>पुस्तक मेले पर चला बुलडोजर और ब्लॉग-जगत में व्यापक विरोध

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प्रिय पाठकों ! 
नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के संग एक बेहद दुखद घटना का जिक्र कर रहा हूँ . शायद आपको पता भी होगा कि नागपुर में आयोजित राष्ट्रीय पुस्तक मेले पर निगम का जो बुलडोजर चलाया गया वह  साहित्य -प्रेमियों के छाती से गुजरा है . महज नियमों की आड़ में एन ओ सी का बहाना  बना कर निगम के अधिकारीयों ने मेले को तहस नहस कर दिया वो भी तब जब मामला न्यायालय में लंबित रहा हो तो क्या कहा जायेगा ? क्या यह लाखों पुस्तक प्रेमियों समेत भारतीय न्यायपालिका की अवमानना नहीं है . वैसे यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि अफसरशाही का न्यायपालिका से विरोध हो लेकिन बात पुस्तक मेले की है . वहां कोई जुआ खाना या पब तो नहीं चल रहा था . और अगर होता भी तो पूरी उम्मीद की जनि चाहिए कि उनको एन ओ सी मिल गयी होती . अरे इस  देश में बहुत कुछ गैर क़ानूनी है . बहुत सारी बिल्डिंगें बगैर एनओसी की शान से खड़ी है जबकि उनमें कई कभी भी गिर सकती है तब ऐसे अधिकारियों की आँखें कहाँ रहती है ? इनकी नींद जनहित में क्यों नहीं खुलती ? जब भी कुछ करेंगे जनता के खिलाफ और समाज के विरुद्ध ही होगा ? अपने झूठे मान के नाम पर जनता के पैसों पर लगाई गयी पुस्तक मेले का सत्यनाश कर दिया . बात इस साल की ही नहीं बल्कि आने वाले कई सालों तक इस घटना की छाप पुस्तक मेले पर पड़ेगी . हो सकता है आने वाले समय में ऐसा कोई आयोजन हो ही न . एक ओर सरकारी संस्थानों द्वारा पाठकों को प्रोत्साहित करने के लिए लाखों रूपये खर्च किये जाते हैं दूसरी तरफ नागपुर में प्रशासनिक अधिकारियों की इस घटना ने शर्मसार कर दिया है . इस घटना का ब्लॉग-जगत में व्यापक विरोध होना चाहिए . अगर आपको लगता है कि कुछ अनुचित हुआ है तो कृपया अपनी आपत्ति यहाँ दर्ज कराएँ .
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>संदेह में उम्मीद

>नया वर्ष ए़क पत्थर है-
पानी से घिस चिकना हो गए
उन् ढेर सारे काले, लाल, सफ़ेद पत्थरों में से ए़क-
केक के खाली हो गए डिब्बे में रख
पिछली विदा में जो दिए थे तुमने- सजाने को कमरे में|

नया वर्ष ए़क पत्थर है
जो दिखा-
सड़क किनारे, चाय की टप्पी पे सिगरेट पीते,
दुनिया और मेरे बीच धुआँ सा था जब,
-थूथन उठाये अपनी दोनों आँखों से मुझे घुरता|
उस की पूँछ में ए़क छेद है,
इस ओर की दुनिया से
उस ओर की दुनिया में जाने के लिए ए़क सुरंग की तरह
-मैं उठा लाया हूँ|

नया वर्ष ए़क पत्थर है-
जो फेंक दें बीच की खाई में,
हर बार को झुठलाती,
इस दफा,
आ ही जाए पेंदे से टकराने की आवाज,
या क्या पता कर ही दे आकाश में सुराख
जो उछाल दें तबियत से|
..मुश्किल सिर्फ इतनी सी है दोस्त
की इस मुश्किल वक़्त में
तबियत का होना ए़क संदेह है|

नया वर्ष ए़क पत्थर है
ट्रक के पहिये से छिटक कर
मेरे सर पर आ लगा है
और अब ए़क पत्थर मेरे भीतर भी है,
सर पर उग आये गुमड़ में|
इन्हीं दो पत्थरो के बीच रख
पीसना है मुझे- साल भर मसाला
(इस सन्नाटे में लगाने को छौंक)
पीसनी है मुझे- साल भर गेंहू
दर्रनी है मुझे – साल भर दाल
और पूरे साल
वही रोटी – वही दाल|

नया वर्ष ए़क पत्थर है
-मील का|
जिस पर लिखा है
कहाँ तक चल चुके हम?
कहाँ था हमें जाना?
और ए़क प्रश्न-
अब पहुचेंगे कहाँ हम ?

नया वर्ष ए़क पत्थर है
-मेरे हाथ में|
जो दिखा-
सड़क किनारे, चाय की टप्पी पे सिगरेट पीते,
दुनिया और मेरे बीच धुआँ सा था जब|

– इस बाज़ार से दूर
जो डाली जा रही हो नीव किसी घर की
उसी में कही रखनी है मुझे