>उन पैंतालिस दिन और पैंतालिस रातों का क्या ?

>संचार-क्रांति के फलस्वरूप जब मोबाईल आया तो लोग बड़े खुश हुए . सरकारी -प्राइवेट सभी तरह की कंपनियों के इस क्षेत्र में कूदने से मोबाईल का प्रसार तेजी से बढ़ता गया . आज हर आदमी इस अत्याधुनिक उपकरणों से लैस है . क्या कमाल हो गया कभी भी कहीं भी बात करके अपनी बात बना सकते हैं . पर साहब , मोबाइल कंपनियों ने जीना मुहाल कर रखा है . एक उपभोक्ता शायद उतनी देर किसी दोस्त या रिश्तेदार से बात नहीं कर पाता है जितनी देर ये कंपनी वाले अपना विज्ञापन सुनाते हैं . कुछ समय  पहले तो पता चल जाता था नंबर देखकर कि यह कंपनी की कॉल है और हम इग्नोर करते थे . लेकिन आजकल इनकी चालाकियां इतनी बढ़ गयी हैं कि हर बार अलग-अलग नंबरों से कॉल करते हैं . सुबह-शाम कहीं भी कभी भी  , एयरटेल के विज्ञापन से एन कम्पनियाँ इतनी परभावित दिखती हैं कि अपनी बात बनाने के लिए हमें अपनी बात सुनने पर मजबूर करते हैं . सोचिये कितना गुस्सा आता होगा जब आप किसी प्रियजन के कॉल का इन्तेजार कर रहे हों , आप बाइक चला रहे हों , आप बाथरूम में हों , आप पढ़ रहे हों , आप एक अच्छी नींद में हों और मोबाइल कंपनी का फ़ोन आये और कहे सर , आप हमारी ये स्कीम ले लीजिये , आप कॉलर ट्यून लगवा लीजिये ……………!

हालाँकि , कंपनियों के मुताबिक यदि आप अनचाहे कॉल नहीं न चाहते हैं तो DND लिख कर sms  करने के पैंतालिस दिनों बाद आपको कोई कॉल अन्हीं आएगी लेकिन यह बस कहने भर को है . अधिकांश लोगों के पास फ़िर भी कॉल आते रहते हैं . कस्टमर केयर में पूछने पर कोई संतोष जनक जवाब  ना पाकर आख़िरकार एक आम आदमी दिमाग लगाना छोड़  देता है . और मान ल्जिये अगर किसी-किसी का हो भी गया तो उन पैंतालिस दिन और पैंतालिस रातों का क्या ?  आखिर ४५ दिन भी कोई उपभोक्ता जबरन किसी कंपनी का विज्ञापन क्यों सुने ? क्या यह एक आदमी की निजता के अधिकारों का हनन करना नहीं है ? सरकार को तुरंत प्रभाव से सभी मोबाइल कंपनियों को यह निर्देश दे कि उपभोक्ता को किसी भी प्रकार का विज्ञापन उसके मोबाइल पर ना भेजा जाए . अरे ,है विज्ञापन के लिए सड़कों किनारे होर्डिंग्स , अख़बार, टीवी , रेडिओ, इंटरनेट आदि मौजूद हैं फ़िर मोबाइल पर लोगों को क्यूँ परेशां किया जाता है . यदि यही ट्रेंड चलता रहा तो एक दिन कंपनियों के विज्ञापन लोगों के बेडरूम की दीवारों पर नज़र आयेंगे ……………………………..

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