>पौराणिक मान्यताओं पर प्रश्नचिन्ह क्यों ?

>क्या किसी देश का इतिहास या उसकी पौराणिक मान्यतायें शर्म का विषय हो सकती हैं ? यदि हजारों वर्षों के इतिहास में कोई शर्म का विषय है भी, तो उसके मायने अलग-अलग समुदायों के लिये अलग-अलग क्यों होना चाहिये ? यह सवाल आजकल कई लोगों के मनोमस्तिष्क को झकझोर रहा है । इतिहास के साथ छेड़छाड़ करना शासकों का प्रिय शगल रहा है, लेकिन जब बुद्धिजीवी वर्ग भी उसी मुहिम में शामिल हो जाये तो फ़िर यह बहस का विषय हो जाता है । मंगल पांडे पर एक फ़िल्म बनती है और सारे देश में उसके बारे में चर्चा होने लगती है, पोस्टर फ़ाडे जाने लगते हैं, चाणक्य पर एक धारावाहिक बनता है, तत्काल उसे सांप्रदायिक घोषित करने की मुहिम चालू हो जाती है, ऐसा ही कुछ रामायण के बारे में भी करने की कोशिश की गई थी, लेकिन चूँकि रामायण जन-जन के दिल में बसा है, इसलिये विरोधियों को उस वक्त मौके की नजाकत देखते हुए चुप बैठना पडा़ । लेकिन जिस तरह की टिप्पणियाँ और विचार वाम समर्थकों द्वारा व्यक्त किये जा रहे हैं, वह भविष्य के एक खतरे की ओर संकेत करते हैं…
कभी हमें पाठ्यपुस्तकों में यह बताया जाता है कि राम और कृष्ण मात्र कल्पना है, इनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है । यदि इन लेखकों की चले तो इनके अनुसार वैज्ञानिक आधार ईसा के जन्म के बाद ही माना जाता है । उसके पहले का भारत कुछ कबीलों, साँप पकड़ने वालों, और छोटी-छोटी रियासतों के आपस मे लड़ मरने वाला एक भूभाग मात्र ही था । उसकी कोई संस्कृति थी ही नहीं । अब कोई उनसे पूछे कि यदि राम और कृष्ण काल्पनिक हैं तो सदियों से उनके नाम, कर्म, कथायें और आदर्श पीढियों से पीढियों तक कैसे चलते आये हैं ? “नासा” ने यह क्यों कहा कि भारत और श्रीलंका के मध्य वाकई में एक पुलनुमा “स्ट्रक्चर” था ! महाभारत में “कुरुक्षेत्र” का उल्लेख क्यों है, टिम्बकटू का क्यों नहीं ? रामायण में पंचवटी का उल्लेख क्यों है, कजाकिस्तान का क्यों नहीं ? यह सब क्या है, मात्र कल्पना या एक मुखारविन्द से दूसरे मुखारविन्द तक फ़ैलती गई अफ़वाहें ? यह माना जा सकता है कि इन चरित्रों से जुडे़ कथानक कहीं-कहीं अतिशयोक्तिपूर्ण हो गये हों, लेकिन जब किंवदंतियाँ होती हैं, तो ऐसी कहानियाँ जन्म ले ही लेती हैं । मैं खुद यह मानने को तैयार नहीं हूँ कि गोवर्धन पर्वत सचमुच में एक ऊँगली पर उठाया गया होगा । हो सकता है यमुना नदी में एक भयंकर साँप को कृष्ण ने मारा होगा, जिसे अनेक लोगों ने कहानी सुनाते-सुनाते, दसियों फ़न वाले राक्षस का रूप दे दिया…अब जाहिर है कि अर्जुन के रथ पर हनुमान सवार नहीं हो सकते, लेकिन ऐसा कुछ तो हुआ ही होगा, जिसके कारण इस कथा को बल मिला, और हजारों वर्षों तक करोडों लोगों ने इस बात पर विश्वास किया । दरअसल इन घटनाओं के व्यापक विश्लेषण की आवश्यकता है, लेकिन सिरे से इनको काल्पनिक घोषित कर देना मानसिक दिवालियापन है.. ठीक उसी तरह जिस तरह से इन कहानियों पर आँख मूँद कर विश्वास कर लेना…अधिक दूर जाने की जरूरत नहीं है, अब से मात्र सौ वर्ष पश्चात लोग इस बात पर यकीन ही नहीं करेंगे कि अहिंसा से भी कोई आन्दोलन खडा किया जा सकता है, और गाँधी नाम का कोई व्यक्ति इस धरती पर चलता-फ़िरता रहा होगा, उस समय भी गाँधी के बारे में कई तरह के मिथक पैदा हो जायेंगे… ये तो होता ही है, लेकिन प्रत्येक बात को आँख मूँद्कर मान लेना या हरेक बात का विरोध के लिये विरोध ठीक नहीं है.. इन वाम लेखकों का बस चले तो ये तुलसीदास को भी काल्पनिक घोषित कर दें । दरअसल यह सब हो रहा है एक विशेष अभियान के तहत और विशिष्ट मानसिकता का पोषण करने के लिये… किस तरह से हिन्दुओं के मन में हीनभावना को जगाया जाये, यह इस मुहिम का हिस्सा होता है । हमें बताया जाता है कि महाराणा प्रताप भगौडे़ थे, या असल में शिवाजी का राज्य कभी था ही नहीं । औरंगजेब से लड़ने वाले सिख गुरुओं की भी प्रशंसा नहीं की जाती, लेकिन अकबर के दीन-ए-इलाही के कसीदे काढे जाते हैं… और भी ऐसे अनेकों उदाहरण हैं… हो सकता है कि इन्होंने यह सब किया भी हो, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि बाकी के सारे हिन्दू राजा या लडाके निरे मूर्ख थे ? इसी विध्वंसक मानसिकता से ग्रसित होकर सतत वन्देमातरम का विरोध किया जाता है, सरस्वती वन्दना की हँसी उडाई जाती है, हिन्दी को हीन दृष्टि से देखने की परम्परा विकसित की जाती है… प्रेमचन्द कुछ नहीं थे, लेकिन शेक्सपीयर महान थे, निराला और महादेवी वर्मा को कोई खास महत्व नहीं लेकिन कीट्स का गुणगान, यह सब क्या है ? बार-बार यह अह्सास दिलाने की कोशिश की जाती है कि “भारत की संस्कृति” नाम की कोई चीज ही नहीं है । लेकिन उन “बाँये चलने वाले लेखकों” के लाख प्रयासों के बावजूद यह तथ्य एक सर्वेक्षण में उभरकर आया है कि लोगों में धार्मिकता बढी है, चाहे उसके कोई दूसरे कारण क्यों ना हो । इस स्थिति का फ़ायदा अंधविश्वास बढाने में लगे “दुकानदारों” ने भी उठाया है, और अधिक आक्रामक तरीके से अपनी “मार्केटिंग” करके जनता में धर्म को प्रचारित करने में लगे हैं । जबकि लोगों में अपने इतिहास का सच जानने की भूख है । आवश्यकता है उसे सही दिशा देने की, उन्हें वैज्ञानिक तरीके से समझाने की, तर्क-वितर्क से बात को दिमाग में बैठाने की,  न कि उनके दिमागों में गलत-सलत जानकारी भरने की । लेकिन दुर्भाग्य से यही हो रहा है, जिसमें दोनों पक्ष शामिल हैं….

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पौराणिक मान्यताओं पर प्रश्नचिन्ह क्यों ?

क्या किसी देश का इतिहास या उसकी पौराणिक मान्यतायें शर्म का विषय हो सकती हैं ? यदि हजारों वर्षों के इतिहास में कोई शर्म का विषय है भी, तो उसके मायने अलग-अलग समुदायों के लिये अलग-अलग क्यों होना चाहिये ? यह सवाल आजकल कई लोगों के मनोमस्तिष्क को झकझोर रहा है । इतिहास के साथ छेड़छाड़ करना शासकों का प्रिय शगल रहा है, लेकिन जब बुद्धिजीवी वर्ग भी उसी मुहिम में शामिल हो जाये तो फ़िर यह बहस का विषय हो जाता है । मंगल पांडे पर एक फ़िल्म बनती है और सारे देश में उसके बारे में चर्चा होने लगती है, पोस्टर फ़ाडे जाने लगते हैं, चाणक्य पर एक धारावाहिक बनता है, तत्काल उसे सांप्रदायिक घोषित करने की मुहिम चालू हो जाती है, ऐसा ही कुछ रामायण के बारे में भी करने की कोशिश की गई थी, लेकिन चूँकि रामायण जन-जन के दिल में बसा है, इसलिये विरोधियों को उस वक्त मौके की नजाकत देखते हुए चुप बैठना पडा़ । लेकिन जिस तरह की टिप्पणियाँ और विचार वाम समर्थकों द्वारा व्यक्त किये जा रहे हैं, वह भविष्य के एक खतरे की ओर संकेत करते हैं…
कभी हमें पाठ्यपुस्तकों में यह बताया जाता है कि राम और कृष्ण मात्र कल्पना है, इनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है । यदि इन लेखकों की चले तो इनके अनुसार वैज्ञानिक आधार ईसा के जन्म के बाद ही माना जाता है । उसके पहले का भारत कुछ कबीलों, साँप पकड़ने वालों, और छोटी-छोटी रियासतों के आपस मे लड़ मरने वाला एक भूभाग मात्र ही था । उसकी कोई संस्कृति थी ही नहीं । अब कोई उनसे पूछे कि यदि राम और कृष्ण काल्पनिक हैं तो सदियों से उनके नाम, कर्म, कथायें और आदर्श पीढियों से पीढियों तक कैसे चलते आये हैं ? “नासा” ने यह क्यों कहा कि भारत और श्रीलंका के मध्य वाकई में एक पुलनुमा “स्ट्रक्चर” था ! महाभारत में “कुरुक्षेत्र” का उल्लेख क्यों है, टिम्बकटू का क्यों नहीं ? रामायण में पंचवटी का उल्लेख क्यों है, कजाकिस्तान का क्यों नहीं ? यह सब क्या है, मात्र कल्पना या एक मुखारविन्द से दूसरे मुखारविन्द तक फ़ैलती गई अफ़वाहें ? यह माना जा सकता है कि इन चरित्रों से जुडे़ कथानक कहीं-कहीं अतिशयोक्तिपूर्ण हो गये हों, लेकिन जब किंवदंतियाँ होती हैं, तो ऐसी कहानियाँ जन्म ले ही लेती हैं । मैं खुद यह मानने को तैयार नहीं हूँ कि गोवर्धन पर्वत सचमुच में एक ऊँगली पर उठाया गया होगा । हो सकता है यमुना नदी में एक भयंकर साँप को कृष्ण ने मारा होगा, जिसे अनेक लोगों ने कहानी सुनाते-सुनाते, दसियों फ़न वाले राक्षस का रूप दे दिया…अब जाहिर है कि अर्जुन के रथ पर हनुमान सवार नहीं हो सकते, लेकिन ऐसा कुछ तो हुआ ही होगा, जिसके कारण इस कथा को बल मिला, और हजारों वर्षों तक करोडों लोगों ने इस बात पर विश्वास किया । दरअसल इन घटनाओं के व्यापक विश्लेषण की आवश्यकता है, लेकिन सिरे से इनको काल्पनिक घोषित कर देना मानसिक दिवालियापन है.. ठीक उसी तरह जिस तरह से इन कहानियों पर आँख मूँद कर विश्वास कर लेना…अधिक दूर जाने की जरूरत नहीं है, अब से मात्र सौ वर्ष पश्चात लोग इस बात पर यकीन ही नहीं करेंगे कि अहिंसा से भी कोई आन्दोलन खडा किया जा सकता है, और गाँधी नाम का कोई व्यक्ति इस धरती पर चलता-फ़िरता रहा होगा, उस समय भी गाँधी के बारे में कई तरह के मिथक पैदा हो जायेंगे… ये तो होता ही है, लेकिन प्रत्येक बात को आँख मूँद्कर मान लेना या हरेक बात का विरोध के लिये विरोध ठीक नहीं है.. इन वाम लेखकों का बस चले तो ये तुलसीदास को भी काल्पनिक घोषित कर दें । दरअसल यह सब हो रहा है एक विशेष अभियान के तहत और विशिष्ट मानसिकता का पोषण करने के लिये… किस तरह से हिन्दुओं के मन में हीनभावना को जगाया जाये, यह इस मुहिम का हिस्सा होता है । हमें बताया जाता है कि महाराणा प्रताप भगौडे़ थे, या असल में शिवाजी का राज्य कभी था ही नहीं । औरंगजेब से लड़ने वाले सिख गुरुओं की भी प्रशंसा नहीं की जाती, लेकिन अकबर के दीन-ए-इलाही के कसीदे काढे जाते हैं… और भी ऐसे अनेकों उदाहरण हैं… हो सकता है कि इन्होंने यह सब किया भी हो, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि बाकी के सारे हिन्दू राजा या लडाके निरे मूर्ख थे ? इसी विध्वंसक मानसिकता से ग्रसित होकर सतत वन्देमातरम का विरोध किया जाता है, सरस्वती वन्दना की हँसी उडाई जाती है, हिन्दी को हीन दृष्टि से देखने की परम्परा विकसित की जाती है… प्रेमचन्द कुछ नहीं थे, लेकिन शेक्सपीयर महान थे, निराला और महादेवी वर्मा को कोई खास महत्व नहीं लेकिन कीट्स का गुणगान, यह सब क्या है ? बार-बार यह अह्सास दिलाने की कोशिश की जाती है कि “भारत की संस्कृति” नाम की कोई चीज ही नहीं है । लेकिन उन “बाँये चलने वाले लेखकों” के लाख प्रयासों के बावजूद यह तथ्य एक सर्वेक्षण में उभरकर आया है कि लोगों में धार्मिकता बढी है, चाहे उसके कोई दूसरे कारण क्यों ना हो । इस स्थिति का फ़ायदा अंधविश्वास बढाने में लगे “दुकानदारों” ने भी उठाया है, और अधिक आक्रामक तरीके से अपनी “मार्केटिंग” करके जनता में धर्म को प्रचारित करने में लगे हैं । जबकि लोगों में अपने इतिहास का सच जानने की भूख है । आवश्यकता है उसे सही दिशा देने की, उन्हें वैज्ञानिक तरीके से समझाने की, तर्क-वितर्क से बात को दिमाग में बैठाने की,  न कि उनके दिमागों में गलत-सलत जानकारी भरने की । लेकिन दुर्भाग्य से यही हो रहा है, जिसमें दोनों पक्ष शामिल हैं….

पौराणिक मान्यताओं पर प्रश्नचिन्ह क्यों ?

क्या किसी देश का इतिहास या उसकी पौराणिक मान्यतायें शर्म का विषय हो सकती हैं ? यदि हजारों वर्षों के इतिहास में कोई शर्म का विषय है भी, तो उसके मायने अलग-अलग समुदायों के लिये अलग-अलग क्यों होना चाहिये ? यह सवाल आजकल कई लोगों के मनोमस्तिष्क को झकझोर रहा है । इतिहास के साथ छेड़छाड़ करना शासकों का प्रिय शगल रहा है, लेकिन जब बुद्धिजीवी वर्ग भी उसी मुहिम में शामिल हो जाये तो फ़िर यह बहस का विषय हो जाता है । मंगल पांडे पर एक फ़िल्म बनती है और सारे देश में उसके बारे में चर्चा होने लगती है, पोस्टर फ़ाडे जाने लगते हैं, चाणक्य पर एक धारावाहिक बनता है, तत्काल उसे सांप्रदायिक घोषित करने की मुहिम चालू हो जाती है, ऐसा ही कुछ रामायण के बारे में भी करने की कोशिश की गई थी, लेकिन चूँकि रामायण जन-जन के दिल में बसा है, इसलिये विरोधियों को उस वक्त मौके की नजाकत देखते हुए चुप बैठना पडा़ । लेकिन जिस तरह की टिप्पणियाँ और विचार वाम समर्थकों द्वारा व्यक्त किये जा रहे हैं, वह भविष्य के एक खतरे की ओर संकेत करते हैं…
कभी हमें पाठ्यपुस्तकों में यह बताया जाता है कि राम और कृष्ण मात्र कल्पना है, इनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है । यदि इन लेखकों की चले तो इनके अनुसार वैज्ञानिक आधार ईसा के जन्म के बाद ही माना जाता है । उसके पहले का भारत कुछ कबीलों, साँप पकड़ने वालों, और छोटी-छोटी रियासतों के आपस मे लड़ मरने वाला एक भूभाग मात्र ही था । उसकी कोई संस्कृति थी ही नहीं । अब कोई उनसे पूछे कि यदि राम और कृष्ण काल्पनिक हैं तो सदियों से उनके नाम, कर्म, कथायें और आदर्श पीढियों से पीढियों तक कैसे चलते आये हैं ? “नासा” ने यह क्यों कहा कि भारत और श्रीलंका के मध्य वाकई में एक पुलनुमा “स्ट्रक्चर” था ! महाभारत में “कुरुक्षेत्र” का उल्लेख क्यों है, टिम्बकटू का क्यों नहीं ? रामायण में पंचवटी का उल्लेख क्यों है, कजाकिस्तान का क्यों नहीं ? यह सब क्या है, मात्र कल्पना या एक मुखारविन्द से दूसरे मुखारविन्द तक फ़ैलती गई अफ़वाहें ? यह माना जा सकता है कि इन चरित्रों से जुडे़ कथानक कहीं-कहीं अतिशयोक्तिपूर्ण हो गये हों, लेकिन जब किंवदंतियाँ होती हैं, तो ऐसी कहानियाँ जन्म ले ही लेती हैं । मैं खुद यह मानने को तैयार नहीं हूँ कि गोवर्धन पर्वत सचमुच में एक ऊँगली पर उठाया गया होगा । हो सकता है यमुना नदी में एक भयंकर साँप को कृष्ण ने मारा होगा, जिसे अनेक लोगों ने कहानी सुनाते-सुनाते, दसियों फ़न वाले राक्षस का रूप दे दिया…अब जाहिर है कि अर्जुन के रथ पर हनुमान सवार नहीं हो सकते, लेकिन ऐसा कुछ तो हुआ ही होगा, जिसके कारण इस कथा को बल मिला, और हजारों वर्षों तक करोडों लोगों ने इस बात पर विश्वास किया । दरअसल इन घटनाओं के व्यापक विश्लेषण की आवश्यकता है, लेकिन सिरे से इनको काल्पनिक घोषित कर देना मानसिक दिवालियापन है.. ठीक उसी तरह जिस तरह से इन कहानियों पर आँख मूँद कर विश्वास कर लेना…अधिक दूर जाने की जरूरत नहीं है, अब से मात्र सौ वर्ष पश्चात लोग इस बात पर यकीन ही नहीं करेंगे कि अहिंसा से भी कोई आन्दोलन खडा किया जा सकता है, और गाँधी नाम का कोई व्यक्ति इस धरती पर चलता-फ़िरता रहा होगा, उस समय भी गाँधी के बारे में कई तरह के मिथक पैदा हो जायेंगे… ये तो होता ही है, लेकिन प्रत्येक बात को आँख मूँद्कर मान लेना या हरेक बात का विरोध के लिये विरोध ठीक नहीं है.. इन वाम लेखकों का बस चले तो ये तुलसीदास को भी काल्पनिक घोषित कर दें । दरअसल यह सब हो रहा है एक विशेष अभियान के तहत और विशिष्ट मानसिकता का पोषण करने के लिये… किस तरह से हिन्दुओं के मन में हीनभावना को जगाया जाये, यह इस मुहिम का हिस्सा होता है । हमें बताया जाता है कि महाराणा प्रताप भगौडे़ थे, या असल में शिवाजी का राज्य कभी था ही नहीं । औरंगजेब से लड़ने वाले सिख गुरुओं की भी प्रशंसा नहीं की जाती, लेकिन अकबर के दीन-ए-इलाही के कसीदे काढे जाते हैं… और भी ऐसे अनेकों उदाहरण हैं… हो सकता है कि इन्होंने यह सब किया भी हो, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि बाकी के सारे हिन्दू राजा या लडाके निरे मूर्ख थे ? इसी विध्वंसक मानसिकता से ग्रसित होकर सतत वन्देमातरम का विरोध किया जाता है, सरस्वती वन्दना की हँसी उडाई जाती है, हिन्दी को हीन दृष्टि से देखने की परम्परा विकसित की जाती है… प्रेमचन्द कुछ नहीं थे, लेकिन शेक्सपीयर महान थे, निराला और महादेवी वर्मा को कोई खास महत्व नहीं लेकिन कीट्स का गुणगान, यह सब क्या है ? बार-बार यह अह्सास दिलाने की कोशिश की जाती है कि “भारत की संस्कृति” नाम की कोई चीज ही नहीं है । लेकिन उन “बाँये चलने वाले लेखकों” के लाख प्रयासों के बावजूद यह तथ्य एक सर्वेक्षण में उभरकर आया है कि लोगों में धार्मिकता बढी है, चाहे उसके कोई दूसरे कारण क्यों ना हो । इस स्थिति का फ़ायदा अंधविश्वास बढाने में लगे “दुकानदारों” ने भी उठाया है, और अधिक आक्रामक तरीके से अपनी “मार्केटिंग” करके जनता में धर्म को प्रचारित करने में लगे हैं । जबकि लोगों में अपने इतिहास का सच जानने की भूख है । आवश्यकता है उसे सही दिशा देने की, उन्हें वैज्ञानिक तरीके से समझाने की, तर्क-वितर्क से बात को दिमाग में बैठाने की,  न कि उनके दिमागों में गलत-सलत जानकारी भरने की । लेकिन दुर्भाग्य से यही हो रहा है, जिसमें दोनों पक्ष शामिल हैं….