>मुक्तिका: फिर ज़मीं पर….. संजीव ‘सलिल’

>मुक्तिका:

फिर ज़मीं पर…..

संजीव ‘सलिल’
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फिर ज़मीं पर कहीं काफ़िर कहीं क़ादिर क्यों है?
फिर ज़मीं पर कहीं नाफ़िर कहीं नादिर क्यों है?
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फिर ज़मीं पर कहीं बे-घर कहीं बा-घर क्यों है?
फिर ज़मीं पर कहीं नासिख कहीं नाशिर क्यों है?
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चाहते हम भी तुम्हें चाहते हो तुम भी हमें.
फिर ज़मीं पर कहीं नाज़िल कहीं नाज़िर क्यों है?
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कौन किसका है सगा और किसे गैर कहें?
फिर ज़मीं पर कहीं ताइर कहीं ताहिर क्यों है?
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धूप है, छाँव है, सुख-दुःख है सभी का यक सा.
फिर ज़मीं पर कहीं तालिब कहीं ताजिर क्यों है?
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ज़र्रे -ज़र्रे में बसा वो न ‘सलिल’ दिखता है.
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं  मंदिर क्यों है?
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पानी जन आँख में बाकी न ‘सलिल’ सूख गया.
फिर ज़मीं पर कहीं सलिला कहीं सागर क्यों है?
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— दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

कुछ शब्दों के अर्थ : काफ़िर = नास्तिक, धर्मद्वेषी, क़ादिर = समर्थ, ईश्वर, नाफ़िर = घृणा करनेवाला, नादिर = श्रेष्ठ, अद्भुत, बे-घर = आवासहीन, बा-घर = घर वाला, जिसके पास घर हो, नासिख = लिखनेवाला,  नाशिर = प्रकाशित करनेवाला, नाज़िल = मुसीबत, नाज़िर = देखनेवाला, ताइर = उड़नेवाला, पक्षी, ताहिर = पवित्र, यक सा = एक जैसा, तालिब =  इच्छुक, ताजिर = व्यापारी, ज़र्रे – तिनके, सलिला = नदी, बहता पानी,  सागर = समुद्र, ठहरा पानी.

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>दोहा सलिला: संजीव ‘सलिल’

>दोहा सलिला:

संजीव ‘सलिल’
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कौन कहानीकार है?, किसके हैं संवाद?
बोल रहे सब यंत्रवत, कौन सुने  फरियाद??
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आर्थिक मंदी छा गयी, मचा हुआ कुहराम.
अच्छे- अच्छे फिसलते, कोई न पाता थाम..
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किसका कितना दोष है?, कहो कौन निर्दोष?
विधना जाने कब करे, सर्व नाश का घोष??
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हवामहल पल में उड़ा, वासी हुए निराश.
बिन नींव की व्यवस्था, हाय हो गयी ताश..
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कठपुतलीवत नचाता, थाम श्वास की डोर.
देख न पाते हम झलक, चाहें करुणा-कोर..
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भ्रम होता हम कर रहे, करा रहा वह काज.
लेते उसका श्रेय खुद, किन्तु न आती लाज..
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सुविधा पाने जो गए, तजकर अपना देश.
फिर-फिर आते पलटकर, मन में व्यथा अशेष..
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नगदी के नौ लीजिये, तेरह नहीं उधार.
अब तो छलिये! बंद कर, सपनों का व्यापार..
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चमक-दमक औ’ सादगी, वह सोना यह धूल.
 वह पावन शतदल कमल, यह बबूल का शूल..
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पेड़ टूटते, दूब झुक, सह लेती तूफ़ान.
जो माटी से जुड़ रहे, ‘सलिल’ वही मतिमान..
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पल में पैरों-तले से, सरकी ‘सलिल’ ज़मीन.
तीसमारखाँ काल के, हाथ हो गए दीन..
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थाम-थमाये विपद में, बिना स्वार्थ निज हाथ.
‘सलिल’ हृदय में लो बसा, नमन करो नत माथ..
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दानव वे जो जोड़ते, औरों का हक छीन.
ऐश्वर्य जितना बढ़ा, वे उतने ही दीन..
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भूमि, भवन, धन जोड़कर, हैं दरिद्र वे लोग.
‘सलिल’ न जो कर पा रहे, जी भरकर उपयोग..
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जो पाया उससे नहीं, ‘सलिल’ जिन्हें संतोष.
वे सचमुच कंगाल हैं, गर्दभ ढोते कोष.
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बात-बात में कर रहे, नाहक वाद-विवाद.
‘सलिल’ सहज हो कर करें, कुछ सार्थक संवाद..
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