>दोहा सलिला: संजीव ‘सलिल’

>दोहा सलिला:

संजीव ‘सलिल’
*
jules-perrier-quebec-enamel-plate-date-unknown.jpg

*
कौन कहानीकार है?, किसके हैं संवाद?
बोल रहे सब यंत्रवत, कौन सुने  फरियाद??
*
आर्थिक मंदी छा गयी, मचा हुआ कुहराम.
अच्छे- अच्छे फिसलते, कोई न पाता थाम..
*
किसका कितना दोष है?, कहो कौन निर्दोष?
विधना जाने कब करे, सर्व नाश का घोष??
*
हवामहल पल में उड़ा, वासी हुए निराश.
बिन नींव की व्यवस्था, हाय हो गयी ताश..
*
कठपुतलीवत नचाता, थाम श्वास की डोर.
देख न पाते हम झलक, चाहें करुणा-कोर..
*
भ्रम होता हम कर रहे, करा रहा वह काज.
लेते उसका श्रेय खुद, किन्तु न आती लाज..
*
सुविधा पाने जो गए, तजकर अपना देश.
फिर-फिर आते पलटकर, मन में व्यथा अशेष..
*
नगदी के नौ लीजिये, तेरह नहीं उधार.
अब तो छलिये! बंद कर, सपनों का व्यापार..
*
चमक-दमक औ’ सादगी, वह सोना यह धूल.
 वह पावन शतदल कमल, यह बबूल का शूल..
*
पेड़ टूटते, दूब झुक, सह लेती तूफ़ान.
जो माटी से जुड़ रहे, ‘सलिल’ वही मतिमान..
*
पल में पैरों-तले से, सरकी ‘सलिल’ ज़मीन.
तीसमारखाँ काल के, हाथ हो गए दीन..
*
थाम-थमाये विपद में, बिना स्वार्थ निज हाथ.
‘सलिल’ हृदय में लो बसा, नमन करो नत माथ..
*
दानव वे जो जोड़ते, औरों का हक छीन.
ऐश्वर्य जितना बढ़ा, वे उतने ही दीन..
*
भूमि, भवन, धन जोड़कर, हैं दरिद्र वे लोग.
‘सलिल’ न जो कर पा रहे, जी भरकर उपयोग..
*
जो पाया उससे नहीं, ‘सलिल’ जिन्हें संतोष.
वे सचमुच कंगाल हैं, गर्दभ ढोते कोष.
*
बात-बात में कर रहे, नाहक वाद-विवाद.
‘सलिल’ सहज हो कर करें, कुछ सार्थक संवाद..
*

Advertisements