>नव गीत: हम खुद को…. संजीव ‘सलिल’

>नव गीत:
हम खुद को….
संजीव ‘सलिल’
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हम खुद को खुद ही डंसते हैं…
*
जब औरों के दोष गिनाये.
हमने अपने ऐब छिपाए.
विहँस दिया औरों को धोखा-
ठगे गए तो अश्रु बहाये.

चलते चाल चतुर कह खुद को-
बनते मूर्ख स्वयं फंसते हैं…
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लिये सुमिरनी माला फेरें.
मन से प्रभु को कभी न टेरें.
जब-जब आपद-विपदा घेरें-
होकर विकल ईश-पथ हेरें.

मोह-वासना के दलदल में
संयम रथ पहिये फंसते हैं….
*
लगा अल्पना चौक रंगोली,
फैलाई आशा की झोली.
त्योहारों पर हँसी-ठिठोली-
करे मनौती निष्ठां भोली.

पाखंडों के शूल फूल की
क्यारी में पाये ठंसते हैं…..
*
पुरवैया को पछुआ घेरे.
दीप सूर्य पर आँख तरेरे.
तड़ित करे जब-तब चकफेरे
नभ पर छाये मेघ घनेरे.

आशा-निष्ठां का सम्बल ले
हम निर्भय पग रख हँसते हैं…..
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Acharya Sanjiv Salil
http://divyanarmada.blogspot.com

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>नवगीत: करो बुवाई… –संजीव ‘सलिल’

>नवगीत:
करो बुवाई…

खेत गोड़कर
करो बुवाई…
*
ऊसर-बंजर जमीन कड़ी है.
मँहगाई जी-जाल बड़ी है.
सच मुश्किल की आई घड़ी है.
नहीं पीर की कोई जडी है.
अब कोशिश की
हो पहुनाई.
खेत गोड़कर
करो बुवाई…
*
उगा खरपतवार कंटीला.
महका महुआ मदिर नशीला.
हुआ भोथरा कोशिश-कीला.
श्रम से कर धरती को गीला.
मिलकर गले
हँसो सब भाई.
खेत गोड़कर
करो बुवाई…
*
मत अपनी धरती को भूलो.
जड़ें जमीन हों तो नभ छूलो.
स्नेह-‘सलिल’ ले-देकर फूलो.
पेंगें भर-भर झूला झूलो.
घर-घर चैती
पड़े सुनाई.
खेत गोड़कर
करो बुवाई…
*
Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

>नव गीत: रंगों का नव पर्व –संजीव ‘सलिल’

>रंगों का नव पर्व बसंती

सतरंगा आया.

सद्भावों के जंगल गायब

पर्वत पछताया…

*

आशा पंछी को खोजे से

ठौर नहीं मिलती.

महानगर में शिव-पूजन को

बौर नहीं मिलती.

चकित अपर्णा देख, अपर्णा

है भू की काया.

सद्भावों के जंगल गायब

पर्वत पछताया…

*

कागा-कोयल का अंतर अब

जाने कैसे कौन?

चित्र किताबों में देखें,

बोली अनुमानें मौन.

भजन भुला कर डिस्को-गाना

मंदिर में गाया.

सद्भावों के जंगल गायब

पर्वत पछताया…

*

है अबीर से उन्हें एलर्जी,

रंगों से है बैर.

गले न लगते, हग करते हैं

मना जान की खैर.

जड़ विहीन जड़-जीवन लखकर

‘सलिल’ मुस्कुराया.

सद्भावों के जंगल गायब

पर्वत पछताया…

*

>गीत: वसुधा को पाती -संजीव ‘सलिल’

>सूरज ने भेजी है
वसुधा को पाती,
संदेसा लाई है
धूप गुनगुनाती…

आदम को समझा
इंसान बन सके
किसी नैन में बसे
मधु गान बन सके
हाथ में ले हाथ
सुबह सुना दे प्रभाती…

उषा की विमलता
निज आत्मा में धार
दुपहरी प्रखरता पर
जान सके वार
संध्या हो आशा के
दीप टिमटिमाती…

निशा से नवेली
स्वप्नावली उधार
मांग श्वास संगिनी से
आस दे संवार
दिवाली अमावस के
दीप हो जलाती…

आशा की किरण
करे मौन अर्चना
त्यागे पुरुषार्थ स्वार्थ
करे प्रार्थना
सुषमा-शालीनता हों
संग मुस्कुराती…

पावस में पुश्पाये
वंदना विनीता
सावन में साधना
गुंजाये दिव्य गीता
कल्पना ले अल्पना
हो नर्मदा बहाती…

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