>कुण्डलिनी आचार्य संजीव ‘सलिल’, संपादक दिव्य नर्मदा

>आचार्य संजीव ‘सलिल’, संपादक दिव्य नर्मदा

कुण्डलिनी

करुणा संवेदन बिना, नहीं काव्य में तंत..

करुणा रस जिस ह्रदय में वह हो जाता संत.

वह हो जाता संत, न कोई पीर परायी.

आँसू सबके पोंछ, लगे सार्थकता पाई.

कंकर में शंकर दिखते, होता मन-मंथन.

‘सलिल’ व्यर्थ है गीत, बिना करुणा संवेदन.

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