>गीत: प्रेम कविता… संजीव ‘सलिल’

>गीत:
प्रेम कविता…
संजीव ‘सलिल’
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प्रेम कविता कब कलम से
कभी कोई लिख सका है?
*
प्रेम कविता को लिखा जाता नहीं है.
प्रेम होता है किया जाता नहीं है..
जन्मते ही सुत जननि से प्रेम करता-
कहो क्या यह प्रेम का नाता नहीं है?.
कृष्ण ने जो यशोदा के साथ पाला
प्रेम की पोथी का उद्गाता वही है.
सिर्फ दैहिक मिलन को जो प्रेम कहते
प्रेममय गोपाल भी
क्या दिख सका है?
प्रेम कविता कब कलम से
कभी कोई लिख सका है?
*
प्रेम से हो क्षेम?, आवश्यक नहीं है.
प्रेम में हो त्याग, अंतिम सच यही है..
भगत ने, आजाद ने जो प्रेम पाला.
ज़िंदगी कुर्बान की, देकर उजाला.
कहो मीरां की करोगे याद क्या तुम
प्रेम में हो मस्त पीती गरल-प्याला.
और वह राधा सुमिरती श्याम को जो
प्रेम क्या उसका कभी
कुछ चुक सका है?
प्रेम कविता कब कलम से
कभी कोई लिख सका है?
*
अपर्णा के प्रेम को तुम जान पाये?
सिया के प्रिय-क्षेम को अनुमान पाये?
नर्मदा ने प्रेम-वश मेकल तजा था-
प्रेम कैकेयी का कुछ पहचान पाये?.
पद्मिनी ने प्रेम-हित जौहर वरा था.
शत्रुओं ने भी वहाँ थे सिर झुकाए.
प्रेम टूटी कलम का मोहताज क्यों हो?
प्रेम कब रोके किसी के
रुक सका है?
प्रेम कविता कब कलम से
कभी कोई लिख सका है?
*
आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
http://divyanarmada.blogspot.com

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>हमें ना खाना महँगी चीनी , ना होना बीमार !

>महंगाई की मार , ऊपर से होली का त्यौहार
हमें ना खाना महँगी चीनी , ना होना बीमार !
जोगीरा……………….सा रा रा राआअ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;
बिन चीनी ,बिन घी- मैदे के मालपुए बनायेंगे ,
आटे को पानी में छनकर वही ख़ुशी से खायेंगे !
जोगीरा……………….सा रा रा राआअ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;
बिन पिचकारी और रंगों के होली खूब मनाएंगे ,
बाल्टी  में पानी भर कर सबको नहलायेंगे !
जोगीरा……………….सा रा रा राआअ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

>स्वच्छता का ढिंढोरा पीटने वाले धर्मभीरु को एक सच्चे भारतीय का जबाव

>
“स्वच्छ हिन्दुस्तान की नेम प्लेट ” शीर्षक नाम से यह कविता एक ब्लॉग पर मिली ।

स्वच्छता का दम भरते हो

ज़रा बताओ फिर क्यों

एक पिता की दो संतान

अगर दो माँ से हैं

तो आपस मे कैसे

और क्यों विवाह

करती हैं

मौन ना रहो

कहो की हम यहाँ

इस हिन्दुस्तान मे

इसीलिये रहते हैं

क्युकी हम यहाँ

सुरक्षित हैं

संरक्षित हैं

कानून यहाँ के

एक होते हुए भी

हमारी तरफ ही

झुके हुए हैं

कहीं और जायगे

तो कैसे इतना

प्रचार प्रसार कर पायेगे

बस हिन्दुस्तान मे ही ये होता हैं

सलीम को यहाँ सलीम भाई

नारज़गी मे भी कोई सुरेश कहता हैं

तुम भाई हो हमारे तो भाई बन कर रहो

हम रामायण पढे

तुम कुरान पढो

ताकि हम तुम कहीं ऊपर जाए

तो राम और अल्लाह से

नज़र तो मिला पाये

ऐसा ना हो की

पैगम्बर की बात फैलाते फैलाते

तुम उनकी शिक्षा ही भूल जाओ

हम को हमारी संस्कृति ने यही समझया हैं

जो घर आता हैं

चार दिन रहे तो मेहमान होता हैं

और रुक ही जाए

तो घर का ही कहलाता हैं

घर के हो तो घर के बन कर रहो

हम तुम से रामायण नहीं पढ़वाते हैं

तुम हम से कुरान मत पढ़वाओ

धार्मिक ग्रन्थ हैं दोनों

पर अगर किताब समझ कर पढ़ सके

कुछ तुम सीख सको

कुछ हम सीख सके

तो घर अपने आप साफ़ रहेगा

और स्वच्छ हिन्दुस्तान नेम प्लेट की

उस घर को कोई जरुरत नहीं होगी ।

>मेरे दिल की यही कवायद है

>

मेरे दिल की यही कवायद है
जो मेरा नहीं है क्यों उसकी चाहत है
भ्रम की दुनिया मे जीती हू
या भ्रम बुन रखा है अपने इर्द-गिर्द
जानती नहीं मै ये फिर भी क्यों उसकी हसरत है
कराह रहा है दिल मेरा या दिल की यही आदत है
भाग रही हू मै तुमसे या नियति की यही चाहत है
खामोश हू मै लेकिन गुफ्तगू है दिल मे कई
बोलू कैसे उसको मै टुकरो मे मिलती है मुझे ज़िन्दगी
रोज़ होती है खुद से कुछ खास बाते
ढूंडटी रहती हू हर रोज़ उनकी फ़रियादे
फरिस्तो की दुनिया मे रहते है वो
और हम तो ज़मीं के भी न लायक है
खौफ होती है मुझे अपनी ज़िन्दगी से
फिर कैसे उन्हें इस खौफ का हिस्सा बनाये
वो नहीं है हमारे फिर क्यों उनकी चाहत है
खुशियो की आदत नहीं है हमें
फिर क्यों आप हमें खुशियों मे नहलाते है
कुर्बत की चाहत नहीं है हमें
फिर क्यों हर रोज़ एक सपना दिखाते है
किश्तों-किश्ती मे मर रहे है हम
ज़िन्दगी भी नहीं है मेरे संग
फिर क्यों जीने की हसरत जगाते हो
तुम नहीं हो मेरे फिर क्यों तुम्हारी चाहत है
क्यों ज़माने मे ऐसा होता है
जो दिल के पास हो दिल से दूर वही होता है
खुशनसीब है वो जो तन्हाई के संग जीते है
हमारी बेबसी तो देखो हम तो भीर मे भी तनहा होते है
तसल्ली तो उनको भी होती है जो देते है
तसल्ली तो उनको भी होती है जो खोते है
और हम बेबस तो पाकर भी खोते है
रेतो का घरोंदा है मेरा
क्यों इसमें बसेरा ढूंडते हो
हम तो पानी मे बह जाएंगे
फिर से साए सा खो जाएंगे
क्यों दिल पर दस्तक दाते हो
तुम नहीं हो मेरे फिर क्यों तुम्हारी चाहत है
मेरे दिल की यही कवायद है

>इस षडयंत्र में कौन शामिल?

>


असफलताओं से लड़ता
मुश्किलों से गुजरता
सीने में दबाये हौसला
चल रहा हूं अंतहीन रास्तों पर
डगमगाते पैरों से अपने
सूनी उन मंजिलों में
सपने है खुबशुरत मगर
टूट जाने का भी है डर
जिन रास्तों को चुनता हूं
कांटे वहाँ बिछ जाते हैं
चुभते हैं मेरे पैरों में
पर कराहता है मेरा दिल
पता नहीं इस षडयंत्र में
कौन शख्स है शामिल
खुद खुदा है या फिर शैतान
आज समझ के तू पहचान
अगर दोषी शैतान होगा
तो मुजरिम उसे ठहराउंगा
मगर खुदा का नाम आया तो
दोषी मैं खुद बन जाउंगा