में लिखा मेरा हीं आलेख पहला रिजल्ट था . प्रभाष जी दुनिया में सशरीर नहीं है तो क्या हुआ पत्रकारिता जगत में उनका नायकत्व हमेशा रहेगा  !

>सेमिनार का विषय "in india we are not indians "

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बेगानेपन का अहसास दबाये दिल वालों की दिल्ली में पूर्वोत्तर भारतीय समय काट रहे हैं .मुनिरका ,मुखर्जीनगर ,कटवारिया ,लाडोसराय आदि  इलाकों के दरबे जैसे घरों में रहने वाले इन बेगाने भारतीयों को कदम-कदम पर अपमान का घूंट पी कर जीना पड़ता है . राह चलते चिंकी ,सेक्सी , माल ,नेपाली ,चाइनीज जैसे फिकरे सुनना तो इनकी नियति बन गयी है . हद तो तब हो जाती है मनचले हाथ लगाने पर उतर आते हैं . ऐसा नहीं है कि ये हरकतें कम-पढ़े लिखे आवारा किस्म के लड़के करते हैं बल्कि डीयु ,जामिया,आई आई टी सरीखे नामी गिरामी शिक्षण संसथानों के तथाकथित सभी छात्र भी इनसे मज़े लेने में कोई कसर नहीं छोड़ते .राजधानी में पूर्वोत्तर की लड़की की आई आई टी के छात्र द्वारा हत्या और ग्यारहवीं के छात्रों द्वारा जामिया के मॉस कॉम में पढ़ रही अरुणाचल की लड़की के कपडे फाड़ने की घटना इन बातों को साबित करने के लिए काफी है . इनकी हालत उन बिहारी रिक्शा चालकों जैसी है जिन्हें दायें -बाएं से आने गुजर रहे हर दुपहिया -चरपहिया वालों की लताड़ खानी पड़ती है . इतना हीं नहीं जब तब सरकार की  भेदभावपूर्ण नीतियों  का शिकार भी इन्हें होना पड़ता है . भारोत्तोलक मोनिका देवी मामले में भारतीय खेल प्राधिकरण का रवैया इसका ताजा उदाहरण है .अकसर हम इनको राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल करने की बात करते हैं लेकिन क्या इन सबके बावजूद  पूर्वोत्तर राज्यों से पढ़ाई या नौकरी के लिए देश की राजधानी आए लोगों  के मन में भारतीय होने का अहसास बच पायेगा ?
ईटानगर में आयोजित एक सेमीनार में का किस्सा याद आ रहा है . हम संयोगवश वहां पहुंचे थे . हमने सेमिनार का विषय “in india we are not indians ” देखा तो आश्चर्यचकित हो गये . अब  अहसास  हो रहा है, वो गलत नहीं थे . पूर्वोत्तर में हमेशा गृहयुद्ध की हालत को भोग रहे ये लोग जब दिल्ली -मुंबई का रुख करते हैं तब हमसे तिरस्कार ,घृणा के सिवा इन्हें क्या मिलता है ?  विश्वबंधुत्व का ढिंढोरा पीटने वाले हम भारतवासी क्या भारतीय कहलाने के काबिल रह गये हैं ?  हम समय के साथ अपने भारतीय होने की अपनी पहचान को खोते जा रहे हैं . यह एक गिरते हुए समाज की तस्वीर है .जो शक्ति खुद के लिए , समाज के लिए और देश के लिए प्रयोग करनी चाहिए थी वह खुद को हीं बदनाम करने में प्रयोग हो रहा है .इस मामले को महज पुलिस कार्यक्षेत्र का मसला समझ कर भूल जाना हमें महंगा पड़ेगा .पुलिस की नाकामी से पहले यह समाज की और समाज से पहले व्यक्ति की नाकामी और पतन का  सूचक है . आखिर ऐसी मानसिकता समाज से हीं तो पैदा हो रही है जो युवाओं को एक खास वर्ग या समुदाय के प्रति नीचता करने को प्रेरित करती है ? समाज को चलाने का दंभ करने वाले बुद्धिजीवी लोग भी इस मसले पर मूकदर्शक बने नज़र आते हैं .मुंबई में राज ठाकरे की गुंडई पर गला फाड़ने वाले पत्रकार बंधू भी गला साफ़ करने में लगे रहते हैं .क्या जो उत्तर भारतीयों के साथ मुंबई में होता है वही पूर्वोत्तर वालों के साथ दिल्ली में नहीं हो रहा है ? फ़िर ,विरोध में भेदभाव क्यों ? क्या देश के चौथे स्तम्भ की उदासीनता { बाकि तो पहले से कन्नी कटे हुए हैं } से मान लिया जाए चीन की बात सही है कि अरुणाचल उनका हिस्सा है ? क्या इसी तरह सांस्कृतिक के आधार पर थोड़े अलग इन भारतीयों को गैरभारतीय मान लिया जाए जिन्हें दिल्ली -मुंबई में शरण दे कर हमने उन पर अहसान किया है ?

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सम्पादकीय समूह , जनोक्ति

>मकबूल फ़िदा हुसैन को ठेंगा

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मकबूल फिदा हुसैनः चित्रकार या हुस्नप्रेमी!

मकबूल फिदा हुसैन को मैंने न कभी चित्रकार माना, न ही चित्रकार की हैसियत से उन्हें देखने की कोशिश की। हुसैन साहब मुझे चित्रकार कम ‘बेकार’ ज्यादा लगते हैं। हुसैन साहब के पास बेकार की बातों को कहने-सोचने का वक्त काफी है और दिमाग भी। हुसैन साहब के प्रेमी उनकी बेकार की बातों और कथ्य को प्रगतिशिलता की मिसाल कहते-बताते हैं। उनकी नजर में हुसैन साहब सिर्फ चित्रकार ही नहीं, बल्कि ‘चित्रकारी के भगवान’ हैं। हुसैन साहब को भगवान मानकर कहीं-कहीं पूजा भी जाता है। तथाकथित प्रगतिशील जमात उनकी शान में उनकी हैसियत से कहीं ज्यादा ‘कसीदे’ पढ़ती व गढ़ती है। हुसैन साहब की आड़ी-तिरछी लकीरों को वे मार्डन या प्रोग्रेसिव आर्ट कहते-बताते हैं। वे उनकी आड़ी-तिरछी लकीरों पर इस कदर फिदा हैं कि अपना दिल तक उन्हें निकालकर दे सकते हैं, अगर वे कहें।

खैर, मैं कला की न कोई बहुत बड़ी जानकार हूं, न ही कला मेरा विषय रहा है। परंतु कला के प्रति रूचि और संवेदना को रखते हुए तस्वीरों के अच्छे-बुरे पक्ष को समझ तो सकती ही हूं। पता नहीं क्यों, हुसैन साहब की चित्रकला में मुझे न कला नजर आती है न संवेदना न ही कोई संदेश। आड़ी-तिरछी लकीरों के बीच रंगे-पूते चित्र पता नहीं किस आधुनिक कला को दर्शाते हैं, ये या तो हुसैन साहब जाने या उनके अंध-प्रेमी।
बहरहाल, मुद्दे पर आती हूं। हुसैन साहब कला से ज्यादा हुस्न के दीवाने रहते हैं। कमसीन शरीर उन्हें अच्छा लगता है। कहना चाहिए, दीवानगी की हद तक अच्छा लगता है। कभी किसी जमाने में वे माधुरी दीक्षित के अन्यन प्रेमी हुआ करते थे। उन्हें, दरअसल, माधुरी से नहीं उनके ‘कमसीन हुस्न’ से प्यार था। हुसैन साहब ने माधुरी की कई पेंटिंगस बनाईं। जब पेंटिंगस से दिल न भरा, तो उन्होंने उनके साथ एक ‘असफल फिल्म’ भी बना डाली। उस फिल्म को मैंने भी देखा था, पर अफसोस फिल्म के अंत तक समझ नहीं पाई कि हुसैन साहब दर्शकों को आखिर कहना, दिखाना या समझाना क्या चाहते हैं?
समय गुजरा। माधुरी की शादी हुई। उनका हुस्न भी थोड़ा ढला। देखते-देखते हुसैन साहब के दिलो-दिमाग से माधुरी की तस्वीर उतरने लगी और नई-नई तस्वीरें वहां जगह पाने लगीं। हुसैन साहब करते भी क्या तमाम पुरुषों की तरह उन्होंने भी पुरुष-दिमाग ही पाया है।
सुना है कि अब उनकी रंगीन दुनिया में एक और नई हुस्नवाली आ गई है। नाम है, अमृता राव। जी हां, ‘विवाह’ और ‘वेल्कम टू सज्जनपुर’ वाली अमृता राव। फिदा हुसैन अमृता राव पर फिदा हैं। वे उनके साथ ईद मनाना चाहते हैं और ‘वेल्कम टू सज्जनपुर’ भी देखना चाहते हैं। अमृता के हुस्न की तारीफ में हुसैन कहते हैं, ‘अमृता तो खुदा की बनाई हुई परफेक्ट पेंटिग हैं। उनकी बाडी लैंग्वेज इस कदर खूबसूरत है कि उसे बस कैनवस पर ही कैपचर किया जा सकता है।’ हुसैन साहब, जहां तक मुझे ध्यान पड़ता है, कुछ ऐसी ही बातें आपने माधुरी दीक्षित को देखकर भी कही थीं। यानी आप नए-नए हुस्न को देखकर अपनी कला के मापदंड़ों में रदो-बदल करते रहते हैं, मुबारक हो।
हुसैन साहब शायद इतनी प्रसिद्धि कभी नहीं पा पाते, अगर उन्होंने उन विवादास्पद चित्रों को न बनाया होता। भोंड़े चित्रों को बनाकर उन्हें ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ कहना प्रगतिशीलों और खुद हुसैन साहब को गंवारा हो सकता है, लेकिन मैं उसे न कला मानती हूं, न ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। मेरा एक सवाल है प्रगतिशीलों से कि क्या हुसैन साहब को इतनी ही ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ अपने धर्म के ईश्वर के स्कैच को बनाने के लिए मिल या दी जा सकती है?
चलो मान लेते हैं, हुसैन साहब के वे चित्र ‘कला की अभिव्यक्ति’ थे परंतु उस अभिव्यक्ति में कितनी कला या क्या संदेश छिपा था, जरा यह भी तो बताने का कष्ट करें।
आगे चलकर जब सांप्रदायिक विवाद खड़ा हुआ, तब हुसैन साहब चुपचाप यहां से खिसक लिए। उनमें तो तसलीमा नसरीन जैसा हौसला भी नहीं था कि यहां आकर एक दफा अपने विरोधियों से रू-ब-रू होते। लेकिन तसलीमा ने ऐसा किया। उसकी सजा भी उन्हें मिली। मगर वे हारी नहीं। अरे, हुसैन साहब तो मर्द हैं, तसलीमा तो फिर भी औरत हैं। कोई कुछ कहे या माने, मगर मेरी निगाह में तसलीमा का कद हुसैन साहब से कहीं ज्यादा बड़ा और सम्मानीय है और हमेशा ही रहेगा।
साभार :http://anuja916.blogspot.com/2008/09/blog-post_28.html

>बाज़ार के बिस्तर पर स्खलित ज्ञान कभी क्रांति का जनक नहीं हो सकता.: जनोक्ति

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आज एक दुनिया देखी हमने, जहां अभिव्यक्ति विकृति की संस्कृति में ढल रही है .हिंदी समाज की विडंबना हीं कहिये , सामाजिक सरोकारों पर मूत्र त्याग कर व्यक्तिगत स्वार्थों में लिप्त हो लेखन  कर्म को वेश्यावृत्ति से भी बदतर बना दिया गया है .अंतरजाल में शीघ्रता से फ़ैल रहे हिंदी पाठक कुंठित दिखते हैं . मौजूदा समय में धार्मिक कुप्रचार ,निजी दोषारोपण,अमर्यादित भाषा ,तथ्य और तर्क विहीन लेखन यत्र तत्र बिखरे पड़े हैं .

जब विचारों को किसी वाद या विचारधारा का प्रश्रय लेकर  ही समाज में स्वीकृति  मिलने का प्रचलन बन जाए तब  व्यक्तित्व का निर्माण संभव नही. आज यही कारण है कि  भारत या तमाम विश्व में पिछले ५० वर्षो में कोई अनुकरणीय और प्रभावी हस्ताक्षर का उद्भव नही हुआ. वाद के तमगे  में जकड़ी मानसिकता अपना स्वतंत्र विकास नही कर सकती और न ही सर्वसमाज का हित सोच सकती है.

 मानवीय प्रकृति में मनुष्य की संवेदना तभी जागृत होती है जब पीड़ा का अहसास प्रत्यक्ष रूप से हो.जीभ को दाँतों के होने का अहसास तभी बेहतर होता है ,जब दातो में दर्द हो. शायद यही वजह रही कि  औपनिवेशिक समाज ने बड़े विचारको और क्रांति को जन्म दिया. आज के नियति और नीति निर्धारक इस बात को बखूबी समझते है . अब किसी भी पीड़ा का भान समाज को नही होने दिया जाता ताकि क्रांति न उपजे. क्रांति के बीज को परखने और दिग्भ्रमित करने के उद्देश्य से सता प्रायोजित धरना प्रदर्शन का छद्म  खेल द्वारा हमारे आक्रोश को खोखले नारों की गूंज में दबा देने की साजिश कारगर साबित हुई है.  कई जंतर मंतर जैसे कई सेफ्टी-वाल्व को स्थापित कर बुद्धिजीवी वर्ग जो क्रांति के बीज समाज में बोया करते थे, उनको बाँझ बना दिया गया है.इतिहास साक्षी है कि कलम और क्रांति में चोली दामन का साथ है. अब कलम को बाज़ार का सारथि बना दिया गया. ऐसे में किसी क्रांति की भूमिका कौन लिखेगा? तथाकथित  कलम के वाहक बाज़ार की महफिलों में राते रंगीन कर रहे है.बाज़ार के बिस्तर पर स्खलित  ज्ञान कभी क्रांति का जनक नही हो सकता.

तो अब जबकि  बाज़ार के चंगुल से मुक्त अभिव्यक्ति का मन्च ब्लागिंग के रूप में सामानांतर विकल्प बन कर उभरा है तो हमारी जिम्मेदारी है कि छोटी लकीरों के बरक्स कई बड़ी रेखाए खिची जाएं. बाज़ारमुक्त और वादमुक्त हो समाजहित से राष्ट्रहित कि ओर प्रवाहमान लेखन समय की मांग है.

>राजशेखर रेड्डी के गम में मरने लिए 5000-5000 रूपये बांटे कांग्रेस ने

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अभी पिछले दिनों आँध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी की मौत विमान दुर्घटना में हो गई.सभी समाचार चैनल में कहा गया  कि  उनकी मौत के दुख में 462 लोगो ने आत्महत्या कर ली. आश्चर्य होता है न आज के समय में किसी नेता के लिए इतना प्यार देखकर!!! लेकिन बाद में मालूम पड़ा की ये प्यार नेता के लिए नहीं बल्कि पैसे के लिए था मतलब की कांग्रेस सरकार ने देश को जितने भी लोगो को खुदख़ुशी करने वालों में गिनाया था वो सभी खुदखुशी के कारण नहीं बल्कि अपनी स्वाभाविक मौत मरे थे.
जी हां एक सनसनीखेज़ खुलासे में ये बात सामने आई है की मरने वाले लोगो के घर वालो को सरकार ने 5000-5000 Rs. दिए थे और बदले में उनलोगों को ये बोलना था की “मरने वाला आदमी अपनी स्वाभाविक मौत नहीं मरा बल्कि उसने मुख्यमंत्री के गम में आत्महत्या की है.”
शर्म आती है ये बाते सुन-सुन कर की आज की कांग्रेस इतनी गिर चुकी है की लोगो की मौत पर भी राजनीति करने लगी
काश ये पैसा उन लोगो को मरने से पहले दिया जाता तो शायद वो दुनिया में होते .
 { ऑरकुट पर भाव्यांश के स्क्रेप का अंश  } 

>धार्मिक लपेटा-लपेटी पर लिखे माइक्रोपोस्ट को पढ़िये परन्तु मानियेगा नहीं

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सभी ब्लॉगर भाई और बहन से एक आग्रह करना चाहता हूँ . वर्तमान में हिंदी ब्लोगिंग लोकतंत्र  के पांचवे खम्भे  के तौर पर देखा जाने लगा  है . एक ऐसा मन्च बन गया है जहाँ लोग अपनी इच्छानुसार सूचना तंत्र का उपयोग कर रहे हैं . मुख्यधारा की मीडिया में हड़कंप मचा है जिसे बाहर से छुपाने की कोशिश की जा रही है . मंत्री से लेकर अफसर लोग भी यहाँ अपनी बात रख रहे हैं .सरकारी तनर पर दबाव डालने का काम हो अथवा लोगों को सुचना के अधिकार , बिजली चोरी , शिक्षा का अधिकार , अदालत आदी के प्रति जागरूकता हेतु कई ब्लॉग पर मुहीम जारी है .  आम लोगों तक पहुँचने का सशक्त माध्यम बन गया है . वह दिन दूर नहीं जब सुचना क्रांति के बढ़ते कदमों से हर घर में ब्लॉग पढ़ा जायेगा सोचिये तब मुख्यधारा की मीडिया का क्या होगा ? लेकिन अफ़सोस तब होता है जब कुछ पागल और धर्मांध लोग यहाँ इसे कूड़ा दान समझ कर अपने मानसिक मॉल-मूत्र का विसर्जन करते  हैं . और घोर निराशा होती है जब कुछ अच्छे और अनुभव वाले  लेखक इनको नज़रअंदाज करने के बजाय कुकर्मियो के कृत्य से दुखी होकर उनके नाम से पोस्ट पर पोस्ट ठेल रहे हैं  . ऐसे में उनका ही प्रचार हो रहा है . कृपा कर अब सभी लोग इस दो पागल धर्मभिरुओं के ऊपर लिखना बंद करें सब ठीक हो जायेगा . मुद्दों की कमी नहीं है हम खुद कहते हैं धर्म पर इस तरह अनर्गल बहस बंद हो परन्तु दूसरे ही दिन इसी बहस में कूद पड़ते हैं ! क्या हमारे दिन इतने फ़िर गये हैं कि किसी कट्टरपंथी के नाम से पोस्ट लगनी पड़े . मैंने अपने दिल की बात कह दी आशा है आप आग्रह को ठुकरायेंगे नहीं .
आप क्यों भूल जाते हैं कि जब कोई इन्हें पढ़ेगा ही नहीं तो ये कैसी भी धार्मिक, घटिया, असहिष्णुता या सांप्रदायिक बातें कर लें कोई फ़र्क नहीं पड़ता है. टिप्पणी में मोडरेशन का अधिकार प्रयोग करें, उसके लिये मोडरेशन लागू करने की जरुरत नहीं जहाँ धार्मिक विज्ञापनबाजी देखो वहीं उसका उपयोग करें . और मैंने एक और तरीका निकाला है उक्त पागल सांड की अपशब्दों वाली टिप्पणी मुझे भी मिली थी तब मैंने उस पर कोई पोस्ट ना लिखकर एक लम्बा पोस्ट उसे मेल कर दिया . मैंने तो जाना छोड़ दिया है ऐसी गलियों में जहाँ धर्म के नाम पर इंसानियत  बिकती  है . आप सभी समझदार हैं . देश दुनिया में क्या यही विषय रह गया है विमर्श के लिए . हम यहाँ उलझे हैं उधर कुछ लोग जो कल तक आतंकवाद का परोक्ष  रूप से समर्थन करते थे आज नक्सलवाद का कर रहे हैं और उन्हें जबाव देने वाला कोई नहीं है . तो वक़्त रहते चेतिए नहीं तो इस उभरते हुए जनमंच का कबाडा हो जायेगा .

>अरब जैसे अन्धविश्वासी समाज में गाँधी दर्शन की सराहना

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देश भर में पिछले एक पखवाड़े से गाँधी के सिद्धांतों और हिंद स्वराज को लेकर विमर्श चल रहा है . आज भारत हीं नहीं संसार के अनेक देशों के विद्वान गाँधी दर्शन में वैश्विक स्तर पर संघर्षों से उत्पन्न कुव्यवस्था  का समाधान बता रहे हैं .बीते दिनों गाँधी जयंती के दौरान काहिरा में आयोजित एक संगोष्ठी में अरब के गणमान्य नेताओं ने गाँधी के सिद्धांतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की.मिस्र में भारतीय राजदूत आर ० स्वामीनाथन ने अपने संबोधन में कहा कि बापू ने भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में सत्य और अहिंसा के प्रयोग से विजय हासिल कर दुनिया को चौंका दिया था . और तब विश्व ने पहली बार अहिंसा की गूंज सुनी . अरब लीग के महासचिव उम्र मूसा ने गाँधी को दुनिया भर में उपेक्षितों की आवाज बताते हुए याद दिलाया कि वो गाँधी ही थे जिन्होंने सन ३१ में फिलिस्तीन का समर्थन किया था . मिस्र के पूर्व विदेशमंत्री अहमद माहिर ने अन्तराष्ट्रीय तंत्र में दोहरे मानदंड के चलन पर विशेष चिंता जाहिर की . अहमद माहिर ने कहा कि गाँधी के विचार हीं हैं जिनको अपना कर अरब और पश्चिम के बीच जारी मतभेद समाप्त जा सकते हैं . कार्यक्रम के दौरान एक प्रदर्शनी भी लगाई गयी जिसमें गाँधी के विचारों के जरिये वैश्विक समस्याओं के उत्तर ढूंढने की कोशिश की गयी थी . अरब जैसे अन्धविश्वासी समाज में गाँधी दर्शन की सराहना निश्चय ही दुनिया को बदलाव की ओर ले जायेगा .

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