>गीत: कौन हो तुम? —- संजीव ‘सलिल’

>गीत:                                                                                                                       
कौन हो तुम?
संजीव ‘सलिल’
*
कौन हो तुम?                
                   मौन हो तुम?…
*
समय के अश्वों की वल्गा
निरंतर थामे हुए हो.
किसी को अपना किया ना
किसी के नामे हुए हो.

अनवरत दौड़ा रहे रथ दिशा,
गति, मंजिल कहाँ है?
डूबते ना तैरते,
मझधार या साहिल कहाँ है?

क्यों कभी रुकते नहीं हो?
क्यों कभी झुकते नहीं हो?
क्यों कभी चुकते नहीं हो?
क्यों कभी थकते नहीं हो?

लुभाते मुझको बहुत हो            
जहाँ भी हो जौन हो तुम.
कौन हो तुम?                
                   मौन हो तुम?…
*
पूछता है प्रश्न नाहक,
उत्तरों का जगत चाहक.
कौन है वाहन सुखों का?
कौन दुःख का कहाँ वाहक?

करो कलकल पर न किलकिल.
ढलो पल-पल विहँस तिल-तिल.
साँझ को झुरमुट से झिलमिल.
झाँक आँकों नेह हिलमिल.

क्यों कभी जलते नहीं हो?
क्यों कभी ढलते नहीं हो?
क्यों कभी खिलते नहीं हो?
क्यों कभी फलते नहीं हो?

छकाते हो बहुत मुझको          
लुभाते भी तौन हो तुम.
कौन हो तुम?                
                   मौन हो तुम?…
*
*********************

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>मुक्तिका: फिर ज़मीं पर….. संजीव ‘सलिल’

>मुक्तिका:

फिर ज़मीं पर…..

संजीव ‘सलिल’
*
फिर ज़मीं पर कहीं काफ़िर कहीं क़ादिर क्यों है?
फिर ज़मीं पर कहीं नाफ़िर कहीं नादिर क्यों है?
*
फिर ज़मीं पर कहीं बे-घर कहीं बा-घर क्यों है?
फिर ज़मीं पर कहीं नासिख कहीं नाशिर क्यों है?
*
चाहते हम भी तुम्हें चाहते हो तुम भी हमें.
फिर ज़मीं पर कहीं नाज़िल कहीं नाज़िर क्यों है?
*
कौन किसका है सगा और किसे गैर कहें?
फिर ज़मीं पर कहीं ताइर कहीं ताहिर क्यों है?
*
धूप है, छाँव है, सुख-दुःख है सभी का यक सा.
फिर ज़मीं पर कहीं तालिब कहीं ताजिर क्यों है?
*
ज़र्रे -ज़र्रे में बसा वो न ‘सलिल’ दिखता है.
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं  मंदिर क्यों है?
*
पानी जन आँख में बाकी न ‘सलिल’ सूख गया.
फिर ज़मीं पर कहीं सलिला कहीं सागर क्यों है?
*
— दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

कुछ शब्दों के अर्थ : काफ़िर = नास्तिक, धर्मद्वेषी, क़ादिर = समर्थ, ईश्वर, नाफ़िर = घृणा करनेवाला, नादिर = श्रेष्ठ, अद्भुत, बे-घर = आवासहीन, बा-घर = घर वाला, जिसके पास घर हो, नासिख = लिखनेवाला,  नाशिर = प्रकाशित करनेवाला, नाज़िल = मुसीबत, नाज़िर = देखनेवाला, ताइर = उड़नेवाला, पक्षी, ताहिर = पवित्र, यक सा = एक जैसा, तालिब =  इच्छुक, ताजिर = व्यापारी, ज़र्रे – तिनके, सलिला = नदी, बहता पानी,  सागर = समुद्र, ठहरा पानी.

>मुक्तिका : सत्य संजीव ‘सलिल’

>मुक्तिका

सत्य                                                                                                                   

संजीव ‘सलिल’
*
सत्य- कहता नहीं, सत्य- सुनता नहीं?
सरफिरा है मनुज, सत्य- गुनता नहीं..
*
ज़िंदगी में तुम्हारी कमी रह गयी.
सिर्फ कहता रहा, सत्य- चुनता नहीं..
*
आह पर वाह की, किन्तु करता नहीं.
दाना नादान है, सत्य- धुनता नहीं..
*
चरखा-कोशिश परिश्रम रुई साथ ले-
कातता है समय, सत्य- बुनता नहीं..
*
नष्ट पल में हुआ, भ्रष्ट भी कर गया.
कष्ट देता असत, सत्य- घुनता नहीं..
*
प्यास हर आस दे, त्रास सहकर उड़े.
वाष्प बनता ‘सलिल’, सत्य- भुनता नहीं..
*

>स्वाधीनता दिवस पर विशेष रचना: गीत भारत माँ को नमन करें…. संजीव ‘सलिल’

>स्वाधीनता दिवस पर विशेष रचना:

गीत

भारत माँ को नमन करें….

संजीव ‘सलिल’
*

*
आओ, हम सब एक साथ मिल
भारत माँ को नमन करें.
ध्वजा तिरंगी मिल फहराएँ
इस धरती को चमन करें…..
*
नेह नर्मदा अवगाहन कर
राष्ट्र-देव का आवाहन कर
बलिदानी फागुन पावन कर
अरमानी सावन भावन कर

 राग-द्वेष को दूर हटायें
एक-नेक बन, अमन करें.
आओ, हम सब एक साथ मिल
भारत माँ को नमन करें……
*
अंतर में अब रहे न अंतर
एक्य कथा लिख दे मन्वन्तर
श्रम-ताबीज़, लगन का मन्तर
भेद मिटाने मारें मंतर

सद्भावों की करें साधना
सारे जग को स्वजन करें.
आओ, हम सब एक साथ मिल
भारत माँ को नमन करें……
*
काम करें निष्काम भाव से
श्रृद्धा-निष्ठा, प्रेम-चाव से
रुके न पग अवसर अभाव से
बैर-द्वेष तज दें स्वभाव से

‘जन-गण-मन’ गा नभ गुंजा दें
निर्मल पर्यावरण करें.
आओ, हम सब एक साथ मिल
भारत माँ को नमन करें……
*
जल-रक्षण कर पुण्य कमायें
पौध लगायें, वृक्ष बचायें
नदियाँ-झरने गान सुनायें
पंछी कलरव कर इठलायें

भवन-सेतु-पथ सुदृढ़ बनाकर
सबसे आगे वतन करें.
आओ, हम सब एक साथ मिल
भारत माँ को नमन करें……
*
शेष न अपना काम रखेंगे
साध्य न केवल दाम रखेंगे
मन-मन्दिर निष्काम रखेंगे
अपना नाम अनाम रखेंगे

सुख हो भू पर अधिक स्वर्ग से
‘सलिल’ समर्पित जतन करें.
आओ, हम सब एक साथ मिल
भारत माँ को नमन करें……
*******

Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

>दोहा सलिला: संजीव ‘सलिल’

>दोहा सलिला:

संजीव ‘सलिल’
*
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*
कौन कहानीकार है?, किसके हैं संवाद?
बोल रहे सब यंत्रवत, कौन सुने  फरियाद??
*
आर्थिक मंदी छा गयी, मचा हुआ कुहराम.
अच्छे- अच्छे फिसलते, कोई न पाता थाम..
*
किसका कितना दोष है?, कहो कौन निर्दोष?
विधना जाने कब करे, सर्व नाश का घोष??
*
हवामहल पल में उड़ा, वासी हुए निराश.
बिन नींव की व्यवस्था, हाय हो गयी ताश..
*
कठपुतलीवत नचाता, थाम श्वास की डोर.
देख न पाते हम झलक, चाहें करुणा-कोर..
*
भ्रम होता हम कर रहे, करा रहा वह काज.
लेते उसका श्रेय खुद, किन्तु न आती लाज..
*
सुविधा पाने जो गए, तजकर अपना देश.
फिर-फिर आते पलटकर, मन में व्यथा अशेष..
*
नगदी के नौ लीजिये, तेरह नहीं उधार.
अब तो छलिये! बंद कर, सपनों का व्यापार..
*
चमक-दमक औ’ सादगी, वह सोना यह धूल.
 वह पावन शतदल कमल, यह बबूल का शूल..
*
पेड़ टूटते, दूब झुक, सह लेती तूफ़ान.
जो माटी से जुड़ रहे, ‘सलिल’ वही मतिमान..
*
पल में पैरों-तले से, सरकी ‘सलिल’ ज़मीन.
तीसमारखाँ काल के, हाथ हो गए दीन..
*
थाम-थमाये विपद में, बिना स्वार्थ निज हाथ.
‘सलिल’ हृदय में लो बसा, नमन करो नत माथ..
*
दानव वे जो जोड़ते, औरों का हक छीन.
ऐश्वर्य जितना बढ़ा, वे उतने ही दीन..
*
भूमि, भवन, धन जोड़कर, हैं दरिद्र वे लोग.
‘सलिल’ न जो कर पा रहे, जी भरकर उपयोग..
*
जो पाया उससे नहीं, ‘सलिल’ जिन्हें संतोष.
वे सचमुच कंगाल हैं, गर्दभ ढोते कोष.
*
बात-बात में कर रहे, नाहक वाद-विवाद.
‘सलिल’ सहज हो कर करें, कुछ सार्थक संवाद..
*

>दो लघुकथाएं: गाँधी और गाँधीवाद, निपूती भली थी -आचार्य संजीव ‘सलिल’ की

>

आचार्य संजीव ‘सलिल’ की दो लघुकथाएं

१. गाँधी और गाँधीवाद
* बापू आम आदमी के प्रतिनिधि थे. जब तक हर भारतीय को कपड़ा न मिले, तब तक कपड़े न पहनने का संकल्प उनकी महानता का जीवत उदाहरण है. वे हमारे प्रेरणास्रोत हैं’ -नेताजी भाषण फटकारकर मंच से उतरकर अपनी मंहगी आयातित कार में बैठने लगे तो पत्रकारों ने उनसे कथनी-करनी में अन्तर का कारण पूछा.

नेताजी बोले– ‘बापू पराधीन भारत के नेता थे. उनका अधनंगापन पराये शासन में देश की दुर्दशा दर्शाता था, हम स्वतंत्र भारत के नेता हैं. अपने देश के जीवनस्तर की समृद्धि तथा सरकार की सफलता दिखाने के लिए हमें यह ऐश्वर्य भरा जीवन जीना होता है. हमारी कोशिश तो यह है की हर जनप्रतिनिधि को अधिक से अधिक सुविधाएं दी जायें.’

‘ चाहे जन प्रतिनिधियों की सुविधाएं जुटाने में देश के जनगण क दीवाला निकल जाए. अभावों की आग में देश का जन सामान्य जलाता रहे मगर नेता नीरो की तरह बांसुरी बजाते ही रहेंगे- वह भी गाँधी जैसे आदर्श नेता की आड़ में.’ – एक युवा पत्रकार बोल पड़ा.

अगले दिन से उसे सरकारी विज्ञापन मिलना बंद हो गया.

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२. निपूती भली थी 
 *
बापू के निर्वाण दिवस पर देश के नेताओं, चमचों एवं अधिकारियों ने उनके आदर्शों का अनुकरण करने की शपथ ली. अख़बारों और दूरदर्शनी चैनलों ने इसे प्रमुखता से प्रचारित किया.

अगले दिन एक तिहाई अर्थात नेताओं और चमचों ने अपनी आंखों पर हाथ रख कर कर्तव्य की इति श्री कर ली. उसके बाद दूसरे तिहाई अर्थात अधिकारियों ने कानों पर हाथ रख लिए, तीसरे दिन शेष तिहाई अर्थात पत्रकारों ने मुंह पर हाथ रखे तो भारत माता प्रसन्न हुई कि देर से ही सही इन्हे सदबुद्धि तो आयी.

उत्सुकतावश भारत माता ने नेताओं के नयनों पर से हाथ हटाया तो देखा वे आँखें मूंदे जनगण के दुःख-दर्दों से दूर सत्ता और सम्पत्ति जुटाने में लीन थे.

दुखी होकर भारत माता ने दूसरे बेटे अर्थात अधिकारियों के कानों पर रखे हाथों को हटाया तो देखा वे आम आदमी की पीड़ाओं की अनसुनी कर पद के मद में मनमानी कर रहे थे. नाराज भारत माता ने तीसरे पुत्र अर्थात पत्रकारों के मुंह पर रखे हाथ हटाये तो देखा नेताओं और अधिकारियों से मिले विज्ञापनों से उसका मुंह बंद था और वह दोनों की मिथ्या महिमा गा कर ख़ुद को धन्य मान रहा था.

अपनी सामान्य संतानों के प्रति तीनों की लापरवाही से क्षुब्ध भारत माता के मुँह से निकला- ‘ऐसे पूतों से तो मैं निपूती ही भली थी.

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>मुक्तिका: जब दिल में अँधेरा हो… संजीव ‘सलिल’

>मुक्तिका:

जब दिल में अँधेरा हो…

संजीव  ‘सलिल’
*

*

जब दिल में अँधेरा हो, क्या होगा मशालों से
मिलते हों गले काँटे, जब पाँव के छालों से?

चाबी की करे चिंता, कोई क्यों बताओ तो?
हों हाथ मिलाये जब, चोरों ने ही तालों से..

कुर्सी पे मैं बैठूँगा, बीबी को बिठाऊँगा.
फिर राज चलाऊँगा, साली से औ’ सालों से..
 
इतिहास भी लिक्खेगा, ‘मुझसा नहीं दूजा है,
है काबलियत मेरी, घपलों में-घुटालों में..

सडकों पे तुम्हें गड्ढे, दिखते तो दोष किसका?
चिकनी मुझे लगती हैं, हेमा जी के गालों से..

नंगों की तुम्हें चिंता, मुझको है फ़िक्र खुद की.
लज्जा को ढाँक दूँगा, बातों के दुशालों से..

क्यों तुमको खलिश होती, है कल की कहो चिंता.
सौदा है ‘सलिल’ का जब सूरज से उजालों से..

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>भारतीय सीमा पर चीन की घुसपैठ : एक विमर्श..!

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देशों के पारस्परिक  सम्बन्धव्यक्तियों के पारस्परिक सम्बन्धों से बहुत भिन्न नही होते. जवाबदेही का अंतर होता है. प्राथमिक उद्देश्य अवसर की निरंतरता व सुरक्षा ही होती है. मिले अवसरों का युक्तिसंगत प्रयोग देश की घरेलू मशीनरी की जिम्मेदारी होती है और सुरक्षा की जिम्मेदारी पारस्परिक व सामूहिक होती है. अभी चीन से लगे सीमाओं पर जो उपद्रव व शोर हो रहा हैएक विचारणीय मसला है. कुछ जरूरी  सवाल हैचीन ऐसा क्यों कर रहा है..क्या सीमाओं पर ऐसी घटनाएँ स्वाभाविक  है या इनका कोई निहितार्थ भी है..क्या ऐसी घटनाएँ पहली बार हैं…भारत सरकार ने ऐसी घटनाओ से निपटने के लिए क्या कोई कारगर रणनीति बनाई है..क्या चीन आधिकारिक रूप से इन घटनाओं की पुष्टि करता है..भारत सरकार के पास कितने संभव विकल्प है इन स्थितियों में…आदि-आदि..
इधर कुछ महीनों से माउन्ट गया के पास चुमार सेक्टर लद्दाख के पास चीनी आवा-जाही बढ़ी है. यह इलाका बर्फ की खूबसूरत राजकुमारी‘ के नाम से आम जनमानस में प्रसिद्द है. करीब १.५ किलोमीटर तक घुसपैठ की जानकारी देश के प्रमुख अखबार बता रहे हैं. चीनी मिलिटरी के जवानपत्थरों पर लाल रंग से चीन लिख रहे है और यह यहाँ आसानी से देखा जा सकता है. स्थानीय लोगों से चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि जल्द ही यह हिस्सा हमारे कब्जे में होगा. सीमा की आबादी बहुत ही संवेदनशील होती है. जितने ही यह देश की मुख्य-धारा से कटे होते है,सीमा सुरक्षा की स्थिति उतनी ही अविश्वश्नीय हो जाती है. 
३१ जुलाई २००९ को पहली बार भारतीय गश्ती दल ने इस आवा-जाही को देखा. हलाकि सेना के प्रमुख जनरल दीपक कपूर ने इसे महज तब दिशा-भ्रम‘ बताया. इससे पहले इसी साल में २१ जून को भी ऐसी ही आपत्तिजनक गतिविधि देखी गयी थी  जब हवाई जहाजों से कुछ खाद्यसामग्री के थैले गिराए गए थे. एक खास बात यह है कि इससे पहले ऐसे उपद्रव अरुणांचल प्रदेश की सीमाओं पर तो आम रहे हैं पर लद्दाखसिक्किम जैसे क्षेत्र LAC के शांतिपूर्ण क्षेत्र माने जाते रहे है.
भारत के कूटनीतिक हलकों में एक अजीब सी चुप्पी मची रही फिर विदेश मंत्री एस.एम्. कृष्णा ने बयान दिया के भारत-चीन सीमा तो देश की अन्य सीमाओं की तुलना में शांतिपूर्ण है और इसतरह की घटनाओं को ‘ इनबिल्ट-मैकेनिस्म‘ से सुलझा लिया जायेगा. यह इनबिल्ट-मैकेनिज्म‘ दरअसल दोनों देशों के जवानों के बीच होने वाली मुलाकातों को कहते है जो एक निश्चित समयांतराल पर होती है और जिसमे बात-चीत के द्वारा चीजें सुलझाने की कवायद होती है. इसे फ्लैग-मीटिंग्स‘ भी कहते हैं. यह मैकेनिज्म १९९३ से एक समझौते के बाद से अपनाई जाती है.
स्थानीय लोगो की माने तो यह घटनाएँ बिलकुल ही नयी नहीं हैंवर्षों से छिट-पुट चली आ रही हैं. चीन ने इस तरह की किसी भी घटना से इंकार किया है. उनकी सुने तो वो भी नहीं समझ पा रहे है कि भारत में ऐसी चर्चा क्यों चल रही है.अभी हाल ही में चीन की  एक सामरिक पत्रिका में एक रिपोर्ट छपी थी जिसमे भारत को खंड-खंड तोड़ देने का सबसे सही समय आ गया है-ऐसा लिखा गया था. इस रिपोर्ट पर चीनी सरकार ने कोई सफाई नहीं दी वरन भारतीय विदेश मंत्रालय को ही एक बयान जारी करना पड़ा कि उक्त रिपोर्ट में कहे गए विचारलेखक की निजी राय थी और चीन के किसी अधिकारिक बयान से इसकी पुष्टि नहीं होती है. 
इसमे कहीं दो राय नहीं है कि ऐसी घटनाएँ हुई हैहोती रहीं हैं और यह भी कि ऐसे उपद्रव स्वाभाविक नहीं कहे जा सकते. चीन की मंशा समझना कठिन नहीं हैजबकि उसने अन्य देशों से अपनी सीमा-विवाद, साठ के दशक से विश्व को यह दिखाने के लिए कि  चीन एक जिम्मेदार राष्ट्र हैसुलझाना शुरू कर दिया था. पाकिस्तान.म्यांमार और अफगानिस्तान से उसने सारे सीमा-विवाद सुलझा लिए हैं. द. एशिया में बस भारत और भूटान ही है जिनसे यह गांठ उलझी हुई है. और यह उलझाव जानबूझकर है और दबाव की रणनीति का एक हिस्सा है. 
आज की वैश्विक राजनीति में शक्ति‘ की अपेक्षा प्रभाव‘ की रणनीति प्रचलन में है. इस नीति मेंअंतिम विकल्पशक्ति-संघर्ष‘ को छोड़कर शेष समस्त विकल्प खुले रखे जाते हैं. हर युग में राष्ट्र-हित‘ की परिभाषा में थोड़ा फेर-बदल होता रहता है. कभी राष्ट्र के लिए धर्म-विस्तार‘ की नीति थीकभी कॉलोनियां बनाने पर जोर थातो  कभीराष्ट्र-विस्तार‘ की नीति. ज्यादातर समयों में व्यापार-विस्तार की प्राथमिकता थी. इस भूमंडलीकरण के दौर में वास्तव में शक्ति का सूत्र – आर्थिक संपन्नता का होना हैजो विश्व-व्यापार में अपनी भागेदारी के प्रतिशत से परिलक्षित होती है. बिना किसी संदेह के चीनविश्व की एक प्रमुख अर्थ-शक्ति है. इस अर्थ-शक्ति को सर्वकालिक बनाने के लिए जरूरी है कि इसकी सतत सुरक्षा हो और इसमे सतत बढोत्तरी भी. अर्थ-क्षेत्र में किसी नए प्रतिद्वंदी का प्रभावी होना निश्चित ही चीन के लिए वांछित नहीं है. वैसे भारत कहीं से भी अर्थ-क्षेत्र में चीन को टक्कर देने की अभी सोच भी नहीं सकता पर अगले दशक तक स्थितियां बदल भी सकती हैं. चीन कोई भी जोखिम नहीं ले सकता यदि उसे दुनिया की निर्विवाद हस्ती बने रहना है…वो भी आस-पड़ोस से. भारत की बढ़ती साख से खतरा है चीन को. भारत के पास एक प्रकार की विश्वशनीयता है जिसमे  चीन गंभीर रूप से संघर्ष करता प्रतीत होता है. यह साखभविष्य के लिए मजबूत संभावनाएं जगाता है. और फिर भारत अभी भी अमेरिका के बाद दूसरे नम्बर की मृदुल शक्ति(soft power) है. मृदुल शक्ति से तात्पर्य यह है कि भारत अपने सांस्कृतिक श्रेष्ठता का लोहा मनवा चुका है. भारत की फिल्मेंखाद्य-सामग्रियां व विविध विधियांसाहित्य की उपलब्धियांयोगा वेश-भूषा आदि-आदि. तो चीन चाहता है की इस  साख  पे बट्टा लगे.
एक और बात बेहद महत्वपूर्ण है कि शीत युद्ध के बाद दुनिया ने कुछ निर्णायक बदलाव देखे हैंइनकी अनदेखी नहीं की जा सकती. दुनिया अब केवल तीन वर्गोंपूंजीवादीसाम्यवादी और गुटनिरपेक्ष  में नहीं बटी है. अपितु अब कुछ क्षेत्रों(regions) यथा- द. एशियामध्य-पूर्व एशियाअमेरिकायूरोपियन यूनियन आदि में विभाजित हो गयी है. यदि महाशक्ति बने रहना है तो अपनी सशक्त भागेदारी व उपस्थिति हर क्षेत्र-विशेष में रखनी है. द.एशिया इसका अपवाद बिलकुल नहीं है. जैसा मैंने कहा यह प्रभाव-राजनीति‘ का समय है, ‘शक्ति-संघर्ष‘ का नहीं तो आज विश्व में समस्त कार्य वाया मोल-तोल (negotiaions) होते हैं. और मोल-तोल के मेज पर एक पक्ष के अधिकतम लाभ के लिए दूसरे पक्ष का असुरक्षित‘ होना आवश्यक है.
तो यकीनन चीनभारत को असुरक्षित‘ रखना चाहता है मोल-तोल वार्ताओं के विश्व-मंच पर. वहभारत की गहरी आवाज को विश्व-मंचों पर हलकी करना चाहता है. ऐसा चीन ने पहले भी किया है१९६२ में जब भारतविश्व के सबसे बड़े समूह-आन्दोलन गुट-निरपेक्ष आन्दोलन‘ का  अगुआ था.
हर क्षेत्र-विशेष की अपनी राजनीति होती है. द.एशिया का ताना-बाना कुछ यूँ बन पड़ा है कि भारत एकदम से बड़ा – और बाकि देश छोटे-छोटे. तो एक तरह की शाश्वत असुरक्षा है इन देशों में. भारत की यह एक लगातार चुनौती है कि वह अपने पड़ोसियों से कम से कम न्यूनतमआवश्यक मधुर सम्बन्ध बनाये रखे जो जहाँ तक संभव हो विश्वशनीय हो. भारत की इस अनिवार्य आवश्यकता के बीचो बीच चीन के पास मौका बना हुआ है इस क्षेत्र-विशेष में अपनी उपस्थिति के लिए…जो कभी आर्थिककभी कूटनीतिक तो कभी सामरिक अतिक्रमण व अन्यान्य उपस्थिति के रूप में दिखलाई पड़ती है.
चित्र साभार: गूगल