>16 मई को राम राज्य पार्टी मैदान में

>

भगवान राम के नाम पर कुछ लोगों ने सिर्फ राजनीति की या कुछ और भी किया, इस मुद्दे पर बहस कई बार हो चुकी है पर एक बात निश्चित है कि आम राम भक्त इस मुद्दे पर निराश रहा. उसे लगता रहा कि उसे छला जा रहा है.अब आम राम भक्त की यह धारणा सही है या गलत इस पर मुझे कुछ नहीं कहना है लेकिन एक सूचना अभी अभी मेरे इनबाक्स में आई है जो आम राम भक्त के लिए खुशखबरी हो सकती है. कल 16 मई रविवार को हैदराबाद में राम राज्य पार्टी का उदघाटन हो रहा है. अक्षय तृतीय के दिवस को अभिजीत महूरत के पावन मौके पर यह औपचारिक घोषणा हैदराबाद के अमृता आर्केड, काचेगुडा, में सुबह 11 बज कर तीस मिनट पर होगी. आयोजकों ने इस नयी पार्टी के गठन का मकसद राजनीति में आ चुके प्रदूषण को दूर करके इसे शुद्ध करना बताया है. गौरतलब है कि इस पार्टी को संगठित करने में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं स्वामी आत्मयोगी. ग्लोबल राम राज्य, अखंड कश्मीर और ग्लोबल गृह लक्ष्मी जैसे अनेक सफल अभियानों को चला रहे स्वामी आत्मयोगी का कहना है कि भगवान राम के राज्य में किसी को भी तन, मन या धन का कोई दुःख नहीं था. उल्लेखनीय है कि किसी भी क्षेत्र में सफलता पाने के लिए राम राज्य विजयी कोर्स का नया स्तर भी 16 मई को अयोध्या में शुरू किया जा रहा है. स्वामी आत्मयोगी ने विश्व भर में छाई मंदी और भारतीय घरों में आर्थिक संकट के नाज़ुक मुद्दों को लेकर कवितायें भी लिखीं थी. कविता और एक्शन में एक जैसी तेज़ी रखने वाले स्वामी आत्मयोगी के संचालन में यह राम राज्य पार्टी कहां तक अपने निशाने में सफल होती है इसका पता तो अब आने वाले समय में ही लग सकेगा.–रैक्टर कथूरिया 
Advertisements

>धर्म की दुकानों से कब तक आँख फेरेंगे , कुछ तो शर्म करो !

>शर्म आती है ?

किसे ? 
अरे , हमें और किसको ! 
अब पूछिए क्यों ? इसलिए कि हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहाँ बड़ी आसानी से योग ,अध्यात्म ,भजन-कीर्तन के नाम पर कोई भी दाढ़ी-बालों वाला नकलची ,ढोंगी ,मक्कार भगवान् के समक्ष पूजा जाने लगता है . हिन्दू समाज के लिए वर्तमान समय धार्मिक और आध्यात्मिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है . ऐसा कहने के एक नहीं अनेक कारण है .और तत्काल उदाहरण भी सामने हैं बस गिनते चलिए और अपने आस-पास भी खोजिये कई मिल जायेंगे ! दिल्ली में चमत्कारी बाबा ६ लड़कियों के साथ सेक्स रेकेट में पकड़ा गया . आसाराम बापू के आश्रम में यौन शोषण और बच्चों के खरीद-फरोख्त की बात कई दफे सामने आई है .कुम्भ मेले में शंकराचार्यों के बीच असली-नकली को लेकर लड़ाई जारी है . दक्षिण के एक बाबा नित्यानंद  को दो अभिनेत्रियों  के साथ मजे लुटते हुए एक सीडी बरामद हुई है . डेरा सच्चा सौदा के बाबा राम रहीम पर हत्या का आरोप लगा है . यह तो कुछ हाई प्रोफाइल बाबाओं के हालिया किस्से हैं ! अनुमानतः दस लाख से अधिक बाबाओं के इस देश में कितने ऐसे हैं और कितने सच्चे यह कहना बगैर किसी सर्वेक्षण के गलत होगा ! बात केवल बाबाओं के सेक्स रेकेट ,किडनी रेकेट ,आदि में लिप्त होने तक नहीं रह जाती है . बात है कि हम कैसे समाज में जी रहे हैं जहाँ उपदेशक /गुरु /संत कहलाने वाले ,भगवान् के तौर पर पूजे जाने वाले लोग इतने गिर गये हैं . मंदिरों मठों को आपसी वर्चस्व और निजी स्वार्थपूर्ति का साधन बना दिया है . बिहार के सुल्तानगंज स्थित अजगैवी मठ का किस्सा याद होगा आपको जहाँ का महंथ मठ की जायदाद बेच कर पकड़े जाने पर शिष्या के संग कमरे में बंद हो गया था . अरे ,इनसे अच्छा तो प्राचीन देवदासी परम्परा थी जिसमें छिप-छिपाकर कदाचार नहीं होता था . इनकी तरह भक्तों को ब्रह्मचारी का उपदेश देकर खुद मज़े तो नहीं लुटते थे . जो भी होता था उसमें समाज की इच्छा शामिल थी और कम से कम सबको मालूम तो जरुर होता था . ” ऊपर से फीट -फाट अन्दर से मोकामा घाट ” ऐसी बात तो कतई नहीं थी. 
आज पत्रकारिता , समाजसेवा , राजनीति आदि के तर्ज पर धर्म -अध्यात्म मिशन से प्रोफेशन बन चुका है लेकिन बाबागिरी  नाम के इस प्रोफेशन में ईमानदारी की कोई गुंजाईश नहीं बची है .लोगों ने इसे भी धंधा बनाया , चलो अच्छी बात है , लेकिन धंधे का पहला वसूल; पेशे के चरित्र को बचाए रखना , को हीं गायब कर दिया ! किसी फिल्म का संवाद याद आ रहा है कि ‘ बेईमानी का काम भी हम ईमानदारी से करते हैं ‘ . कई सवाल आपके मन भी तैर रहे होंगे ! जैसे , यह सब अचानक से अभी क्यों सामने आ रहा है ? पहले ऐसा नहीं था ? ये सब कब से शुरू हुआ ? आदि-आदि . ऐसा नहीं कहा जा सकता कि पहले ऐसा नहीं था लेकिन इतना जरुर है कि अब जबकि बाबागिरी नाम का एक नया धंधा बाजार में आया है तब तादाद बढ़ गयी है .निजी शिक्षण संस्थानों की तरह धार्मिक-आध्यात्मिक -ज्योतिष वगैरह ,वगैरह की संस्थाओं की बाढ़ आ गयी है . और इस पूरे हादसे मे सूचना क्रांति की उपज इलेक्ट्रोनिक मीडिया और इंटरनेट ने सबसे अहम् भूमिका निभाई है . एक बार खुद से आंकलन करके देखिये तो पता चलेगा कि टीवी पर सामाजिक सरोकारों से जुडे विषयों से दुगुने -तिगुने समय में इन धंधेबाजों को दिखाया जाता है और इन्टरनेट पर समाजोपयोगी वेबसाइट के मुकाबले ज्योतिष -अध्यात्म -धर्म के नाम पर चल रही दुकानें सौ गुना अधिक संख्या में है .सुना है कि बीबीसी हिंदी की साईट से अधिक पाठक शनिधाम .कॉम पर जाते हैं ! हिन्दुओं का असंख्य धन राशि मंदिर -मठ रूपी दुकानों के महंथों और कुकुरमुत्ते की तरह फैले बाबाओं के पास बेकार पड़ा है और जो धन मात्र कुछ लोगों की ऐय्याशी में झोका जाता है . सबको मालूम है राम जी ,दुर्गा माँ ,शिव जी या साईं बाबा को पैसों का कोई काम नहीं है .अरे जिसके दर पे हम खुद भीख मांगने जाते है उनको कुछ देकर बड़ी चीज की उम्मीद रखना उनके ही विरुद्ध है .  

बहरहाल , हिन्दू धर्म के हित में सोचने वाले तमाम बुद्धिजीवों से आग्रह है कि आप खुद सोचिये , प्रमाणित रूप से ज्ञात संसार के सबसे प्राचीनतम धर्म -संस्कृति की इस दयनीय दशा पर रोना नहीं आता ? रोइए मत ! कुछ करिए . सबसे पहले खुद पर शर्म करिए कि हम लोग ऐसे समाज में जी रहे हैं और जब शर्म का अहसास होगा और लगेगा कि सच में कुछ गलत हो रहा है तब कहीं जाकर इस लड़ाई का आगाज होगा . यह आग्रह उन सभी के लिए है जो इंटरनेट पर हिन्दू धर्म को लेकर संघर्ष कर रहे हैं या ऐसा दावा करते हैं .हम शुतुरमुर्ग नहीं बन सकतेहैं . अपनी गर्दनें रेत में नहीं छुपा सकते हैं . सदियों से जागृत समाज का वंशज होने का दायित्व हमारे सर पर है उसे हम छोड़ कर आत्मप्रशंसा में डूबे रहेंगे ? नहीं , तो फ़िर क्या करेंगे इस पर गंभीरता से चिंतन करना होगा . धर्म-संसद जैसी संस्थाओं को जागृत करने की दिशा में प्रयास जरुरी है क्योंकि जब तक पथप्रदर्शक नहीं होगा पथानुगामी क्या करेंगे ! हमें अपने घर का कचड़ा स्वयं हीं साफ़ करना होगा . एक जागरण की शुरुआत करनी होगी  जिसमें हिन्दू जनता के धन के इस बेजा उपयोग को रोका जाए और इसका इस्तेमाल हिन्दू धर्म की समृद्धि { जैसे हिन्दू धर्म से जुड़े रिसर्च कार्यों , असहाय हिन्दुओं को रोटी कपडा मकान व शिक्षा देने तथा अशोक महान के तर्ज पर हिन्दू धर्म के विश्वव्यापी प्रचार} का काम किया जाए .

>बीबीसी संवाददाता सुहैल हलिम के ब्लॉग को पढ़कर एक चिट्ठी उनके और उस ब्लॉग पर टिप्पणी करने वालों के नाम

>


सुहैल साहब ,नमस्कार !

शिवसेना के मुद्दे पर आपका ब्लॉग पढ़ा .आपने काफी साफगोई से सारी बात रखी पर, शायद कुछ भाइयों को इस व्यंग में शिवसेना की तरफदारी नज़र आई तो इस पर क्या कहा जाए . खैर एक अंतर्राष्ट्रीय मीडिया से जुड़े आदमी का ब्लॉग मैं कैसे बातें कही जानी चाहिए आपने इसका खूब ख्याल रखा है . पर मुझे इस ब्लॉग के शीर्षक और पोस्ट में कोई तारतम्य नज़र नहीं आया . माफ़ कीजियेगा . ….. वैसे जब शिवसेना की बात हो रही है तो मराठी मानुष के नाम पर हो रहे तमाम कारनामों से सभी परिचित है . शिवसेना को ऐतराज जताने का पूरा हक़ है और शाहरुख़ को भी लेकिन उन्हें यह अधिकार नहीं कि किसी की फिल्म चलने से रोकें ……. इतने कमेन्ट आये पर किसी ने सोनिया ब्रिगेड का नाम तक नहीं लिया जिनके युवराज बिहार में भारतीयता का दंभ भरते हैं और महाराष्ट्र में उन्हीं की सरकार है , क्या यह उनका दोहरापन नहीं है ? वैसे दरभंगा में राहुल का जो हश्र हुआ वह उनके युवा राजनीति को जान्ने के लिए काफी है ………. शिवसेना या मनसे को बढ़ावा देने वाले हम और और हीं हैं जिन्होंने आज तक कांग्रेस की विभाजक नीतियों का विरोध नहीं किया . उलटे हमेशा वोट बैंक की तरह खुद को उपभोग होने दिया . पौव्वा पीकर ,ठेकेदारी लेकर ,पैसे खाकर , सिफारिश करवाकर आदि -आदि अपने हितों में दूर का नुकसान भूल गये . क्यों भूल जाते हैं हम पंजाब से लेकर अयोध्या तक की घटना जिन्हें आज मीडिया और प्रधानमंत्री तक राष्ट्रीय शर्म कह रहे हैं वह बहुत इसी कांग्रेस के वोट बैंक की राजनीति का परिणाम है . वैसे आज जनसत्ता में छपा पुन्य प्रसून वाजपेई का लेख पढियेगा जिसमें राहुल गाँधी के युवा अभियान की धज्जियाँ उड़ा कर रख दी गयी है .राहुल गाँधी ब्यान दे रहे हैं कि मुंबई हमले में बिहारी सैनिकों ने अपना योगदान दिया . अरे ,शर्म आती है ऐसे युवा नेता पर जो भारतियों को बिहारी और मराठी के तराजू में तौल कर देश को बाँट रहे हैं . ऐसे छद्म लोगों को शिवसेना या मनसे का विरोध करने का कोई अधिकार नहीं है जिनकी सरकार खुद भाषा के आधार पर भेद-भाव वाला कानून पारित करती हो , जिनके शासनकाल में एक असहाय महिला को अधिकार इसलिए नहीं मिलता क्योंकि इससे वोट बैंक भड़क जाता है और उसी समय दूसरे समुदाय को खुश करने के लिए एक विवादित ढांचे का टला खोल दिया जाता है जो आज तक भारत की नाक का घाव बना हुआ है . क्या हम दोषी नहीं है जो उत्तर भारतीयों अथवा हिंदी भाषियों पर हो रहे अत्याचार और भेदभाव का रोना तो रोते हैं परन्तु राहुल गाँधी की पूंछ सहलाने से बाज नहीं आते ? जरा , सोचियेगा कभी आज सारी विघटनकारी शक्तियों के उभरने में किसकी अहम् भूमिका है ?


>"करवा चौथ" के सम्बन्ध में प्रचलित दंतकथाएं

>

करवा चौथके सम्बन्ध में अनेकों कहानियाँ , दंतकथाएं ,मिथक आदि समाज में प्रचलित हैंक्षेत्रीय आधार पर हर स्थान पर अलगअलग कथा सुनने को मिल जाती हैउन्हीं में से कुछ को नीचे दिया जा रहा है : –

प्रथम कथा

बहुत समय पहले की बात है, एक साहूकार के सात बेटे और उनकी एक बहन करवा थी। सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। यहाँ तक कि वे पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे। एक बार उनकी बहन ससुराल से मायके आई हुई थी।
शाम को भाई जब अपना व्यापार-व्यवसाय बंद कर घर आए तो देखा उनकी बहन बहुत व्याकुल थी। सभी भाई खाना खाने बैठे और अपनी बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे, लेकिन बहन ने बताया कि उसका आज करवा चौथ का निर्जल व्रत है और वह खाना सिर्फ चंद्रमा को देखकर उसे अर्घ्‍य देकर ही खा सकती है। चूँकि चंद्रमा अभी तक नहीं निकला है, इसलिए वह भूख-प्यास से व्याकुल हो उठी है।
सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं जाती और वह दूर पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। दूर से देखने पर वह ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे चतुर्थी का चाँद उदित हो रहा हो।
इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि चाँद निकल आया है, तुम उसे अर्घ्य देने के बाद भोजन कर सकती हो। बहन खुशी के मारे सीढ़ियों पर चढ़कर चाँद को देखती है, उसे अर्घ्‍य देकर खाना खाने बैठ जाती है।
वह पहला टुकड़ा मुँह में डालती है तो उसे छींक आ जाती है। दूसरा टुकड़ा डालती है तो उसमें बाल निकल आता है और जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुँह में डालने की कोशिश करती है तो उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है। वह बौखला जाती है।
उसकी भाभी उसे सच्चाई से अवगत कराती है कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गए हैं और उन्होंने ऐसा किया है।
सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है। उसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एकत्रित करती जाती है।
एक साल बाद फिर करवा चौथ का दिन आता है। उसकी सभी भाभियाँ करवा चौथ का व्रत रखती हैं। जब भाभियाँ उससे आशीर्वाद लेने आती हैं तो वह प्रत्येक भाभी से ‘यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो’ ऐसा आग्रह करती है, लेकिन हर बार भाभी उसे अगली भाभी से आग्रह करने का कह चली जाती है।
इस प्रकार जब छठे नंबर की भाभी आती है तो करवा उससे भी यही बात दोहराती है। यह भाभी उसे बताती है कि चूँकि सबसे छोटे भाई की वजह से उसका व्रत टूटा था अतः उसकी पत्नी में ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है, इसलिए जब वह आए तो तुम उसे पकड़ लेना और जब तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न कर दे, उसे नहीं छोड़ना। ऐसा कह के वह चली जाती है।
सबसे अंत में छोटी भाभी आती है। करवा उनसे भी सुहागिन बनने का आग्रह करती है, लेकिन वह टालमटोली करने लगती है। इसे देख करवा उन्हें जोर से पकड़ लेती है और अपने सुहाग को जिंदा करने के लिए कहती है। भाभी उससे छुड़ाने के लिए नोचती है, खसोटती है, लेकिन करवा नहीं छोड़ती है।
अंत में उसकी तपस्या को देख भाभी पसीज जाती है और अपनी छोटी अँगुली को चीरकर उसमें से अमृत उसके पति के मुँह में डाल देती है। करवा का पति तुरंत श्रीगणेश-श्रीगणेश कहता हुआ उठ बैठता है। इस प्रकार प्रभु कृपा से उसकी छोटी भाभी के माध्यम से करवा को अपना सुहाग वापस मिल जाता है। हे श्री गणेश माँ गौरी जिस प्रकार करवा को चिर सुहागन का वरदान आपसे मिला है, वैसा ही सब सुहागिनों को मिले।

द्वितीय कथा

इस कथा का सार यह है कि शाकप्रस्थपुर वेदधर्मा ब्राह्मण की विवाहिता पुत्री वीरवती ने करवा चौथ का व्रत किया था। नियमानुसार उसे चंद्रोदय के बाद भोजन करना था, परंतु उससे भूख नहीं सही गई और वह व्याकुल हो उठी। उसके भाइयों से अपनी बहन की व्याकुलता देखी नहीं गई और उन्होंने पीपल की आड़ में आतिशबाजी का सुंदर प्रकाश फैलाकर चंद्रोदय दिखा दिया और वीरवती को भोजन करा दिया।
परिणाम यह हुआ कि उसका पति तत्काल अदृश्य हो गया। अधीर वीरवती ने बारह महीने तक प्रत्येक चतुर्थी को व्रत रखा और करवा चौथ के दिन उसकी तपस्या से उसका पति पुनः प्राप्त हो गया।

तृतीय कथा

एक समय की बात है कि एक करवा नाम की पतिव्रता स्त्री अपने पति के साथ नदी के किनारे के गाँव में रहती थी। एक दिन उसका पति नदी में स्नान करने गया। स्नान करते समय वहाँ एक मगर ने उसका पैर पकड़ लिया। वह मनुष्य करवा-करवा कह के अपनी पत्नी को पुकारने लगा।
उसकी आवाज सुनकर उसकी पत्नी करवा भागी चली आई और आकर मगर को कच्चे धागे से बाँध दिया। मगर को बाँधकर यमराज के यहाँ पहुँची और यमराज से कहने लगी- हे भगवन! मगर ने मेरे पति का पैर पकड़ लिया है। उस मगर को पैर पकड़ने के अपराध में आप अपने बल से नरक में ले जाओ।
यमराज बोले- अभी मगर की आयु शेष है, अतः मैं उसे नहीं मार सकता। इस पर करवा बोली, अगर आप ऐसा नहीं करोगे तो मैं आप को श्राप देकर नष्ट कर दूँगी। सुनकर यमराज डर गए और उस पतिव्रता करवा के साथ आकर मगर को यमपुरी भेज दिया और करवा के पति को दीर्घायु दी। हे करवा माता! जैसे तुमने अपने पति की रक्षा की, वैसे सबके पतियों की रक्षा करना।

एक अन्य कथा

एक बार पांडु पुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी नामक पर्वत पर गए। इधर द्रोपदी बहुत परेशान थीं। उनकी कोई खबर न मिलने पर उन्होंने कृष्ण भगवान का ध्यान किया और अपनी चिंता व्यक्त की। कृष्ण भगवान ने कहा- बहना, इसी तरह का प्रश्न एक बार माता पार्वती ने शंकरजी से किया था। पूजन कर चंद्रमा को अर्घ्‍य देकर फिर भोजन ग्रहण किया जाता है। सोने, चाँदी या मिट्टी के करवे का आपस में आदान-प्रदान किया जाता है, जो आपसी प्रेम-भाव को बढ़ाता है। पूजन करने के बाद महिलाएँ अपने सास-ससुर एवं बड़ों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लेती हैं।

तब शंकरजी ने माता पार्वती को करवा चौथ का व्रत बतलाया। इस व्रत को करने से स्त्रियाँ अपने सुहाग की रक्षा हर आने वाले संकट से वैसे ही कर सकती हैं जैसे एक ब्राह्मण ने की थी। प्राचीनकाल में एक ब्राह्मण था। उसके चार लड़के एवं एक गुणवती लड़की थी।
एक बार लड़की मायके में थी, तब करवा चौथ का व्रत पड़ा। उसने व्रत को विधिपूर्वक किया। पूरे दिन निर्जला रही। कुछ खाया-पीया नहीं, पर उसके चारों भाई परेशान थे कि बहन को प्यास लगी होगी, भूख लगी होगी, पर बहन चंद्रोदय के बाद ही जल ग्रहण करेगी।
भाइयों से न रहा गया, उन्होंने शाम होते ही बहन को बनावटी चंद्रोदय दिखा दिया। एक भाई पीपल की पेड़ पर छलनी लेकर चढ़ गया और दीपक जलाकर छलनी से रोशनी उत्पन्न कर दी। तभी दूसरे भाई ने नीचे से बहन को आवाज दी- देखो बहन, चंद्रमा निकल आया है, पूजन कर भोजन ग्रहण करो। बहन ने भोजन ग्रहण किया।
भोजन ग्रहण करते ही उसके पति की मृत्यु हो गई। अब वह दुःखी हो विलाप करने लगी, तभी वहाँ से रानी इंद्राणी निकल रही थीं। उनसे उसका दुःख न देखा गया। ब्राह्मण कन्या ने उनके पैर पकड़ लिए और अपने दुःख का कारण पूछा, तब इंद्राणी ने बताया- तूने बिना चंद्र दर्शन किए करवा चौथ का व्रत तोड़ दिया इसलिए यह कष्ट मिला।
अब तू वर्ष भर की चौथ का व्रत नियमपूर्वक करना तो तेरा पति जीवित हो जाएगा। उसने इंद्राणी के कहे अनुसार चौथ व्रत किया तो पुनः सौभाग्यवती हो गई। इसलिए प्रत्येक स्त्री को अपने पति की दीर्घायु के लिए यह व्रत करना चाहिए। द्रोपदी ने यह व्रत किया और अर्जुन सकुशल मनोवांछित फल प्राप्त कर वापस लौट आए। तभी से हिन्दू महिलाएँ अपने अखंड सुहाग के लिए करवा चौथ व्रत करती हैं। (साभार : हिंदी विकिपीडिया )

>"Hindi bhasha google group" में चल रहे विवाद से सबक लेना चाहिए ब्लॉग जगत को

>

अंतरजाल पर आजकल विवादों का चलन बढ़ गया है . किसी भी बात को लेकर लोग टीका- टिप्पणी शुरू कर देते हैं फ़िर शुरू होता है आरोप -प्रत्यारोप का दौर . चिट्ठों पर तो दर्जनों पोस्ट व्यक्तिगत लड़ाई में लिखी जा रही है .और गौर करें तो अक्सर बहस हिन्दू -मुस्लिम की ओर , महिला-पुरुष , दलित-सवर्ण की ओर पहुँच जाती है भले ही मुद्दा कुछ भी हो .लेकिन कुछेक सार्थक बहस भी हो रही है  उदाहरण के लिए  ‘हिंदी भाषा’  पर चल रहे इस विवाद को हीं लीजिये :
                                                  एक सज्जन दिनेश सरोज ने शुभकामना क्या भेजी बबाल हो गया :
                                                       हर दुआ कुबूल हो आपकी,
हर तमन्ना साकार हो,
महफिलों सी रहे रोशन जिंदगी,
कभी न जीवन में वीरानी हो,
हमारे तरफ से आप सभी को
   “नवरात्र की ढेरों शुभकामनाएँ”/“ईद मुबारक हो!!”

                                                      शुभकामना सन्देश को पढ़कर मोहन भैया ने ये कहा :
नवरात्र  की शुभकामनाये  तो  ठीक   है   पर  दूसरी ….?  क्यों ? जबकि 15 अगस्त  और  26 जनवरी को  उनकी  भीड़
इतनी  नहीं  होती  जितना  वो  लोग  ताजमहल   और  रोड्स  पर  करते  है ,,,,? इसका  क्या  मतलब  हुआ   यह  समझ  के  बाहर  है ? साथ  ही  वे  लोग  हमारे  किसी  त्यौहार  की  शुभकामनायें  पब्लिकली  नहीं  देते ….? सोचिये …..वर्ना  जो  लोग  पोलियो  ड्रोप्स / परिवार  निओजन  / नागरिकता  के  बारे  में  घम्भीर  नहीं  है  और  दिन  दूनी  रत  चौगुनी  अपनी  संख्या  बढा  रहे  हैं  और  यही  रफ्तार  रही  तो  बहुत  जल्दी  वो  ही  दिखेंगे  भारत  में  हम  नहीं  रहेंगे ….जैसा  कुछ  दिन  पहले  इंडियन  मुजाहिद्दीन  ने  हमारे  न्यूज़  पपेर्स  में  विगय्प्ती  प्रकाशित  करवाई  की  5 साल  में   भारत  से  हिंदूं  का  नाम  निशान  मिटा  देंगे ..? कहाँ  है  हमारी  भारतीयता  की  भावना ….नागरिकता  की  भावना ..? या  गुलामी  और  मस्का परस्त  ही  हमारी  पहचान  बन  गई  है ….?
-एक   भारतीय  नागरिक .
मोहन भैया ने परिवार नियोजन की बात तो सही कही है लेकिन ईद की शुभकामना पर सवाल उठाना उचित नहीं लगता . हमें कोई काम नहीं पसंद तो ना करें पर दूसरों को रोक नहीं सकते . 
                                                              
                                                    आगे चलिए रजिया मिर्जा अपनी प्रतिक्रिया में कहती हैं :

बेशक़!! जो भारतीय अपने आपको हिन्दुस्तानी कहलाना मंज़ूर नहिं करते उन्हें भारत में रहना ही नही चाहिये। बताईये कौन सा मज़हब-धर्म  वतन से नफरत सिखाता है? मैं उसे धर्म- मज़हब नहिं क्हुंगी। हम सब भारतीय ही हैं। और रहेंगे। ईस देश को तोडनेवाली ताक़्तों से नफरत है मुझे। मेरा हिन्दुस्तान “महान” है। जहां मेरा जन्म हुआ वो भारत को मेरा सलाम है।

                                       बहुत हीं सही बात कही रजिया ने परन्तु क्या लोग ऐसा समझते हैं ? 

                                 बहस में एक और जनाब मंसूर अली पधारे और शुभकामना दे चलते बने :

नवरात्र की ढेरों शुभकामनाएँ…..तमाम  भारतवासियों  को  चाहे  वोह  किसी  भी  धर्म  अथवा  जाती  का  हो . धन्यवाद !

                                       चलो कुल मिलकर बहस सही दिशा में जाती दिख रही है .आपको क्या लगता है ?

                                     पुनः दिनेश जी, मोहन जी को संबोधित करते हुए आपने सधे शब्दों में बातें रखते हैं :

प्रिय मोहनजी,

आपकी वतनपरस्ती एवं उससे जुडी चिंता के लिये आपको सलाम!!!

आपकी चिंता एवं उसके उपलक्ष्य में आपने जो ताजमहल एवं सडकों पर भीड़ वाली बात कही है मैं भी उससे इत्तेफाक रखता हूँ| परन्तु १५ अगस्त एवं २६ जनवरी में इकठ्ठे भीड़ में से आप किसी हिन्दू, मुस्लिम या किसी ईसाई को पृथक कैसे कर पायेंगे? क्या ऐसा कोई चस्मा है? क्या कहीं भीड़ के आंकड़े निर्दिष्ट किये हुए है? या हम बस ऐसा मान लेते है और अपने मन में अवधारणा बना लेते है|

जब आप ताजमहल एवं सडकों पर भीड़ वाली बात करते हैं, तब शायद आप यह भूल जाते है या यूँ कहे की नजरअंदाज कर देते है की उससे कहीं कहीं ज्यादा भीड़ मुंबई एवं अन्य जगहों पर गणेश पंडालों में गणेश जी के दर्शन के लिए उमड़ती है तथा चतुर्दशी के दिन गणेश विसर्जन करने आये श्रध्हलुओं की होती है, जिसे संभालना प्रशासन के लोगों के लिए सिरदर्द बन जाता है| मुंबई के जन्माष्टमी को भी शायद आप भूल गए जिसमे इस बार swine flu के संक्रमण के भय के बावजूद भी भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी| एसे और भी कई उधाहरण मैं प्रस्तुत कर सकता हूँ जैसे कुम्भ का मेला ईत्यादी| क्या आपने कभी क्रिकेट मैच में जुटे भीड़ को उनके जाती-धर्म के आधार पर आंकने की कोशिश की है?

आज भारत देश एक धर्म निरपेक्ष देश के रूप में अपनी संप्रभुता बना चुका है…. और भारतीय संविधान ने सभी धर्मों को उनकी संप्रभुता और स्वतंत्रता बनाये रखने का पुर-पूरा अधिकार दिया है|
और इसपर न ही आप ना ही मैं और ना ही कोई और प्रश्न उठा सकता है|

और रही “इंडियन मुजाहिद्दीन” के ५ सालों में हिन्दुओं का नामों निशां मिटाने की तो उसके लिए आप निश्चिंत रहें…. ऐसी कोशिशे सदियों से होती आ रही हैं पर सदा ही नाकाम भी होती रही हैं!!! भारतीय संस्कृति इतनी उदार और परिपक्कव है की यह सभी को अपने में समाहित कर लेती है!!!

कोई भी जागरूक माता-पिता अपने बच्चों को पोलियो टिका से वांच्छित नहीं रखेंगे …. और यदि कोई रखता है तो मैं समझता हूँ वे नासमझ हैं, उन्हें जागरुक बनाने की जरुरत है| इसे धर्म-जाती के  आधार से देखना मुझे तर्क सांगत लगता है| और यदि कोई धार्मिक गुरु पोलियो टिका न देने की सलाह या फतवा देता है तो  मैं इसे धर्मान्धता और अज्ञानता ही कहूँगा|

परिवारनियोजन एक गंभीर मुद्दा है, जिस तरह जनसँख्या विस्फोट हो रहा है यह निकट भविष्य के लिए बहुत ही बड़ी समस्या बनता जा रहा है| पर मैं फिर कहना चाहूँगा इस विषय को भी एक रंग के चश्मे से न देखें| आपको केवल मुस्लिम परिवार ही नहीं अपितु हर धर्म के परिवार मिल जायेंगे जो बच्चों को ईश्वर का रूप कहते हैं और परिवार नियोजन के नाम से कन्नी काटते हैं| मैंने एक हिन्दू धर्मगुरु (किसी का नाम नहीं लेना चाहूँगा) के पुस्तक में उन्हें यह सन्देश देते पाया है की भारत देश में हिन्दुओं की संख्या बढाइये सरकार के परिवार नियोजन को तवज्जो न दें? इसके बारे में आप क्या कहेंगे??? मैं तो इसे धर्मान्धता ही कहूँगा फिर चाहे कोई भी धर्म गुरु ऐसा क्यों न कहे|

रही भारतीय नागरिकता की बात, तो भाईजी, तो जो मुस्लिम खुद को भारतीय या हिन्दुस्तानी कहलाना पसंद नहीं करते थे (या जैसी भी परिस्थिति रही हो) १९४७ में ही भारत छोड़ चले गए थे| और जो देश छोड़ कर नहीं गए यहीं रह गए आप उन्हें देशप्रेमी कहने के बजाय उन्हें एक विशेष रंग के चश्में से देख रहे हैं!!! यह कहाँ तक तर्कसंगत है??? आप यह भूल जाते हैं की मुस्लिमों के आलावा  कुछ गैर मुस्लिम (हिन्दू, सिख एवं अन्य) १९४७ में भारत नहीं आये थे और जहां थे वहीँ बसे रहे, उन्हें अपनी जन्मभूमि से प्रेम था चाहे अब वह अखंड भारत देश का हिस्सा न रहा हो| उनका मैं सम्मान करता हूँ| और जो मुस्लिम यहाँ रह गए हैं उनका भी सम्मान करता हूँ|

कृपया हमारे राजनीतिज्ञों एवं तथाकथित कट्टरपंथीयों की तरह अखंड भारत देश को जाती-धर्म के चश्में से मत देखें| कम से कम मैं इतना कह ही सकता हुं की मेरे जितने भी गैर हिन्दू मित्र या जानने वाले लोग हैं वे मुझे हर हिंन्दु धार्मिक त्योहारों की शुभकामना के साथ साथ स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस की बधाई देते है| और मैं इसी पर विश्वास करता हुं| और तो और कुछ तो मेरे साथ मंदिरों में आकर प्रार्थना करने में जरा भी संकोच नहीं करते| और मैं स्वयं भी दरगाहों, मजारों, गिरिजाघरों में उसी श्रध्दा से जाता हूँ जैसे की मंदिरों में|

मैं सर्वधर्म समभाव में यकीन रखता हूँ, और हर धर्म को सामान रूप से आदर भी देता हूँ| और मेरा सभी महानुभावों से निवेदन है की मानव धर्म को सभी जाती-धर्मों से सर्वोपरि समझे| वैस हर इंसान अपनी विचारधारा के लिए स्वतंत्र है| सुनी-सुनाई बातों में कितना सत्य है या कितनी छलावा यह मैं नहीं कह सकता| hindibhasha Group पर भी गैर हिन्दू मित्र हिन्दू त्योहर्रों की बधाई देते रहे हैं यह तो आपने भी देखा होगा|

अंत में मैं यह भी कहना चाहूँगा की बिना आग के धुआं नहीं निकलता, कुछ चंद मुठ्ठी भर एसे लोग भी यकीनन हैं जो भारत देश की संप्रभुता को क्षति पहुँचाने में जुटे हुए हैं और लगातार प्रयास करते रह रहे हैं, जिस कारण हमें अक्सर कई आतंकवादी हमलों एवं सांप्रदायिक तनाव का सामना करना पड जाता है| परन्तु किसी परिवार के रसोई घर के चूल्हे में लगी आग से निकले धुएँ को किसी आतंकी हमले में हुए विस्फोटों का धुंआ समझ लेना कितना तर्कसंगत है???

मैं किसी के भावना को आघात पहुँचाना नहीं चाहता, और यदि जाने अनजाने ऐसा कुछ हुआ हो तो क्षमा प्रार्थी हुं!!!

रहीमन धागा प्रेम का,मत तोड़ो चटाकाई|टूटे से फिर ना जुड़े,जुड़े गाँठ परि जाई|| जय हिंद !!!

फिलहाल तो यह बहस जारी है ……………………… . क्या ब्लॉगजगत को इस बहस से कुछ सीख लेने की जरुरत है ? सवाल पर जरा मंथन कीजियेगा . 
अरे , साहब मैं बेकार की नसीहत नहीं दे रहा हूँ . आपने अपने ब्लॉगजगत की बहस को देखा है तो समझते होंगे . यहाँ ऐसे-ऐसे सूरमा हैं कि बस पूछो मत ! एक जनाब हर जगह धमकी देते हैं “:- फुरसत में आउंगा तेरी तरफ, रोंद डालूंगा तब तक मुंह बंद करले और विचार कर ”  पर फुर्सत में कब आयेंगे पता नहीं ? पोस्ट कुछ भी बात वहीँ करेंगे जो उनको बकना है . एक दुसरे के नाम से पोस्ट लिख -लिख कर लोकप्रियता की उचाइयों को छूना चाहते हैं ! अब हिंदी चिट्ठों  का भगवान् ही मालिक है .

>"लव जिहाद" सांप्रदायिक भड़ास निकलने का जरिया ….. जरुर पढिये

>


अपने जीवन के 17 बसन्त देख चुकी श्रुति (काल्पनिक नाम) को यह नहीं मालूम था कि जो युवक विद्यालय जाते समय रास्ते में मिलता रहा और वे एक दूसरे के काफी नजदीक आ गये थे वह उससे प्रेम नहीं करता है बल्कि पूर्वांचल में चल रहे लव जिहाद का एक जेहादी है और वह उसे दलालों के जरियें खाडी देश के किसी शेख के हाथों बेच देगा। वह खुशकिश्मत थी कि बच गयी अन्यथा उसका भी वहीं हाल हुआ होता जो इस जेहाद की जद में फंस चुकी लड़कियों का हो रहा है।

आजमगढ़ जनपद के अहरौला कस्बे की रहने वाली श्रुति अग्रहरि पिछले एक माह से विद्यालय में पढ़ने जाती तो उसके पीछे एक युवक जो दिखने में स्मार्ट था वह लग जाता था। श्रुति और उसकी आंखे चार हो गयी। और वह उस युवक से प्रेम कर बैठी। वह युवक स्वंय को फूलपुर कस्बे के एक वैश्य परिवार का बताता था। बात शारीरिक सम्बन्धों तक नहीं पहुंची थी।इसी बीच 8 सितम्बर 2009 को श्रुति अचानक लापता हो गयी। परिजनों ने खोजबीन की इसी दौरान उन्हें सूचना मिली कि उनकी लड़की जौनपुर जनपद खुटहन के शाहगंज थानान्तगर्त अरन्द गांव के निवासी राशिद पुत्र जकरिया व अब्दुल पुत्र सन्तार जो शाहगंज के पक्का पोखरा के पास रहता है उन दोनों के साथ 8 सितम्बर को देखी गयी। इस बात की जानकारी जब परिजनों ने 9 सितम्बर को अहरौला थाने को दी तो थानाध्यक्ष ने कोई कार्यवाही नहीं की। इसके बाद परिजनों और अहरौला के कुछ लोग खुद अब्दुल के घर पहुंच गये और वहां से उसे पकड़कर लाये तथा अहरौला पुलिस को साँप दिया। 9 सितम्बर को जब ग्रामीणों ने आरोपी को खुद ही पुलिस को सौप दिया फिर भी पुलिस 24 घण्टे तक मूकदर्शक बनी रही। इसके बाद जब ग्रामीणों ने 10 सितम्बर को अहरौला थाने में तोड़ फोड़ शुरू कर दी तो पुलिस सक्रिय हुई और आरोपी पर थर्ड डिग्री का इस्तेमाल किया तो उसने जो रहस्योदघाटन किया उसके बाद तो पुलिस के पैरों तले से जमीन ही खिसक गयी पुलिस बैकफुट पर नजर आने लगी। उसने बताया कि युवती को उसने आजमगढ़ के फूलपुर कस्बे में रहने वाले बसपा नेता और पिछला विधानसभा चुनाव लड़ चुके इमरान खान उर्फ हिटलर के घर में रखा है। पुलिस इमरान खां उर्फ हिटलर के घर पर छापेमारी को लेकर मौन बनी रही। इसके बाद तों अहरौला के निवासियों और युवती के परिजनों ने ही सम्प्रदाय विशेष के प्रबल विरोध के बावजूद हिटलर के घर में घुसकर युवती को बरामद कर लिया और फूलपुर कोतवाली पर लाये। पुलिस सिर्फ तमाशबीन की भूमिका में रही। इसके बाद जब युवती ने बताया कि उसके साथ 10-12 की संख्या में अन्य युवतियां भी उस मकान में थी तो पुलिस को मानों सांप ही सूंघ गया। थाने से मात्र 200 मीटर की दूरी पर स्थित बसपा नेता के उस मकान पर छापेमारी करने में उसने 4 घंटे का समय लगा दिया। इसके बाद जब पुलिस छापेमारी करने पहुंुची तो उस मकान में आदमी तो क्या कोई परिन्दा भी नहीं मिला। इस घटना में राशिद भी पुलिस की गिरफ्त में आया लेकिन पुलिसिया पूछताछ में उसने क्या बताया यह बताने से पुलिस कतराती रही। 17 वर्षीय श्रुति को पुलिस फूलपुर कोतवाली ले गयी। और पहले तो वह उसके चरित्र हनन का प्रयास करती रही लेकिन जब वह अपनी बात पर अड़ी रही तो पुलिस ने मुकदमा दर्ज लिया और आगे की कार्यवाही कर रही है लेकिन वह भी घटना की तह में जाने से कतरा रही है। कारण यह है मामला काफी हाइप्रोफाइल नजर आ रहा है।

श्रुति बताती है कि 8 सितम्बर को जब वह स्कूल से आ रही थी तो उसी समय तीन की संख्या में लोगों ने उसके मुंह पर रूमाल रखकर उसे दबोच लिया। इसके बाद वह बेहोश हो गयी। जब वह होश में आयी तो देखा कि वह एक कमरे में है। उसके शरीर पर बुर्के जैसा वस्त्र है। उसके नाखून काट दिये गये है तथा गले की माला और हाथ का रक्षासूत्र भी काट लिया गया था। कुल मिलाकर उसकी पहचान समाप्त करने की कोशिश की गयी थी। उसके बाद 9 सितम्बर की दोपहर में फिर उसे बेहोश कर दिया गया। इसके बाद वह दूसरे स्थान पर थी। उसके पास खान नामक एक आदमी था जो मोबाइल पर बात कर रहा था कि लड़की को कहा पहुंचायें सर किस रास्ते व कैसे ले जाय इसके बाद पुन:उसे बेहोश कर दिया गया। जब उसे होश आया तो उसने अपने आपकों दूसरे कमरे में पाया जहां 10-12 की संख्या में और भी लड़कियां थी। होश आने के बाद उसे दुसरे कमरे में बन्द कर दिया गया जिसमें एक और महिला थी जिसे खान की बीबी कहा जा रहा था। 10 सितम्बर की सुबह फिर खान ने बात की। सर लड़की को क्या करें बात समाप्त होने के बाद खान की बीबी ने कहा कि मुंह धुल लों। इसके बाद उसने उसे जबरिया नकब पहनाना शुरू कर दिया। इसी बीच हंगामा हुआ और किसी ने दरवाजा खटखटाया फिर शोर हुआ तो मैने खान की बीबी का प्रतिरोध करके दरवाजा खोल दिया। इसके बाद मेरे परिजन मुझे वहां से निकालकर ले गये। इस बात की जानकारी होने के बाद पुलिस ने दुबारा वहां पर छापेमारी करने में 4घण्टे लगा दिये। तब तक वहां कोई नहीं था। प्यार की आड़ में चल रहे इस धंधे को ही लब जिहाद का नाम दिया गया है जिसमें सम्प्रदाय विशेष के युवक येन-केन-प्रकारेण हिन्दु युवतियों को अपने माया जाल में फंसाते है। और अपने बॉस को सौप देते है। बॉस उन युवतियों का क्या करता है यह तो मुख्य सरगना की गिरफ्तारी के बाद ही पता चलेगा। अभी तक पुलिस न तो मुख्य सरगना को गिरफ्तार कर सकी है और न ही इस प्रयास में ही दिखाई दे रहीं है ताकि लब जिहाद के मुख्य सरगना को दबोचा जा सके।

-डॉ। ईश्वरचंद्र त्रिपाठी (साभार :प्रवक्ता डौट कॉम )

लेखक ने अप्रत्यक्ष तौर पर किस ओर इशारा किया है यह कहने की जरुरत नहीं है । क्या एक संप्रदाय विशेष सचमुच ऐसा कर रहा है ? क्या कोई ऐसा कर रहा है तो इसके पीछे कौन सी सामाजिक परिस्थिति है ? क्या ऐसा नहीं कि दो बड़े समुदायों के मध्य फैली तरह-तरह की भ्रांतियां इसे बढावा दे रही है ? अक्सर मुसलमान युवकों के बीच इस बात की चर्चा होती है कि हिंदू लड़की के साथ सेक्स करने पर जन्नत हासिल होगी और हिंदू युवक कहते हैं एक मुस्लिम लड़की के साथ सेक्स करने पर सौ यज्ञों का पुन्य मिलेगा । क्या इन दुष्प्रचारों से तो ऐसा नहीं हो रहा ? समाज को अपनी सोच बदलनी होगी नही तो ये लव के नाम पर हो रहा जिहाद हमें ले डूबेगा ।



>पुनर्जन्म और मानव जीवन

>

पुनर्जन्म या REINCARNIATION एक ऐसा शब्द है जिससे लोग REBIRTH के नाम से जानते है हिन्दू धर्म के लोग पुनर्जन्म मतलब जनम,मृत्यु,और पुनः जनम के चक्र में विश्वास करते है अध्यात्मिक कानून के आधार पर पुनर्जन्म का तात्पर्य है” आत्माओ की पुर्नस्थापना” ,संस्कृत में पुनः शब्द का अर्थ होता है ‘अगला समय’ या ‘फिर से’ और जनम का अर्थ होता है जिंदगी इस तरह पुनर्जन्म का अर्थ हुआ अगली ज़िन्दगी या आने वाली ज़िन्दगी पुनर्जन्म में हमारे पुराने कर्मो का बड़ा महत्व है वेदों में कहा गया कि अध्यात्मिक कानून के अनुसार पिछले जन्मों के बुरे कर्म हमें अपने नए जनम में भोगने पड़ते है जैसे एक परिवार मे एक बच्चा जन्म लेता है और वह पूरी तरह से स्वस्थ भी है मगर उसी दम्पति की दूसरी संतान अपंग है या मानसिक रूप से ठीक नहीं है तो यह उसके पिछले जन्म के बुरे कर्मो के कारण है पुनर्जन्म के इस बात को लोगो ने स्वीकार किया है कि हमें अपने पिछले जन्म के पुरे कर्म का फल अपने अगले जन्म में मिलता है
भगवत गीता के अनुसार जिस तरह से एक मनुष्य पुराने कपड़े उतार कर नए कपड़े पहनता है ठीक हमारी आत्मा भी पुराने शरीर को छोड़ कर नया शरीर धारण करती है
स्वामी ज्योतिमयानान्दा ने संस्कृत में कर्म शब्द का अर्थ कार्य बताया है इनके अनुसार हमारे कार्य के भाव की छवि हमारे मस्तिस्क में दो प्रकार से रहती है
(१) पहले प्रकार में हमारे पिछले जन्म के कार्य की छवि के बारे मे हमारा मस्तिष्क बेहोश रहता है उससे कुछ भी याद नहीं रहता है
(२)और दूसरे प्रकार में हमारे कार्य यानि हमारे पिछले जनम की कहानी की हलकी हलकी सी छवि हमारे दिमाग के किसी कोने में संजोये रहती है
हमें कई ऐसे उद्धरण मिले है जहाँ लोगों ने अपने पुराने जन्म के बारे में बताया है मगर अधिकांश लोग मृत्यु के बाद जब नए योनी में प्रवेश करते है तो वो अपने पुराने जन्म के बारे में भूल जाते है
स्वामी ज्योतिमयानान्दा के अनुसार हमारे पीछे जन्म के कार्य बीज की तरह होती है अगर कार्य आछा हुआ तो हमें फल अच्छा मिलता है और अगर कार्य बुरा रहा तो फल भी बुरा मिलता है हमें पिछले जन्म की बातें तो याद नहीं होती मगर अपने उपस्थित जन्म में हम अच्छा कार्य करके अपने आने वाले जन्म को सुखमय बना सकते है
प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक पुर्नजन्म के बारे में कई मान्यताएं चलती आई है मगर ऐसे भी कुछ प्रमाण मिले है जिससे प्रमाणित होता है कि प्राचीन काल से ही लोग पुर्नजन्म की बातो पर विश्वास करते आये हैखासकर मिश्र के लोग जब किसी मृतक को दफनाते थे तो वे मृतक की शव के साथ उसकी पसंदीदा चीजे और ज़रूरी सामान दफना देते थे ताकि अगले जन्म में ये चीजे उनके काम आये
स्वामी विवेकानंद का कहना था की ”हमारे अन्दर वो शक्ति है की हम कुछ भी कर सकते है बस हमें उस शक्ति को पहचानने की ज़रूरत है हम क्या है या क्या करना चाहते है ये सब हम अपने अन्दर पा सकते है कहने का तात्पर्य ये है कि अपने अन्दर की शक्ति को जान कर अपने पिछले कार्यो को समझ सके और अपने वर्त्तमान और भविष्य की ज़िन्दगी मे सामंजस्य स्थापित कर सके
बुद्ध धर्म के के अनुयायी भी पुर्नजन्म पर विश्वास करते है ” THE TIBETIAN BOOK OF DEAD ” में हमें वर्णन मिलता है की १ आत्मा १ शरीर को छोड़ कर दूसरे शरीर में प्रवेश करती है
हिन्दू धर्म के अनुसार उस दिन पुर्नजन्म का चक्र समाप्त हो जायेगा जिस दिन हम इंसान कर्म करना छोड़ । जब हमारे बुरे या अच्छे कर्म ही नहीं होगे तो पुर्नजन्म भी नही होगा । वेदों के जानकर विद्वानों का मानना है कि पुर्नजन्म की पहली सीढ़ी कर्म है
फिर भी पुर्नजन्म के के पन्ने खुलने के बाद भी हमारे समाज में यह विषय एक गुत्थी की तरह है लोग तो अभी भी पुर्नजन्म की बातो पर विश्वास नही करते मगर वेदों में पुर्नजन्म को माना गया है। वेदों के अनुसार पुर्नजन्म में कर्म को प्राथमिकता दी गई है । कहने का सार यह है कि अपने लिए हीं सही अच्छे कर्मों को जीवन में प्राथमिक दर्जा दिया जाना चाहिए ।

>जीने का फंडा और अध्यात्म

>

जिंदगी है तो समस्याएं बनी रहेगी । समस्याएं हमेशा के लिए समाप्त हो जाएं, इसमें पूरी ताकत झोंकने से अच्छा है कि समाधान की कला सीखने में ऊर्जा लगाई जाए। समाधान का ही एक नाम है उपाय। आपको सांसारिक समस्याएं निपटानी हो या आध्यात्मिक, उपाय की आवश्यकता जरूर पड़ेगी। सबके अपने-अपने इलाज हैं , तरकीब और तरीके हैं। स्कंद पुराण के अवंति खंड में चलते हैं। यहां श्रीसत्यनारायणव्रतकथा का वर्णन है। इसमें आरंभ में ही विष्णुजी और नारद का एक वार्तालाप आया है।
केनोपायेन चैतेषां दु:खनाशो भवेद् ध्रुवम् यानी किस उपाय से इनके दुखों का नाश हो सकता है। इसी उपाय को आजकल की भाषा में फंडा बोलते हैं। आज हर स्तर पर उपाय की आवश्यकता है। अर्जुन का उपाय श्रीकृष्ण थे, सुग्रीव का उपाय श्रीहनुमान रहे। बहुत छोटे-छोटे आध्यात्मिक उपाय बड़े-बड़े परिणाम दे देते हैं।
जब हम अशांत होते हैं तो शांति अपने आसपास या दूसरों से प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। दूसरों पर मत टिकें, खुद पर रुकें। दूसरों में प्रवेश से अच्छा होगा, खुद के भीतर गहरे उतर जाएं। बहुत सूक्ष्म में जाने पर पाते हैं कि हमारी अशांति का कारण हम ही हैं।
इसलिए अशांति के दौर में अपना ही अवलोकन करें। अपने ही पर्यवेक्षक बन जाएं। अपने प्रति एक अनुसंधान की दृष्टि और वृत्ति रखें। यह छोटा सा उपाय स्वयं के प्रति तटस्थ दर्शन और दुनिया के प्रति तटस्थ भाव होगा। यहीं से आप कर्ता की जगह दृष्टा बन जाएंगे और यह उपाय शतप्रतिशत शांति दे जाएगा।
shivendu rai (rai sahab)

>कंधमाल दंगे, धर्म-परिवर्तन और गाँधी जी

>

आज सुबह -सुबह जनसत्ता की सुर्खी पढ़ी – ” कंधमाल दंगों का बड़ा कारण था धर्म परिवर्तन -आयोग ” । ओडिसा दंगों की असलियत को मुख्यधारा की मीडिया ने छुपाया । तथाकथित सेकुलर लोगों ने इसे संघ की साजिश करार देने में कोई कसर नही छोड़ी । परन्तु स्थानीय परिस्थितियों को हमेशा नजर अंदाज किया गया । आज आयोग की रपट पढ़ी तो देखा उन्ही मुद्दों को दंगों की मुख्य वजह बताई गई है । किसी भी दंगे की पृष्ठभूमि में लंबे समय से चल रही किसी बात का होना जरुरी होता है । हाँ , दंगे भड़कते हैं तात्कालिक वजहों से । ओडिसा समेत देश के विभिन्न भागों में धर्म परिवर्तन के कारण हिंसा की घटनाये आम हैं । ये बात भी सच है कि इसमे राजनीति भी की जाती रहा है । लेकिन दंगे केवल भड़काने से नही होते । आख़िर वो कौन सी मानसिकता है जो दंगों को जन्म देती है दो समुदायों में नफरत बढाती है । इसी सिलसिले में गाँधी जी जो अपनी धर्मनिरपेक्षता के लिए जाने जाते हैं उनका एक उद्धरण देखिये :-

” मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि यधपि आजकल ईसाई मित्र अपने मुंह से तो ऐसा नही कहते कि हिंदू – धर्म झूठा धर्म है , तो भी उनके दिल में अब भी यही भाव जड़ जमाये हुए है कि हिंदू धर्म सच्चा नही है और इसाई -धर्म ही – जैसा उन्होंने समझ रखा है – एक मात्र सच्चा धर्म है । उनकी यह मनोवृति उन उद्धरणों से प्रकट होती है जो मैंने कुछ समय पूर्व सी ० एम० एस ० की अपील में से ‘हरिजन’ में प्रकाशित किए थे । हिंदू समाज में घुसी हुई छुआछुत या ऐसी ही अन्य भूलों पर कोई प्रहार करे तो बात समझ में आ सकता है । अगर इन मानी हुई बुराइयों को दूर करने में और हमारे धर्म कि शुद्धि में हमारी सहायता करें तो यह एक रचनात्मक प्रयास होगा और उसे हम कृतज्ञता पूर्वक स्वीकार भी करेंगे । पर आज जो प्रयास हो रहा है उससे तो यही दिखाई पड़ता है कि यह तो हिंदू धर्म को जड़-मूल से उखाड़ फेंकने और उसके स्थान पर दूसरा धर्म कायम करने की तैयारी है । यह तो ऐसी बात है मानो किसी पुराने मकान को , जिसमे मरम्मत की बड़ी जरुरत हो , पर जो रहने को अच्छा और काम देने लायक प्रतीत होता हो , कोई जमीं में मिला देना चाहे । अगर कोई गृह स्वामी को जाकर बताये कि उसमे क्या -क्या सुधार और मरम्मत होना चाहिए , तो इसमें संदेह नही कि वह उनका स्वागत करेगा । पर अगर कोई उस मकान को ही गिराने लगे जिसमें उसके पूर्वज सदियों से रहते आए हो , तो वह जरुर उसका प्रतिकार करेगा ।

(१३। ०३। १९३७ , पृष्ठ १८५-४८६ , खंड -६४ , गाँधी वांग्मय )

गाँधी जी ने धार्मिक प्रतिस्पर्धा को चिन्हित किया है कि किस तरह से तब हिंदू -धर्म को झूठा बता कर आनी धर्मों को स्थापित किया जारहा था । आज भी स्थितियां वही हैं । तो ऐसी परिस्थिति में प्रतिकार की बात कही है । गाँधी जी अहिंसात्मक प्रतिकार की बात करते हैं पर प्रतिकार तो करना है । लेकिन जब लोगों को कोई रास्ता नही मिलता तब हिंसा ही एक मात्र सहारा बनती है । पर ये बात अनेक तथाकथित परगतिशील बुद्धिजीवियों को समझ में नही आएगी भले हीं वो नक्सली हिंसा को सही ठहराते हों ।

>हमारी अस्मिता और हम हिन्दू –?

>देखिये जब विदेश में गुरुद्वारों पर या सिखों पर हमला होता है तो भारत सहित विश्व भर के सिख सडकों पर उतर आते हैं ,भारत में दंगे होजाते हैं ; मुस्लिमो पर कहीं भी कुछ होने पर दुनिया के मुस्लिम एक होकर सड़क पर उतर आते हैं , कहीं ईसाइयों के विरुद्ध कुछ कहा जाता है तो धर्म निरपेक्षिता का डंका पीता जाता है और सारा पश्चिम एक हो जाता है ;;परन्तु हिन्दुओं पर देश या विदेश में कहीं भी कुछ होता रहे ,कहीं कुछ नहीं होता , हम ,हमारी सरकार सेक्युलर जो हें न ?
हिन्दू होना ,कहलाना ,हिंदुत्व की बात करना ,उनकी अस्मिता की बात करना तो साम्प्रदायिकता है न , सेकुलर राज्य में हिन्दुस्तानियों , हिन्दुओ कब तक टुकडों में बनते रहोगे ,कुछ सीखो ओरों से ही।