>क्या इंसा जो लेकर आया

>कितने सपने संजोये हमने
पर वो ख्वाब अधुरे है
सावन आये पल के लिए
पर पतझड़ अभी भी पूरे है

ये नदिया बहती सदियों से
पर सागर में मिल जाती है
अरे फूल खीले हो कितने भी
पर एक दिन वो मुरझाते/मिट जाते है

क्या इंसा जो लेकर आया
क्या लेकर वो जायेगा
खुषी मिले या गम कितने भी
सब छोड़ यहां चला जायेगा


जब अज्ञानी मैं जो था
ये तेरा ये मेरा था
जब जाना ये सबकुछ मैंने
सब माया का फेरा था

सोचा था मैंने कुछ हटके
जाउ जग से नया कुछ करके
वरना खुदा फिर कहेगा मुझसे
आया एक नया पशु फिर मर के

        कितने सपने संजोये हमने
        पर वो ख्वाब अधुरे है
        सावन आये पल के लिए
        पर पतझड़ अभी भी पूरे है

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