प्रकाश प्रदूषण : एक धीमा जहर ?

पाठकगण शीर्षक देखकर चौंकेंगे, लेकिन यह एक हकीकत है कि धीरे-धीरे हम जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण के बाद अब प्रकाश प्रदूषण के भी शिकार हो रहे हैं । प्रकाश प्रदूषण क्या है ? आजकल बडे़ शहरों एवं महानगरों में सडकों, चौराहों एवं मुख्य सरकारी और व्यावसायिक इमारतों पर तेज रोशनी की जाती है, जिसका स्रोत या तो हेलोजन लैम्प, सोडियम वेपर लैम्प अथवा तेज नियोन लाईटें होती हैं । उपग्रह से पृथ्वी के जो चित्र लिये गये हैं उसमें टोकियो और जापान का कुछ हिस्सा, पश्चिमी यूरोप के लन्दन और फ़्रैंकफ़ुर्ट और अमेरिका के शिकागो और न्यूयार्क शहरों की तेज रोशनी के चित्र स्पष्ट तौर पर नजर आते हैं, इससे कल्पना की जा सकती है कि इन महानगरो में रात के समय कितनी तेज रोशनी होती है । रात्रि के समय इस प्रकार के तेज प्रकाश से नागरिक तो खुश होते हैं और उन्हें कोई असुविधा नहीं होती, लेकिन पर्यावरण एवं छोटे-छोटे जीव-जंतुओं पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है । सबसे पहले बात प्रकृतिप्रेमियों की, इन शहरों के लोग आसपास की तेज रोशनी के कारण आकाशगंगा को ही ठीक से नहीं देख पाते । मुम्बई के किसी मुख्य चौराहे पर खडे होकर हम अधिक से अधिक २५० तारे देख सकते हैं, लेकिन शहर के बाहर निकलने पर किसी अन्धेरे स्थान पर खडे होकर हमें नंगी आँखों से २५०० से अधिक नक्षत्र और तारे आसानी से दिख जाते हैं । यह कोई मुख्य समस्या नहीं है, बल्कि असल बात तो यह है कि रात्रिकालीन तेज प्रकाश के कारण अनेक पक्षी, कीट-पतंगे अपना रास्ता भूल जाते हैं और भटक कर रोशनी के स्रोतों से टकराते रहते हैं । एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष लगभग दस करोड़ पक्षी ऊँची इमारतों से टकराकर मर जाते हैं । वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर रॉड क्राफ़ोर्ड के अनुसार “पहले आमतौर पर दिखाई दे जाने वाले कई कीट हमारी नजरों से दूर होते जा रहे हैं, कुछ छोटे पतंगे तो शहरों से लगभग लुप्तप्राय होने लगे हैं, क्योंकि रात की तेज रोशनी में वे अपना सफ़र नहीं कर पाते और उनके प्राकृतिक “मिलन” के लिये जो रात का कम समय मिल पाता है, उसमें भी कमी हो गई है । साथ ही तेज प्रकाश के कारण वे बडे पक्षियों के शिकार बन जाते हैं । इसी प्रकार एक जीव विज्ञानी डॉ. मारिआन मूर, जिन्होंने झीलों के सूक्ष्म जीवों (zooplanktons) पर गहन अनुसन्धान किया है, कहते हैं “तालाब या झील के ये सूक्ष्म जीव रात के समय पानी की सतह पर आकर जल शैवालों का भक्षण करते हैं, लेकिन नदी या झीलों के किनारे तेज प्रकाश के कारण वे सतह पर आने से कतराते हैं और उन्हें अधिक समय पानी के नीचे ही गुजारना पड़ता है, इसलिये सतह पर शैवालों (Algae) का बढना जारी रहता है जिसके कारण अन्य दूसरी जलीय वनस्पतियों को पनपने का मौका ही नहीं मिलता । चन्द्रमा के नैसर्गिक प्रकाश में इन विविध प्राणियों को सहवास का जो समय मिलता है वह अब तेज रोशनी के कारण होने वाले दिमागी भ्रम के कारण नहीं मिलता, इस कारण लाखों प्रजातियाँ लुप्त होने की कगार पर आ गई हैं ।

(यह चित्र अमेरिका में रात होते समय का उपग्रह से लिया गया है, जिसमें अमेरिका के चकाचौंध शहर साफ़ दिखाई देते हैं)
हालांकि लोग कहते हैं कि मनुष्य की सुविधा और अपराधों पर नियन्त्रण के लिये रात में तेज प्रकाश आवश्यक है और उसके कारण पर्यावरण को होने वाले नुकसान की परवाह नहीं करना चाहिये, लेकिन इस तेज प्रकाश का मनुष्यों पर भी घातक प्रभाव पड़ रहा हो तब तो हमें सचेत हो ही जाना चाहिये । “नेशनल कैन्सर इंस्टिट्यूट” की एक शोध रिपोर्ट के अनुसार प्राकृतिक प्रकाश की अपेक्षा रात्रिकालीन प्रकाश में अधिक देर तक रहने से कैंसर का खतरा बढ जाता है । रिपोर्ट के अध्ययन के अनुसार जो स्त्रियाँ नाईट शिफ़्ट में काम करती हैं, उनमें स्तन कैंसर की मात्रा अधिक पाई गई, इसी प्रकार बोस्टन के एक अस्पताल में किये गये शोध के अनुसार रात्रि पाली में काम करने वाली नर्सों में कैंसर की सम्भावना 36% तक बढ गई थी । दरअसल, तेज प्रकाश के कारण शरीर में मेलाटोनिन के निर्माण में कमी आती है, इस हार्मोन पर शरीर के “चक्र” का दारोमदार होता है, जिससे यह चक्र गडबडा़ जाता है । मेलेटोनिन में Antioxidant गुण होते हैं, इनमें कमी के कारण Astrogen का निर्माण भी बाधित होता है और अन्ततः यही कैंसर का कारण बनता है ।

(इस चित्र में जापान, यूरोप, दुबई, और अमेरिका के बडे शहरों को आसानी से चिन्हित किया जा सकता है)

नैसर्गिक प्रकाश मनुष्य या प्राणी के शरीर के लिये औषधि का काम करता है, लेकिन कृत्रिम प्रकाश का अधिकाधिक उपयोग बीमारियों को बढा़ता जा रहा है । यह एक सामान्य सा स्थापित तथ्य है कि जिन घरों में सूर्य का प्रकाश अधिक देर तक रहता है, वहाँ लोग अधिक स्वस्थ रहते हैं । नॉर्वे, स्वीडन आदि स्कैंडेनेवियाई देशों के नागरिक सूर्य देखने के लिये तरस जाते हैं, वहाँ कई बार चार-छः महीनों तक धूप ही नहीं निकलती । विदेशी पर्यटक यूँ ही नहीं गोवा और कोवलम के बीचों पर नंग-धडंग पडे़ रहते, बल्कि धूप से अधिक देर तक दूर रहने के कारण उनको त्वचा कैंसर का खतरा होता है, इसलिये डॉक्टर उन्हें “धूप-स्नान” की सलाह देते हैं । हम भारतवासी सौभाग्यशाली हैं कि हमें धूप, ठंड और बारिश लगभग समानुपात में मिलती है (ये और बात है कि हम उसकी कद्र नहीं करते) । सामान्यतः एक बडे़ बल्ब की प्रखरता 2900 ल्यूमेन्स होती है, जबकि फ़्लोरोसेंट ट्यूब की 7750, मरकरी लैम्प की 19100, कम प्रेशर के सोडियम लैम्प की 33000, अधिक दबाव वाले सोडियम लैम्प की 45000 और मेटल हेलाईड के प्रकाश की तीव्रता 71000 ल्यूमेन्स होती है । इसके कारण इनके आसपास के वातावरण के तापमान में भारी वृद्धि हो जाती है । स्टेडियमों में लगने वाले बल्बों से अल्ट्रावॉयलेट किरणें एवं अन्य उच्च दाब के प्रकाश से इन्फ़्रारेड किरणें निकलती हैं, और यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि इन किरणों का मनुष्य के शरीर पर क्या प्रभाव पडता है । यदि किसी बडे शहर की सभी सार्वजनिक लाईटों को दो सौ वॉट की बजाय सौ वॉट एवं ढाई सौ की बजाय डेढ सौ वॉट में बदल दिया जाये तो कितनी ऊर्जा और बिजली की बचत होगी । इमारतों और सडकों पर उतना ही प्रकाश होना चाहिये जितनी जरूरत है, खामख्वाह आँखें चौंधियाने वाले प्रकाश की कोई आवश्यकता नहीं है और ऐसा अभी सिद्ध नहीं हुआ है कि अंधेरी रातों में अधिक चोरियाँ होती हैं, बल्कि पुलिस के अनुसार सेंधमारी और लूट दिन के वक्त ज्यादा होती है, जब घरों में कोई नहीं होता । इसलिये समय आ गया है कि सभी नगरीय प्रशासनिक संस्थायें इस दिशा में विचार करें, वैसे ही हमारे देश में बिजली की कमी है, फ़िर क्यों उसका इस तरह से अपव्यय किया जाये ? साथ ही स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिये तो यह हितैषी होगा ही, कि हम सब मिलकर कटौती करने की कोशिश करें । बडे़-बडे़ शोरूमों और कम्पनियों से भी यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने यहाँ गैरजरूरी लाईटों में कमी करें, साईन बोर्ड रात के दस बजे तक ही चालू रखें । नगरपालिकायें सडक की बत्तियाँ एक खंभा छोडकर एक पर जलायें । यही बात घरों पर भी लागू करने की कोशिश करें और ट्यूबलाईटों को निकालकर CFL का अधिकाधिक प्रयोग शुरु करें, साथ ही यह भी याद करने की कोशिश करें कि पिछली बार आपने “जुगनू” कब देखा था ?
स्व-आचार संहिता : इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री एवं लेखों पर आधारित

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प्रकाश प्रदूषण : एक धीमा जहर ?

पाठकगण शीर्षक देखकर चौंकेंगे, लेकिन यह एक हकीकत है कि धीरे-धीरे हम जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण के बाद अब प्रकाश प्रदूषण के भी शिकार हो रहे हैं । प्रकाश प्रदूषण क्या है ? आजकल बडे़ शहरों एवं महानगरों में सडकों, चौराहों एवं मुख्य सरकारी और व्यावसायिक इमारतों पर तेज रोशनी की जाती है, जिसका स्रोत या तो हेलोजन लैम्प, सोडियम वेपर लैम्प अथवा तेज नियोन लाईटें होती हैं । उपग्रह से पृथ्वी के जो चित्र लिये गये हैं उसमें टोकियो और जापान का कुछ हिस्सा, पश्चिमी यूरोप के लन्दन और फ़्रैंकफ़ुर्ट और अमेरिका के शिकागो और न्यूयार्क शहरों की तेज रोशनी के चित्र स्पष्ट तौर पर नजर आते हैं, इससे कल्पना की जा सकती है कि इन महानगरो में रात के समय कितनी तेज रोशनी होती है । रात्रि के समय इस प्रकार के तेज प्रकाश से नागरिक तो खुश होते हैं और उन्हें कोई असुविधा नहीं होती, लेकिन पर्यावरण एवं छोटे-छोटे जीव-जंतुओं पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है । सबसे पहले बात प्रकृतिप्रेमियों की, इन शहरों के लोग आसपास की तेज रोशनी के कारण आकाशगंगा को ही ठीक से नहीं देख पाते । मुम्बई के किसी मुख्य चौराहे पर खडे होकर हम अधिक से अधिक २५० तारे देख सकते हैं, लेकिन शहर के बाहर निकलने पर किसी अन्धेरे स्थान पर खडे होकर हमें नंगी आँखों से २५०० से अधिक नक्षत्र और तारे आसानी से दिख जाते हैं । यह कोई मुख्य समस्या नहीं है, बल्कि असल बात तो यह है कि रात्रिकालीन तेज प्रकाश के कारण अनेक पक्षी, कीट-पतंगे अपना रास्ता भूल जाते हैं और भटक कर रोशनी के स्रोतों से टकराते रहते हैं । एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष लगभग दस करोड़ पक्षी ऊँची इमारतों से टकराकर मर जाते हैं । वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर रॉड क्राफ़ोर्ड के अनुसार “पहले आमतौर पर दिखाई दे जाने वाले कई कीट हमारी नजरों से दूर होते जा रहे हैं, कुछ छोटे पतंगे तो शहरों से लगभग लुप्तप्राय होने लगे हैं, क्योंकि रात की तेज रोशनी में वे अपना सफ़र नहीं कर पाते और उनके प्राकृतिक “मिलन” के लिये जो रात का कम समय मिल पाता है, उसमें भी कमी हो गई है । साथ ही तेज प्रकाश के कारण वे बडे पक्षियों के शिकार बन जाते हैं । इसी प्रकार एक जीव विज्ञानी डॉ. मारिआन मूर, जिन्होंने झीलों के सूक्ष्म जीवों (zooplanktons) पर गहन अनुसन्धान किया है, कहते हैं “तालाब या झील के ये सूक्ष्म जीव रात के समय पानी की सतह पर आकर जल शैवालों का भक्षण करते हैं, लेकिन नदी या झीलों के किनारे तेज प्रकाश के कारण वे सतह पर आने से कतराते हैं और उन्हें अधिक समय पानी के नीचे ही गुजारना पड़ता है, इसलिये सतह पर शैवालों (Algae) का बढना जारी रहता है जिसके कारण अन्य दूसरी जलीय वनस्पतियों को पनपने का मौका ही नहीं मिलता । चन्द्रमा के नैसर्गिक प्रकाश में इन विविध प्राणियों को सहवास का जो समय मिलता है वह अब तेज रोशनी के कारण होने वाले दिमागी भ्रम के कारण नहीं मिलता, इस कारण लाखों प्रजातियाँ लुप्त होने की कगार पर आ गई हैं ।

(यह चित्र अमेरिका में रात होते समय का उपग्रह से लिया गया है, जिसमें अमेरिका के चकाचौंध शहर साफ़ दिखाई देते हैं)
हालांकि लोग कहते हैं कि मनुष्य की सुविधा और अपराधों पर नियन्त्रण के लिये रात में तेज प्रकाश आवश्यक है और उसके कारण पर्यावरण को होने वाले नुकसान की परवाह नहीं करना चाहिये, लेकिन इस तेज प्रकाश का मनुष्यों पर भी घातक प्रभाव पड़ रहा हो तब तो हमें सचेत हो ही जाना चाहिये । “नेशनल कैन्सर इंस्टिट्यूट” की एक शोध रिपोर्ट के अनुसार प्राकृतिक प्रकाश की अपेक्षा रात्रिकालीन प्रकाश में अधिक देर तक रहने से कैंसर का खतरा बढ जाता है । रिपोर्ट के अध्ययन के अनुसार जो स्त्रियाँ नाईट शिफ़्ट में काम करती हैं, उनमें स्तन कैंसर की मात्रा अधिक पाई गई, इसी प्रकार बोस्टन के एक अस्पताल में किये गये शोध के अनुसार रात्रि पाली में काम करने वाली नर्सों में कैंसर की सम्भावना 36% तक बढ गई थी । दरअसल, तेज प्रकाश के कारण शरीर में मेलाटोनिन के निर्माण में कमी आती है, इस हार्मोन पर शरीर के “चक्र” का दारोमदार होता है, जिससे यह चक्र गडबडा़ जाता है । मेलेटोनिन में Antioxidant गुण होते हैं, इनमें कमी के कारण Astrogen का निर्माण भी बाधित होता है और अन्ततः यही कैंसर का कारण बनता है ।

(इस चित्र में जापान, यूरोप, दुबई, और अमेरिका के बडे शहरों को आसानी से चिन्हित किया जा सकता है)

नैसर्गिक प्रकाश मनुष्य या प्राणी के शरीर के लिये औषधि का काम करता है, लेकिन कृत्रिम प्रकाश का अधिकाधिक उपयोग बीमारियों को बढा़ता जा रहा है । यह एक सामान्य सा स्थापित तथ्य है कि जिन घरों में सूर्य का प्रकाश अधिक देर तक रहता है, वहाँ लोग अधिक स्वस्थ रहते हैं । नॉर्वे, स्वीडन आदि स्कैंडेनेवियाई देशों के नागरिक सूर्य देखने के लिये तरस जाते हैं, वहाँ कई बार चार-छः महीनों तक धूप ही नहीं निकलती । विदेशी पर्यटक यूँ ही नहीं गोवा और कोवलम के बीचों पर नंग-धडंग पडे़ रहते, बल्कि धूप से अधिक देर तक दूर रहने के कारण उनको त्वचा कैंसर का खतरा होता है, इसलिये डॉक्टर उन्हें “धूप-स्नान” की सलाह देते हैं । हम भारतवासी सौभाग्यशाली हैं कि हमें धूप, ठंड और बारिश लगभग समानुपात में मिलती है (ये और बात है कि हम उसकी कद्र नहीं करते) । सामान्यतः एक बडे़ बल्ब की प्रखरता 2900 ल्यूमेन्स होती है, जबकि फ़्लोरोसेंट ट्यूब की 7750, मरकरी लैम्प की 19100, कम प्रेशर के सोडियम लैम्प की 33000, अधिक दबाव वाले सोडियम लैम्प की 45000 और मेटल हेलाईड के प्रकाश की तीव्रता 71000 ल्यूमेन्स होती है । इसके कारण इनके आसपास के वातावरण के तापमान में भारी वृद्धि हो जाती है । स्टेडियमों में लगने वाले बल्बों से अल्ट्रावॉयलेट किरणें एवं अन्य उच्च दाब के प्रकाश से इन्फ़्रारेड किरणें निकलती हैं, और यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि इन किरणों का मनुष्य के शरीर पर क्या प्रभाव पडता है । यदि किसी बडे शहर की सभी सार्वजनिक लाईटों को दो सौ वॉट की बजाय सौ वॉट एवं ढाई सौ की बजाय डेढ सौ वॉट में बदल दिया जाये तो कितनी ऊर्जा और बिजली की बचत होगी । इमारतों और सडकों पर उतना ही प्रकाश होना चाहिये जितनी जरूरत है, खामख्वाह आँखें चौंधियाने वाले प्रकाश की कोई आवश्यकता नहीं है और ऐसा अभी सिद्ध नहीं हुआ है कि अंधेरी रातों में अधिक चोरियाँ होती हैं, बल्कि पुलिस के अनुसार सेंधमारी और लूट दिन के वक्त ज्यादा होती है, जब घरों में कोई नहीं होता । इसलिये समय आ गया है कि सभी नगरीय प्रशासनिक संस्थायें इस दिशा में विचार करें, वैसे ही हमारे देश में बिजली की कमी है, फ़िर क्यों उसका इस तरह से अपव्यय किया जाये ? साथ ही स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिये तो यह हितैषी होगा ही, कि हम सब मिलकर कटौती करने की कोशिश करें । बडे़-बडे़ शोरूमों और कम्पनियों से भी यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने यहाँ गैरजरूरी लाईटों में कमी करें, साईन बोर्ड रात के दस बजे तक ही चालू रखें । नगरपालिकायें सडक की बत्तियाँ एक खंभा छोडकर एक पर जलायें । यही बात घरों पर भी लागू करने की कोशिश करें और ट्यूबलाईटों को निकालकर CFL का अधिकाधिक प्रयोग शुरु करें, साथ ही यह भी याद करने की कोशिश करें कि पिछली बार आपने “जुगनू” कब देखा था ?
स्व-आचार संहिता : इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री एवं लेखों पर आधारित

>प्रकाश प्रदूषण : एक धीमा जहर ?

>पाठकगण शीर्षक देखकर चौंकेंगे, लेकिन यह एक हकीकत है कि धीरे-धीरे हम जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण के बाद अब प्रकाश प्रदूषण के भी शिकार हो रहे हैं । प्रकाश प्रदूषण क्या है ? आजकल बडे़ शहरों एवं महानगरों में सडकों, चौराहों एवं मुख्य सरकारी और व्यावसायिक इमारतों पर तेज रोशनी की जाती है, जिसका स्रोत या तो हेलोजन लैम्प, सोडियम वेपर लैम्प अथवा तेज नियोन लाईटें होती हैं । उपग्रह से पृथ्वी के जो चित्र लिये गये हैं उसमें टोकियो और जापान का कुछ हिस्सा, पश्चिमी यूरोप के लन्दन और फ़्रैंकफ़ुर्ट और अमेरिका के शिकागो और न्यूयार्क शहरों की तेज रोशनी के चित्र स्पष्ट तौर पर नजर आते हैं, इससे कल्पना की जा सकती है कि इन महानगरो में रात के समय कितनी तेज रोशनी होती है । रात्रि के समय इस प्रकार के तेज प्रकाश से नागरिक तो खुश होते हैं और उन्हें कोई असुविधा नहीं होती, लेकिन पर्यावरण एवं छोटे-छोटे जीव-जंतुओं पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है । सबसे पहले बात प्रकृतिप्रेमियों की, इन शहरों के लोग आसपास की तेज रोशनी के कारण आकाशगंगा को ही ठीक से नहीं देख पाते । मुम्बई के किसी मुख्य चौराहे पर खडे होकर हम अधिक से अधिक २५० तारे देख सकते हैं, लेकिन शहर के बाहर निकलने पर किसी अन्धेरे स्थान पर खडे होकर हमें नंगी आँखों से २५०० से अधिक नक्षत्र और तारे आसानी से दिख जाते हैं । यह कोई मुख्य समस्या नहीं है, बल्कि असल बात तो यह है कि रात्रिकालीन तेज प्रकाश के कारण अनेक पक्षी, कीट-पतंगे अपना रास्ता भूल जाते हैं और भटक कर रोशनी के स्रोतों से टकराते रहते हैं । एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष लगभग दस करोड़ पक्षी ऊँची इमारतों से टकराकर मर जाते हैं । वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर रॉड क्राफ़ोर्ड के अनुसार “पहले आमतौर पर दिखाई दे जाने वाले कई कीट हमारी नजरों से दूर होते जा रहे हैं, कुछ छोटे पतंगे तो शहरों से लगभग लुप्तप्राय होने लगे हैं, क्योंकि रात की तेज रोशनी में वे अपना सफ़र नहीं कर पाते और उनके प्राकृतिक “मिलन” के लिये जो रात का कम समय मिल पाता है, उसमें भी कमी हो गई है । साथ ही तेज प्रकाश के कारण वे बडे पक्षियों के शिकार बन जाते हैं । इसी प्रकार एक जीव विज्ञानी डॉ. मारिआन मूर, जिन्होंने झीलों के सूक्ष्म जीवों (zooplanktons) पर गहन अनुसन्धान किया है, कहते हैं “तालाब या झील के ये सूक्ष्म जीव रात के समय पानी की सतह पर आकर जल शैवालों का भक्षण करते हैं, लेकिन नदी या झीलों के किनारे तेज प्रकाश के कारण वे सतह पर आने से कतराते हैं और उन्हें अधिक समय पानी के नीचे ही गुजारना पड़ता है, इसलिये सतह पर शैवालों (Algae) का बढना जारी रहता है जिसके कारण अन्य दूसरी जलीय वनस्पतियों को पनपने का मौका ही नहीं मिलता । चन्द्रमा के नैसर्गिक प्रकाश में इन विविध प्राणियों को सहवास का जो समय मिलता है वह अब तेज रोशनी के कारण होने वाले दिमागी भ्रम के कारण नहीं मिलता, इस कारण लाखों प्रजातियाँ लुप्त होने की कगार पर आ गई हैं ।

(यह चित्र अमेरिका में रात होते समय का उपग्रह से लिया गया है, जिसमें अमेरिका के चकाचौंध शहर साफ़ दिखाई देते हैं)
हालांकि लोग कहते हैं कि मनुष्य की सुविधा और अपराधों पर नियन्त्रण के लिये रात में तेज प्रकाश आवश्यक है और उसके कारण पर्यावरण को होने वाले नुकसान की परवाह नहीं करना चाहिये, लेकिन इस तेज प्रकाश का मनुष्यों पर भी घातक प्रभाव पड़ रहा हो तब तो हमें सचेत हो ही जाना चाहिये । “नेशनल कैन्सर इंस्टिट्यूट” की एक शोध रिपोर्ट के अनुसार प्राकृतिक प्रकाश की अपेक्षा रात्रिकालीन प्रकाश में अधिक देर तक रहने से कैंसर का खतरा बढ जाता है । रिपोर्ट के अध्ययन के अनुसार जो स्त्रियाँ नाईट शिफ़्ट में काम करती हैं, उनमें स्तन कैंसर की मात्रा अधिक पाई गई, इसी प्रकार बोस्टन के एक अस्पताल में किये गये शोध के अनुसार रात्रि पाली में काम करने वाली नर्सों में कैंसर की सम्भावना 36% तक बढ गई थी । दरअसल, तेज प्रकाश के कारण शरीर में मेलाटोनिन के निर्माण में कमी आती है, इस हार्मोन पर शरीर के “चक्र” का दारोमदार होता है, जिससे यह चक्र गडबडा़ जाता है । मेलेटोनिन में Antioxidant गुण होते हैं, इनमें कमी के कारण Astrogen का निर्माण भी बाधित होता है और अन्ततः यही कैंसर का कारण बनता है ।

(इस चित्र में जापान, यूरोप, दुबई, और अमेरिका के बडे शहरों को आसानी से चिन्हित किया जा सकता है)

नैसर्गिक प्रकाश मनुष्य या प्राणी के शरीर के लिये औषधि का काम करता है, लेकिन कृत्रिम प्रकाश का अधिकाधिक उपयोग बीमारियों को बढा़ता जा रहा है । यह एक सामान्य सा स्थापित तथ्य है कि जिन घरों में सूर्य का प्रकाश अधिक देर तक रहता है, वहाँ लोग अधिक स्वस्थ रहते हैं । नॉर्वे, स्वीडन आदि स्कैंडेनेवियाई देशों के नागरिक सूर्य देखने के लिये तरस जाते हैं, वहाँ कई बार चार-छः महीनों तक धूप ही नहीं निकलती । विदेशी पर्यटक यूँ ही नहीं गोवा और कोवलम के बीचों पर नंग-धडंग पडे़ रहते, बल्कि धूप से अधिक देर तक दूर रहने के कारण उनको त्वचा कैंसर का खतरा होता है, इसलिये डॉक्टर उन्हें “धूप-स्नान” की सलाह देते हैं । हम भारतवासी सौभाग्यशाली हैं कि हमें धूप, ठंड और बारिश लगभग समानुपात में मिलती है (ये और बात है कि हम उसकी कद्र नहीं करते) । सामान्यतः एक बडे़ बल्ब की प्रखरता 2900 ल्यूमेन्स होती है, जबकि फ़्लोरोसेंट ट्यूब की 7750, मरकरी लैम्प की 19100, कम प्रेशर के सोडियम लैम्प की 33000, अधिक दबाव वाले सोडियम लैम्प की 45000 और मेटल हेलाईड के प्रकाश की तीव्रता 71000 ल्यूमेन्स होती है । इसके कारण इनके आसपास के वातावरण के तापमान में भारी वृद्धि हो जाती है । स्टेडियमों में लगने वाले बल्बों से अल्ट्रावॉयलेट किरणें एवं अन्य उच्च दाब के प्रकाश से इन्फ़्रारेड किरणें निकलती हैं, और यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि इन किरणों का मनुष्य के शरीर पर क्या प्रभाव पडता है । यदि किसी बडे शहर की सभी सार्वजनिक लाईटों को दो सौ वॉट की बजाय सौ वॉट एवं ढाई सौ की बजाय डेढ सौ वॉट में बदल दिया जाये तो कितनी ऊर्जा और बिजली की बचत होगी । इमारतों और सडकों पर उतना ही प्रकाश होना चाहिये जितनी जरूरत है, खामख्वाह आँखें चौंधियाने वाले प्रकाश की कोई आवश्यकता नहीं है और ऐसा अभी सिद्ध नहीं हुआ है कि अंधेरी रातों में अधिक चोरियाँ होती हैं, बल्कि पुलिस के अनुसार सेंधमारी और लूट दिन के वक्त ज्यादा होती है, जब घरों में कोई नहीं होता । इसलिये समय आ गया है कि सभी नगरीय प्रशासनिक संस्थायें इस दिशा में विचार करें, वैसे ही हमारे देश में बिजली की कमी है, फ़िर क्यों उसका इस तरह से अपव्यय किया जाये ? साथ ही स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिये तो यह हितैषी होगा ही, कि हम सब मिलकर कटौती करने की कोशिश करें । बडे़-बडे़ शोरूमों और कम्पनियों से भी यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने यहाँ गैरजरूरी लाईटों में कमी करें, साईन बोर्ड रात के दस बजे तक ही चालू रखें । नगरपालिकायें सडक की बत्तियाँ एक खंभा छोडकर एक पर जलायें । यही बात घरों पर भी लागू करने की कोशिश करें और ट्यूबलाईटों को निकालकर CFL का अधिकाधिक प्रयोग शुरु करें, साथ ही यह भी याद करने की कोशिश करें कि पिछली बार आपने “जुगनू” कब देखा था ?
स्व-आचार संहिता : इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री एवं लेखों पर आधारित

हरित मानव का पुनरागमन

लापोडिया (राजस्थान) में विगत वर्ष बहुत ही अल्प बारिश हुई । गाँव में वैसे तो तीन विशाल आकार के तालाब, जिनका नामकरण सौन्दर्यशास्त्र के आधार पर अन्नासागर, देवसागर और फ़ूलसागर… खाली पडे़ हुए थे । परन्तु, लापोडिया, जो सूरज की तीव्रता से झुलसता हुआ एक छोटी सी बस्ती वाला गाँव है और जयपुर से ८० किलोमीटर दूरी पर दक्षिण-पश्चिम मे स्थित है, में ना तो झुलसती हुई धरती को शांत करने के लिये कोई यज्ञ आयोजित किये गये और ना ही पानी के अतिरिक्त टैंकरों की जरूरत महसूस की गई । जो थोडे लोग गाँव छोडकर गये वे भी जयपुर में रोजगार की तलाश में गये थे ।
लेकिन आज अन्य गाँवों से भिन्न लापोडिया के कुँए पानी से लबालब भरे हुए हैं । खेत के किनारे हरी पत्तियों वाली साग-सब्जी, पालक, मैथी, आलू, मूली आदि से पटे हैं । हर परिवार के पास अलग से अतिरिक्त स्थान है, जिसमें उन्होंने पशु आहार के लिये ताजा हरा चारा उगा रखा है । गाँव से प्रतिदिन १६ हजार लीटर दूध का विक्रय होता है । यहाँ पर वृक्ष जैसे – नीम, पीपल, पान, खैर, देशी बबूल आदि की बहार है और पूरा गाँव सैकडों अजनबी पक्षियों की चहचहाहट से रोमांचित हो उठता है, जिसे एक पक्षी प्रेमी ही समझ सकता है । यह सारा दृश्य एक पक्षी अभयारण्य का रूप अख्तियार कर लेता है ।
लापोडिया को कोई दैवीय आशीर्वाद प्राप्त नहीं हो गया है, यह सब चमत्कार है श्री लक्ष्मण सिंह की बाजीगरी का । एक ऐसा ग्रामीण व्यक्ति, जो किसी महाविद्यालय में अध्ययन के लिये नहीं गया, किन्तु उसने दिन-प्रतिदिन के अपने अनुभवों एवं पारम्परिक ज्ञान को गूँथकर जल-संग्रहण की एक अनूठी पद्धति विकसित की । जिसका नाम उसने “चोका” रखा – जो एक छोटे बाँध के स्वरूप में जटिल ग्रिड वाली संरचना है, जिसमें पानी की हर बूँद जो धरा के ऊपर और भीतर मौजूद है, को संग्रहीत किया जाता है । पूर्व में जो पानी ऊपर मौजूद था, वह या तो खपत हो जाता था या सूख जाता था, किन्तु भूमिगत जल जो धरती के अन्दर है, छुपा ही रहता था । इस पानी में गाँव के १०३ कुँए कभी नहीं सूखने देने की क्षमता मौजूद थी । लक्ष्मणसिंह की इस ठेठ देशी सोच नेण दूर तक बसे लोगों का ध्यान आकर्षित किया । दो वर्ष पूर्व सूखे से झुलसते हुए अफ़गानिस्तान का एक प्रथिनिधिमण्डल पूर्वी राजस्थान के इस गाँव में लक्ष्मणसिंह से जल संग्रहण की इस तकनीक को करीब से जानने-समझने के उद्देश्य से आया था । मध्यप्रदेश शासन ने भी एक अध्ययन दल भेजा, राजस्थान सरकार भी लापोडिया के उदाहरण को लेकर एक “हैण्डबुक” निकालने जा रही है । किन्तु इन सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अडोस-पडो़स के कई गाँवों जैसे जयपुर जिले के मेत, चापियाँ एवं ईटनखोई तथा टोंक जिले के बालापुरा, सेलसागर और केरिया में “चोका पद्धति” सफ़लतापूर्वक अंगीकार की गई है ।
५१ वर्षीय लक्ष्मणसिंह जो अपना स्वयं का एक एनजीओ “ग्राम विकास नवयुवक मण्डल” चलाते हैं, का कहना है कि अन्या गाँवों में भी इस काम को बखूबी अंजाम दे रहे हैं” । २०० परिवारों की बस्ती वाला यह गाँव पहले कभी ऐसा नहीं था । लापोडिया का शाब्दिक अर्थ है “झक्की लोग” जो एक सन्देहपूर्ण नाम इसके झगडालू प्रवृत्ति वाले लोगों के कारण मिला होगा । लक्ष्मण सिंह जी के पिता एक जमींदार थे, कहते हैं कि वे सब कुछ बदल देना चाहते है, जो लोग इस गाँव के बारे में धारणा बनाये हुए हैं । एक दिन टोंक जिले के समीप स्थित पारले गाँव का भ्रमण करते हुए वे एक “बुण्ड” (कच्ची मिट्टी की दीवारें) के सम्पर्क में आये । सिंह कहते हैं कि इनको देखकर ही उनके मस्तिष्क में “चोका पद्धति” को विकसित करने के बीज अंकुरित हुए । अगले पाँच वर्ष तक वे “बुण्ड” के आसपास के वातावरण का अवलोकन करते रहे और जल संरक्षण की इस तकनीक को विकसित करने में जुट गये ।
इसकी आधारभूत संरचना काफ़ी सरल है, इसमें बारिश का पानी जो धरती द्वारा सोख जाता है वाष्प बनकर उड़ता नहीं है और यदि रोका जाये तो इसका उपयोग जब जरूरत हो तब किया जा सकता है । इस तरह से धरती के भीतर मौजूद पानी की हर बूँद को संरक्षित किया जा सकता है । सिंह इस दिशा एवं विचार पर काम करना शुरू किया, और वे कहते हैं कि “मैं जिला अधिकारियों के पास सहायता के लिये गया, किन्तु वे मुझ पर हँसे और उन्होंने मुझसे कहा कि यह सम्भव नहीं है, और पूछा कि तुम किस महाविद्यालय मे अध्ययन के लिये गये हो ?” वर्ष १९९४ के लगभग सिंह ने एक “चोका मॉडल” विकसित कर लिया था । अब इसका लाभ स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, यह सब आँखों के सामने है । नंगी आँखों से चरागाह सूखे दिखाई पडते हैं, लेकिन यह छोटी घास से भरे पडे हैं, जिसमें पालतू पशु चरते हैं । विगत आठ वर्षों से बारिश नियमित नहीं है किन्तु कुँए भरे हुए हैं । गाँव वालों ने सामूहिक पद्धति और सहमति रखकर ५०% भूमि पर ही खेती-बाडी़ करने का निर्णय ले रखा है । इसी तरह कुँए भी सिंचाई के लिये सुबह के वक्त ही उपयोग में लिये जाते हैं ।
सिंह कहते हैं कि “हमें प्रकृति से वही लेना चाहिये जो वह हमें गर्व से और सहर्ष दे, यदि आप जोर-जबर्दस्ती से कुछ छीनना चाहेंगे तो प्रकृति स्वयं की संपूर्ति और आपकी आपूर्ति नहीं कर सकती” ।
परिणामस्वरूप आज लापोडिया में पक्षी बिना भय के चहचहाते हैं और खेत-खलिहान में हरियाली बिछी हुई है ।

>हरित मानव का पुनरागमन

>लापोडिया (राजस्थान) में विगत वर्ष बहुत ही अल्प बारिश हुई । गाँव में वैसे तो तीन विशाल आकार के तालाब, जिनका नामकरण सौन्दर्यशास्त्र के आधार पर अन्नासागर, देवसागर और फ़ूलसागर… खाली पडे़ हुए थे । परन्तु, लापोडिया, जो सूरज की तीव्रता से झुलसता हुआ एक छोटी सी बस्ती वाला गाँव है और जयपुर से ८० किलोमीटर दूरी पर दक्षिण-पश्चिम मे स्थित है, में ना तो झुलसती हुई धरती को शांत करने के लिये कोई यज्ञ आयोजित किये गये और ना ही पानी के अतिरिक्त टैंकरों की जरूरत महसूस की गई । जो थोडे लोग गाँव छोडकर गये वे भी जयपुर में रोजगार की तलाश में गये थे ।
लेकिन आज अन्य गाँवों से भिन्न लापोडिया के कुँए पानी से लबालब भरे हुए हैं । खेत के किनारे हरी पत्तियों वाली साग-सब्जी, पालक, मैथी, आलू, मूली आदि से पटे हैं । हर परिवार के पास अलग से अतिरिक्त स्थान है, जिसमें उन्होंने पशु आहार के लिये ताजा हरा चारा उगा रखा है । गाँव से प्रतिदिन १६ हजार लीटर दूध का विक्रय होता है । यहाँ पर वृक्ष जैसे – नीम, पीपल, पान, खैर, देशी बबूल आदि की बहार है और पूरा गाँव सैकडों अजनबी पक्षियों की चहचहाहट से रोमांचित हो उठता है, जिसे एक पक्षी प्रेमी ही समझ सकता है । यह सारा दृश्य एक पक्षी अभयारण्य का रूप अख्तियार कर लेता है ।
लापोडिया को कोई दैवीय आशीर्वाद प्राप्त नहीं हो गया है, यह सब चमत्कार है श्री लक्ष्मण सिंह की बाजीगरी का । एक ऐसा ग्रामीण व्यक्ति, जो किसी महाविद्यालय में अध्ययन के लिये नहीं गया, किन्तु उसने दिन-प्रतिदिन के अपने अनुभवों एवं पारम्परिक ज्ञान को गूँथकर जल-संग्रहण की एक अनूठी पद्धति विकसित की । जिसका नाम उसने “चोका” रखा – जो एक छोटे बाँध के स्वरूप में जटिल ग्रिड वाली संरचना है, जिसमें पानी की हर बूँद जो धरा के ऊपर और भीतर मौजूद है, को संग्रहीत किया जाता है । पूर्व में जो पानी ऊपर मौजूद था, वह या तो खपत हो जाता था या सूख जाता था, किन्तु भूमिगत जल जो धरती के अन्दर है, छुपा ही रहता था । इस पानी में गाँव के १०३ कुँए कभी नहीं सूखने देने की क्षमता मौजूद थी । लक्ष्मणसिंह की इस ठेठ देशी सोच नेण दूर तक बसे लोगों का ध्यान आकर्षित किया । दो वर्ष पूर्व सूखे से झुलसते हुए अफ़गानिस्तान का एक प्रथिनिधिमण्डल पूर्वी राजस्थान के इस गाँव में लक्ष्मणसिंह से जल संग्रहण की इस तकनीक को करीब से जानने-समझने के उद्देश्य से आया था । मध्यप्रदेश शासन ने भी एक अध्ययन दल भेजा, राजस्थान सरकार भी लापोडिया के उदाहरण को लेकर एक “हैण्डबुक” निकालने जा रही है । किन्तु इन सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अडोस-पडो़स के कई गाँवों जैसे जयपुर जिले के मेत, चापियाँ एवं ईटनखोई तथा टोंक जिले के बालापुरा, सेलसागर और केरिया में “चोका पद्धति” सफ़लतापूर्वक अंगीकार की गई है ।
५१ वर्षीय लक्ष्मणसिंह जो अपना स्वयं का एक एनजीओ “ग्राम विकास नवयुवक मण्डल” चलाते हैं, का कहना है कि अन्या गाँवों में भी इस काम को बखूबी अंजाम दे रहे हैं” । २०० परिवारों की बस्ती वाला यह गाँव पहले कभी ऐसा नहीं था । लापोडिया का शाब्दिक अर्थ है “झक्की लोग” जो एक सन्देहपूर्ण नाम इसके झगडालू प्रवृत्ति वाले लोगों के कारण मिला होगा । लक्ष्मण सिंह जी के पिता एक जमींदार थे, कहते हैं कि वे सब कुछ बदल देना चाहते है, जो लोग इस गाँव के बारे में धारणा बनाये हुए हैं । एक दिन टोंक जिले के समीप स्थित पारले गाँव का भ्रमण करते हुए वे एक “बुण्ड” (कच्ची मिट्टी की दीवारें) के सम्पर्क में आये । सिंह कहते हैं कि इनको देखकर ही उनके मस्तिष्क में “चोका पद्धति” को विकसित करने के बीज अंकुरित हुए । अगले पाँच वर्ष तक वे “बुण्ड” के आसपास के वातावरण का अवलोकन करते रहे और जल संरक्षण की इस तकनीक को विकसित करने में जुट गये ।
इसकी आधारभूत संरचना काफ़ी सरल है, इसमें बारिश का पानी जो धरती द्वारा सोख जाता है वाष्प बनकर उड़ता नहीं है और यदि रोका जाये तो इसका उपयोग जब जरूरत हो तब किया जा सकता है । इस तरह से धरती के भीतर मौजूद पानी की हर बूँद को संरक्षित किया जा सकता है । सिंह इस दिशा एवं विचार पर काम करना शुरू किया, और वे कहते हैं कि “मैं जिला अधिकारियों के पास सहायता के लिये गया, किन्तु वे मुझ पर हँसे और उन्होंने मुझसे कहा कि यह सम्भव नहीं है, और पूछा कि तुम किस महाविद्यालय मे अध्ययन के लिये गये हो ?” वर्ष १९९४ के लगभग सिंह ने एक “चोका मॉडल” विकसित कर लिया था । अब इसका लाभ स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, यह सब आँखों के सामने है । नंगी आँखों से चरागाह सूखे दिखाई पडते हैं, लेकिन यह छोटी घास से भरे पडे हैं, जिसमें पालतू पशु चरते हैं । विगत आठ वर्षों से बारिश नियमित नहीं है किन्तु कुँए भरे हुए हैं । गाँव वालों ने सामूहिक पद्धति और सहमति रखकर ५०% भूमि पर ही खेती-बाडी़ करने का निर्णय ले रखा है । इसी तरह कुँए भी सिंचाई के लिये सुबह के वक्त ही उपयोग में लिये जाते हैं ।
सिंह कहते हैं कि “हमें प्रकृति से वही लेना चाहिये जो वह हमें गर्व से और सहर्ष दे, यदि आप जोर-जबर्दस्ती से कुछ छीनना चाहेंगे तो प्रकृति स्वयं की संपूर्ति और आपकी आपूर्ति नहीं कर सकती” ।
परिणामस्वरूप आज लापोडिया में पक्षी बिना भय के चहचहाते हैं और खेत-खलिहान में हरियाली बिछी हुई है ।