>दोहा सलिला: संजीव ‘सलिल’

>दोहा सलिला:

संजीव ‘सलिल’
*
hindi-day.jpg

*
दिव्या भव्य बन सकें, हम मन में हो चाह.
‘सलिल’ नयी मंजिल चुनें, भले कठिन हो राह..
*
प्रेम परिश्रम ज्ञान के, तीन वेद का पाठ.
करे ‘सलिल’ पंकज बने, तभी सही हो ठाठ..
*
कथनी-करनी में नहीं, ‘सलिल’ रहा जब भेद.
तब जग हमको दोष दे, क्यों? इसका है खेद..
*
मन में कुछ रख जुबां पर, जो रखते कुछ और.
सफल वही हैं आजकल, ‘सलिल’ यही है दौर..
*
हिन्दी के शत रूप हैं, क्यों उनमें टकराव?
कमल पंखुड़ियों सम सजें, ‘सलिल’ न हो बिखराव..
*
जगवाणी हिन्दी हुई, ऊँचा करिए माथ.
जय हिन्दी, जय हिंद कह, ‘सलिल’ मिलाकर हाथ..
*
छंद शर्करा-नमक है, कविता में रस घोल.
देता नित आनंद नव, कहे अबोले बोल..
*
कर्ता कारक क्रिया का, करिए सही चुनाव.
सहज भाव अभिव्यक्ति हो, तजिए कठिन घुमाव..
*
बिम्ब-प्रतीकों से ‘सलिल’, अधिक उभरता भाव.
पाठक समझे कथ्य को, मन में लेकर चाव..
*
अलंकार से निखरता, है भाषा का रूप.
बिन आभूषण भिखारी, जैसा लगता भूप..
*
रस शब्दों में घुल-मिले, करे सारा-सम्प्राण.
नीरसता से हो ‘सलिल’, जग-जीवन निष्प्राण..
*

>कविता : संजीव ‘सलिल’

>

कविता  :  संजीव ‘सलिल’

*

*
जिसने कविता को स्वीकारा, कविता ने उसको उपकारा.
शब्द्ब्रम्ह को नमन करे जो, उसका है हरदम पौ बारा..

हो राकेश दिनेश सलिल वह, प्रतिभा उसकी परखी जाती-
 होम करे पल-पल प्राणों का, तब जलती कविता की बाती..

भाव बिम्ब रस शिल्प और लय, पञ्च तत्व से जो समरस हो.
उस कविता में, उसके कवि में, पावस शिशिर बसंत सरस हो..

कविता भाषा की आत्मा है, कविता है मानव की प्रेरक.
राजमार्ग की हेरक भी है, पगडंडी की है उत्प्रेरक..

कविता सविता बन उजास दे, दे विश्राम तिमिर को लाकर.
कविता कभी न स्वामी होती, स्वामी हों कविता के चाकर..

कविता चरखा, कविता चमडा, कविता है करताल-मंजीरा.
लेकिन कभी न कविता चाहे, होना तिजोरियों का हीरा..

कविता पनघट, अमराई है, घर-आँगन, चौपाल, तलैया.
कविता साली-भौजाई है, बेटा-बेटी, बाबुल-मैया..

कविता सरगम, ताल, नाद, लय, कविता स्वर, सुर वाद्य समर्पण.
कविता अपने अहम्-वहम का, शरद-पग में विनत विसर्जन..

शब्द-साधना, सताराधना, शिवानुभूति ‘सलिल’ सुन्दर है.
कह-सुन-गुन कवितामय होना, करना निज मन को मंदिर है..

******************************
जब भी ‘मैं’ की छूटती, ‘हम’ की हो अनुभूति.
तब ही ‘उस’ से मिलन हो, सबकी यही प्रतीति..

>दोहे आँख के… संजीव ‘सलिल’

>दोहे आँख के…

संजीव ‘सलिल’

कही कहानी आँख की, मिला आँख से आँख.
आँख दिखाकर आँख को, बढ़ी आँख की साख..

आँख-आँख में डूबकर, बसी आँख में मौन.
आँख-आँख से लड़ पड़ी, कहो जयी है कौन?

आँख फूटती तो नहीं, आँख कर सके बात.
तारा बन जा आँख का, ‘सलिल’ मिली सौगात..

कौन किरकिरी आँख की, उसकी ऑंखें फोड़.
मिटा तुरत आतंक दो, नहीं शांति का तोड़..

आँख झुकाकर लाज से, गयी सानिया पाक.
आँख झपक बिजली गिरा, करे कलेजा चाक..

आँख न खटके आँख में, करो न आँखें लाल.
‘सलिल न काँटा आँख का, तुम से करे सवाल..

आँख न खुलकर खुल रही, ‘सलिल’ आँख है बंद.
आँख अबोले बोलती, सुनो सृजन के छंद..

***********

>कुण्डलिनी आचार्य संजीव ‘सलिल’, संपादक दिव्य नर्मदा

>आचार्य संजीव ‘सलिल’, संपादक दिव्य नर्मदा

कुण्डलिनी

करुणा संवेदन बिना, नहीं काव्य में तंत..

करुणा रस जिस ह्रदय में वह हो जाता संत.

वह हो जाता संत, न कोई पीर परायी.

आँसू सबके पोंछ, लगे सार्थकता पाई.

कंकर में शंकर दिखते, होता मन-मंथन.

‘सलिल’ व्यर्थ है गीत, बिना करुणा संवेदन.

**********************************

http://divyanarmada.blogspot.com

>पुस्तक मेले पर चला बुलडोजर और ब्लॉग-जगत में व्यापक विरोध

>

प्रिय पाठकों ! 
नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के संग एक बेहद दुखद घटना का जिक्र कर रहा हूँ . शायद आपको पता भी होगा कि नागपुर में आयोजित राष्ट्रीय पुस्तक मेले पर निगम का जो बुलडोजर चलाया गया वह  साहित्य -प्रेमियों के छाती से गुजरा है . महज नियमों की आड़ में एन ओ सी का बहाना  बना कर निगम के अधिकारीयों ने मेले को तहस नहस कर दिया वो भी तब जब मामला न्यायालय में लंबित रहा हो तो क्या कहा जायेगा ? क्या यह लाखों पुस्तक प्रेमियों समेत भारतीय न्यायपालिका की अवमानना नहीं है . वैसे यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि अफसरशाही का न्यायपालिका से विरोध हो लेकिन बात पुस्तक मेले की है . वहां कोई जुआ खाना या पब तो नहीं चल रहा था . और अगर होता भी तो पूरी उम्मीद की जनि चाहिए कि उनको एन ओ सी मिल गयी होती . अरे इस  देश में बहुत कुछ गैर क़ानूनी है . बहुत सारी बिल्डिंगें बगैर एनओसी की शान से खड़ी है जबकि उनमें कई कभी भी गिर सकती है तब ऐसे अधिकारियों की आँखें कहाँ रहती है ? इनकी नींद जनहित में क्यों नहीं खुलती ? जब भी कुछ करेंगे जनता के खिलाफ और समाज के विरुद्ध ही होगा ? अपने झूठे मान के नाम पर जनता के पैसों पर लगाई गयी पुस्तक मेले का सत्यनाश कर दिया . बात इस साल की ही नहीं बल्कि आने वाले कई सालों तक इस घटना की छाप पुस्तक मेले पर पड़ेगी . हो सकता है आने वाले समय में ऐसा कोई आयोजन हो ही न . एक ओर सरकारी संस्थानों द्वारा पाठकों को प्रोत्साहित करने के लिए लाखों रूपये खर्च किये जाते हैं दूसरी तरफ नागपुर में प्रशासनिक अधिकारियों की इस घटना ने शर्मसार कर दिया है . इस घटना का ब्लॉग-जगत में व्यापक विरोध होना चाहिए . अगर आपको लगता है कि कुछ अनुचित हुआ है तो कृपया अपनी आपत्ति यहाँ दर्ज कराएँ .

>दोहा गीतिका ‘सलिल’

>(अभिनव प्रयोग)

दोहा गीतिका

‘सलिल’
*
तुमको मालूम ही नहीं शोलों की तासीर।
तुम क्या जानो ख्वाब की कैसे हो ताबीर?

बहरे मिलकर सुन रहे गूँगों की तक़रीर।
बिलख रही जम्हूरियत, सिसक रही है पीर।

दहशतगर्दों की हुई है जबसे तक्सीर
वतनपरस्ती हो गयी खतरनाक तक्सीर।

फेंक द्रौपदी खुद रही फाड़-फाड़ निज चीर।
भीष्म द्रोण कूर कृष्ण संग, घूरें पांडव वीर।

हिम्मत मत हारें- करें, सब मिलकर तदबीर।
प्यार-मुहब्बत ही रहे मजहब की तफसीर।

सपनों को साकार कर, धरकर मन में धीर।
हर बाधा-संकट बने, पानी की प्राचीर।

हिंद और हिंदी करे दुनिया को तन्वीर।
बेहतर से बेहतर बने इन्सां की तस्वीर।

हाय! सियासत रह गयी, सिर्फ स्वार्थ-तज़्वीर।
खिदमत भूली, कर रही बातों की तब्ज़ीर।

तरस रहा मन ‘सलिल’ दे वक़्त एक तब्शीर।
शब्दों के आगे झुके, जालिम की शमशीर।

*********************************

तासीर = असर/ प्रभाव, ताबीर = कहना, तक़रीर = बात/भाषण, जम्हूरियत = लोकतंत्र, दहशतगर्दों = आतंकवादियों, तकसीर = बहुतायत, वतनपरस्ती = देशभक्ति, तकसीर = दोष/अपराध, तदबीर = उपाय, तफसीर = व्याख्या, तनवीर = प्रकाशित, तस्वीर = चित्र/छवि, ताज्वीर = कपट, खिदमत = सेवा, कौम = समाज, तब्जीर = अपव्यय, तब्शीर = शुभ-सन्देश, ज़ालिम = अत्याचारी, शमशीर = तलवार..