शिवजी बिहाने चले…..एक विलक्षण गीत

शिवजी की नगरी उज्जैन में श्रावण के सोमवारों को भगवान महाकालेश्वर की सवारी निकलती है और अन्तिम सोमवार को बाबा महाकाल की विशाल और भव्य सवारी निकाली जाती है । ऐसी मान्यता है कि महाकाल बाबा श्रावण में अपने भक्तों और प्रजा का हालचाल जानने के नगर-भ्रमण करते हैं । उस शाही अन्तिम सवारी में विशाल जनसमुदाय उपस्थित होता है और दर्शनों का लाभ लेता है । शाही सवारी में सरकारी तौर पर और निजी तौर पर हजारों लोग अपने-अपने तरीके से सहयोग करते हैं । बैंड, होमगार्ड, स्काऊट-गाईड, विभिन्न सेवा संगठन, एवं कुछ विशिष्ट भक्तजन भी उस सवारी में शामिल होते हैं । सवारी में शामिल लोग विभिन्न रूप धरे होते हैं जैसे भूत, चुडैल, नन्दी, शेर आदि और ऐसा माहौल तैयार हो जाता है कि बस देखते ही बनता है, शब्दों में बयान करना मुश्किल है । उस वक्त हमेशा मुझे एक गीत याद आता है…गीत है फ़िल्म “मुनीमजी” का, लिखा है शैलेन्द्र ने, संगीत दिया है एस.डी.बर्मन ने और गाया है हेमन्त कुमार और कोरस ने । यह एक विलक्षण गीत है जिसे धरोहर गीत की संज्ञा भी दी जा सकती है । यह गीत हिन्दी से मिलती-जुलती भाषा में है, शायद यह अवधी, भोजपुरी या मैथिली में है ? शिव जी की बारात और विवाह प्रसंग का आँखों देखा हाल सुनाता है यह गीत । इस गीत में शैलेन्द्र ने जिस खूबसूरती से शिवजी के विवाह का वर्णन किया है वह अदभुत है । गीत की भाषा और कुछ शब्द तो ठीक से समझ में नहीं आते, लेकिन इतने लम्बे गीत लिखना, उसकी धुन बनाना और फ़िर उसे हेमन्त दा द्वारा त्वरित गति में गाना एक अतिउल्लेखनीय कार्य है, यह कल्पना ही की जा सकती है कि पुराने गीतों में ये महान लोग कितनी मेहनत करते होंगे, जबकि तकनीक इतनी उन्नत भी नहीं थी… बहरहाल, इस गीत को कई बार सुनने के बावजूद मैं इसके कुछेक शब्दों को नहीं पकड़ पाया (हो सकता है कि मेरा हेडफ़ोन उच्च क्वालिटी का नहीं है इसलिये..) गीत के बोलों को लिखते समय मैने कुछ जगहों पर ***** का प्रयोग किया है, अब लोग इसे सुनें और मेरी मदद करें ताकि इस गीत के पूरे बोलों को सामने लाया जा सके, साथ ही जब बोल सही रूप में सामने आयेंगे तभी हम गीत का सही मतलब भी समझ पायेंगे । वैसे मैने अपने तईं भरपूर कोशिश की है सही बोल लिखने की, फ़िर भी जब अन्तरा समाप्त होने को होता है उस वक्त जल्दी-जल्दी में गाये गये बोल पकड़ में नहीं आते । इसी प्रकार मैने कोशिश की है कि प्रत्येक अन्तरे के बाद उसका अर्थ समझाने का प्रयास करूँ, हो सकता है कि किसी अन्य को वह अर्थ सही ना लगे, तो वह कृपया उसका सही अर्थ मालूम करके मुझे बताने का कष्ट करें, ताकि भविष्य में इस गीत को पूरे अर्थ और सही बोलों के साथ प्रस्तुत किया जा सके… प्रस्तावना बहुत हुई अब पहले आप यह गीत सुनिये (यहाँ क्लिक करके) – फ़िर आते हैं इसके विश्लेषण पर…

गीत शुरु होता है हेमन्त दा के बोले हुए शब्दों से –

बम-बम भोला… बम-बम भोला..
बम-बम भोला… बम-बम भोला..

डमरू, ढोल, ताशे, शंख और नगाडे़ की आवाज के साथ गीत शुरु होता है –

हो..शिवजी बिहाने चले
पालकी सजाय के
भभूति लगाय के, नाथ…
ओ शिवजी बिहाने चले पालकी सजाय के
कोरस – भभूति लगाय के, पालकी सजाय के, नाथ…
हो.. जब शिव बाबा करे तैय्यारी
कईके सकल समान हो..
दईने अंग त्रिशूल विराजे
नाचे भूत शैतान हो..
ब्रह्मा चले विष्णु चले
लईके वेद पुरान हो..
शंख, चक्र और गदा धनुष लै
चले श्री भगवान हो…
और बन-ठन के चलें बम भोला
लिये भांग-धतूर का गोला
बोले ये हरदम
चले लाड़का पराय के..
कोरस – हो भभूति लगाय के
पालकी सजाय के… ला..ला..
हो शिवजी बिहाने चले….

(मेरे मतानुसार यह अन्तरा विवाह से पहले दूल्हे की तैयारी के बारे में है, जिसमें भोलेनाथ को दाँये हाथ में त्रिशूल और भांग-धतूरे के साथ एवं साथी के रूप में ब्रह्मा और विष्णु को भी बताया गया है, सारे भूत-शैतान बारात में नाच भी रहे हैं)

कोरस – ओई आई, ओई आया..(२ बार)
फ़िर शहनाई की मधुर आवाज…

ओ माता मतदिन पर चंचललि
तिलक जलि लिल्हार हो
काला नाग गर्दन के नीचे
वोहू दियन फ़ुफ़कार हो..
नाग के फ़ुफ़कारने की आवाज आती है…
लोटा फ़ेंक के भाग चलैलि
ताविज निकल लिलार हो..
इनके संगे बिबाह ना करबो
गौरी रही कुंवारी हो
कहें पारवती समझाईं
बतियाँ मानो हमरो माईं
जै भराइलै हाँ हम करमवा लिखाय के
कोरस – भभूति लगाय के
पालकी सजाय के… हाँ…
हो शिवजी बिहाने चले….
(मेरे मतानुसार जब विवाह के पहले दूल्हे का द्वारचार किया जाता है, यह उस वक्त का दृश्य है जिसमें शिवजी की गर्दन का नाग फ़ुफ़कारता है तो आरती उतारने वाली, लोटा फ़ेंक के भाग खडी होती है, उस समय पार्वतीजी की माँ कहती हैं कि इनसे मेरी पुत्री का विवाह नहीं हो सकता भले वह कुंवारी ही रह जाये, और पार्वती उन्हें समझाती हैं कि बात मानो और जो भाग्य में लिखा है वह तो होगा ही..)

फ़िर शहनाई के स्वर और मंत्रोच्चार…
ओम नमः शिवाय, ओ..म स्वाहा..ओम स्वाहा…

ओ.. जब शिव बाबा मंडवा गईले
होला मंगलाचार हो
बाबा पंडित वेद विचारे
होला गस्साचार हो
बजरबाटी की लगी झालरी
नागिन की अधिकार हो
विज मंडवा में नावन अईली
करे झंगन वडियार हो..
एगो नागिन गिले विदाई
********* (???)
********* (???)
कोरस – हो भभूति लगाय के
पालकी सजाय के.. हाँ..
हो शिवजी बिहाने चले…
(इस अन्तरे को समझना थोडा़ मुश्किल होता है, शायद शिवजी के मंडप में पहुँचने के बाद जब पंडित मंगलगान शुरु करते हैं और मंडप की सजावट का उल्लेख है, फ़िर शब्दों के खो जाने के कारण उसका पूर्ण अर्थ समझ में नहीं आता)

कोरस – आ..आ.आ.आ.आ.आ

तो कोमल रूप धरे शिवशंकर
खुशी भये नर-नारी हो
राजहि नाचन गान करईले
इज्जत रहें हमार हो
रहें वर साथी शिवशंकर से
केहू के ना पावल पार हो
इनके जटा से गंगा बहिली
महिमा अगम अपार हो..
जब शिवशंकर ध्यान लगाये
इनको तीनो लोक दिखाये
कहे दुःखहरन यही
******* (???)

कोरस – भभूति लगाय के
पालकी सजाय के हाँ..
(इस अंतरे में शिव की महिमा का गुणगान किया गया है । जब सभी के परेशान हो चुकने के बाद शंकर जी औघड़ बाबा वाला चोला छोडकर कोमल रूप धारण कर लेते हैं और सभी लोग खुश हो जाते हैं)
गीत में प्रत्येक अन्तरे के शुरु होने से पहले जो डमरू और ढोल का धूमधडाका किया जाता है, उससे एक मस्ती भरी बारात का दृश्य जीवन्त हो उठता है, इसे कहते हैं संगीत से माहौल रचना..
बहनों और भाईयों, अब गीत एक बार फ़िर सुनिये, और अपनी राय, सुझावों, मेरी गलतियों से मुझे अवगत करायें…इस मामले में यूनुस भाई मेरी कुछ मदद कर सकें …

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>शिवजी बिहाने चले…..एक विलक्षण गीत

>शिवजी की नगरी उज्जैन में श्रावण के सोमवारों को भगवान महाकालेश्वर की सवारी निकलती है और अन्तिम सोमवार को बाबा महाकाल की विशाल और भव्य सवारी निकाली जाती है । ऐसी मान्यता है कि महाकाल बाबा श्रावण में अपने भक्तों और प्रजा का हालचाल जानने के नगर-भ्रमण करते हैं । उस शाही अन्तिम सवारी में विशाल जनसमुदाय उपस्थित होता है और दर्शनों का लाभ लेता है । शाही सवारी में सरकारी तौर पर और निजी तौर पर हजारों लोग अपने-अपने तरीके से सहयोग करते हैं । बैंड, होमगार्ड, स्काऊट-गाईड, विभिन्न सेवा संगठन, एवं कुछ विशिष्ट भक्तजन भी उस सवारी में शामिल होते हैं । सवारी में शामिल लोग विभिन्न रूप धरे होते हैं जैसे भूत, चुडैल, नन्दी, शेर आदि और ऐसा माहौल तैयार हो जाता है कि बस देखते ही बनता है, शब्दों में बयान करना मुश्किल है । उस वक्त हमेशा मुझे एक गीत याद आता है…गीत है फ़िल्म “मुनीमजी” का, लिखा है शैलेन्द्र ने, संगीत दिया है एस.डी.बर्मन ने और गाया है हेमन्त कुमार और कोरस ने । यह एक विलक्षण गीत है जिसे धरोहर गीत की संज्ञा भी दी जा सकती है । यह गीत हिन्दी से मिलती-जुलती भाषा में है, शायद यह अवधी, भोजपुरी या मैथिली में है ? शिव जी की बारात और विवाह प्रसंग का आँखों देखा हाल सुनाता है यह गीत । इस गीत में शैलेन्द्र ने जिस खूबसूरती से शिवजी के विवाह का वर्णन किया है वह अदभुत है । गीत की भाषा और कुछ शब्द तो ठीक से समझ में नहीं आते, लेकिन इतने लम्बे गीत लिखना, उसकी धुन बनाना और फ़िर उसे हेमन्त दा द्वारा त्वरित गति में गाना एक अतिउल्लेखनीय कार्य है, यह कल्पना ही की जा सकती है कि पुराने गीतों में ये महान लोग कितनी मेहनत करते होंगे, जबकि तकनीक इतनी उन्नत भी नहीं थी… बहरहाल, इस गीत को कई बार सुनने के बावजूद मैं इसके कुछेक शब्दों को नहीं पकड़ पाया (हो सकता है कि मेरा हेडफ़ोन उच्च क्वालिटी का नहीं है इसलिये..) गीत के बोलों को लिखते समय मैने कुछ जगहों पर ***** का प्रयोग किया है, अब लोग इसे सुनें और मेरी मदद करें ताकि इस गीत के पूरे बोलों को सामने लाया जा सके, साथ ही जब बोल सही रूप में सामने आयेंगे तभी हम गीत का सही मतलब भी समझ पायेंगे । वैसे मैने अपने तईं भरपूर कोशिश की है सही बोल लिखने की, फ़िर भी जब अन्तरा समाप्त होने को होता है उस वक्त जल्दी-जल्दी में गाये गये बोल पकड़ में नहीं आते । इसी प्रकार मैने कोशिश की है कि प्रत्येक अन्तरे के बाद उसका अर्थ समझाने का प्रयास करूँ, हो सकता है कि किसी अन्य को वह अर्थ सही ना लगे, तो वह कृपया उसका सही अर्थ मालूम करके मुझे बताने का कष्ट करें, ताकि भविष्य में इस गीत को पूरे अर्थ और सही बोलों के साथ प्रस्तुत किया जा सके… प्रस्तावना बहुत हुई अब पहले आप यह गीत सुनिये (यहाँ क्लिक करके) – फ़िर आते हैं इसके विश्लेषण पर…

गीत शुरु होता है हेमन्त दा के बोले हुए शब्दों से –

बम-बम भोला… बम-बम भोला..
बम-बम भोला… बम-बम भोला..

डमरू, ढोल, ताशे, शंख और नगाडे़ की आवाज के साथ गीत शुरु होता है –

हो..शिवजी बिहाने चले
पालकी सजाय के
भभूति लगाय के, नाथ…
ओ शिवजी बिहाने चले पालकी सजाय के
कोरस – भभूति लगाय के, पालकी सजाय के, नाथ…
हो.. जब शिव बाबा करे तैय्यारी
कईके सकल समान हो..
दईने अंग त्रिशूल विराजे
नाचे भूत शैतान हो..
ब्रह्मा चले विष्णु चले
लईके वेद पुरान हो..
शंख, चक्र और गदा धनुष लै
चले श्री भगवान हो…
और बन-ठन के चलें बम भोला
लिये भांग-धतूर का गोला
बोले ये हरदम
चले लाड़का पराय के..
कोरस – हो भभूति लगाय के
पालकी सजाय के… ला..ला..
हो शिवजी बिहाने चले….

(मेरे मतानुसार यह अन्तरा विवाह से पहले दूल्हे की तैयारी के बारे में है, जिसमें भोलेनाथ को दाँये हाथ में त्रिशूल और भांग-धतूरे के साथ एवं साथी के रूप में ब्रह्मा और विष्णु को भी बताया गया है, सारे भूत-शैतान बारात में नाच भी रहे हैं)

कोरस – ओई आई, ओई आया..(२ बार)
फ़िर शहनाई की मधुर आवाज…

ओ माता मतदिन पर चंचललि
तिलक जलि लिल्हार हो
काला नाग गर्दन के नीचे
वोहू दियन फ़ुफ़कार हो..
नाग के फ़ुफ़कारने की आवाज आती है…
लोटा फ़ेंक के भाग चलैलि
ताविज निकल लिलार हो..
इनके संगे बिबाह ना करबो
गौरी रही कुंवारी हो
कहें पारवती समझाईं
बतियाँ मानो हमरो माईं
जै भराइलै हाँ हम करमवा लिखाय के
कोरस – भभूति लगाय के
पालकी सजाय के… हाँ…
हो शिवजी बिहाने चले….
(मेरे मतानुसार जब विवाह के पहले दूल्हे का द्वारचार किया जाता है, यह उस वक्त का दृश्य है जिसमें शिवजी की गर्दन का नाग फ़ुफ़कारता है तो आरती उतारने वाली, लोटा फ़ेंक के भाग खडी होती है, उस समय पार्वतीजी की माँ कहती हैं कि इनसे मेरी पुत्री का विवाह नहीं हो सकता भले वह कुंवारी ही रह जाये, और पार्वती उन्हें समझाती हैं कि बात मानो और जो भाग्य में लिखा है वह तो होगा ही..)

फ़िर शहनाई के स्वर और मंत्रोच्चार…
ओम नमः शिवाय, ओ..म स्वाहा..ओम स्वाहा…

ओ.. जब शिव बाबा मंडवा गईले
होला मंगलाचार हो
बाबा पंडित वेद विचारे
होला गस्साचार हो
बजरबाटी की लगी झालरी
नागिन की अधिकार हो
विज मंडवा में नावन अईली
करे झंगन वडियार हो..
एगो नागिन गिले विदाई
********* (???)
********* (???)
कोरस – हो भभूति लगाय के
पालकी सजाय के.. हाँ..
हो शिवजी बिहाने चले…
(इस अन्तरे को समझना थोडा़ मुश्किल होता है, शायद शिवजी के मंडप में पहुँचने के बाद जब पंडित मंगलगान शुरु करते हैं और मंडप की सजावट का उल्लेख है, फ़िर शब्दों के खो जाने के कारण उसका पूर्ण अर्थ समझ में नहीं आता)

कोरस – आ..आ.आ.आ.आ.आ

तो कोमल रूप धरे शिवशंकर
खुशी भये नर-नारी हो
राजहि नाचन गान करईले
इज्जत रहें हमार हो
रहें वर साथी शिवशंकर से
केहू के ना पावल पार हो
इनके जटा से गंगा बहिली
महिमा अगम अपार हो..
जब शिवशंकर ध्यान लगाये
इनको तीनो लोक दिखाये
कहे दुःखहरन यही
******* (???)

कोरस – भभूति लगाय के
पालकी सजाय के हाँ..
(इस अंतरे में शिव की महिमा का गुणगान किया गया है । जब सभी के परेशान हो चुकने के बाद शंकर जी औघड़ बाबा वाला चोला छोडकर कोमल रूप धारण कर लेते हैं और सभी लोग खुश हो जाते हैं)
गीत में प्रत्येक अन्तरे के शुरु होने से पहले जो डमरू और ढोल का धूमधडाका किया जाता है, उससे एक मस्ती भरी बारात का दृश्य जीवन्त हो उठता है, इसे कहते हैं संगीत से माहौल रचना..
बहनों और भाईयों, अब गीत एक बार फ़िर सुनिये, और अपनी राय, सुझावों, मेरी गलतियों से मुझे अवगत करायें…इस मामले में यूनुस भाई मेरी कुछ मदद कर सकें …